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अथ पद्मावत : स्त्री व्यथा-कथा

रामबक्ष
पद्मावती के बारे में जो भी कोई चर्चा करता है उसका आधार आज भी जायसी का पद्मावत ही है। हालांकि पद्मावत पूरी तरह से ऐतिहासिक ग्रंथ नहीं है। इसमें अतिरजनाएँ हैं, अविश्वसनीय कल्पनाओं की उडान है। अति यथार्थवादी विवरण है। धार्मिक-पौराणिक मान्यताएँ हैं। कुछ ऐसी मान्यताओं की कल्पना कर ली गई है कि इतिहास का होते हुए भी यह ग्रंथ ऐतिहासिक नहीं है, तब भी पद्मावती की कथा को लोक में पुनःस्थापित करने का श्रेय जायसी को जाता है। इसलिए जब भी हम पद्मावती की कथा को नए सिरे से पढते हैं, तो सबसे पहले यह जान लेना जरूरी समझते हैं कि इस प्रकरण पर जायसी ने क्या लिखा है? आप जायसी से सहमत हों या न हों, उनके मत की छाया आप के लेखन पर रहती है, यह जायसी की सबसे बडी ताकत है और नए आने वाले लेखक के सामने सबसे बडी चुनौती भी।
राजेन्द्र मोहन भटनागर के उपन्यास अथ पद्मावती के लिए भी सबसे बडी चुनौती यही है। लेखक ने पुस्तक पर यह घोषणा कर रखी है कि यह चित्तौड की रानी पद्मावती की ऐतिहासिक दास्तान है। भले ही यह उपन्यास ऐतिहासिक होने का दावा कर रहा हो, तो भी किसी प्रकरण पर जायसी के मत को जाने बिना हम आगे नहीं बढ सकते। आपको भी निर्णय लेना होता है कि आप कहाँ जायसी से असहमत हैं या सहमत हैं। इसलिए इस उपन्यास को पढते समय इसका पाठक भी मन ही मन जायसी को ही याद कर रहा होता है।
जायसी के अनुसार पद्मावती संसार की सबसे सुन्दर स्त्री थी। यह बात तो उपन्यासकार भी मानता है। उसी सौन्दर्य से प्रभावित होकर अलाउद्दीन चित्तौड पर आक्रमण करता है। रतनसेन के मन में भी पद्मावती को पाने का लोभ है और यह लोभ राघव-चेतन के प्रयासों से जागता है। यह अलग बात है कि उनका यह विवाह यहाँ शुद्ध प्रेम विवाह नहीं है (जैसा जायसी ने दिखाया है) वरन् राजनीतिक सौदेबाजी के अन्तर्गत होता है, ताकि इस विवाह से चित्तौड और रणथम्भौर का राजनीतिक-कूटनीतिक रिश्ता मजबूत हो सके। इसलिए यहाँ रतनसेन जोगी नहीं बनता।
फिर उपन्यास की पद्मावती सिंहलद्वीप की नहीं थी वरन् रणथम्भौर की राजकुमारी थी। इस तरह सिंहलद्वीप का सारा वर्णन काल्पनिक मानकर उपन्यासकार छोड देता है। लेकिन जायसी का प्रभाव उनका पीछा नहीं छोडता। पद्मावती के जीवन की कथा कहते-कहते उपन्यासकार बताता है कि पद्मावती रणथम्भौर के राजा हम्मीरदेव और उनकी पत्नी चम्पावती की संतान है। अब चम्पावती कौन है? एक भावुक प्रकरण में चम्पावती अपने पति हम्मीर से कहती है मैंने पहले ही कह दिया था कि सिंहल से आई हूँ। सौन्दर्य आभा में मेरी जाति पद्मिनी है और वीरांगना क्षत्रिय से। (अथ पद्मावती, पृ.सं. १०८)। तो पद्मावती के सौन्दर्य का राज यह है कि उसकी माँ सिंहल से आई है और वह पद्मिनी जाति की रही है। माँ के अनुरूप बेटी का रूप निखरता ही है, इसलिए वह संसार की सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी है। बाकी जम्बूद्वीप में अर्थात् भारतभूमि में ऐसी सुन्दरी होती नहीं है।
इस उपन्यास में लेखक का यह दावा है कि इसमें ऐतिहासिकता है अर्थात् जैसा पद्मावती का जीवन रहा होगा, वैसा वर्णन इस उपन्यास में है। पद्मावती का जीवन रणथम्भौर में बीता। वह राजपूत परिवार की बेटी थी, वहीं पली-बढी। लेखक ने विस्तार से पद्मावती के बचपन और किशोरावस्था का वर्णन किया है। यह कितना ऐतिहासिक है और कितना काल्पनिक? कहना मुश्किल है। इतिहास ग्रंथों में राजपूत कन्याओं के पालन-पोषण का विवरण कितना है? और उसमें से कितना लेखक की नजरों से गुजरा है? इसके बारे में भी कुछ कहना मुश्किल है। इस पूरे प्रकरण को पढते हुए लगता है कि यह मध्यवर्गीय परिवार के लाड-प्यार में पली-बढी लडकी का जीवन है। जिसके घर में धन-धान्य की कोई कमी नहीं है। पिता बहुत प्यार करते है। माँ जिसकी चिन्ता करती रहती है। सखियाँ-सहेलियाँ भी बहुत संवेदनशील हैं। जैसा आदर्श और सुखी जीवन किसी कन्या को मिलना चाहिए, वह पद्मावती को मिलता है। इस पूरे वर्णन और विवरण में ऐसा कहीं नहीं लगता कि यह राजपूत परिवार है। सिर्फ बाहरी आवरण राजपरिवार का है। यह राजपरिवार राजपूत परिवार है, ऐसा कहीं रेखांकित नहीं होता। हाँ, किशोरवय की कन्या के माता-पिता को उसकी सुरक्षा की चिन्ता होती है। सुन्दर कन्या की चिन्ता अधिक होती है। मध्यकालीन राजपरिवारों में यदि किसी के घर पर सुन्दर कन्या पैदा हो जाती है, तो किशोरावस्था से ही माँ-बाप चिन्ता करने लगते थे। कयोंकि यदि किसी राजा की नजर उस पर पडी तो वह आक्रमण कर देगा या कन्या का अपहरण कर के ले जाएगा। यह आशंका पद्मावती के माँ-बाप को भी है, परन्तु किसी मध्यवर्गीय परिवार की भी यह चिन्ता हो सकती है। इसमें भी माँ मनका चिन्तित है। पिता तो निश्चिंत हैं।
राजपूत परिवारों में लडकी का लालन-पालन कैसे होता है? इसके बारे में इतिहास में कितना प्रामाणिक विवरण उपलब्ध है और उसमें से कितने का उपन्यासकार ने अध्ययन किया है? इसका कोई प्रमाण इस उपन्यास में नहीं मिलता है। अतः लेखक ने यहाँ कल्पना से ही पद्मावती की किशोरावस्था का वर्णन किया है और यह मानकर किया है कि मध्यकाल में पद्मावती को बचपन से किशोरावस्था तक सर्वोत्तम जीवन मिला होगा। तभी तो उसका व्यक्तित्व इतना निर्मल, पवित्र और तेजस्वी है। यह सब सही है, परन्तु यह ऐतिहासिक है यह कहना मुश्किल है।
यहाँ जायसी शान्त हैं वहाँ उपन्यासकार भी कुछ नहीं बताता। मसलन उपन्यास में यह कही नहीं बताया गया कि नागमती का पीहर कहाँ था? इस तरह बहुत कुछ छूट गया है, जो जायसी से भी छूटा था। जायसी ने चित्तौड के शासकों का गौत्र चौहान बताया। यह तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने जायसी की इस भूल पर टिप्पणी की थी और बताया था कि चित्तौड पर सिसोदिया राजपूतों का शासन था। फिर पद्मावत में रतनसेन की मृत्यु अलाउद्दीन के हाथों नहीं होती, बल्कि पडौसी राजा से लडते हुए होती है। फिर नागमती और पद्मावती सती हो जाती है।
उपन्यास में हम्मीरदेव और रतनसिंहन का अपना अधिकांश समय घर में, परिवार के साथ बीतती है। वे कूटनीतिज्ञ व्यक्ति नहीं लगते। राजसभा की सारी बातें घर आकर अपनी पत्नी को बताते हैं। पत्नी भी उस पर अपनी राय देती है। राजसभा में क्या हुआ? इसकी जिज्ञासा स्त्रियों में भी रहती थी। यह सब जानकारियाँ दास-दासियों, सेवकों आदि से छन-छन कर उनके पास आती थीं। और जब कोई निर्णायक बात होती, तब कभी-कभी राजा से भी पूछ लेती थीं। या किसी भावुक क्षण में राजा स्वयं रानी को बता देता। परन्तु ऐसा आमतौर पर नहीं होता कि राजकाज की दैन्दिन घटनाओं की चर्चा... राजमहल में होती हो और रानी को सब बात पता होती हो। राजकाज के षड्यंत्रों से वे अपरिचित रहती हैं, बल्कि उन्हें अपरिचित रखा जाता है।
उपन्यास में तीन प्रमुख स्त्री पात्र हैं, हम्मीरदेव की पहली पत्नी चम्पावती, दूसरी मनका और तीसरी पद्मावती तीनों ही स्त्रियाँ जब पुरुषों से बात करती हैं तब उनका प्रिय विषय होता है स्त्री-पुरुष भेदभाव का विरोध। यह विरोध आधुनिक है, मध्ययुगीन तो नहीं है। मध्ययुग में पुरुष सत्ता का वर्चस्व स्वीकृत था। चंपावती कहती है स्त्री-पुरुष दोनों बराबर है। स्वस्थ परम्पराएँ सबके लिए समान हैं। उनमें कोई भेद-भाव नजर नहीं आता। फिर स्त्री के लिए इतनी पाबंदी क्यों? .... क्यों उसको पिंजरे में ला पटका? रानीवास में राजी-गैर राजी स्त्रियों को डालते जाओ।.... उनको कौन संतुष्ट करेगा? उनका तो जीवन हो गया नरक (अथ पद्मावती, पृ.109)।
एक बार पद्मावती को कुछ याद आ रहा है... दीदी, म्हारा जीवन बिना जड की बेल जैसा है या उससे भी बदतर उन पुरुषों का क्या एक से मन भरा, तो दूसरी ले आय और जरूरत पडी, तो रखैल पाल ली। उनकी संतान लडकी हुई, तो उसका पालन-पोषण राजसी ठाठ से हुआ, ताकि उसके कली बनते ही उसे भी अपनी हवस का शिकार बना सके। वे गोली बनकर रह गयीं।... मुझे हँसी आती है, दीदी, जब युद्ध में ये हार के मुकाम पर होते हैं, तब चाहते हैं कि आक्रमणकर्ता की जीत के बाद हम उनके हाथ पडकर भ्रष्ट ना हो जायें।.... कभी सोचा उन्होंने कि उन्होंने कितनों की अस्मत लूटी, उनको भ्रष्ट किया। अपने ही लोग, राजघराने से होकर अपनी ही लडकियों पर क्या-क्या अत्याचार करते हैं? और हमारे साथ उन्होंने क्या किया, अपना मन बहलाकर, हमें महल के एक कौने में डाल दिया। सारी जिन्दगी उस कैद में पडे, हम अपनी इच्छाओं का दमन कर घुट-घुट कर जियें-मरें। अचानक हमारी इज्जत का ख्याल आते ही जौहर की ज्वाला में धकेल दिया और उस पर भी नाम या श्रेय खुद ने लिया। (अथ पद्मावती, पृ.सं. 205-6)
एक प्रकरण में पद्मावती रतनसेन से कहती है सच्चाई यह है कि मुझे तलवार चलानी अच्छी तरह आती है। पैतरेबाजी की भी अक्ल है। घुडसवार और निशाने पर तीर छोडना मेरी पहचान है।.... कभी अवसर दीजिए।.... क्षत्राणी का यह हुनर भी देख लीजिए।... तभी तो मैं चाहती हूँ कि नारी को कमजोर....नाजुक...घर की देख-रेख और चारदीवारी से बाहर आने दिया जाए, तो हर दृष्टि से राज्य की हुकूमत इंसाफ की इज्जत, फौज की ताकत और राज्य के प्रबंधन में न केवल इजाफा होगा, बल्कि प्रजा का विश्वास बढेगा। (अथ पद्मावत, पृ. 193)
यह तीनों उद्धरण उस काल की स्त्री की मानसिकता को प्रकट करते हैं। इस पर टिप्पणी करने के स्थान पर कुछ अन्य बातों पर भी विचार किया जाए। उपन्यास में मनका जब-जब भी हम्मीरदेव से मिलती है तो वह हम्मीरदेव को नैतिक रूप से थोडा नीचा साबित करती रहती है और हम्मीरदेव अपराधी की तरह उसके सामने खडे रहते हैं। मनका को हम्मीरदेव बलात् हरण कर के लाए थे। इसी तरह पद्मावती भी रतनसेन से नैतिक रूप से ऊपर रहती है।
इस उपन्यास को पढकर दो प्रश्न अनुत्तरित रह जाते हैं। एक, यदि पद्मावती अनिंद्य सुन्दरी न होती, तब भी क्या अलाउद्दीन चित्तौड पर आक्रमण करता? यदि आक्रमण नहीं करता, तो राघव-चेतन की भूमिका इतनी महत्त्वपूर्ण नहीं होती। यदि वह तब भी आक्रमण करता, तो उसकी भूमिका थोडी कमजोर हो जाती। एक स्थान पर वर्णन आता है सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने बराबर प्रयत्न किए कि रतनसिंह के साथ संधि हो जाये। वह अधीनता स्वीकार कर ले और सालाना कर देता रहे। इस सुभीता के साथ कि गुजरात से आने-जाने वाला माल बिना कर अदा किए आता-जाता रहे। उसकी एवज में अपने जीते हुए इलाके में से कुछ भाग उसे दिया जाएगा। (अथ पद्मावती, पृ.सं.215) यदि ऐसा है तो चित्तौड युद्ध में पद्मावती का दोष जरूर कुछ कम हो सकता है। उपन्यासकार को इस पर विचार करना चाहिए था, लेकिन जायसी के दबाव में लेखक ऐसा नहीं सोच पाया। दूसरा प्रश्न पद्मावती के जौहर से सम्बन्धित है। पद्मावती ने जौहर किया था, यह ऐतिहासिक तथ्य है। उपन्यासकार इससे सहमत भी है। तब पद्मावती के चरित्र को इतना आधुनिक रूप क्यों दिया? आधुनिक नारी संघर्ष करती है, पद्मावती भी कर सकती थी। यदि जौहर ही करना था, तो लेखक को उसका व्यक्तित्व उसी तरह से विकसित करना चाहिए था, जो उस तरह से नहीं किया गया है। जो भी है - उपन्यास पठनीय है, भाषा साफ-सुथरी है और वर्णन श्लाघनीय है।
पुस्तक का नाम : अथ पद्मावती
लेखक : राजेन्द्र मोहन भटनागर
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली,
सन् : 2019
मूल्य : ३९५
पृष्ठ संख्या : २७९

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