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समय के जख्म का मरहम

मंजु शर्मा
गीताश्री की लिट्टी चोखा और अन्य कहानियाँ का ऐसा कहानी संग्रह है जिसमें शहरों की जंदगी साँसें ले रही है, तो दिल में कहीं गाँव धडक रहा है। गाँवों से शहरों में आ बसे लोगों में गाँव की जडें कहीं गहरे धंसी है...गाँव कभी भी पूरी तरह शहर में तब्दील नहीं हो सकता, तो शहर भी गाँव के साथ नहीं चल सकता। संग्रह की कहानियाँ बिहार के ग्राम्य जीवन को बहुत सहेज कर साथ लिए चलती हैं या तब भी जबकि पात्र शहरों की जद्दोजहद भरी जिंदगियाँ जी रहे हैं।
पुस्तक का शीर्षक आकर्षित करता है और एक ललक मन में भर देता है, पाठक पढते हुए कब अंतिम कहानी तक पहुँच जाता है पता ही नहीं चलता। आकर्षक आवरण पृष्ठ में सजी कुल दस कहानियों वाले इस संग्रह की खास बात यह है कि इसमें कहानियाँ अनावश्यक विस्तार लिए हुए नहीं हैं जिससे त्वरित गति से पाठक बढता जाता है। संग्रह की कहानियाँ बिल्कुल अलग अंदाज में अभिव्यक्त हुईं है। कहानियों के शीर्षक भी बहुत आकर्षक और उत्सुकता जगाने वाले हैं। विषयवस्तु भी बहुत नवीनता लिए हुए है। गाँव से शहर आ बसे पात्रों में साँसें लेता गाँव ही इन कहानियों को जीवंत बनाता है। ग्राम्य जीवन की झलक, लोकगीत, मुहावरे, खानपान, रीतिरिवाज इन कहानियों की आंचलिकता को पुख्ता बनाते हैं, मसलन रतिया, कहवाँ बिताउली हो रामा... हो या
फुलवा में फुलवा एगो चंपा फुलवा,
गोरिया करैये सिंगार चमेली फुलवा हो या
बहिन सभ के नेग पहिले चुकईयो हे दुलरुआ भइया
तब जइहो कोहबर अपन...हे दुलरुआ भइया
लोकगीतों की मधुरता कहानियों में ताजगी भर देती है। कहानियों के पात्र चाहे वो रम्या हो, पमपम हो, राजा बाबू हो, नीलू कुमारी हो, आशना हो, उमा कुमारी हो,नीलन्ति हो या सपना हो, सबकी अपनी पहचान है जो आजकल के रूटीन पात्रों से बिल्कुल अलग हैं। रम्या शहर से गाँव आती है तो बालमन का प्रेम फिर जीवित हो उठता है... राजाबाबू के गीतों में कहीं साँसें लेता बचपन का नेह। वह राजाबाबू के माध्यम से बिछडे मीत को ढूंढ लेना चाहती है।
रम्या के मन में तो एक गाना बसा था, उसके बारे में और बात करना चाहती थी, एकांत की तलाश थी। सोचा उत्सव की रात निकल जाए, चलने से पहले बात करेगी। राजाबाबू शायद मददगार साबित हों- कहानी नजरा गईली गुइयाँ की रिया भी स्त्री के विद्रोही रूप को दर्शाती हुई अपनी माँ की मृत्यु पर माँ के प्रेमी रहे पमपम को बुलाती है जो उसकी मां की अंतिम इच्छा है। मां के खत में लिखा है मेरी इच्छा है कि बिना अपने भाइयों को बताए, पमपम को इज्जत से बुलाओ, यहाँ से बेइज्जत करके निकाला गया है, तुम इज्जत देना उसको।
इस संग्रह की हर स्त्री पात्र विद्रोही तेवर लिए है। पढी-लिखी हो या अपढ, हर स्त्री का अपना स्वाभिमान जंदा है... परिस्थितियों के आगे घुटने टिकाने वाली वह नहीं, अगर मन की न हुई तो भी वह संघर्ष करती हुई आगे बढती है।
गाँव से महानगर में रोजी रोटी के लिए आई नीलू का, प्रेमी टुल्लू को दिया जवाब उसकी खुद्दारी दर्शाता है रिचार्ज का उधार है... हम उधार नहीं रखते किसी का, हम कमाते हैं अब, किसी के आगे हाथ नहीं फैलाते।
इसी तरह दगाबाज रे... की उजियारी नवविवाहिता होते हुए भी अपनी शर्तों पर जन्दगी जीने का फैसला करती है वह कहती है मुझे हनीमून पर जाना है। नैनीताल। जल्दी... मेरी एक और सहेली वहाँ परसों पहुँच रही है पति के साथ हनीमून के लिए... उजियारी के मन की नहीं होती तो वह पति का घर छोड देती है और वापस घर लौट कर नहीं आती।
संग्रह की कहानियों में स्त्री पात्र अपने आप में मुकम्मल हैं, चाहे भीतर कितनी भी टूटन क्यों न हो। खोए सपनों का द्वीप की आशना भी एक मजबूती लिए उठती है। कहानी में आया यह कथन उसके मजबूत व्यक्तित्व को दर्शाता है, जबकि वह गाँव से शहर आई एक संवेदनशील लडकी है जो अपने भीतर छुपी हुई मजबूत लडकी को खोज चुकी थी। इसी प्रकार सभी कहानियों के नारी पात्र बहुत खुद्दार, वक्त के आगे सिर उठाकर चलनेवाले हैं।
नारी संघर्ष, घुटन, पीडा और विद्रोह के ताने-बाने से बुनी कहानियों के बीच कहीं अतृप्त प्रेम साँसें ले रहा है तो कहीं प्रेम के लिए देश काल की सीमाओं को लाँघती नायिका है। कहानियों के कथानक गाँव से शहर आकर बसे लोगों और गाँव में बसे लोगों के इर्दगिर्द घूमते हैं। बिहार के ग्राम्य जीवन से जुडे पात्रों के जीवन में भी बिहार रक्त की तरह धमनियों में बह रहा है। पात्रों के नजरिये से देखें, तो महिला प्रधान कहानियाँ हैं... प्रायः सभी पात्र सशक्त हैं, समय के थपेडे खाकर सब परिपक्व हो जातीं हैं। इसके पात्र वे पात्र हैं जिनको समाज में कोई हैसियत नहीं मिली या किसी मुकाम पर पहुँचे अतिनायक- नायिकाएँ इसमें नहीं दिखाई देते। जो भी पात्र हैं वे बहुत मामूली, कोई विस्थापना का दंश झेल रहा है, तो कोई रोटी की तलाश में शहर और गाँव के रास्तों को नाप रहा है। इस पाखंडी समाज में जिनकी कोई गिनती नहीं उन जुझारू पात्रों के बूते कहानियाँ अपने मुकाम तक पहुँचती हैं और इस दृष्टि से सफल भी हुईं हैं। इस संग्रह की खास बात है कि यह अनावश्यक ही किसी विमर्श के बोझ तले नहीं दबी हुई हैं। सहज ही स्त्री के मन की पीडा, उसका राग द्वेष,आशा-आकांक्षा, सपने, सफलता, असफलता सब व्यक्त होते चले जाते हैं... कहीं कुछ आरोपित नहीं लगता, समाज के हर तबके के लोगों के जीवन की कशमकश से यह कहानियाँ बुनी गई हैं।
यह बहुत बडी बात है कि विमर्शों के इस दौर में गीताश्री बहुत अलग अंदाज की कहानियाँ लेकर आई हैं... एकदम फ्रेश।
सबसे बडी बात कि आजकल बेबाक लेखन के चलते लेखक वह सब भी लिखने लगते हैं जो सन्दर्भों से कटा हुआ लगता है, पर गीताश्री के इस संग्रह में बोझिल और बोल्ड दृश्य, उत्तराधुनिकता के जबरन ठूँसे हुए संवाद नहीं है, यह इस संग्रह की खासियत है। जबरन ओढी हुई बोल्डनेस कभी- कभी कहानियों को स्तरहीन बना देती है। लिट्टी चोखा और अन्य कहानियाँ इस लिहाज से अपना एक स्तर मेंटेन रखती हैं।
संवाद की दृष्टि से देखें तो यह एक बेहतरीन संग्रह है जिसमें कथा को गतिशील बनाते, बिहारी रंगत को संजोए,पात्रानुकूल संवाद हैं।
यह मोबाइल युग है और कहानियों में देशकाल और वातावरण आज को उद्घाटित करता है, एक उदाहरण न व्हाट्सएप देखा था न फेसबुक। न मैसेंजर। जैसे ही वॉल पर गई, नोटिफिकेशन आने शुरू।
इसी तरह उस रात जब वह बेखबर सो गया, मैंने जागते हुए एचडी फॉर्मेट में फाइव डी सपने देखे...कोई और ऐसे फॉर्मेट में सपने देखता है या नहीं, मुझे नहीं मालूम, मैंने देखे हैं। आधुनिक युग की देन है मनोरोगों का बढते जाना। गन्ध-मुक्ति की नायिका गाँव से शहर आई है, पर अतीत की एक घटना उसके अवचेतन को मथती रहती है... यह मंथन आज की जीवन शैली की देन है... कहानी में यद्यपि गाँव से जुडी घटना नायिका को विचलित करती है। कहानी का यह वाकया इसका प्रमाण है ऑब्शेशिव कंपल्सिव डिसऑर्डर हो सकता है। इसकी सिंपल थ्योरी है कि कोई भी चीज या सेंसेशनल चीज चाहे वो घटना हो, भाव हो, डर हो, चेहरा हो जिसके बारे में हमको पता होता है कि ये ई-रेशनल है....।
127वाँ आदमी उर्फ... की नायिका आधुनिक जीवन की विसंगतियों को झेलती है वह कभी मेकअप करती है और अपना लुक पूरा का पूरा बदल लेती है, कभी कपडों की शॉपिंग तो कभी गैर जरूरी एसेसरीज की...
इस तरह आधुनिक जीवन की विसंगतियाँ कहानियों में दिखाई देती है।
कहानियों की भाषा बिहार अंचल की मिठास लिए हुए है, कहानियों में तिरहुत-मिथिला की गंवई महक है। कुछ उदाहरण देखे जा सकते हैं यथा-
बडे भाग वाले के काम में हंकपडवा आते हैं। अब त अइसे भी गाँव ज्वार में ढूँढे नहीं मिलते
ऐ दुलहिन...सिर पर अंचरा रखो, बूझी...चलो ।
ललनाओं का भाग्य वैसे ही घूमता है जैसे घूमे उनकी मनोवृत्ति
बउवा, कोनो चीज चुरा कर भागा है क्या, बोलिये तो किसी को दौडावें
इसी प्रकार बेचारी टुअर बच्ची... हे भगवान, बडी कठकरेज औरत थी...
कथानुसार अंग्रेजी, उर्दू आदि के शब्दों का चयन भी कहानी को खूबसूरत बनाता है।
इसी तरह कहानियों में कुछ आप्त वाक्य भी दिखाई देते हैं, पर बहुत ही कम जैसे-
स्त्री की ताकत उसका आत्मविश्वास, जैसे नदी की ताकत उसका पानी, जैसे साँस की ताकत हवा
उसकी आत्मा में अब गन्ध नहीं, एक जला हुआ संसार बसेगा
पराजय तब नहीं होती जब आप गिर जाते हैं, पराजय तब होती है जब आप उठने से इनकार कर देते हैं।
समय के जख्म का मरहम भी समय ही होता है।
शैली की दृष्टि से कहानियाँ कुछ कमजोर लगती हैं, कहानियाँ सीधे अभिधा में चलती हैं... सामान्य पाठक के लिए तो यह ठीक है, पर कमजोर अभिव्यक्ति और वैचारिकता के अभाव में कहानियाँ लचर-सी प्रतीत होती हैं। अभिव्यक्ति कौशल और कलात्मकता और जुड जाती, तो कहानियाँ खूबसूरत बन पडतीं क्योंकि लोकजीवन की महक इन कहानियों में नवीनता लाती हैं पर टेक्नीक की यह कमी खलती है। मैं यह कह सकती हूँ कि विषयगत विविधता और परिवेश की सघनता अवश्य कहानियों के प्राण हैं और इस नाते ये कहानियाँ खरी हैं।

कहानियों का जो मजबूत पक्ष है वह है, मानव मन की गुत्थियाँ, भीतर की टूटन, बदलते परिवेश में अपना अस्तित्व ढूँढते स्त्री-पुरुष, महानगरीय जीवन का खालीपन, रिश्तों का खोखलापन, रिक्तता की अनुभूति... सबकुछ मिलाकर गढी हुई कहानियाँ अपने-आप में सशक्त तो हैं, पर पात्रों का अंतद्वन्द्व और कुछ दर्शन का पुट और मिल जाता तो कहानियों में चार चांद लग जाते। वैसे दर्शन तो स्वतः ही शामिल हो जाता है क्योंकि वह लेखक के नजरिये में ही झलकता है, पर यह प्रयत्न प्रसूत नहीं हो सकता...चिंतन की एक सतत प्रक्रिया होती है, जो नदी की तरह बहती है, यह अभाव खटकता है।
कुल मिलाकर गीताश्री गाँवों, कस्बों और शहरों के जीवन को सशक्त रूप से अभिव्यक्ति देती हैं... कहानियाँ बहुत छोटे-छोटे से कैनवास पर उकेरी गई हैं पर उसमें मानव मन की बहुत बडी पीडा और जन्दगी की बहुत बडी जद्दोजहद, पात्रों के अवचेतन के विहंगम दृश्य बहुत कम शब्दों में उकेर दिए हैं। लिट्टी चोखा और अन्य कहानियाँ आज के दौर में पीछे छूटे हुए कल को साथ लिए चलती कहानियाँ हैं...कुल मिलाकर अगर आपको बिल्कुल अलग कलेवर की कहानियाँ पढनी हों, तो यह एक अच्छा कहानी संग्रह कहा जा सकता है। अपने सपनों की तलाश में गाँवों से शहर की ओर रुख करने वाले युवा अपने साथ पोटली में गाँव लिए आते हैं... छोटे- छोटे से एहसासों से भरी कहानियाँ बारिश की हल्की फुहारों सी हैं, जो मन को भिगोती भी है और साहस भी देती हैं। ये कहानियाँ शहरों में बसे गाँव के युवाओं और गाँवों के संघर्षों को झेल रहे मानव मन की गहन पडताल है। विषय तो कमोबेश वही होते हैं पर कहानियों में साँसें लेता संसार अपनी अलग जमीन रखता है और वही उन्हें अन्य कहानियों से अलग करता है। इस लिहाज से गीताश्री का यह संग्रह बिल्कुल नवीनता लिए है।
पुस्तक समीक्षा
लिट्टी चोखा और अन्य कहानियाँ
लेखक- गीताश्री
प्रकाशक -राजपाल एन्ड संस्
मूल्य - रू. 160
प्रकाशन वर्ष : २०१९

सम्पर्क : द्वारा डॉ. दिनेश शर्मा,
रजतसीप, नई सडक, चूरू - ३३१००१
मो. ९४१४६६५९५५