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तारानाथ तर्कवाचस्पति का जीवनचरित - रामकृष्ण स्वामी

राधावल्लभ त्रिपाठी
रूपांतरकार की ओर से

उन्नीसवीं सदी भारतीय इतिहास का अनोखा समय है। सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, आध्यात्मिक और साहित्यिक क्षेत्रों में जितने बडे व्यक्तित्व इस सदी में जन्मे, उतने हमारे इतिहास के शायद ही किसी ओर दौर में जन्मे हों। संस्कृत की पांडित्यपरंपरा पर यह बात विशेष रूप से लागू होती है, जितने दिग्गज पंडित, शास्त्रचिंतक और विचारक इस सदी में संस्कृत के क्षेत्र में अपने विलक्षण कर्तृत्व के साथ अवतरित हुए, उतने इसके पहले एक साथ किसी काल में कदाचित् भारत में नहीं हुए होंगे। इन्हीं पंडितों में से एक थे बंगाल के तारानाथ तर्कवाचस्पति (1812- 1885)। वे इस पुस्तक के चरितनायक हैं। वे अपने समय में धर्मशास्त्र और व्याकरण के सबसे बडे पंडित माने गए। वे अठारहवीँ शताब्दी के एक सम्मानित पंडित रामराम सिद्धांतरत्न के पौत्र और कालिदास सार्वभौम जैसे विख्यात पंडित के पुत्र थे। तारानाथ ईश्वरचंद्र विद्यासागर के गुरु थे, विद्यासागर के जीवन व्यक्तित्व के निर्माण में इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। तारानाथ के घर ईश्वरचंद्र का आना जाना था, जरूरत पडने पर वे अपने छोटे भाइयों - दीनबंधु और शंभुचंद्र - को तारानाथ की अनुपस्थिति में उनके घर की देख-रेख के लिए भेज देते थे। विधवाविवाह के समर्थन और बालविवाह के विरोध में विद्यासागर के द्वारा चलाये गए आंदोलन की वैचारिक भूमिका बनाने के लिए तारानाथ तर्कवाचस्पति जिम्मेदार थे, ईश्वरचंद्र विद्यासागर को उनके मत की पुष्टि के लिए धर्मशास्त्रों से उद्धरण तर्कवाचस्पति देते थे। विद्यासागर अपने गुरु के बडे प्रशंसक थे, यद्यपि बाद में बहुविवाह के सवाल को ले कर दोनों में मतभेद हुआ और स्नेह संबंधों में थोडी-सी खटास भी आ गई।

अत्यंत पारंपरिक पंडित और कर्मकांडी ब्राह्मण होते हुए भी तारानाथ ने अनेक रूढियों को तोडा, अपनी बेटी को पढने के लिए स्कूल भेजा, विधवाविवाह के समर्थन और बालविवाह के विरोध में उन्होंने खुल कर अपने शिष्य ईश्वरचंद्र विद्यासागर का साथ दिया, स्त्री शिक्षा का समर्थन किया, रूढिवादियों के प्रहार झेले। भीतरघातियों ने उन पर प्राणांतक हमले किए। उन्होंने अपने अकेले के बूते पर उस समय संस्कृत का सबसे बडा विश्वकोश तैयार किया, जो बहुत छोटे फोंट में बडे आकार में लगभग छह हजार पृष्ठों में छह खंडों में छपा। तारानाथ ने एक एक पृष्ठ का प्रूफ देख देख कर अपने प्रेस में उसे छपवाया, उन्होंने छापेखाने के आने से पुस्तक प्रकाशन में होने वाली क्रांति की अगुवाई की, वे कदाचित् अपने समय के सबसे बडे लिक्खाड और सबसे बडे प्रकाशक भी बने। उन्होंने संस्कृत के सौ से ज्यादा दुर्लभ ग्रंथ पहली बार प्रकाशित किए, पहली बार उनमें से अनेक काव्यों पर टीकाएँ लिख कर प्रकाशित कीं, उनके अलावा शब्दस्तोममहानिधिः एक दूसरा कोश भी बनाया, शब्दार्थरत्नाकर नाम से संस्कृत में व्याकरणदर्शन पर एक मौलिक ग्रंथ लिखा और छापा। तारानाथ अपने समय के बडे वैयाकरण और कोशकार तो थे ही, वे अपने समय के बडे टीकाकार, मुद्रक और प्रकाशक भी बने।

निर्धन छात्रों को वे न केवल निःशुल्क पढाते रहे, उनके भोजन आदि की व्यवस्था के लिए किसी के आगे हाथ न फैला कर उन्होंने कभी कपडे का व्यापार किया, कभी लकडी का, कभी गुड का तो कभी दूसरे उद्योग लगाए। यह समय ब्रिटिश हुकूमत की खिलाफत करने का नहीं था, तारानाथ के समकालीनों में बंकिमचंद्र और ईश्वरचंद्र जैसे महापुरुष भी इसी हुकूमत में सरकारी मुलाजिम रहे। पर सरकारी सहायता के अभाव में बंद होते संस्कृत विद्यालयों की स्थिति देख कर अपना व्यावसायिक प्रतिष्ठान खडा कर के उसके मुनाफे से शिक्षण संथाएँ चलाने की बात तारानाथ जैसा कोई एक पंडित ही सोच सकता था।

पंडित बलदेव उपाध्याय ने अपने ग्रंथ काशी की पांडित्य परंपरा में तारानाथ तर्कवाचस्पति और ईश्वरचंद्र विद्यासागर को सहपाठी बताया है, जब कि इस जीवनी में तारानाथ को विद्यासागर का गुरु बताया गया है। तारानाथ ईश्वरचंद्र से आयु में आठ साल बडे थे, और ईश्वरचंद्र उनसे अध्ययन करते रहे - प्रस्तुत जीवनीकार की इस बात पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है। यह सत्य है कि तारानाथ और ईश्वरचंद्र दोनों ने ब्रिटिश शासन द्वारा स्थापित संस्कृत कालेज में एक ही समय अध्ययन किया, यद्यपि दोनों के पाठ्यक्रम अलग अलग थे। ये दोनों औपनिवेशिक शासन के उस दौर में रहे, जिसमें शिक्षापद्धति बदल रही थी और परीक्षा की प्रणाली लागू की जा ही थी। संस्कृत के पंडित इसके पहले इस प्रणाली से कोई परीक्षा देते ही नहीं थे। पर जीविकोपार्जन के लिए वे बाद में अंग्रेजों की बनाई पद्धति से भी परीक्षा देने लगे। ऐसे में ऐसी स्थितियाँ भी संभव थीं कि गुरु और शिष्य दोनों एक समय में एक शिक्षणसंस्था के छात्र रहें या दोनों एक ही परीक्षा साथ साथ दें।

रामकृष्ण शास्त्री के द्वारा संस्कृत में लिखी जीवनी तारानाथतर्कवाचस्पते-र्जीवनचरितम् (तारानाथ तर्कवाचस्पति का जीवन चरित) पुस्तक लगभग एक सौ पच्चीस साल पहले छपी थी। इसे तारानाथ तर्कवाचस्पति के पुत्र जीवानंद विद्यासागर वे छापा। जीवानंद भी अपने पिता की तरह, या पिता से बढ कर, कदाचित् उस समय के सबसे बडे टीकाकार, प्रकाशक और लेखक रहे। ये बंगला के कवि जीवानंद से भिन्न हैं।

जीवनीकार रामकृष्ण शास्त्री तारानाथ के समकालीन थे, उनके घर में उनका आना जाना था। ऐसा लगता है कि यह जीवनी उन्होंने जीवानंद के आग्रह पर लिखी होगी। इसके अलावा उनका और कोई परिचय मुझे नहीं मिल सका। तारानाथ के बेटे जीवानंद विद्यासागर के सहयोगी रहे होंगे- ऐसा अनुमान होता है। वे तारानाथ और जीवानंद दोनों के लिए बडा भक्तिभाव रखते हैं, दोनों की खुल कर प्रशंसा उन्होंने की है।

तारानाथतर्कवाचस्पतेर्जीवनचरितम् का मेरी जानकारी में अब तक अन्य किसी भाषा में कोई अनुवाद या रूपांतर नहीं हुआ है। मैंने यह काम जब हाथ में लिया, तो विचार यही था कि पूरी पुस्तक का अविकल अनुवाद करूँगा। पर मूल रचनाकार की भाषा और शब्दावली से छेडछाड किए बिना इसका संक्षिप्त रूपांतर करना अधिक वांछनीय लगा, क्योंकि पुस्तक जिस शैली में लिखी गई है, उसमें प्रशस्तिपरक विशेषणों की बौछार होती चली गई है, कुछ विवरणों की भी पुनरावृत्ति हुई है। प्रस्तुत रूपांतर में तथ्यात्मकता बने रखने के लिए प्रशस्तिपरक विशेषणों तथा अनावश्यक विवरणों और पुस्तकसूचियों को छोड दिया गया है, मूल रचनाकार की वाक्यरचना और शब्दावली यथावत् रहने दी गई है। तारानाथ तर्कवाचस्पति द्वारा प्रणीत, मुद्रित और प्रकाशित ग्रंथों के विवरण के साथ इसमें जीवानंद विद्यासागर द्वारा लिखे गए पूरे के पूरे 1॰7 मूल ग्रंथों की सूची भी दी गई है, और संस्कृत के उन 1॰7 काव्यों की सूची भी दी गई है, जिन पर जीवानंद ने टीकाएँ लिखीं और प्रकाशित कीं। कुल 214 किताबें जीवानंद ने स्वयं लिखीं, अपने प्रेस में छापीं और प्रकाशित की। रामकृष्ण स्वामी ने इन सारी किताबों की सूची अपनी जीवनी में दे दी है, जो इस रूपांतर में कम कर दी गई है। रामकृष्ण शास्त्री ने तारानाथ तर्कवाचस्पति के द्वारा विरचित समुद्रयात्राविषयक पुस्तिका को भी पूरा का पूरा उद्धृत कर दिया है। इस पुस्तिका का सार इस रूपांतर में दे दिया गया है।

अवतरणिका

पूर्वी बंगाल के वरिशाल जिले में वैचंडी नाम के गाँव में रामराम नाम के एक नामी ब्राह्मण पंडित रहते थे। तर्कसिद्धान्त की उपाधि से उन्हें जाना जाता था। सारे शास्त्रों की उन्हें ऐसी पक्की जानकारी थी कि वे हर शास्त्र में पारंगत कहे जा सकते थे। उनके गुणगौरव की सुगंध प्रायः सारे बंगाल में फैली हुई थी। फूलों की माला पर जैसे भौंरे मँडराते हैं, वैसे ही छात्र उनके गुणकुसुम के निर्मलपरिमल से खिंच कर अध्ययन के लिए इनके पास चले आते थे। दूर-दूर से आए छात्रों के समूहों से उनके मठ की भूमि भरी-भरी रहती और उनके पाठ का नाद उसमें गूँजा करता। यह कहने में कोई अत्युक्ति नहीं होगी कि तर्कसिद्धांत की कीर्ति के प्रकाश से वह स्थान चमकता रहता था।

महात्मा रामराम तर्कसिद्धांत के पुरखे पहले यशोहर जिले के अंतर्गत सारल गाँव में रहते थे। उन्होंने भी विद्यार्थियों में विद्याधन बाँट कर प्रचुर ख्याति अर्जित की थी। उस गाँव में संस्कृत भाषा का ऐसा व्यापक प्रचार था कि वह गाँव संस्कृत विद्या और शिक्षा का एक श्रेष्ठ केंद्र माना जाता था।

यशोहर नगर के राजा बडे पराक्रमी थे, उनकी कीर्ति की आभा के आगे सूर्य की रश्मियाँ निष्प्रभ लगतीं। संस्कृत विद्या के रत्नों के तो वे जैसे गहरे महारत्नाकर थे, आर्यधर्म के द्वारा अनुमोदित विविध कर्मकांडों के अनुष्ठान में वे लगे रहते। उन्हीं राजा का बडा प्रयास और अत्यधिक आग्रह था कि उस समय यशोहर प्रदेश बंगाल में संस्कृतविद्या की शिक्षा के आद्यस्थान के रूप में प्रसिद्ध हो गया था। अब तो ऐसा कोई स्वदेशी राजा नहीं बचा, जो विद्या के अनुशीलन और गुणियों के सम्मान को ले कर इस तरह का उत्साह दिखाए। उसके बहुत समय बाद बंगाल में नवद्वीप का अवश्य विद्या के अनुशीलन में चरम उत्कर्ष हुआ।

एक बार महाराजाधिराज समस्त राजगुणों से समवेत वर्धमान (बर्दवान) के अधिपति तिलकचंद्र ने कालना नगरी के बडे प्रतिष्ठित समुदाय भवन के सम्मुख दीर्घिका (बावडी) की स्थापना करने के लिए दूर-दूर की दिशाओं से ज्ञानी पंडितजनों को आमंत्रित कर के सभा आयोजित की। तर्कसिद्धांत तो उस समय ज्ञानियों के सिरमौर थे, वे भी उस सभा में पहुँचे। वहाँ उन्होंने न्याय, सांख्य, पातंजल आदि छहों दर्शनों का सूक्ष्म विचार प्रस्तुत कर के उस सभा में उपस्थित सारे विद्वानों को पराजित कर दिया। उनके अलौकिक पांडित्य को समझ बूझ कर, वर्धमान के महाराजा बहुत ही संतुष्ट हुए। यह जान कर कि वे एक उगते हुए चंद्रमा हैं, महाराज उनके आगे इस तरह उल्लसित हुए, जैसे चंद्रमा के उगने पर सागर उमडता है। तब राजा ने अपने विनय, नम्रता और सौजन्य के साथ इस तरह तर्कसिद्धांत के आगे तरह तरह से प्रार्थना कर के उनका मन रिझा लिया, उसने तर्कसिद्धांत को पर्याप्त भूमि दी और कालना नगर में उन्हें बसाया। इस प्रकार तर्कसिद्धांत को रुतबा पहले से और भी बढ गया। उसके बाद वे कालना नगर में आ गए। कालना नगर के निवासी आज तक तर्कसिद्धांत के वंशजों को बंगाल के भट्टाचार्य्यों के नाम से बुलाते हैं।

महापुरुष तर्कसिद्धान्त में अलौकिक गुण थे। वे एक सिद्ध पुरुष ही थे। वृद्धावस्था में वे केवल घी और श्रीफल मात्र खाते थे, और कोई खाद्य वस्तु ग्रहण नहीं करते थे। उनकी यह अद्भुत चर्या देख कर उस समय उस स्थान के निवासी मुग्ध और चकित थे।

कालना नगर में कुछ ही दिन उनका रहना हुआ। वहाँ से पश्चिम की ओर चल पडे। पाटलिपुत्र नगर (पटना) में पहुँचे। वहाँ संयोग से बिहारमहाराज के सचिव से उनकी भेंट हो गई। सचिव का नाम था वैद्यनाथ। राय उनकी उपाधि थी। यह समय था कि वैद्यनाथ राय पदच्युत हो कर बडे क्लेश में समय बिता रहे थे। सकलशास्त्रविशारद तर्कसिद्धान्त की ज्योतिष विद्या में असाधारण ख्याति थी, सो उन्होंने गणना की और उससे बोले- हे महामति वैद्यनाथ ! तुम शंका मत करो, शीघ्र तुम्हारे मनोरथ पूरे होंगे। और क्या कहें, आज से पंद्रहवें दिन फिर से अपने पद के लिए नियुक्तिपत्र तुम्हारे पास आ जाएगा।



महात्मा तर्कसिद्धांत ने जो फलादेश निकाला था, वैद्यनाथ राय के शुभ भविष्य के अनुसार वह शीघ्र उन्हें मिल भी गया। फिर तो वे तर्कसिद्धांत के गुणों से आकर्षित हो कर न केवल उनसे संतुष्ट हुए, उनके प्रति प्रगाढ भक्तिभाव भी रखने लगे। तर्कसिद्धांत भी वैद्यनाथ राय के कल्याण के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते रहे।

एक बार की बात है। वैद्यनाथ राय अपनी बैठक में राजकाज निपटा रहे थे। सहसा जैसे देवी शक्ति के बल से तर्कसिद्धांत वहाँ आ पहुँचे, और आते ही दाहिना हाथ उठाते हुए बोले-रायजी, तत्काल सभा विसर्जित करो और अपने सारे लोगों के साथ यहाँ से अन्यत्र चले जाओ।

देवता के वचनों जैसी तर्कसिद्धांत की वाणी को सुन कर राय वैद्यनाथ अपने परिजनवर्ग से घिरे तत्काल वहाँ से चल पडे, उनके बाहर निकलते ही वह सभाभवन धराशायी हो गया। राय वैद्यनाथ ने यह घटना अपनी आँखों से देखी, वे हाथ जोड कर भक्तिपूर्वक तर्कसिद्धांत के चरणों पर लेट गए, जैसे देवराज इंद्र देवगुरु बृहस्पति के चरणों पर गिरे हों। फिर उन्होंने अपने बेटे को बुलाया और उससे कहा कि गुरुजी के पाँवों की धूल माथे से लगाए और उनसे दीक्षा ले। राजा के अनुरोध से सिद्धपुरुष तर्कसिद्धांत ने वैद्यनाथ राय के देवकुमार जैसे उस पुत्र की उसका परलोक सुधारने और इहलोक में सारे सुखों का लाभ उसे दिलाने के लिए उसे दीक्षा दी। तब से लगा कर महात्मा वैद्यनाथ तर्कसिद्धांत के लिए सदा बडी गुरुभक्ति प्रकट करते रहे, मन में तो वे उन को अपना गुरु मानते ही रहे।

यह भी कहा जाता है कि एक बार बिहार प्रदेश में क्वार का महीना आने तक भी वर्षा नहीं हुई। अनावृष्टि के कारण वहाँ के लोगों को बडा कष्ट हुआ। सूखे की विपद् आने पर लोग वैद्यनाथ तर्कसिद्धांत के पास पहुँचे और अनावृष्टि का कारण पूछने लगे। तर्कसिद्धांत अगले दिन भोर होने पर एक शिवमंदिर में पहुँचे और वहाँ बैठ कर सूखे की मार झेलती जनता के कल्याण के लिए शिव के नाम का जप करने लगे। जप पूरा कर के फिर उन महात्मा ने गणना की। गणना कर के उन्होंने जनसमाज के सामने घोषणा की - आज ही दस घंटे के बाद भरपूर वर्षा हो जाएगी। देवबल की अचिंतनीय महिमा कहें, करुणामय परमेश्वर करुणा कहें, या तर्कसिद्धांत के शिवमंत्र के जप का अवश्यंभावी फल कहें कि उनके द्वारा बताये गए समय पर आकाश से फूलों की वर्षा की तरह मूसलाधार बारिश होने लगी। अचानक हो गई इस वर्षा से लोग चकित रह गए। इस घटना सेराय वैद्यनाथ की तर्कसिद्धांत के प्रति भक्तिभावना और भी बढ गई। उन्होंने मुजफ्परपुर के निकट तर्कसिद्धांत को जमींदारी दे दी।

राय वैद्यनाथ तर्कसिद्धांत को भूसंपत्ति दे कर ही संतुष्ट नहीं हुए, बल्कि पटना के राजा से उन्होंने तर्कसिद्धांत की पाठशाला के छात्रों के भरणपोषण के लिए तीन सौ रुपये महीने की वृत्ति की व्यवस्था भी कराई। आगे चल कर जब मुर्शिदाबाद के नवाब के सारे अधिकार छिन गए, तब भी बंगाल के रिप्रजेंटेटिव की ओर से तर्कसिद्धांत को पाठशाला के लिए तीन सौ रुपये महीने की वृत्ति मिलती रही। इसके बाद महात्मा तर्कसिद्धांत उत्तरपश्चिमांचल से वापस कालना शहर आ गए। वहाँ से एक बार एक जरूरी मुकदमे के सिलसिले में बर्दवान की कचहरी में उनको जाना हुआ। वहाँ के जज साहेब ने उनका विशेष सम्मान किया। इस सम्मान का कारण क्या था- यह संक्षेप में बताते हैं।

ये जज साहब इसके पहले पटना में रह चुके थे। उस समय सूखा पडने पर तर्कसिद्धांत की ज्योतिष गणना की विद्या का चमत्कार वे देख चुके थे। उस समय तर्कसिद्धांत से उनकी बातचीत भी हुई थी। अब अपनी कचहरी में उन्हें देख कर जज साहब ने उनको अपनी अदालत में पंडित के पद पर नियुक्ति दे दी।

ये महानुभाव रामराम तर्कसिद्धान्त प्रतिदिन बारह सौ छात्रों को पढा कर उनके दुःख दूर करने के लिए उनके भोजन और वस्त्र की व्यवस्था भी करते थे।

18॰॰ ई. में इन्हीं सिद्धपुरुष ने काशीधाम में शिवमंदिर की प्रतिष्ठा की और वहीं एक घर भी बनवाया। आज भी काशी में तर्कसिद्धांत का मकान शिवशिव भट्टाचार्य के घर के नाम से जाना जाता है। उनका बनवाया शिवमंदिर एक रात में ही बन कर तैयार हो गया था। परमकारुणिक भगवान् भूतभावन भवानीपति तर्कसिद्धान्त के उपास्य होने से उनके त्राणकर्ता थे। इसीलिए उन्हें परमशैव के रूप में ख्याति भी मिली थी। शैव होने के कारण इन महात्मा को वहाँ के लोग शिवशिव भट्टाचार्य के नाम से बुलाने लग गए थे। इतना ही नहीं, उन्होंने तर्कसिद्धांत को सारी विद्याओं का एक असाधारण निधान ऐसे ही मान लिया था, जैसे सागर रत्नों का निधान होता है। इसलिए उन्हें विद्याधर भी कहा जाता था। वाराणसीपुरी में उन्होंने जिस मंदिर की प्रतिष्ठा की, उसके प्रस्तरफलक पर निम्नलिखित श्लोक खुदा हुआ है -

द्विद्व्यश्वचन्द्रविमिते शकाब्दे

क्रीत्वा त्रिपत्रैरतिजीर्णवाटीम्।

शोणेष्टकाद्यैर्नवकां प्रचऋे

रामेश्वरार्थं द्विजरामरामः।।

इसका अर्थ इस प्रकार है - रामराम नामक ब्राह्मण ने 1722 शक वर्ष में तीन पत्तों से बहुत पुरानी बाडी या घर को खरीद कर रामेश्वरार्थ या शिव के लिए लाल ईंटों से इस भवन का नवीनीकरण कराया।

महात्मा रामराम तर्कसिद्धान्त का विवाह बर्दवान जिले के आन्-लोक गाँव में हुआ। समय बीतने पर उनकी सहधर्मिणी ने एक कुमार और दो बेटियों को जन्म दे कर जीवनलीला समाप्त कर ली। उससे जो पुत्र तर्कसिद्धांत को हुआ, उसका नाम रखा गया शिवदास। इसके बाद तर्कसिद्धान्त ने बर्दवान जिले में ही हुमसपुर गाँव में दूसरा विवाह किया। इस दूसरी सहधर्मिणी से उनको अश्विनीकुमार जैसे दो पुत्र हुए, जिनके नाम दुर्गादास और कालिदास रखे गए।

सिद्धपुरुष तर्कसिद्धान्त जीवन की अंतिम वेला में भवबंधन काटने के लिए काशीधाम में जा कर रहने लगे। वहाँ कुछ दिन रह कर उन्होंने अपने स्थूल शरीर को पापमय समझ कर योगाभ्यास के द्वारा त्याग दिया।

उन महात्मा के शिवपद पर पहुँचे, उस समय उनके बेटे दुर्गादास की आयु सोलह साल की थी। कुछ समय बाद वह भी बर्दवान की ही जिला अदालत में पंडित के पद पर काम करने लगा। पिता के पदचिह्नों पर चलते हुए दुर्गादास भी बहुत सारे छात्रों को अन्न वस्त्र प्रदान करके उनका अध्यापन भी करता रहा। फिर चालीस वर्ष की आयु में ही यह महात्मा भी चार चतुर पुत्रों और चार कन्याओं को छोड कर स्वर्ग सिधार गया।

तर्कसिद्धान्त के छोटे बेटे कालिदास ने बडे परिश्रम से अध्ययन कर के शास्त्रों पर अधिकार प्राप्त किया, और विद्या के साम्राज्य में सार्वभौम सम्राट् की तरह होने से उन्होंने सार्वभौम की उपाधि प्राप्त की। कालिदास ने केवल विद्वानों के बीच बल्कि साधारण लोगों के बीच भी विशेष रूप से आदर के पात्र बने रहे। वे आधुनिक कालिदास की तरह ही थे। उन्होंने घोषपाँचका गाँव के हलधर पाठक की शास्त्रीय लक्षणों से युक्त सुलक्षणा माहेश्वरी नामक कन्या से ऐसे ही विवाह किया जैसे महेश्चर ने माहेश्वरी उमा से किया था। समय बीतने पर कालना नगर में इसी माहेश्वरी के गर्भ से 1812ई. में सकल विद्याओं की आभा से दिङ्मंडल को आलोकित करने वाले प्रसन्नकांति महामति तारानाथ तर्कवाचस्पति का जन्म ऐसे ही हुआ जैसे क्षीरसागर से चंद्रमा का।

तारानाथ शैशव में ही माता से बिछड गए। इस विछोह के सर्प ने अपने विष से उनके शरीर को जर्जर कर दिया और मन को विषण्ण। पिता कालिदास सार्वभौम ने दूसरा विवाह किया।

अथ बाल्यचरित

तारानाथ जब पाँच वर्ष के बालक थे, तब कालना नगर में इन्हें लाया गया। इनके विद्यारंभ के लिए शुभ दिन और शुभ मुहूर्त निकलवाया गया, और कृष्णमोहन गुरुजी की पाठशाला में इनका दाखिला कराया गया। कृष्णमोहन एक पैर से लँगडे थे। इनकी पाठशाला में जितने विषयों में जितनी शिक्षा दी जाती थी, जो वर्ष में ही बालक तारानाथ ने उतने विषयों में उससे अधिक अधिक ज्ञान के साथ पारदर्शिता प्राप्त कर ली। पद्मरागमणि की खान में काँच पैदा नहीं होता, नंदनकानन में घासपात नहीं होती। अतः एवं ऐसे पवित्र महाकुल में जन्म लेने वाले तारानाथ का शिक्षा के विषय में प्रगाढ प्रयत्न और अध्यवसाय देखते हुए लोग यह अनुमान ठीक ही कर रहे थे कि समय आने पर देवताओं के बीच बृहस्पति के समान यह बच्चा ब्राह्मण समुदाय में असामान्य बुद्धि की तलवार से दुर्बोध शास्त्रीय युक्ति जाल के जंजाल को काट कर दूसरे देवगुरु के समान बनेगा।

गुरुजी की पाठशाला में पढाये जाने वाले गणित में बालक तारानाथ की असाधारण समझ को देखते हुए उसके सहपाठियों के ही नहीं उसकी अगली कक्षा बडी उम्र के छात्रों के मन में भी ईर्ष्या की ज्वालाएँ धधकने लगीं। वे लोग जब देखो, तब उससे गणित के सवाल पूछ-पूछ कर उसे कोंचने लगे। उनके पूछे गए दुर्बोध सवालों पर भी उत्तेजित हुए बिना बालक तारानाथ शांति से उत्तर देता। इस तरह उसके गुणों से समीर से उसकी कीर्तिपताका फहराती चली गई।

गुरु को भी लगने लगा कि उनकी बुद्धि की पिटारी बालक तारानाथ के सामने खाली होती जा रही है। वे उस बालक को आगे पढाने में असमर्थ होते गए। तारानाथ के पिता ने देखा कि बच्चा गुरु की पाठशाला की परीक्षा उत्तीर्ण कर चुका है, तो उन्होंने उसके आठवें साल में उसे संस्कृतव्याकरण पढाना आरंभ किया। बहुत थोडे से समय में ही महामति तारानाथ ने पिता से तथा बडे चाचा के बेटे श्री तारणीप्रसाद से मुग्धबोध व्याकरण, अमरकोश, भट्टिकाव्य, कुमारसंभव, शिशुपालवध का अध्ययनपूरा कर लिया, और उन सब में उसकी गहरी पैठ हो गई। बडे चाचा के बेटे श्री तारणीप्रसाद न्यायरत्न की उपाधि पा चुके थे, और वर्दवान में जजपंडित के पद पर काम कर रहे थे। उनका अपने भाई तारानाथ पर बहुत अधिक अकृत्रिम स्नेह था, इसलिए तारानाथ की भावी उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता गया। व्याकरणशास्त्र में तारानाथ की अक्षुण्ण प्रगाढ व्युत्पत्ति के मूल तारिणी प्रसाद ही थे।

भट्टाचार्य महाशय पूर्वबंग देश से आकर कालना में बस गए थे। कलकत्ता के संस्कृत कालेज के अध्यक्ष रामकमल सेन महाशय इनकी अच्छी मित्रता थी। एक बार रामकमल सेन महाशय किसी काम से भट्टाचार्य महाशयके घर आए। वहाँ उन्होंने तारानाथ को अपने चचेरे भाई के साथ पढाई के दौरान विचार विमर्श करते देखा, वे दोनों शास्त्रीय युक्तियों से एक दूसरे के साथ तर्क वितर्क कर रहे थे, उनकी विचारशक्ति देखकर सेन महाशय को लगा कि इस बच्चे की बराबरी करने वाला कोई न मिलेगा। उस समय कलकत्ता में अंगे*जी का पढाई के कारण लोग विदेशियों का आचार व्यवहार अपनाते जा रहे थे, और सामान्य लोग भी नास्तिक होते जा रहे थे। इसलिए गुरुजन नहीं चाहते थे कि बच्चे कलकत्ता जा कर पढाई करें। पर इन दोनों महाशयों ने कालिदास सार्वभौम से बहुत आग्रह किया। सार्वभौम बडे असमंजस में थे, पर इन दोनों के प्रबल अनुरोध के आगे विवश हो गए। रामकमल सेन के सदाचार और सद्गुणों से भी वे प्रभावित थे।

1॰ मई 183॰ के दिन सेन महाशय ने तारानाथ को संस्कृत विद्यालय की अलंकार श्रेणी में प्रवेश दिलवाया। तारानाथ की आयु उस समय अठारह वर्ष थी। अलंकार की कक्षा में प्रवेश पा कर जल्दी ही उन्होंने अपनी नैसर्गिक प्रतिभा से अलंकारशास्त्र के मर्म का अवगाहन कर लिया। इस कक्षा में अध्ययन करते हुए तारानाथ बचे हुए समय में वेदांत और काव्य की कक्षा में भी जा कर इन विषयों का अध्ययन करते। उस समय काव्यशास्त्र के अध्यापक जयगोपाल तर्कालंकार थे। काव्यशास्त्र पढाने में उनके समकक्ष उस समय कोई नहीं था। वे काव्यमर्मज्ञ भी थे। वे परमपावन वाराणसी नगरी में रह चुके थे, काव्यशास्त्र में उनकी असाधारण समझ थी। जब ये काशी में रह कर काव्यशास्त्र का अध्ययन कर रहे थे, उस समय कलकत्ता संस्कृत कालेज के अध्यक्ष विल्सन साहब भी काशी में रह रहे थे। संयोग वश विल्सन साहब से तर्कालंकार का परिचय हो गया। जयगोपाल तर्कालंकार ने हृदय को रसास्वाद में डबो देने वाली, अपूर्व कवित्व शक्ति से संपन्न अपनी गद्य पद्य रचना से विल्सन महाशय को मुग्ध कर लिया। विल्सन महोदय उनके गुणों से आकर्षित हो कर उन्हें किसी तरह मना कर काशी से ले आए और कलकत्ता में स्थित संस्कृतविद्यामन्दिर में नियुक्त कर दिया। तारानाथ की तो बुद्धि कुशाग्र थी ही, उन्होंने इन के सान्निध्य में रहते हुए कुछ ही महीनों में सारे काव्य नाटक, नाटिका, प्रकरण पढ लिए , जो मुद्रित नहीं हुए थे, और हस्तलिखित पोथियों में थे। दिन में तो समय मिलता नहीं था, तो वे रात रातभर जाग कर उन पोथियों की नकल तैयार करते थे। समय व्यर्थ में उन्होंने कभी नहीं गँवाया। काव्यप्रकाश और साहित्यदर्पण इन दो अलंकारशास्त्र के ग्रंथों का उन्होंने बडे यत्न से अध्ययन किया और कुछ ही दिनों में इनमें पारंगत हो गए।

इस समय की प्रचलित व्यवस्था के अनुसार अलंकार की कक्षा के छात्रों को ज्योतिष और गणित में शिक्षा प्राप्त करना अनिवार्य था। तारानाथ ने तीन चार महीनों में ही बहुत परिश्रम कर के लीलावती और बीजगणित का अध्ययन कर डाला। फिर ज्योतिष के अध्यापक योगध्यानमिश्र के साथ रहते हुए तारानाथ ने सूर्यसिद्धान्त, ग्रहलाघव, गणिताध्याय, गोलाध्याय, खगोल आदि ज्योतिष के ग्रंथ पढ कर ज्योतिष पर अच्छा अधिकार प्राप्त कर लिया। उनकी सब तरफ प्रशंसा होने लगी। इसके बाद उन्होंने नाथूराम शास्त्री से वेदांतशास्त्र का अध्ययन किया। शास्त्री तारानाथ के गुणों से बहुत आकृष्ट थे, और कहा करते थे कि मैं जितना पढाता हूँ, तारानाथ की बुद्धि उसके आगे दौडती है। शंकराचार्य के भाष्यग्रंथ पढते हुए पूर्वपक्ष पढकर ही तारानाथ अपनी ओर से उसका समाधान करते हुए उत्तरपक्ष बता देते थे। उनकी बुद्धि की ऐसी प्रखरता देख कर वेदान्त के अध्यापक उनसे प्रभावित हुए थे।

सन् 1831ई. में दस मई के दिन तारानाथ ने न्यायशास्त्र की कक्षा में प्रवेश लिया। उस समय न्यायशास्त्र के प्रख्यात अध्यापक थे निमाई चाँद शिरोमणि। बंगाल में उनके जैसा न्यायशास्त्र का पंडित नहीं था। बंगाल के सारे पंडितों को वे तर्क में परास्त कर चुके थे। पर ये भी तारानाथ की बुद्धि की प्रखरता देख मुग्ध हो उठे थे। तारानाथने इनके पास चार साल तक न्यायदर्शन का अध्ययन किया, और न्याय में असाधारण गति प्राप्त कर ली।जब षड्दर्शनों पर विचार होता, तो कोई भी पंडित उनसे भिडने का साहस नहीं कर सकता था।

तारानाथ जब छात्र थे,उसी समय एशियाटिक सोसाइटी ने विभिन्न लिपियों में लिखीं महाभारत की हस्तलिखित पोथियों का संशोधन कर के महाभारत का संस्करण प्रकाशित करने का निर्णय लिया। पर निमाई चाँद शिरोमणि बूढे हो चुके थे, और अधिक मेहनत नहीं कर सकते थे, तारानाथ ने गुरुदेव की आज्ञा से उनके कंधों पर डाला भार स्वयं अपने ऊपर ले लिया, और महाभारत का आद्योपात संशोधन किया। पर संस्करण प्रकाशित होने लगा तो गुरुभक्तिपरायण तारानाथ ने संशोधक के रूप में अपना नाम उस में प्रकाशित नहीं करवाया। महाभारत का संशोधन करते करते पूरा महाभारत उन्हें कंठस्थ हो गया था, ऐसी स्मरणशक्ति दुर्लभ ही होती है।

तारानाथ का नाम तो न्याय की कक्षा में लिखा था, पर ये स्मृति आदि की कक्षाओं में जा कर षड्दर्शन आदि का भी अध्ययन करते रहते। उस समय छपी किताबें मिलती नहीं थीं। तारानाथ में देवी शक्ति थी, उन्होंने व्याकरण, काव्य, नाटक, अलंकार, न्याय, सांख्य, वेदान्त, पातंजल योगदर्शन, मीमांसा, उपनिषद्, धर्मशास्त्र, ज्योतिष आदि की पोथियों की नकल तैयार करते रहते। उनके हस्ताक्षर मोतियों की पंक्तिकी तरह सुंदर थे। उनके द्वारा लिखी हस्तलिखित पोथियाँ उनके सुयोग्य पुत्र महात्मा जीवानंद विद्यासागर के पुस्तकालय में अभी भी प्रकाशमान हैं। तारानाथ जब न्याय की कक्षा में अध्ययनकर रहे थे,उस समय अलंकार के अध्यापक का पदखाली हुआ। विल्सन साहब का मन तारानाथ को उस पर नियुक्त करने का था, पर तारानाथ ने स्वयं ही वह पद स्वीकार नहीं किया।

इसी समय पंडितों में अग्रणी ईश्वरचंद्र विद्यासागर भी अलंकार की कक्षा में अध्ययनकर रहे थे। वे प्रतिदिन अपराह्ण में तारानाथ के ठनठनिया में स्थित आवास पर पाठ्यपुस्तक ले कर आ जाते। काव्यप्रकाश और साहित्यदर्पण का अध्ययन उन्होंने तारानाथ से किया। तारानाथ का ईश्वरचंद्र विद्यासागर पर बडा स्नेह था। विद्यासागर को भी उनके ऊपर बहुत श्रद्धा थी।

एक बार कलकत्ता के एक सेठ के घर कोई आयोजन था। उसमें दूर दूर से विद्वान् आमंत्रित थे। महात्मा तारानाथ इस तरह की सभाओं में बहस में भाग लेने के लिए सदा जाते थे, पर किसी से कोई दान-दक्षिणा नहीं लेते थे। इस सभा में उन्होंने पूर्वपक्ष की प्रस्तुति अपने छात्र बालक ईश्वरचंद्र विद्यासागर से कराई। सभा में उपस्थित लोग पंद्रह साल के नवयुवक ईश्वरचंद्र को षड्दर्शनों का पूर्वपक्ष प्रस्तुत करते सुन कर चकित रह गए। उसके बाद तारानाथ से सभा में उपस्थित सारे पंडितों को अपने प्रतिपादन से पराजित कर दिया। अब उन्हें हर आयोजन में मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया जाने लगा।

1839 ई. में तारानाथ ने लॉ कमेटी की परीक्षा पास की और प्रशंसित हुए। उस समय अनेक विद्वान् तीन वर्षतक अध्ययन कर के भी लॉ कमेटीकी परीक्षा उत्तीर्ण नहीं कर पाते थे। पर तारानाथ की मेधा कुछ ऐसी विलक्षण थी कि न्यायशास्त्र का अध्ययन करते हुए बचे हुए समय में ही वे स्मृति ग्रंथ पढते रहते, और मनुस्मृति आदि स्मृतियों में उन्होंने प्रवीणता प्राप्त कर ली। 15 जनवरी 1835 ई. के दिन जब तारानाथ विद्यालय छोडकर जा रहे थे, तब एडुकेशन काउंसिल के द्वारा उन्हें तर्कवाचस्पति की उपाधि प्रदान की गई।

संस्कृत कालेज की पढाई पूरी होने पर 1838ई. में तारानाथ तर्कवाचस्पति को बर्दवान में ढाई सौ रुपये महीने के वेतन पर सदरामणि के पद पर नियुक्ति का पत्र मिला। उस समय यह पद मिलना बहुत बडी बात थी, पर वे इस पद पर काम करना नहीं चाहते थे। कारण यह था कि 1838ई.में उनके चचेरे भाई न्यायरत्न तारणीप्रसाद का निधन हो गया था, वे ही अब तक इस पद पर काम करते आ रहे थे। उनके निधन के कुछ समय पहले ही सरकार ने प्रत्येक जिले में जज-पंडित के पदों को गैरजरूरी मान कर उन्हें खत्म कर दिए। इसलिए इन्हें अपने चाचा के स्थान पर जज पंडित का पद न दे कर सरकार ने सदरामणि के पद पर नियुक्ति दी। तारानाथ ने इसे अपने लिए अपमानजनक समझा।

अब उनकी असाधारण कीर्ति सर्वत्र फैलती जारही थी। ईर्ष्या की आग में जल रहे कुछ लोग उन पर घात लगाए हुए थे। एक महिला के द्वारा उन्हें विष देने का प्रयास किया गया। तारानाथ के घर एक बूढी दासी थी, उसको इस बात की भनक लग गई, और उसने समय रहते उन्हें सावधान कर दिया। उसके बाद से तारानाथ अपना भोजन स्वयं बनाने लगे, मछली और माँस खाना छोड दिया। मृत्युपर्यंत उन्होंने इस नियम का पालन किया।

1838ई. की घटना है। भादों का महीना था। तारानाथ नाव से कालना नगर जा रहे थे। सातगेक्वे नाम के गाँव के पास पहुँचते पहुँचते नाव भयंकर आँधी के कारण पानी में डूब गई। नाव में बैठे सभी यात्री डूब गए, केवल तारानाथ उफनती गंगा को अपने बाहुबल से पार कर के अपने विश्वस्त सेवक जयघोष के साथ बाहर निकल आए।

इन्हीं दिनों तारानाथ ने काशी की यात्रा की। वहाँ ये हनुमान् घाट पर परमहंस मठ में टिके। तीन महीने ये उस मठ में रहे। परमहंस जी वेदांत और न्याय के प्रकांड पंडित थे। तारानाथ ने उन्हें पूरी विनम्रता और भक्तिभाव के साथ प्रसन्न कर लिया, थोडे ही समय में वे उनसे खंडनखंडखाद्य जैसे परम दुरूह ग्रंथ पढ कर उसमें पारंगत हो गए। परमहंस भी तारानाथ जैसे व्युत्पन्न शिष्य को पा कर प्रसन्न थे। ग्रंथ का पाठ पूरा होने पर उन्होंने तारानाथ की परीक्षा ली, और खंडनखंडखाद्य में उनकी गति देख कर संतोष प्रकट करते हुए आशीर्वाद दिया। परमहंस उन्हें आशीर्वाद दे कर अंतर्धान हो गए। फिर कहीं उनका पता न चला। कहा जाता है कि काशी के अधीश भगवान् शंकर ही तारानाथ को परमहंस का रूप धर कर पढाने आते रहे। तारानाथ परमहंस को खोजते ही रह गए, जब वे नहीं मिले, तब काशी के दिग्गग्ज पंडितों से वे भाष्यसहित चारों वेद, वेदांत, पूर्वमीमांसा, पाणिनी व्याकरण और पंतजलि के महाभाष्य, सांख्य, योग, गणित, फलित आदि विषयों का अध्ययन करते रहे।

तारानाथ ने काशी में रह कर ज्ञान का संचय किया, फिर कालनानगर लौट आए। वे घर पर ही गाँव के और गाँव से बाहर से आने वाले विद्यार्थियों को पढाते रहते। उनके पांडित्य के आकर्षण से दूर दूर से छात्र लालायित हो कर उनसे शास्त्र पढने आते। ये छात्र प्रायः दरिद्र होते थे। तारानाथ को लगता कि छात्रों के भरणपोषण के लिए भी कुछ करना चाहिये। किसी के सामने सहायता के लिए हाथ फैलाना उनके स्वभाव में न था। इसलिए एक अनोखा तरीका उन्होंने इसके लिए अपनाया। तय किया कि व्यापार कर के धन कमाएँगे और उससे छात्रों का भरण-पोषण करंगे।

पहले तारानाथ ने कपडे की दूकान खोली। इंग्लैंड के कपडे उस समय बाजार में नहीं आए थे, अंग्रेजों ने भारतीय बाजार को ध्वस्त नहीं किया था। तारानाथ सूत इंग्लैंड से मँगाते, कालना में बारह सौ जुलाहों को वे कच्चामाल देते, और अपने हिसाब से तरह तरह के वस्त्र उनसे बनवाते। उनके वाणिज्य प्रतिष्ठान में बने कपडे उस समय विदेशों तक जाते थे। पर इससे भी उनका मन भरा नहीं। धीरे धीरे व्यापार में पाँव पसारते हुए उन्होंने मेदिनीपुर (मिदनापुर) जिले में अपनी कपडे की फैक्टरी ही खोल ली।

तारानाथ इस फैक्टरी में हर महीने करीब चार रुपये का सूत खरीद कर भेजते थे, बीच बीच में स्वयं जा कर काम देखते थे, उनकी फैक्टरी में बने कपडे मुर्शिदावाद, काशी, मथुरा, ग्वालियर, आदि शहरों तक जाते थे। उत्तर पश्चिम क सुदूर अंचलों में आवागमन के लिए रेल उस समय तक नहीं चली थी, तारानाथ ने अपनी एक टीम बना ली थी, कपडों के गट्ठर लाद लाद तक उनके आदमी इन शहरों में जाते।

राधानगर और उसके आस-पास के गाँव उस समय वस्त्रोद्योग के लिए मशहूर थे। हजारों जुलाहों के करघे इनमें रात-दिन चलते रहते।

थोडे समय बाद ही मशीनों का युग आ गया। जो व्यापारी कपडों के व्यवसाय में लगे थे, वे छोड छोड कर जाने लगे। कपडों का व्यवसाय डूबने लगा।

तारानाथ राधानगर में थे। उनकी माँ के श्राद्ध का मौका था। इस अवसर पर तारानाथ ने इस क्षेत्र के अनेक विद्वानों को आमंत्रण भेजा। इन विद्वानों के मन में यह भावना थी कि तारानाथ बाहर के आदमी हैं, यहाँ धंधा कर के कमाई कर रहे हैं, विदेशी हैं। पर माँ के श्राद्ध के मौके पर तारानाथ ने उनसे खुल कर बात की। अपनी शास्त्रचर्चा से राधानगर के पंडितों का मन उन्होंने जीत लिया। तारानाथ के पुरुषार्थ का हाल यह था कि तीन सौ ब्राह्मणों के लिए भोजन वे अकेले बना लेते थे, उसमें भी तरह तरह के व्यंजन रहते। उस पर पाककला में उनकी असाधारण निपुणता। लोग बाग बाग हो गए। राधानगर के पंडित तारानाथ की तारीफ करते थकते न थे। इस घटना के बाद तारानाथ का व्यवसाय और चमक गया। कितने सूत में कितना कपडा बनेगा, किस किस तरह की डिजाइन का बनाना है - यह सब तारानाथ तुरंत तय कर लेते थे। राधानगर के कपडा उद्योग में उत्तर भारत के गुरुदास ने मैनेजर का काम अच्छी तरह सँभाल लिया था।

इस तरह व्यापार में मुनाफे से उनके पास एक लाख रुपया इकट्ठा हो गया। तारानाथ कपडे के व्यवसाय तक ही सीमित नहीं रहे। उन्होंने लकडी के धंधे में भी हाथ लगाया। नेपाल से साल की लकडी मँगाते, उसकी बिऋी काम कलकत्ते और आसपास के क्षेत्र में करते। व्यापार में हुई आमदनी से उन्होंने कालना में दुतल्ले का बडा मकान बनवाया। इतना बडा मकान उस समय पूरे कालना नगर में राजा की हवेली को छोड कर और कोई न था। तारानाथ का दिमाग व्यवसाय में खूब चलता था, कपडे का रोजगार डूब रहा था, उन्होंने बहुत सारी ढेकियाँ (बडी ओखलियाँ) खरीदीं, और थोक में चावल खरीद कर चावल की कुटाई का काम कराने लगे। उनके मकान में रात दिन ढेकियों पर कुटाई का काम चलता, उसके शोर से पडौसियों की नींद में खलल होने लगा। पडौसियों ने शिकायत की। तब तारानाथ ने शहर के बाहर एक जगह इस काम के लिए ले ली

यौवनचरित

एक अध्यापक के रूप में तारानाथ की ख्याति बढ रही थी। सोलह दिसंबर 1844 ई. का दिन। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर कलकत्ता से पैदल चलते हुए कालना आए। देखा कि किस तरह तारानाथ आस-पास के गाँवों से आए छात्रों को पढाने में लगे हुए हैं। अपने गुरु से उन्होंने चर्चा की। वे चाहते थे कि संस्कृत कालेज में नब्बे रुपये महीने पर व्याकरण के प्राध्यापक का पद है, उस पर गुरूजी आ जाएँ। सामने बैठ कर उन्होंने गुरु जी के सारे प्रमाणपत्र और प्रशंसापत्र निकलवाए, उनकी नकल तैयार की, आवेदन बनवाया, अनुरोध किया कि गुरु जी दस्तखत कर दें।

तारानाथ ने कहा-कालना में मेरा व्यापार है, उससे मुझे आमदनी खूब हो रही है। इन बच्चों को देख रहे हो, ये नंगे भूखे गरीब ब्राह्मणपरिवारों के बच्चे हैं, मैं इन्हें अन्न वस्त्र देता हूँ, पढाता भी हूँ। कलकत्ता आ गया, तो यह सब समाप्त हो जाएगा।

विद्यासागर ने कहा - कलकत्ता बडी जगह है, आफ पांडित्य का वहाँ उपयोग अधिक अच्छी तरह हो सकेगा। व्यवसाय तो आप वहाँ रहकर भी कर सकते हैं, कलकत्ता में आप जिस तरह जो व्यवसाय करना है, करें, पर कालेज में आपकी आवश्यकता है।

कालना छोडने का तारानाथ का मन नहीं था। पर विद्यासागर का अनुरोध के आगे झुकना पडा। अनिच्छा से-छह महीने के लिए आ कर देखता हूँ - यह कहा।

तारानाथ विद्यासागर के साथ कलकत्ता आ गए। अगले दिन ही विद्यासागर ने उनके प्रमाणपत्र और प्रशंसापत्र कालेज के अध्यक्ष मार्सेल साहब को दिखाए और नियुक्ति के लिए तारानाथ का आवेदन प्रस्तुत किया। तारानाथ की नियुक्ति नब्बे रुपये महीने के वेतन पर संस्कृत कालेज में हो गई। 1845ई. से तारानाथ ने इस कालेज में अध्यापन कार्य आरंभ किया।

तारानाथ के अध्यापनशैली से छात्र तृप्त होते। संस्कृत कालेज में ही नहीं, उनके घर पर भी विद्यार्थियों का जमघट लगा रहता।

शिक्षा व्यवस्था धीरे-धीरे बदल रही थी। अब शासकीय संस्था थी, पाठ्यऋम थे, परीक्षाप्रणाली थी। तारानाथ ने अनुभव किया कि मुँह जबानी पढाने का युग बीतने को है, छात्रों को छपी हुई पाठ्यपुस्तकें चाहिये।

छात्र जिन्हें पाठ्यपुस्तक की कोई हस्तलिखित पोथी मिल जाती, वे अपने लिए उसकी नकल कर के अपनी पोथी तैयार करते। जो ऐसा नहीं कर पाते थे, वे केवल गुरुमुख से ग्रंथ सुनते, सुन कर मन में बिठा कर उसे गुनते। पढाई सुनने और गुनने पर टिकी थी।

तारानाथ ने अनुभव किया कि हाथ से लिखी पोथियों का समय बीत रहा है। छापाखाना आ चुका। छात्र के हाथ में छपी किताब हो, तो गुरुमुख से पढाई करते हुए किताब उनके लिए सहारा बन सकती है। भारवि का किरातार्जुनीयम् और माघ का शिशुपालवध पाठ्यक्रम में थे। तारानाथ ये दोनों ग्रंथ पढाते थे। उन्होंने इन दोनों की टीका लिखी, और छपाई की व्यवस्था करने में जुट गए।

पाठशालाओं के पंडित गुरुजी उस समय तक यह सोच भी नहीं सकते थे कि पढाई छपी हुई किताब के सहारे भी हो सकती है।

1847ई. तारानाथ के द्वारा संपादित मल्लिनाथ की टीका के साथ किरातार्जुनीयम् और शिशुपालवध की किताबें छपीं। पैसा तारानाथ ने अपने पास ले लगाया था। प्रूफ तो खुद को देखना ही था। जब किताबें छप कर आ गईं, तो संस्कृत कालेज के प्रशासन और सरकार का ध्यान तारानाथ के इस अद्भुत उपक्रम की ओर गया। तारानाथ को इन प्रकाशनों के लिए आर्थिक सहायता दी गई। किताबों से लाभ भी हुआ। पर पुस्तक बेच कर रुपया कमाना तारानाथ के लिए अनैतिक कृत्य था। दोनों पुस्तकों से जो आमदनी हुई, वह सब उन्होंने ज्योतिष के अध्यापक योगध्यानी मिश्र को दे दी।

दोनों काव्यों के मल्लिनाथी टीका के साथ संस्करण निकलना बंगाल में उस समय एक घटना थी। छात्र कृतकृत्य थे, अध्यापक उफत।

इसके बाद तो तारानाथ पुस्तक प्रकाशन में आगे बढते चले गए। अगले ही साल उनके द्वारा संपादित ज्योतिष और गणित के दो ग्रंथ लीलावती और बीजगणितम् में छप कर आ गए। इसके बाद व्याकरण का महाग्रंथ वैयाकरणभूषणसार छपा।

विघ्नसंतोषियों को तारानाथ का यह सारा उद्यम रास नहीं आ रहा थ। वे तारानाथ पर घात लगाए हुए थे। तारानाथ की तरह-तरह से निंदा की जाने लगी। कहा जाने लगा कि वे अपने व्यापार में अधिक समय दे रहे हैं।

1851ई. में बेथुन् साहब शिक्षाविभाग में सुपरिंटेंडेंट हो कर आए। उनकी जन-जन को शिक्षित करने में रुचि थी। उस समय तक लडकियों की शिक्षा की कोई सांस्थानिक व्यवस्था नहीं थी। बेथुम ने पहली बार कलकत्ता में लडकियों के लिए एक विद्यालय खोला। बंगाल के रूढिवादी समाज में इससे तहलका मच गया। पर तारानाथ समय से आगे देख रहे थे। कलकत्ता के पारंपरिक पंडितों में वे पहले थे जिन्होने न केवल स्त्रीशिक्षा का महत्त्व समझा, उन्होंने अपनी बेटी ज्ञानदा को बेथुम के स्कूल में पढने भी भेजा यह जानते हुए भी कि इससे समाज उनका बहिष्कार कर सकता है। तारानाथ के विरोधियों को उन पर प्रहार कर ने का एक और हथियार मिल गया।

स्त्रीशिक्षा पर बहस छिड गई। तापानाथ मैत्रयी, गार्गी आदि वैदकालीन नारियों के दृष्टांत देते, महाभारत में सुलभा की कथा बताते, जो बडी दार्शनिक थीं। दमयंती, सीता, सावित्री, शकुंलता जैसी महिलाओं के भी वे उदाहरण देते। तारानाथ का उद्यम और वक्तृता का असर हुआ। कुछ और भी पारंपरिक पंडितों ने अपने घर से लडकियों को पढने के लिए विद्यालय भेजा।

इसी समय ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने विधवाविवाह को ले कर एक और बहस उठाई। तारानाथ ने विद्यासागर के इस अभियान में बहुत सहायता की - धर्मशास्त्रों से विधवाविवाह के समर्थन करने वाले उद्धरण उन्होंने विद्यासागर को दिए। इस पूरे अभियान में तारानाथ विद्यासागर के साथ निरंतर बने रहे।

समय बदल रहा था। जमींदार कंगाल हो गए थे। मिदनापुर में राधानगर गाँव में शिवनारायण चौधुरी ऐसे ही जमींदार थे। उन्होंने अपनी सारी जमीन रमाप्रसाद राय के पास गिरवी रख कर पचास हजार रुपया कर्ज में लिया था। समय बीतता गया, शिवनारायण चौधुरी की हैसियत तो ब्याज देने की भी नहीं रह गई। रमाप्रसाद के धमकाने पर चौधुरी रुपये की व्यवस्था करने के लिए कलकत्ता आए और वहीं उनका निधन हो गया। अब उनके भूखंड की उत्तराधिकारणी उनकी बेटी थी। रमाप्रसाद चौधरी की इस बेटी के पास कर उसे धमकाने लगे और उसकी जमीन पर कब्जा जमाने की बात करने लगे।

हताश हो कर वह लडकी कलकत्ता आई और ईशंवरचंद्र विद्यासागर के पास जा कर उनके सामने अपना दुखडा सुनाया। ईश्वरचंद्र उसका कर्ज उतारने के लिए रुपये की व्यवस्था का प्रयास करने लगे। रमाप्रसाद को जब यह बात पता चली, तो वह कलक्तता के लोगों को मना करने लगा कि विद्यासागर को इस कार्य के लिए रुपया न दें। निरुपाय हो कर विद्यासागर हताशा में तारानाथ के पास जा कर यह बात उन्हें बताई।

तारानाथ ने सारी बात सुन कर कलकत्ता से प्रवास की व्यवस्था की। वे मुर्शिदाबाद के जेमोकांदी गाँव में राजा प्रतापसिंह के पास पहुँचे। प्रतापसिंह उन्हें बहुत मानते थे। उन्होंने और कालिदास घोष ने मिल कर तारानाथ को पचास हजार रुपया दिया। कलकत्ता आ कर उन्होंने फिर अर्थसंग्रह का प्रयास किया और एक सेठ से पच्चीस हजार रुपये प्राप्त किए । उनकी मेहनत काम कर गई, राधानगर के चौधुरी परिवार से वारिसों की जमीन रमाप्रसाद राय के हत्थे चढने से बच गई। इसके बाद भी तारानाथ इस परिवार के अभिभावक बने रहे और अपने परिचितों से धन संग्रह कर के इसे देते रहे।

कलकत्ता में तारानाथ और विद्यासागर की जोडी प्रसिद्ध हो गई थी। दोनों तर्क करने में प्रखर थे, समाज सुधार में आगे बढ कर हिस्सा ले रहे थे। तारानाथ लोकोपकार के कार्यों से यात्राएँ भी खूब करते। उनकी अनुपस्थिति में विद्यासागर उनके मकान की सुरक्षा का ध्यान रखते। उन्होंने दीनबंधु और शंभुचंद्र - इन दो भाइयों को तारानाथ की अनुपस्थिति में उनके घर की देख रेख का काम सौंप रखा था।

विधवा विवाह की मुहिम के साथ विद्यासागर ने बालविवाह के विरोध का भी अभियान छेडा, तो तारानाथ उनके साथ थे। लेकिन तारानाथ और विद्यासागर का साहचर्य अधिक समय तक टिक नहीं पाया। विद्यासागर बहुविवाह प्रथा के खिलाफ जब मुहिम छेडी तो, तारानाथ ने उनका समर्थ नहीं किया, हालाँकि वे यह मानते थे कि बहुविवाह सामाजिक न्याय की दृष्टि से सुसंगत नहीं है, पर यह झूठ उनके गले कैसे उतर सकता था कि धर्मशास्त्रों में बहुविवाह का निषेध किया गया है। इस मुद्दे पर असमहमत होते हुए भी तारानाथ चुप्पी साध लेते तो बात का बतंगड न बनता। अपनी बात साफगोई के साथ सामने रखने में तारानाथ कोई कसर छोडने वाले तो थे नहीं। उन्होंने बहुविवाहवाद नाम से पुस्तक लिखी, जिसमें साबित किया कि बहुविवाह हिंदू धर्मशास्त्रों के अनुसार अनुमत है। तथ्य और शास्त्रप्रमाण की दृष्टि से तारानाथ सही थे, पर इससे उनके और विद्यासागर के संबंधों में खटास पैदा हो गई।

1852ई. का साल था। तारानाथ बाकी व्यवसायों को छोड अब खेती में रुचि लेने लगे थे। उन्होंने बीरभूम जिले में दस हजार बिस्वे की जमीन खरीदी। गाय और बैल भी बडी संख्या में खरीद लिए। दूध खूब होने लगा, तो घी बनवा कर कलकत्ता में उसे बिकवाते। बीरभूम से कलकत्ता तक रेल नहीं थी, बैलगाडियों पर ही तारानाथ की कृषि और दूध के उत्पाद कलकत्ता पहुँचाए जाते। इस सारे काम के लिए उन्होंने राहा धनपाल नाम के नौकर को जिम्मा सौंप दिया।

सर्दियों में कश्मीर और अमृतसर से बडी मात्रा में शाल बिक्री से लिए बंगाल में आते थे। तारानाथ ने एक लाख रुपये के शाल थोक में खरीद लिए। इसके साथ ही गहनों का व्यवसाय भी उन्होंने किया। राम पोद्दार उनके मातहत काम करते थे। गहनों के व्यवसाय में वे सहायक हुए। वे कालना से पटोल मँगवाते, वीरभूम से रेशमी कपडे। कुछ साल उन्होंने इस तरह अच्छी कमाई की, सन् 1862 में उन्हें व्यापार में बडी हानि हुई। करीब एक लाख रुपये के रेशमी कपडों में कीडा लग गया। अनेक कर्मचारियों ने जिन पर तारानाथ ने विश्वास किया, उन्होंने धोखा दिया। तारानाथ पर लाखों का कर्ज हो गया। तारानाथ किसी से सहायता माँगने में सकुचाते थे। वाराणसी में प्रवास के समय लक्ष मिश्र नाम के एक संपन्न कारोबारी से उनकी अच्छी मित्रता हो गई थी। लक्ष मिश्र को उनकी स्थिति पता चली, तो उसने उन्हें रुपया देने का प्रस्ताव किया, पर तारानाथ को यह गंवारा न हुआ। वे कर्मकांड के लिए दक्षिणा लेने लगे। संस्कृत कालेज के अध्यक्ष इस समय कावेल थे। कावेल ने उनका विद्यानुराग देख कर उन्हें संस्कृत की पांडुलिपियों के संपादन के साथ उन पर टीका लिखने और मुद्रण कराने का काम सौंप दिया।

यहाँ से तारानाथ के जीवन में दूसरा मोड आया। उनका ध्यान संस्कृत साहित्य के विशाल भंडार की ओर गया, जो हस्तलिखित ग्रंथों के संग्रहालयों में बंद था। कावेल साहब तारानाथ से प्रभावित थे, कोई भी समस्या होती तो वे तारानाथ से पूछते।

इसी अवधि में उन्होंने व्याकरणदर्शन पर शब्दार्थरत्नम् नाम से मौलिक ग्रंथ संस्कृत में लिखा। 1851 से 1862 के बीच तारानाथ ने मल्लिनाथ की टीका के साथ रघुवंश और कुमारसंभव, भवभूति का महावीरचरित नाटक, धनंजयविजय व्यायोग नाटक तथा छन्दःशास्त्र के ग्रंथ छंदोमंजरी, सिद्धांतकौमुदी सरल टीका के साथ का संपादन कर के इन सब को प्रकाशित कराया। सिद्धांतकौमुदी का उस समय अमेरिका और यूरोप तक प्रचार हुआ। तारानाथ के जीवनकाल में ही इसके तीन संस्करण निकले। सरकार ने इसकी पाँच सौ प्रतियाँ खरीद कर वितरित कराईं। छात्रों और सामान्य पाठकों का सदैव ध्यान उन्हें रहता। संस्कृत वाक्य रचना सिखाने के लिए उन्होंने इसी समय वाक्यमंजरी नामक पुस्तक रची और इसका प्रकाशन कराया।

कर्मकांड की दृष्टि से गया श्राद्ध पद्धति तथा गया माहात्म्य ये दो पुस्तकें उन्होंने संस्कृत में लिखीं और बंगला अनुवाद के साथ उन्हें प्रकाशित कराया।

सिद्धांतकौमुदी की टीका लिख कर उसके प्रकाशन के प्रस्ताव को ले कर डा. राजेंद्रलाल मित्र ने हंगामा खडा कर दिया। उन्होंने कावेल साहब को आवेदन दिया कि मैं एक हजार दो सौ रुपये में ही सिद्धांतकौमुदी छाप कर दे सकता हूँ। मुझे यह काम सौंप दिया जाए कावेल साहब ने उनका आवेदन सरकार को बढा दिया। पर उन्होंने उस पर यह टीप लिखी कि राजेंद्रलाल मित्र ने न तो किसी संस्कृत ग्रंथ पर तो टीका लिखी है, न वे उसके मुद्रण का काम ही करा सकते हैं। इसलिए तर्कवाचस्पति से ही यह काम कराया जाए

क्षुद्र श्ाृंगाल मत्त मातंग के बल को भला कैसे समाप्त कर सकता है, हवा का झोंका हिमालय को कैसे कँपा सकता है?

कावेल साहब के अनुरोध को सरकार को मानना पडा। तर्कवाचस्पति को टीका लिखने का काम सौंप दिया गया। इस पुस्तक के छपने पर सिद्धांतकौमुदी पढने वाले छात्रों का बडा उपकार हुआ। तर्कवाचस्पति की टीका की प्रशंसा सारे देश के संस्कृत विद्वानों ने की। उस समय काशी में रहने वाले महाराष्ट्रीय ब्राह्मण सिद्धांतकौमुदी के पठन-पाठन में बहुत व्युत्पन्न माने जाते थे। उनके मन में अहंकार था कि हमारे जैसे व्याकरणमर्मज्ञ भारत में अन्यत्र नहीं हैं। बंगाल के एक पंडित ने सिद्धांतकौमुदी के दुर्बोध अर्थों को स्पष्ट करते हुए सारे ग्रंथ का ऐसा खुलासा कर दिया - यह देख कर उनके भी कलेजों पर साँप लौट गए। काशी में इस पुस्तक को ले कर बतंगड हुई। वहाँ भी इंग्लैंड के किसी संस्कृत के जानकार ने काशी के पंडितों से कहा कि आप लोग तो ऐसी टीका नहीं लिख सके, यदि आप लोगों में से कोई समर्थ है, तो सिद्धांतकौमुदी की ऐसी टीका लिख कर लाये, मैं उसके छपवाने के लिए सहायता दिलवाऊँगा। यह सुन कर वे पंडित लोग सिर खुजाते हुए चुप्पी लगा गए।

अब यह स्थिति थी कि जो पंडित तर्कवाचस्पति की निंदा करते थे, वे उनकी टीकाओं से सहायता लेने लग गए, और उनकी लिखी आशुबोधव्याकरण के टीका, शब्दार्थरत्न, शब्दस्तोममहानिधि और वाचस्पत्यम् नामक विशालकाय कोश देख कर मुक्तकंठ से सराहना करने लगे कि तर्कवाचस्पति निश्चित रूप से पाणिनि के अवतार हैं।

1864 ई. में तर्कवाचस्पति ने रत्नावली नाटिका का मुद्रण का मुद्रण करवा कर प्रकाशित किया। 1865ई. में उडीसा के ढेंकानल राज्य के महाराज कलकत्ता आए। वे यहाँ के पंडितों को खोज खोज कर उनसे चर्चा कर रहे थे। ढेंकानलनरेश स्वयं भी वेदांतदर्शन के असाधारण विद्वान् थे। वे स्वयं छात्रों को प्रतिदिन वेदांत पढाया करते थे। महाराज के आदेश से जयनारायण तर्कपंचानन तथा तर्कवाचस्पति दोनों ने उनके समक्ष वेदांत शास्त्र पर अपने अपने विचार प्रस्तुत किए। फिर तो महाराज का ऐसा विचार बना कि कोई पंडित दस दिन के भीतर मधुसूदन सरस्वती के सिद्धांतबिंदु नामक ग्रंथ, जिसमें वेदांतशास्त्र का गहन मंथन है, उसका सार लिख कर दे दे, तो उन्हें बडी प्रसन्नता होगी।

भगवान् शंकराचार्य के ब्रह्मस्तोत्र नाम से काव्य है। उसमें दस श्लोंको में वेदांतमत समझा दिया गया है। मधुसूदन सरस्वती नाम के बडे पंडित हुए, उन्होंने उस काव्य के दस श्लोकों पर सिद्धांतबिंदु नाम से ग्रंथ लिखा। ढेंकानल के महाराज की इच्छा जान कर तर्कवाचस्पति ने सरल संस्कृत भाषा में इस ग्रंथ को ले कर सिद्धांतबिंदुसार नामक पुस्तक बना कर उन्हें दस दिन में दे दी। यही नहीं, उन्होंने शंकराचार्य के दस श्लोकों पर अपनी एक टीका अलग से इसके साथ प्रस्तुत की। ढेंकानल महाराज को इस कार्य से बडा संतोष मिला।

तर्कवाचस्पति की इस पुस्तक की कलकत्ता में भी चर्चा हुई। तर्कपंचानन ने इस पुस्तक को पढ कर कहा कि तर्कवाचस्पति जैसा पंडित हमारे बीच और कोई नहीं है। रानी स्वर्णमयी कासिम बाजार में रहती थीं। धर्मकार्य में सहायता देने में वे बडी उदार थीं। उनके सेक्रेटरी थे- रायबहादुर राजीवलोचन। उन्होंने तर्कवाचस्पति के ये दोनों ग्रंथ देखे, तो इनको बडे पैमाने पर छपवाने और वितरित कराने की व्यवस्था कराई।

इसी बीच तर्कवाचस्पति ने विचार किया कि बंगाल में कर्मकांड में विनियुक्त होने वाले मंत्रों के जानकार कोई नहीं मिल रहे हैं, तो उन्होंने पाँच वर्ष प्रगाढ परिश्रम कर के कर्मकांड पद्धतियों का संस्कार कर के तुलादानादिपद्धति नामक एक पुस्तक लिखी, और इसका 1866ई. में मुद्रण करवाया। महात्मा राजीवलोचन ने इस पुस्तक की छपाई के लिए भी सहायता देने का प्रस्ताव किया, और प्रातःस्मरणीया स्वर्णमयी देवी के खजाने से पाँच सौ रुपये इस काम के लिए तर्कवाचस्पति को दिलवाए। 1866ई. में तर्कवाचस्पति ने कुमारसंभव महाकाव्य आठवें से सत्रहवें सर्ग तक मुद्रित करवा कर छपवाया। इसी वर्ष वेणीसंहार नाटक की उनकी टीका भी प्रकाशित हुई।

1867ई. में उन्होंने आशुबोध नामक नये संस्कृतव्याकरण की रचना की। इसके पहले उनकी सिद्धांतकौमुदी की टीका ही संस्कृतव्याकरण सीखने के लिए सबसे अच्छा माध्यम थी, इस ग्रंथ के छप जाने पर उसमें एक सहायक ग्रंथ और सम्मिलित हो गया। लंदन विश्वविद्यालय के संस्कृत के प्राध्यापक गोल्डष्टकर आशुबोधव्याकरण की रचनाप्रणाली और सहज सरल सूत्र बनाने की विधि से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने यह मत प्रकट किया कि संस्कृत व्याकरण सीखने के लिए यही पुस्तक सर्वोत्तम है। 1869ई. में तर्कवाचस्पति ने अकारादिक्रम से शब्दों का संयोजन करते हुए संस्कृतशब्दों के महासागर को पाँच खंडों में व्याख्या के साथ शब्दस्तोममहानिधि नामक पाँच खंडों के शब्दकोश में प्रस्तुत किया। यह शब्दकोश आधुनिक पद्धति पर बना हुआ पहला वैज्ञानिक संस्कृतकोश था। इसमें हर शब्द की व्युत्पत्ति भी दी गई है। इस तरह का अपने ढंग का यह पहला कोश था। संस्कृत व्याकरण की अपनी प्रामाणिक जानकारी के कारण तर्कवाचस्पति इतना व्यवस्थित कोश बना सके। इसी वर्ष तर्कवाचस्पति ने धातुरूपादर्श नामक पुस्तक पूरी कर के प्रकाशित की। इस पुस्तक में अकारादि ऋम से सारे धातुरूप इस तरह दिए गए हैं जिससे अध्यापक और अध्येता दोनों को तो सहूलियत हो गई, पाठ्यपुस्तकें बनाने वाले विद्वज्जन धातुरूप इसमें देख कर पाठों की रचना करने लगे।

(इसके आगे 187॰ -72 में तर्कवाचस्पति द्वारा संपादित और प्रकाशित किए गए संस्कृत के अनेक काव्यों के पहले संस्करणों का विवरण है।)

सांख्यकारिका और भामिनीविलास पर उनकी टीकाएँ इन वर्षों में प्रकाशित हुईं। सर्वदर्शनसंग्रहम्, कविकल्पद्रुमम्, परिभाषेन्दुशेखर - इन ग्रंथों के संस्करणों के साथ बहुविवाहवाद नामक अपनी संस्कृत पुस्तक का भी उन्होंने इसी साल प्रकाशन करवाया।

1873 में उनका वाचस्पत्यम् का पहला खंड प्रकाशित हुआ। यह महामति तर्कवाचस्पति के अठारह वर्षों के परिश्रम का परिणाम था। इसकी छपाई का काम बारह साल तक चला। 1884 में इसके छहों खंड सामने आ गए। बहुत बारीक अक्षरों में बडे आकार का 56॰॰ से अधिक पृष्ठों का यह महाकोश अपने समय का कोशनिर्माण का सबसे बडा कार्य था, जिसे तारानाथ ने अकेले पूरा किया और उसके मुद्रण की भी व्यवस्था अपने बल पर की। उन्होंने अपने शिष्यों - ईश्वरचंद्र विद्यासागर, महेशचंद्र न्यायरत्न, कृष्णकमल भट्टाचार्य आदि से अनुरोध अवश्य किया था कि तुम सब लोग तन मन धन से इस काम में सहायता दो, पर जो सहाता मिली, वह अत्यल्प थी। इस ग्रंथ को छपवाने में तर्कवाचस्पति का अस्सी हजार रुपया खर्च हुआ। जीवानंद विद्यासागर तर्कवाचस्पति के ही दूसरे रूप थे, उन्होंने इतना सब खर्च उठाने में अपना हाथ लगाया।

बंगाल सरकार में शिक्षा विभागाध्यक्ष बुडरफ साहब थे। 1865 में सरकार की ओर से इस कोश के लिए दसहजार रुपये मंजूर करा चुके थे। 1884 में सरकार की ओर से पाँच हजार रुपये का अनुदान फिर मिला। इस तरह पंद्रह हजार रुपये में सरकार ने इस कोश की दो सौ प्रतियाँ खरीदीं। इसके छठे खंड के प्रकाशन के लिए विजयपुर के राजा की ओर से भी पचास प्रतियाँ खरीदने के लिए पाँच हजार रुपये भेजे गए।

वाचस्पत्यम् के प्रकाशन से तर्कवाचस्पति ने प्रमाणित कर दिया कि वे सचमुच वाचस्पति हैं, वे चारों वेदों के भाष्यकार सायण और सारे उपनिषदों के भाष्यकार शंकराचार्य की कोटि के आचार्य के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके हैं, वाचस्पत्यम् के साथ तर्कवाचस्पति का नाम साहित्य संसार में अमर हो गया है। इस महाकोश में संस्कृत भाषा के सारे शब्दों की प्रकृति और प्रत्यय बताते हए सिद्धि की गई है। भिन्न भिन्न अर्थ वाले लौकिक और वैदिक शब्दों के प्रयोग संदर्भसहित सप्रमाण प्रदर्शित किए गए हैं। इसके साथ चार्वाक, माध्यमिक, योगाचार, वैभाषिक, सौत्रान्तिक, आर्हत (जैनदर्शन), रामानुज, माध्व, पाशुपत, शैव, प्रत्यभिज्ञा, पाणिनि, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, सांख्य, पातञ्जलयोगदर्शन तथा वेदान्तदर्शन के पारिभाषिक शब्दों को भी स्पष्ट किया गया है। आश्वलायन,बोधायन, पारस्कर आदि सूत्रों के पारिभाषिक शब्दों की भी व्याख्या है। अठारहों पुराणों के विषय यहाँ संक्षेप में बता दिए गए हैं। ऐतिहासिक पौराणिक पात्रों का परिचय इसमें दिया गया है। ईश्वर शब्द के विवेचन में अलग अलग दर्शनों के मतों का खुलासा किया गया है। भूगोल और खगोलशास्त्र के विषय भी समाविष्ट हैं। और अधिक क्या कहा जाए, विधाता की सृष्टि के समान तर्कवाचस्पति की यह एक नई सृष्टि है।

पाठकजन, आप विचार करें कि महामति मानवाकृति तर्कवाचस्पति मानव हैं या मानवरूप धर कर धरती पर उतरे कोई देवता हैं? यह कलकत्ता नगरी राधधानी है। यहाँ सारे देशों के विद्वान् आते रहे हैं। इस नगरी में रह कर तर्कवाचस्पति ने अनेक विद्वानों के साथ विचार-विमर्श करते हुए अलग अलग देशों के शास्त्र का संकलन किया था। उन सब का अध्ययन कर के अपनी अप्रतिहत शक्ति से तर्कवाचस्पति ने यह असाधारण कार्य कर दिया। इस ग्रंथ के निर्माण के समय महात्मा तर्कवाचस्पति पर दो बार उत्कट पीडा झेलनी पडी। उन पर दुःसाध्य व्याधि ने आक्रमण किया। दोनों बार ऐसा हुआ कि बचने की आशा न थी। पर तर्कवाचस्पति को साधारण जनों के हित के लिए यह असाधारण ग्रंथ पूराकरना था, इसलिए वे बच गए।

वाचस्पत्यम् के रचनाकाल की अवधि में ही तर्कवाचस्पति ने 1873 ई. में लिंगानुशासन नामक पुस्तक की रचना कर के उसका प्रकाशन किया। इसके बाद भारतेश्वरी विक्टोरिया के सुपुत्र ड्यूक आफ एडिनबरा जब भ्रमण के लिए भारत आए, तो बृहस्पति के समान मति वाले तर्कवाचस्पति ने भारतवासियों के प्रतिनिधि के रूप में उनके समक्ष राजप्रशस्ति नामक काव्य प्रस्तुत किया और रानी के बेटे को आशीर्वाद दिया।

वाचस्पत्यम् के प्रकाशन के द्वारा तर्कवाचस्पति ने अपना पांडित्य ही नहीं उसके प्रकाशन में अपना वैभव भी प्रकट कर दिया था। उनके प्रकाशनों ने भारतवर्ष को सचमुच भारतवर्ष बना दिया। सत्तर वर्ष की आयु में वे जितना श्रम कर रहे थे, उतना सोलह वर्ष का नवयुवक भी नहीं कर पाते। प्रकाशनों को ले कर उनकी तत्परता और चिंता ऐसी थी कि रास्ते पर चलते हुए या यात्रा करते हुए भी प्रूफ सुधारने का काम करते जाते। एक क्षण भी वे व्यर्थ नहीं जाने देते थे।

ज्योतिशास्त्र में ग्रहणगणना में उनकी बुद्धि बहुत चलती थी। एक बार ग्रहण की गणना को लेकर उनका इंग्लैंड के डा. मेकाइ से विवाद हो गया। पर मेकाइ की गणना सही नहीं निकली। यह समाचार उस समय बहुत से अखबारों में प्रकाशित हुआ। पंचांग के निर्माण में भी तर्कवाचस्पति की बहुत गति थी। इस क्षेत्र में उनके शिष्य थे - ज्योतिर्भूषण रुद्रनारायण। पंचांग निर्माण में तर्कवाचस्पति के दिखाए मार्ग से रुद्रनारायण बंगाल के सारे पंडितों से विवाद में सही साबित हुए। आज बंगाल के ज्योतिर्विद इन्हीं के मत पर आस्था रखते हैं। यदि तर्कवाचस्पति कुछ वर्ष और जीवित रहते तो, वे रोम के सम्राट् जूलियस सीजर और और रोम के ग्रिगरी नामक ज्योतिषपंडित ने जिस तरह ज्योतिष की गणना में भ्रमों का निवारण कर के अपना सिद्धांत स्थापित किया, उसी तरह वे भी भारतीय पंचांगविधि को परिष्कृत कर के अपना मत स्थापित करते।

महामति तर्कवाचस्पति जितने दिन संस्कृत कालेज में अध्यापन करते रहे, वहाँ कर्णाटक, सौराष्ट्र, महाराष्ट्र, कश्मीर, द्राविडदेश, नेपाल आदि स्थानों से पंडितजन इस संस्था को देखने के लिए आते, उन पंडितों से संवाद संस्कृत भाषा के माध्यम से ही होता। संस्कृत कालेज के पंडितजन उन से बातचीत करने के लिए तर्कवाचस्पति को ही आगे कर देते। संस्कृत में धाराप्रवाह विचारमंथन प्रस्तुत करने में तर्कवाचस्पति की पटुता अपूर्व थी।

187॰ई. में जयपुराधीश्वर महाराज रामसिंह संस्कृत कालेज देखने के लिए कलकत्ता आए। संस्कृत भाषा में उनका बडा अनुराग था, तर्कवाचस्पति की विलक्षणता से वे बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने तर्कवाचस्पति से बहुत अनुरोध कया कि वे उनकी राजधानी जयपुर पधारें। तब तर्क- वाचस्पति वैसाख के महीने में जयपुर गए। जयपुर दरबार के वैष्णव पंडित नाम के लिए विष्णु के उपासक थे, पर धर्म से विमुख हो चुके थे, कुपथ पर चल रहे थे। तर्कवाचस्पति परम वैष्णव थे उन्होंने उन पंडितों को वैष्णवशास्त्र से अनुमोदित मार्ग पर चलने का उपदेश दिया, तब वैष्णवों के मुखिया ने उनको उत्कोच (रिश्वत) दे कर तर्कवाचस्पति को साधने की चेष्टा की। तर्कवाचस्पति ने उसके प्रस्ताव को तिनके की तरह ठुकरा दिया, और वाद में सारे वैष्णवों को पराजित किया।

उनकी अलौकिक कुशाग्र बुद्धि को देख कर भूपतितिलक जयपुराधीश रामसिंह ने तर्कवास्पति के ऊपर बहुत प्रीति प्रकट की, और उन्हें रास्ते के खर्च के लिए दो हजार रुपये दिए, और पंद्रह हजार रुपये की वार्षिक वृत्ति और बहुत-सी संपदा उन्हें देने का प्रस्ताव किया। महात्मा तर्कवाचस्पति ने महाराज की दी हुई पाथेय राशि ही केवल स्वीकार की, वार्षिक वृत्ति और भूसंपदा लेने से मना कर दिया।

एक बार तर्कवाचस्पति किसी काम से बिहार प्रदेश के मुजफ्फरपुर नगर में गए हुए थे। उनके नगर में पहँचने का समाचार मिलते ही संभ्रांत नागरिकों, पंडितों ने उनके सान्निध्य में एक बडी सभा का आयोजन किया। तर्कवाचस्पति से इस सभा में आर्यधर्म पर व्याख्यान देने का अनुरोध किया गया। इस सभा में छह हजार लोग उपस्थित थे। तर्कवाचस्पति ने उनके समक्ष हिंदी में धर्म के विषय में ऐसा व्याख्यान दिया कि लोग चमत्कृत हो गए। तर्कवाचस्पति ने वहाँ उपस्थित जनसमाज को संस्कृत शिक्षा के प्रचार के लिए प्रेरित किया। इसी प्रेरणा का परिणाम था कि मुजफ्फरपुर में धर्मसमाज संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना हुई। बिहार प्रदेश के छात्रों के लिए यह संस्था बहुत उपकारक सिद्ध हुई।

एक बार ब्राह्मसमाज के प्रचारक केशवचन्द्र सेन के भवन में बहुत बडी सभा बुलाई गई। इस सभा में राजधानी में रहने वाले बहुत से धनी मानी ज्ञानी जन उपस्थित हुए। इस विराट सभा में कोई एम.पी. डफ साहब अध्यक्षता कर रहे थे। देवगुरु बृहस्पति के समान तर्कवाचस्पति इस सभा में अचानक अपने पुत्र जीवानंद विद्यासागर के साथ आ पहुँचे। कृष्णमोहन वंद्योपाध्याय ईसाई मत को मानते थे, उनको आया देख कर वे दूर से ही झट से अपनी कुर्सी से उठे, और तर्कवाचस्पति को शाष्टांग प्रणाम किया। तर्कवाचस्पति ने भी उन्हें आशीर्वाद दिया - आयुष्मन् भव।

कृष्णमोहन वन्द्योपाध्याय को इस तरह तर्कवाचस्पति के पैरों पर गिरता देख कर एम.पी. डफ साहब ने उनसे पूछा-आपने इस पंडित को धरती पर गिर कर इस तरह प्रणाम क्यों किया? यह तेजस्वी पंडित कौन है?

दूरदर्शी कृष्णमोहन उपाध्याय ने उनसे कहा - ये तारानाथ तर्कवाचस्पति हैं। ये मेरे संस्कृत के गुरु हैं, इन्होंने अपने प्रभाव से सारे पंडितों का गर्व मिटा दिया है, ये संसार में दूसरे वाचस्पति ही हैं, तर्कवाचस्पति इनकी उपाधि है। इनके समान संस्कृत का इस समय कोई दूसरा विद्वान् नहीं है। हम लोग अपने गुरु को इसी तरह प्रणाम करते हैं।

कृष्णमोहन की यह बात सुन कर डफ साहब बहुत संतुष्ट हुए।

एक बार दार्जिलिंग प्रदेश के कैम्पबेल नाम के अधिकारी बर्दवान के राजा प्रतापचंद्र के साथ चर्चा कर रहे थे। कृष्णमोहन वंद्योपाध्याय साथ में थे। कैंपबेल ने हिंदू धर्म में बहुविवाह की व्यवस्था के विषय में जिज्ञासा की। कृष्णोहन वंद्योपाध्याय ने केंपबेल को बताया कि इस विषय में तारानाथ तर्कवाचस्पति ईश्वरचंद्र विद्यासागर के साथ विवाद हो चुका है।

रसोई के काम में तर्कवाचस्पति बहुत निपुण थे। अपने पिता और माता के श्राद्ध में उन्होंने अपने हाथ से ही सारी रसोई बना कर ब्राह्मणों को भोजन कराया। उन्होंने अनेक चूल्हों पर एक साथ चालीस व्यंजन दो तीन घंटे के अंदर बनवा कर तैयार करा दिए थे। मिठाइयाँ बनाने मे तो उनकी कोई तुलना न थी। कलकत्ता के अनेक बडे लोगों के घरों में विवाह या अन्नप्राशन का उत्सव होता, तो तर्कवाचस्पति की देखरेख में रसोई बनवाई जाती।

एक बार हेतमपुर के राजा के भवन में किसी कार्य में एक लाख ब्राह्मणों का भोज हुआ। इस आयोजन में तर्कवाचस्पति की निगरानी में भोजन बनवाया गया। भोजन करने वाले इतने प्रसन्न थे कि वे चलते समय तर्कवाचस्पति को प्रणाम कर कर के जा रहे थे। इसी तरह जमीन जायदाद, कोर्ट कचहरी के मामलों में भी तर्कवाचस्पति की बुद्धि बहुत चलती थी।

गणित और ज्योतिषशास्त्र में भी उनकी विद्वत्ता अगाध थी। 1873 में बडे लाट साहब लार्ड नार्थब्रुक इंग्लैंड की महारानी के प्रतिनिधि के रूप में कलकत्ता आए। संस्कृत कालेज में उनका आगमन हुआ। तारानाथ तर्कवाचस्पति उस समय कक्षा में ज्योतिषशास्त्र पढा रहे थे। उन्होंने तर्कवाचस्पति से ग्रहों की गति के बारे में सवाल किए । तारानाथ ने उनके सारे प्रश्नों का सटीक उत्तर देते हुए सूर्यसिद्धांत आदि ज्योतिष के ग्रंथों से प्रमाण उपस्थित कर के भारतीय ज्योतिष की महत्ता इस तरह स्थापित की कि लोग मुग्ध हो गए। दोनों के बीच के संवाद अंग्रेजी से संस्कृत और संस्कृत से अंग्रेजी में दुभाषिये के माध्यम से अनूदित किए गए।

राजधानी में धर्मरक्षणी सभा की स्थापना हुई, कलकत्ता के अनेक संपन्न नागरिक इसके सदस्य बने। शोभाबाजार के कमलकृष्ण राजबहादुर इसके अध्यक्ष थे। तारानाथ तर्कवाचस्पति इस सभा के प्रेरणास्रोत थे। उनके परिश्रम, प्रयास और लगन से धर्मरक्षणी सभा उस समय पराकाष्ठा पर पहुँच गई थी। इसमें बडी मात्रा में चंदा एकत्र हुआ। इससे चतुष्पाठी के छात्रों की परीक्षा, उपाधिप्रदान और छात्रवृत्ति की व्यवस्था की गई।

एक बार धर्मरक्षणी सभा में इस विषय को ले कर विवाद हुआ कि चमडे के पात्र में जल रखा हो, तो उससे नारायण की पूजा की जा सकती है या नहीं। उपस्थित विद्वानों का कहना था कि चमडे के छू जाने पर जल पूजा के योग्य बना रहता है। सब ने इसके विषय में शास्त्रों से प्रमाण दिए। तर्कवाचस्पति चुप बैठे रहे। अंत में जब सब उनकी ओर देखने लगे, तो वे हँस कर बोले - आप लोग पहले चर्मजल से स्वयं अभिषेक कीजिए, फिर मैं भी आप लोगों का अनुसरण करूँगा।

तर्कवाचस्पति के प्रयासों से धर्मरक्षणी सभा के पास लगभग छत्तीस लाख रुपये एकत्र हो गए। जयपुर के राजा सभा में बहुत रुचि लेने लगे। उन्होंने बहुत आर्थिक सहायता भी दी, यह हमारी आँखों देखी बात है कि एक बार जयपुर नरेश चार घोडों से जुती बग्घी पर धर्मरक्षणी सभा में उपस्थित होने के लिए जा रहे थे। रास्ते में तर्कवाचस्पति को जाता देख कर वे बग्घी से उतरे, उन्हें बग्घी पर चढा कर अपने बगल में बिठा कर धर्मरक्षणी सभा की बैठक में पहुँचे।

फलित ज्योतिष की गणना में तर्कवाचस्पति की बडी शक्ति थी। कुंडली के कोष्ठक देख कर भावी शुभाशुभ फल बताने में उनकी बराबरी और कोई नहीं कर सकता था। इसीलिए पाइकपाडा के राजा प्रतापनारायण सिंह और राजेश्वरानारायण सिंह आदि राजा तथा और भी संभ्रांत लोग उन पर बहुत श्रद्धा रखते थे। तारानाथ जो फलित बताते, वह सच निकलता। उनके गणित और फलित की गणना कभी गलत साबित नहीं हुई।

तारानाथ बिना कुंडली के भी गणना कर के आने वाली घटना का संकेत कर देते थे। एक बार एक चिकित्सक कलकत्ता से वचवजिया गाँव में किसी मरीज को देखने गए। जिस दिन उनको लौट कर आना था, वे लौटकर नहीं आए। घर पर उनके भाई बंधु बहुत परेशान थे। तब महेशचंद्र न्यायरत्न और राजकुमार मित्र आदि लोग तारानाथ के पास आए और उनसे पूछा कि वे डाक्टर कहाँ हैं, जीवित हैं या नहीं। तारानाथ ने गणनाकर के कहा कि वे चिकित्सक जीवित हैं, उत्तर पश्चिमी इलाके में हैं, और दस दिन बाद लौट आएँगे। उनकी गणना के अनुसार वे चिकित्सक निर्दिष्ट दिन और निर्दिष्ट समय पर घर लौट आए। इसी तरह चौबीस परगना जिले में एक गाँव में शारदाप्रसन्न मुखोपाध्याय थे, वे बीमार हो गए। तारानाथ उनके घर मिलने गए, उन्हें शुभाशुभ फल बताया, बीमारी से मुक्त होने का उपाय बताया। तारानाथ फलित बताने के लिए कभी एक कौडी भी नहीं लेते थे, जो छात्र उनसे ज्योतिष पढते थे, उन्हें भी वे यही समझाते थे कि ज्योतिष विद्या से गणना बता कर कभी भी किसी से एक पैसा भी मत लेना।

तारानाथ वक्तृत्वकला में भी पारंगत थे। वे दस हजार लोगों की सभा में भी जब बोलने को उठ कर खडे हो जाते, प्रस्तुत विषय पर शास्त्रसम्मत युक्तियों से इस तरह प्रतिपादन करते कि सभा में उपस्थित जनसमाज मंत्रमुग्ध हो जाता। संस्कृत, हिन्दी और बंगला - इन तीन भाषाओं में उनकी समान गति थी। संस्कृत में जब बोलते, तो इतनी सहज और सरल रूप में बात कहते कि संस्कृत न जानने वाला भी अनायास समझ सके।

एक बार मथुराप्रदेशस्य मेठवंशी सेठ के प्रयास से कलकत्ता विश्वविद्यालय के सभागार में कोई सभा बुलाई गई थी। इस सभा में बंगाल के बडे बडे पंडित बुलाए गए थे, और भी कई धनी मानी लोग आए थे। आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द ने देवमूर्ति की पूजा वेदविरुद्ध है - यह घोषणा की थी, उनके मत के खंडन के लिए यहसभा बुलाई गई थी। तय हुआ कि सभी भाषण संस्कृत में होंगे। कोई भी पंडित वहाँ बोलने का साहस न कर पा रहा था। तारानाथ ने उस सभा में संस्कृत में विस्तृत भाषण दिया और अखंडनीय युक्तियों से दयानंद के मत का खंडन किया।

अब समय बदल गया है। कलकत्ता में अब जैसे नाटक होने लगे हैं, वैसे पचास वर्ष पूर्व नहीं होते थे, नाटक का नाम भी लोगों ने नहीं सुना था। उस समय बंगाल में कविगान होता था। उसमें दो ही पक्ष होते थे। एक पक्ष जब अपना गाना प्रस्तुत कर चुका होता, तो दूसरा पक्ष तत्काल उसका उत्तर देने के लिए उठ खडा होता। भद्र लोग, अज्ञानी लोग, ब्राह्मण और विद्वान् सभी रुचि ले कर संगीत सुनते और इसी को रंगमंच मानते। दोनों पक्षों में दो तीन गीत रचने वाले होते थे। गीत लिखने वाले को उस्ताद कहा जाता था। गीतों में सवाल जवाब गूँथने के लिए पुराणों और शास्त्रों का ज्ञान आवश्यक था। रंगमंच पर बैठे बैठे वे तत्काल गीत में सवाल जवाब गूँथ देते थे। उनकी असाधारण प्रत्युत्पन्नमति का चमत्कार देखने के लिए ही लोग कविगान सुनने जाते। दूर-दराज के इलाकों से लोग कविगान सुनने आते थे। केवल बंगाल में ही यह अनोखी विधा चली आ रही थी। ।

तारानाथ जब सोलह वर्ष के थे, तो वे कवि के रूप में गीत रचना करने के लिए और दूसरे पक्ष के कवि के गाने सुनने के लिए इस तरह के आयोजन में जाने लग गए थे। जब वे कलकत्ता में अध्ययन कर रहे थे, उस समय हाप अखाडा की मंडली के गीत बहुत लोकप्रिय थे। इस मंडली के लोगों को महाभारत कंठस्थ था। तारानाथ कालना नगर में भी कविगान सुनने के लिए जाते थे। कलाकार खडे हो कर गीत गाते। समय बीतता गया, तो कलकत्ता के लोगों की कविगान में वैसी रुचि नहीं रह गई। तब कलकत्ता में रंगमंच का उदय हुआ। तर्कवाचस्पति गीतरचना में भी निपुण थे, मृदंग वे बजा लेते थे, संगीतशास्त्र का उनको ज्ञान था, राग-रागिनियों को अच्छी तरह पहचानते थे।

कलकत्ता के संस्कृत महाविद्यालय में जितने पुस्तकें थी, उनको वे पढ चुके थे। किस पुस्तक के किस अध्याय में कहाँ क्या बात कही गई है, यह भी वे बता सकते थे।

कोर्ट कचहरी के मामले में केस को समझ कर उसका उत्तर तैयार करने में भी उन्हें महारत हासिल थी। एक बार किसी मामले में निचली अदालत में मुवक्किल की हार हो गई, उसने बडी अदालत में मामला प्रस्तुत किया। मुख्य न्यायाधीश मिस्टर पीकॉक थे। तर्कवाचस्पति इस मुवक्किल की ओर से पैरवी के लिए हाजिर हुए। उनकी दलीलें सुन कर सभी जजों ने एक स्वर में कहा कि यदि तारानाथ वकालत का पेशा करते, तो द्वारकानाथ मिश्र जैसे बडे वकील को भी हतप्रभ कर देते। तर्कवाचस्पति की वक्तृता के प्रभाव से इस प्रकरण में उनके मुवक्किल की जीत हुई।

हिंदू विधवा स्त्री को मृत पति की संपत्ति पर अधिकार है - इस का ताराचण ने समर्थन किया था। पर एक प्रकरण अलग तरह का कचहरी में प्रस्तुत हुआ - विधवा स्त्री पति की संपत्ति की उत्तराधिकारिणी होने के बाद व्यभिचार करने लगे तो क्या वह उत्तराधिकारिणी बनी रहेगी? कलकत्ता के उच्च न्यालय ने इस प्रकरण में व्यवस्था देने के लिए तारानाक को बुलवाया। शास्त्रसम्मत व्यवस्था यही है कि विधवा स्त्री यदि व्यभिचारिणी हो, तो वह उसका संपत्ति पर अधिकार नहीं रहता। उच्चन्यायालय के दूसरे वकील द्वारकानाथ मित्र भी तारानाथ की व्यवस्था से सहमत थे। तर्कवाचस्पति ने अपने मत के समर्थन में शास्त्रों से बहुत से अकाट्य प्रमाण उपस्थित किए। इस पुण्यभूमि भारतवर्ष में न्याय की व्यवस्था बनाये रखने के लिए उन्होंने न केवल अपार शारीरिक और मानसिक श्रम किया, इस कार्य के लिए अपनी ओर से धनराशि का व्यय भी किया।

कचहरी के मामलों में जिरह करने में तारानाथ की शक्ति अतुलनीय थी। एक बार हुगली जिले की कचहरी में माधवगिरि मोहंत के खिलाफ तारकेश्वर मोहन्त का मामला चल रहा था। विपक्ष में श्रीमान् तारकनाथ पालित महोदय वकील थे। माधवगिरि मोहंत की ओर से त्रैलोक्यनाथ मित्र वकील थे। इस मामले में तर्कवाचस्पति जिरह करने में त्रैलोक्यनाथ मित्र के साथ थे।

उस दिन तर्कवाचस्पति अष्टक श्राद्ध कर रहे थे, और वे नदी पार कर के अन्य गाँव नहीं जा सकते थे, जबकि हुगली की कचहरी में उन्हें इस प्रकरण के लिए उपसथित होना था। तब उस दिन जज ने अभियोग पक्ष की सुनवाई रद्द कर दी। इस पर मुख्य वकील तारानाथ पालित ने आपत्ति की। उनका कहना था कि तर्कवाचस्पति तो वकील हैं ही नहीं, और दूसरे पक्ष की ओर से वकील त्रैलोक्यनाथ उपस्थित हैं ही। इसलिए अभियोजन पक्ष की सुवाई आप क्यों नहीं कर रहे हैं। जज ने कहा - तर्कवाचस्पति मामले के जानकार हैं, और शास्त्रज्ञ पंडित हैं। वे नहीं हैं, तो कार्रवाई नहीं होगी। जब तक महामहोपाध्याय शास्त्रज्ञ पंडित जिरह न कर ले तब तक आफ पक्ष की सुनवाई भी पूरी नहीं हो सकती। इसलिए आज काम रोक दिया जाए। अगले दिन तर्कवाचस्पति कचहरी पहुँचे। दूसरे पक्ष के गवाह भरतचंद्र शिरोमणि थे, जो स्मृतिशास्त्र के प्राध्यापक थे। तर्कवाचस्पति ने उनसे जिरह की, और फिर माधवगिरि मोहन्त जीत गए।

तर्कवाचस्पति की प्रत्युत्पन्न मति असाधारण थी। एक बार वे तर्पण करने के लिए घोडागाडी पर सवार हो कर गया तीर्थ की ओर जा रहे थे। सोन नदी के दूसरी किनारे पर डाकुओं ने उन्हें घेर लिया। उनके पास हथियार थे और वे हमला करने के लिए तैयार थे। तर्कवाचस्पति घबराये नहीं, उन्होंने अपने साथ के लोगों से कहा कि- अमुक अमुक जगह के मजिस्ट्रेट की सवारी जा रही है। यह सुन कर वे डाकू दूर से ही पलट कर भाग उठे।

षड्दर्शनवेत्ता निमाई चाँद शिरोमणि बंगाल के अद्वितीय पंडित थे। अपने समय में वे कलकत्ता के एक मात्र पंडित थे, जिन्हें शास्त्रार्थ के लिए निमंत्रण पत्र भेजा जाता था। पर उन्होंने जब संस्कृत कालेज में नौकरी की, तो निमंत्रण पत्र तो उनको भेजा जाता, पर सम्मान राशि सौ रुपये से घटा कर चालीस रुपया कर दी गई। निमाई चाँद शिरोमणि ने इसे अपना अपमान समझा। वे इस घोषणा के साथ सम्मानराशि लौटा देते कि संस्कृत कालेज के प्राध्यापकों को सम्मानराशि सम्मानपूर्वक मिलेगी, तभी वे इसे स्वीकार करेंगे। उनके जीवनकाल में उनकी यह घोषणा प्रतिफलित नहीं हो सकी। तारानाथ उन्हीं के शिष्य थे, उन्होंने अपने गुरु की कामना को चरितार्थ किया।

पहले कलकत्ता नगर में शास्त्रार्थों में एकमात्र विजयी विद्यारत्न भवशंकर पंडित थे, उसके बाद शास्त्रार्थों में अपराजेय रहने वाले वादी तारानाथ तर्करत्न हुए। शास्त्रार्थ करने के लिए पत्र भेजा जाता, कलकत्ता में केवल तारानाथ के पास शास्त्रार्थ का पत्र भेजा जाता था। शास्त्रार्थों में कभी कभी सौ-सौ पंडित एक साथ उनसे विवाद करने पर उतर आते, और शास्त्रार्थ सोलह सत्रह दिनों तक चलता रहता। पूर्वी बंगाल के पंडित पूर्वपक्ष प्रस्तुत करते, पश्चिमी बंगाल के पंडित उत्तर पक्ष।

अपनी असाधारण बुद्धिमत्ता और उदारता के कारण तर्कवाचस्पति समाज में बहुत लोकप्रिय थे और सब उन पर विश्वास रखते थे। पर कई बार ऐसा भी हुआ कि दुष्टों ने उनके साथ धोखा किया, और उनका पैसा हडप गए। इसलिए तारानाथ ने कमाया तो बहुत, पर वे रुपया बचा कर न रख सके।

तारानाथ ने तीन बार विवाह किया। उनका पहला विवाह सोलह वर्ष की आयु में हुआ। पहली परिणीता छह मास में ही दिवंगत हो गई। दूसरा विवाह बर्दवान जिले में तारिणीशंकर भट्टाचार्य की सुलक्षणा कन्या अंबिकादेवी से हुआ। वे तर्कवाचस्पति के सर्वथा अनुरूप गृहिणी प्रमाणित हुईं। इनसे तर्कवाचस्पति के तीन पुत्र और दो पुत्रियाँ हुईं। पुत्रों में से ज्येष्ठ और कनिष्ठ पुत्र अल्प आयु में ही कालकवलित हो गए। दूसरे पुत्र जीवानंद का जन्म 1844 ई. में हुआ। जीवानंद से तर्कवाचस्पति को बहुत आशाएँ थीं। दुर्भाग्य से 185॰ई. में अंबिकादेवी ने नश्वर शरीर त्याग दिया। उनके असमय देहावसान से तर्कवाचस्पति बहुत दुखी हुए, विशेष रूप से अपने पुत्र और पुत्रियों के लालन पालन को ले कर चिंतित भी। तीसरी बार विवाह करना नहीं चाहते थे। पर उनके पिता कालिदास सार्वभौम और तथा संस्कृत कालज में उनके सहयोगी योगध्यान मिश्र - इन दोनों ने उन पर फिर से विवाह के लिए बहुत दबाव डाला। 1851ई. में तर्कवाचस्पति ने श्योपुर गाँव के कालिदास चट्टोपाध्याय के पुत्री प्रसन्नमयी से विवाह किया। प्रसन्न मयी से उनके दो लडकियाँ हुईं।

तर्कवाचस्पति के जैसे व्ययशाली लोग कम ही मिलंगे। 1854 में बडे बेटे के उपनयन में उन्होंने खूब रुपया खर्च किया। ज्यादातर रुपया निमंत्रित अभ्यागतों को छप्पन व्यंजन की रसोई बनवाने में खर्च हुआ। दरिद्रनारायण को भरपेट भोजन कराया गया और उनमें रुपया भी बाँटा गया। इसी साल तर्कवाचस्पति के पिता स्वर्ग सिधार गए। तर्कवाचस्पति शोकविह्लल हो गए, और बहुत व्यय कर के पिता का अंतिम संस्कार किया। बंगाल के सारे पंडितों को निमंत्रण गया, सब को प्रचुर दान दक्षिणा तर्कवाचस्पति ने दी। यही नहीं, माता और पिता के श्राद्ध के निमित्त तारानाथ प्रतिवर्ष शास्त्रज्ञ पंडितों को अध्ययन अध्यापन में प्रोत्साहित करने के लिय सम्मानराशि देते। जीवन में बीस वर्षों तक महात्मा तारानाथ ने इस नियम का पालन किया। इस अवसर में केवल पंडितों को ही नहीं, निचले वर्ग के लोगों को भी आमंत्रित कर के भोजन कराया जाता। इसी तरह के अवसर अन्य भी आए। तारानाथ ने 1854 में अपने द्वितीय पुत्र का उपनयन किया। 1862 में उन्होंने अपने पुत्र जीवानंद का विवाह किया। दुर्गापूजन के अवसर पर भी तारानाथ प्रचुर दान करते।

1866 में तारानाथ के प्रथम पौत्र आशुबोध का जन्म हुआ। 1877 में द्वितीय पौत्र नित्यबोध का। 1876 में तारानाथ ने विद्यार्थियों को निःशुल्क विद्यादान के लिए एक विशाल भवन खरीदा। दूर-दूर के जनपदों से विद्यार्थी आ कर यहाँ तारानाथ से अध्ययन करने लगे। तारानाथ के द्वारा स्थापित यह विद्यामंदिर आज तक चल रहा है। 1882 में तारानाथ ने अपने पहले पोते आशुबोध का विवाह बहुत धूमधाम से किया। इस शुभ अवसर पर उन्होंने ने खुले हाथों अध्यापकों, पंडितों, ब्राह्मणों तथा दीन दुखियों को धन दिया।

कालीप्रसन्न साह जोडासांको में रहते थे। बडे सज्जन पुरुष थे। धर्म में इनकी रुचि थी। इन्होने महाभारत के अनुवाद का काम हाथ में लिया। समस्या यह थी कि अनुवादक कहाँ मिलेंगे? बहुत ऊहापोह करने के बाद कालीप्रसन्न अंततः तर्कवाचस्पति के पास ही आए। और उनसे महाभारत का अनुवाद करवाया। तर्कवाचस्पति के इतने बडे श्रमसाध्य कार्य से कालीप्रसन्न बहुत प्रसन्न हुए और पारितोषिक के रूप में प्रचुर धनराशि उन्हें देने लगे। पर तर्कवाचस्पति को धन का लालच नहीं था, उन्होंने कालीप्रसन्न से कहा - मैंने जनता के कल्याण के लिए अनुवाद कर दिया, इसका मानदेय लेना तो अनुचित होगा। कालीप्रसन्न ने अठारहवें पर्व के उपसंहार में तारानाथ का ऋणस्वीकार करते हुए लिखा है - इस कार्य में कलकत्ता संस्कृत महाविद्यालय के सुविख्यात प्राध्यापक, दुरूह शास्त्रतत्त्ववेत्ता श्रीतारानाथतर्कवाचस्पति ने मेरी बहुत सहायता की है। उनकी सहायता के बिना महाभारत के कूट श्लोकों का अनुवाद किसी भी तरह संभव न था।

यूरोप के संस्कृतभाषाविशारदों ने स्वीकार किया कि तर्कवाचस्पति और उनके पुत्र जीवानंद के द्वारा विरचित संस्कृतभाषाविषयक साहित्य बहुमूल्य है। कोशों में तो तर्कवाचस्पति का वाचस्पत्यम् नामक कोश सबसे विश्वसनीय है।

इस बीच तर्कवाचस्पति 1874 में जनवरी के महीने में सेवानिवृत्त हो चुके थे। पेंशन उन्हें प्राप्त हो रही थी।

वार्धक्यचरित

सेवानिवृत्ति के बाद तर्कवाचस्पति निरंतर वैसे ही सक्रिय बने रहे। कलकत्ता में उन्होंने अपना संस्कृत विद्यालय स्थापित कर ही दिया था। वे इसमें निरंतर अवैतनिक अध्यापन करते रहते। इस विद्यालय की दूर दूर तक प्रतिष्ठा थी। केवल बंगाल से ही नहीं, लंका, काश्मीर और दक्षिण के प्रदेशों से भी अध्ययन के लिए छात्र यहाँ आते।

1875 में बंबई से संस्कृताभाषाविशारद विविधशास्त्रवेत्ता डा. ब्यूलर कलकत्ता आए। तर्कवाचस्पति के द्वारा स्थापित विद्यालय में भी उनका आना हुआ। वहाँ अध्ययन अध्यापन की व्यवस्था देख कर उन्होंने यह अभिमत दिया कि मैंने अब तक भारत देश में जितने संस्कृत विद्यालय देखे, उनमें तर्कवाचस्पति का यह विद्यालय सबसे उत्तम है।

1862ई. में तर्कवाचस्पति को व्यवसाय में करीब एक लाख रुपये का नुकसान हुआ। वे कर्ज चुका नहीं पा रहे थे। समय बीतता गया। कर्ज चुकाने के लिए उन्होंने अपने ऋणदाताओं के उत्तराधिकारियों को कलकत्ता बुलवाया। अधिकांश लोगों को पता तक न था कि उनका कब का कौन-सा कर्ज तर्कवाचस्पति को अदा करना है। असल में उस समय अंग्रेजों का जो कानून लागू था, उसके मुताबिक तर्कवाचस्पति के द्वारा उनके पुरखों से लिया गया रुपया कर्ज की श्रेणी में आता ही न था। पर तर्कवाचस्पति धर्मभीरु थे, वे चाहते थे कि कर्जदारों के वारिसों को ऋण चुका ही दें। इसी बीच बडे बेटे केउपनयन के लिए तर्कवाचस्पति कालना नगर आए। बीस वर्ष पहले इसी नगर में व्यवसाय करते समय उनके कर्मचारियों ने उधार रुपया उठाया था, तर्कवास्पति ने उनके सारे दस्तावेज मँगवा कर कर्जदाताओं का पता कर के वह सारा कर्ज अदा किया।

एक बार कलकत्ता संस्कृत कालेज के ज्योतिष शास्त्र के अध्यापक योगध्यान मिश्र ने उनके पास अपने दो हजार रुपये धरोहर के रूप में रखे थे। तर्कवाचस्पति ने उनको पाँच हजार रुपया ब्याज चुकाया। फिर पंडित योगध्यान मिश्र का निधन हो गया। उनकी पत्नी भी चल बसी। उस समय उनका पुत्र सदानंद बच्चा ही था। उसे तो अपने पिता के गिरवी रखे धन की कोई बात की विदित न थी। सदानंद जब वयस्क हुआ, तो तर्कवाचस्पति ने उसके पिता का सारा धन उसे दे दिया।

वाचस्पत्यम् पूरा करने के बाद तर्कवाचस्पति एक साल तक देशाटन में भ्रमण करते रहे। जहाँ जहाँ वे जाते, उनके धर्म के विषय में व्याख्यान आयोजित किए जाते। एक बार वे राजस्थान पहुँचे। प्रचंड ग्रीष्म का समय था। दोपहर में तर्कवाचस्पति को कहीं जाना था। उन्होंने नियम बना रखा था कि गोवंश जिसमें जुते हैं, ऐसे वाहनपर सवारी न करेंगे। और कोई सवारी उपलब्ध नहीं थी। तर्कवाचस्पति उस प्रचंड गर्मी में दोपहर में कईं कोस पैदल चलते रहे। उनके साथ वाले लोगों में इतनी सहनशक्ति नहीं थी। वे बैलगाडी पर सवार हो गए। तर्कवाचस्पति सहजता के साथ ऐसे चलते रहे, जैसे शीतल जल से भरी नदी में तैर रहे हों।

उस समय विदेश जाने के लिए समुद्रयात्रा करनी चाहिये या नहीं - यह बहस बंगाल में चल रही थी। 187॰ में तर्कवाचस्पति ने धर्मशास्त्रों का अध्ययन कर के इस संबंध अपना अभिमत पुस्तकाकार प्रकाशित कराया। इस पुस्तक में उन्होंने स्थापना दी कि विद्या के अर्जन के लिय कोई छात्र विदेश जाता है, वह अपने वर्णधर्म का त्याग यदि नहीं करता, नित्यनैमित्तिक कर्म करता रहता है, सन्ध्यावन्दन आदि का अच्छी तरह अनुष्ठान भी करता रहता है, तो वह शास्त्र के अनुसार किसी भी पाप का भागी नहीं हो सकता।

तर्कवाचस्पति की यह पुस्तक उस समय इंग्लैंड जा कर भारत लौटने वाले कई व्यक्तियों के लिए बडा सहारा बन गई। इन्ही में से एक थे नेपाल देश के महाराजा जंगबहादुरसिंह। इसी पुस्तक में दी गई व्यवस्था का सहारा ले कर होल्कार राज्य की आवश्यक काम निपटाने के लिए राजा होल्कार बहादुर के द्वारा भेजे गए गणेश के समान बुद्धिमान् गणेशशास्त्री जो बहुत कीर्तिशाली, सदाचारसंपन्न और आस्तिक थे, म्लेच्छदेश गए और वे पंक्तिपावन ब्राह्मण बने रहे।

(इसके आगे तर्कवाचस्पति की पुस्तिका समुद्रयात्रा यहाँ लेखक ने पूरी उद्धृत की है जिसका सारांश यह है) - अब जहाज में बैठ कर समुद्रयात्रा के दोष की मीमांसा करते हैं। ओम् तत् सत्। यदि व्यापार के काम से, राजा की आज्ञा से कोई व्यक्ति अपने धर्म का अनुष्ठान करता हुआ और म्लेच्छ लोगों से संसर्ग न रखता हुआ वहाँ रहे, और यदि वह ब्राह्मण है तो उसे प्रायश्चित्त करने की आवश्यकता नहीं है। यदि शूद्र है, तो वह प्रायश्चित्त कर के शुद्ध हो सकता है। यदि कोई धर्म के लिए समुद्रयात्रा करता है, या अपना धर्म छोड देता है, म्लेच्छों से बहुत संसर्ग करता है, तो प्रायश्चित्त करने पर भी वह पवित्र नहीं हो सकता, भले ही वह ब्राह्मण हो। (इसके आगे धर्मशास्त्र के ग्रंथों तथा पुराणों से से इसके लिए प्रमाणस्वरूप उद्धरण दिए गए हैं।) समुद्र में जहाज से यात्रा करने पर प्रायश्चित्त का विधान किसी शास्त्र में नहीं किया गया, इससे यह नहीं समझना चाहिये कि शास्त्र समुद्रयात्रा का निषेध कर रहे हैं। क्योंकि म्लेच्छ के संसर्ग में उनके साथ अन्न-जल ग्रहण करने पर प्रायश्चित्त का विधान शास्त्र करते हैं, इससे स्पष्ट है कि समुद्रयात्रा तो की जा सकती है, पर म्लेच्छों के देश में म्लेच्छसंसर्ग वर्जित है। किसी कार्य का जब तक निषेध न किया जाए, तब तक वह वर्जनीय है, यह नहीं मान लेना चाहिये। समुद्र में नौका से यात्रा करने से पाप होता है - यह भी किसी शास्त्र नहीं कहा गया। (इसेक आगे कलियुग में वर्जनीय बातों के विषय में बृहन्नारदीयराण का लंबा उद्धरण दे कर उस पर टीका की गई है) तथा निष्कर्ष दिया गया है इस पुराण में समुद्रयात्रा को जो वर्जनीय कहा गया है, उससे आशय दूसरे के धर्म को स्वीकार करने के लिए की गई यात्रा से है, वाणिज्य विद्याध्ययन के लिए की गई यात्रा से नहीं। पराशर आदि प्राचीन ऋषियों के उदाहरण भी दिए गए हैं, जिन्होंने समुद्रयात्रा की। पराशरस्मृति में शतयोजन विस्तीर्ण रामसेतु का दर्शन ब्रह्महत्या के पाप को भी दूर करने वाला कहा गया है। समुद्र के किनारे से दूर से सेतु की झलक तो पाई जा सकती है, पर शतयोजन विस्तीर्ण सेतु का दर्शन बिना जहाज में बैठे उस तक पहुँचे बिना कैसे किया जा सकता है? यदि कहा जाय, कि दूर से थोडा सा दर्शन कर लेने पर ही पाप दूर हो ही जाएगा, तो यह कहना ठीक नहीं, क्यों कि ब्रह्महत्या का महापाप संपूर्ण सेतु के दर्शन से ही दूर हो सकता है, दूर से यत्किंचित देख लेने से नहीं। मीमांसा दर्शन में जैमिनी ने कहा ही है कि संपूर्ण प्रयास करने ही संपूर्ण फल मिलता है। (इसके आगे याज्ञवल्क्यस्मृति, वेद के भाष्यकारों सायण, माधवाचार्य तथा वेदांत के ग्रंथ वेदांतपरिभाषा से संदर्भ दिए गए हैं तथा बताया गया है कि संस्कृत नाटकों से नायकों के द्वारा समुद्रयात्रा के भी उल्लेख मिलते हैं, भाषाचंडी नामक पुस्तक में श्रीमंत नामक व्यापारी के समुद्रयात्रा का वर्णन है। तर्कवाचस्पति का कहना है कि इसी परंपरा में आज भी वाणिज्य के लिए व्यापारी समुद्रयात्रा करते हैं। निष्कर्ष यह है कि धर्मप्रचार या दूसरे के धर्म के स्वीकार के लये समुद्रयात्रा करना तो निषिद्ध है, अन्य कार्यों से समुद्रयात्रा करना निषिद्ध नहीं है।

1883 में थियोसोफिकल सोसायटी के संस्थापक कर्नल अल्काट तर्कवाचस्पति से मिलने उनके घर आए। तर्कवाचस्पति तथा उनके बेटे जीवानंद विद्यासागर के साथ उनकी योगदर्शन पर बातचीत हुई, साथ में भोजन किया। वे जीवानन्द विद्यासागर से इतने प्रभावित हुए कि इनको उन्होंने अपना गुरु मान लिया। एक बार विजयगच्छ जैन सम्प्रदाय के प्रधान गुरु कलकत्ता आए। वे चाहते थे कि उनका एक प्रधान शिष्य तर्कवाचस्पति से संस्कृत का अध्ययन कर ले। काशीवासी पंडित जैनियों को पढाते नहीं हैं। वहाँ के कोई छोटे मोटे पंडित कभी कभी धन के लोभ में अवश्य जैन मुनि को संस्कृत पढाने के लिए किसी तरह तैयार हो जाते हैं। जैन धर्म गुरु यह सब जानते थे, इसलिए उन्होंने प्रस्ताव किया कि आप यदि मेरे शिष्य को पढा देंगे, तो मैं तीन सौ रुपया महीना वृत्ति आपको दूँगा। तर्कवाचस्पति ने कहा मैं विद्या का विक्रय नहीं करता, निःशुल्क विद्यादान मेरे जीवन का संकल्प है। आपका प्रधान शिष्य या जो भी दूसरे शिष्य मुझ से अध्ययन के लिए आएँगें, उन्हें पढाने में मुझे प्रसन्नता होगी।

एक बार रसिकानन्द गोस्वामी कर्ज में डूब गए। उनका बनिया उनका भवन एक हजार रुपये में बिकवा कर अपना कर्ज वसूलने की तैयारी कर रहा था। गोस्वामी बहुत परेशान हो कर तर्कवाचस्पति के पास आए, उनके सामने रोने गिडगिडाने लगे। तर्कवाचस्पति ने तो व्यापार का काम ही इसलिए किया था कि विपन्न जनों की सहायता कर सकें। वाणिज्य से बहुत वैभव पा कर मैं परम सुख भोगूँगा- ऐसी आशा उन्होंने कभी नहीं पाली। उल्टे वे सदा विपदा में पडे लोगों के लिए प्रचुर धन अपने पास से देते रहते थे। उन्होंने गोस्वामी की सहायता की।

तर्कवाचस्पति को सबसे बडा धन जो मिला वह था पुत्रधन। प्रायः देखा जाता है कि बडे पंडितों के पुत्र मूर्ख निकल जाते हैं। हमारे दार्शनिक कहते हैं कि कारण के गुण कार्य में आते हैं। कारण थे तर्कवाचस्पति, कार्य थे उनके पुत्र जीवानंद। जीवानंद का वैदुष्य अप्रतिम था। वेदांत में कहा है कि व्यवहार दशा में प्राणी आत्मा को अपने से अलग देखता है। परमार्थ दशा में वही आत्मा से अपने को अभिन्न देखता है। पुत्र को पिता का आत्मा कहा गया है। इस दृष्टि से तारानाथ तर्कवाचस्पति और उनके पुत्र जीवानंद विद्यासागर में कोई भेद नहीं था।

जीवानंद को कलकत्ता के सरकारी संस्कृत कालेज में बाल्यकाल में ही प्रवेश मिल गया था। उन्होंने पाठ्यपुस्तकों का अध्ययन वहाँ किया, पिता से व्याकरण, काव्य, अलंकार, न्याय, सांख्य, योग, वेदांत, मीमांसा, ज्योतिष, स्मृति आदि अनेक शास्त्रों का अध्ययन कर के संस्कृत कालेज से 187॰ई. में विद्यासागर की उपाधि प्राप्त की और कलकत्ता विश्वविद्यालय से बी.ए. किया।

जीवानंद जब छात्र थे, तभी पिता के बताये रास्ते पर चलते हुए उन्होंने संस्कृत के शास्त्रों के प्रामाणिक संस्करण तैयार करने और उन पर टीका लिखने का काम आरंभ कर दिया था। जब उनका अध्ययन समाप्त हो गया, तो उनके पास लाहौर के ओरिएंटल कालेज की अध्यक्षता के लिए नियुक्तिपत्र आ गया। इसके साथ ही जादवपुर के विद्यालय की अध्यक्षता के लिए भी उन्हें निमंत्रित किया गया, जिसमें तीन सौ रुपया महीना वेतन देने का प्रस्ताव था। पर जीवानंद तेजस्वी थे, उन्होंने दोनों ही प्रस्ताव स्वीकार नहीं किए । इस बीच संस्कृत शास्त्रों के मुद्रण, प्रचारण और टीकालेखन के लिए महामति जीवानंद देश और विदेश में प्रसिद्ध हो गए थे, जयपुर के महाराजा ने उन्हें पाँच सौ रुपया महीना वेतन पर जयपुर आ कर काम करने का अनुरोध किया। काश्मीर के महाराजा ने एक हजार रुपया महीना वेतन पर अपने राज्य में प्राचीन पोथियों के संशोधन और प्रकाशन का काम स्वीकार करने का उनसे अनुरोध किया। नेपाल के महाराजा रणदीपसिंह एक बार कलकत्ता आए, उन्होंने जीवानंद की बुद्धिमत्ता विद्वत्ता देख कर एक हजार रुपया मासिक वेतन पर नेपाल राजसभा की सदस्यता स्वीकार करने का आग्रह किया। जीवानंद ने इनमें से कोई भी प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया।

महाविद्वान् जीवानंद विद्यासागर यदि राजकीय कर्मचारी का पद या किसी महाराजा के यहाँ राजसभा में कोई पद स्वीकार कर लेते, तो वे संस्कृत के इतने बहुमूल्य दुर्लभ ग्रंथों का संपादन और प्रकाशन न कर पाते। अब तो संस्कृत भाषा में दो चार पंक्ति लिखने में ही पंडितों को पसीना आने लगता है। जीवानंद ने संस्कृत भाषा में सरल गद्य में 14॰॰ पृष्ठों का कथासरित्सागर ग्रंथ लिख कर प्रकाशित कराया। पहले कभी सोमदेव भट्ट नाम के काश्मीरी पंडित ने पैशाची भाषा से बृहत्कथासरित्सागर नामक ग्रंथ का सारांश ले कर श्लोंकों में कथासरित्सागर नाम का ग्रंथ रचा था। पण्डितशिरोमणि जीवानन्द ने सोमदेवभट्टकृत कथासरित्सागर के आधार पर सरल संस्कृत गद्य में नया कथाग्रंथ रचा, वह 1883 में प्रकाशित कराया। आज तक संस्कृत भाषा में कथासरित्सागर के बराबर इतनी बडी पुस्तक गद्य में किसी ने नहीं लिखी है। कादम्बरी, दशकुमारचरित, हर्षचरित आदि पुस्तकें गद्य में हैं, पर दीर्घ समासों की जटिलता के कारण वे सरस नहीं रह गईं हैं, यह पुस्तक अपनी सरलता के कारण इनमें सबसे अधिक उत्कर्ष पर पहुँची। इसप्रकार पांडित्य के हिमाचल पर विराजमान जीवानंद विद्यासागर ने बाईस वर्षों में संस्कृत के 1॰7 ग्रंथों पर टीकाओं की रचना की। जीवानंद विद्यासागर के द्वारा लिखी गईं टीकाएँ, जो मूल ग्रंथों के साथ छपीं, केवल भारत में ही नहीं, यूरोप, अमेरिका, श्रीलंका, चीन, सियाम और बर्मा तक पहुँचीं। उनके अनेक पुनर्मुद्रण हुए। (इसके आगे संस्कृत के 1॰7 प्राचीन ग्रंथों की सूची है, जिन पर जीवानंद विद्यासागर ने टीकाएँ लिखीं।)

जीवानंद केवल इन 1॰7 ग्रंथों पर टीका लिख कर ही संतुष्ट नहीं हुए, उन्होंने कथासरित्सागर, वेतालपंचविंशति तथा द्वात्रिंशत्पुत्तलिका इन कथाग्रंथों के संस्कृत में संक्षिप्त गद्य रूपांतर के साथ कादम्बरीकथासार, मुद्राराक्षस नाटक की पूर्वपीठिका, संक्षिप्तहर्षश्चरित, तथा संक्षिप्तदशकुमारचरित - ये ग्रंथ सरल संस्कृत में लिखे। शब्दरूपदर्शन नाम से व्याकरण की पुस्तक लिखी, तर्कसंग्रह का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया। इसके अलावा उन्होंने संस्कृत के 1॰7 मूल ग्रंथों का प्रकाशन अलग से किया। (इसके आगे जीवानंद विद्यासागर के द्वारा प्रकाशित 1॰7 मूल संस्कृतग्रंथों की सूची है।)

इन दुर्लभ ग्रंथों के प्रकाशन पर जीवानंद विद्यासागर ने लगभग छह लाख रुपये खर्च किए , तथा लागत मूल्य पर पुस्तकें उन्होंने उपलब्ध करवाईं।

इधर तर्कवाचस्पति ने देश के लिए जितना हो सकता था, कर चुके थे। अब आर्यधर्म के द्वारा अनुमोदित पद्धति का अवलंबन कर के संसार से विदा लेने का उन्होंने मन बना लिया। वे जान गए थे कि उनका पुत्र उनके जीवन का आनंद जीवानंद अपनी कर्मठता से सारे शास्त्रों में पारंगत हो चुका है। मेरा वंशधर दूर-दूर से आए छात्रों को पढा रहा है, अनेक ग्रंथों पर टीकाएँ लिख रहा है। इससे बढ कर संतोष की बात और क्या हो सकती है? तो इस दुःख के सागर संसारसागर को छोड कर धर्मोपार्जन के लिए अब मुझे किसी ऐसे पावन तीर्थ में जा कर रहना चाहिये, जहाँ परमात्मा का निवास हो - यह सोच कर 1885 में तर्कवाचस्पति ने कलकत्ता छोड दिया और ज्ञान की गहरी वाराणसी जा पहुँचे। वहाँ रहते हुए वे छात्रों को वेद, वेदांत, सांख्य, पातंजल योगसूत्र आदि शास्त्र पढाते रहे। काशी में महाराष्ट्र, गुजरात, मिथिला, नेपाल, बंगाल तथा दक्षिण से आए हुए पंडितों को आमंत्रित कर के वे उन्हें प्रचुर धनराशि भी देते। वे प्रतिदिन पंचतीर्थों की प्रदक्षिणा करते। एक तो वाराणसी बहुत गर्म जगह है, दूसरे चैत के महीने की प्रचंड धूप, जिसमें प्रतिदिन बिना छाते और बिना जूते के तर्कवाचस्पति पैदल चलते हुए दोपहर होते होते बिना किसी क्लेश के पंचक्रोशी की सीमा तक पहुँचते। पर तेज धूप में इस तरह प्रतिदिन चलने से उनका शरीर क्षीण होता जा रहा था

एक बार तेज घाम में शरीर बहुत तप रहा था, तर्कवाचस्पति ने वरुणा नदी के ठंडे जल से माथा धो लिया। उसी दिन उन्हें बुखार आ गया। अगले दिन बगल में फोडा निकल आया। उसके बाद तर्कवाचस्पति कई दिन शय्याधीन रहे। ऐसी स्थिति में भी उनसे हठयोग और राजयोग की पद्धतियाँ सीखने कई दंडी साधु और परमहंस आते रहे। तर्कवाचस्पति को पीडा बहुत थी, पर वे शांत भाव से उन्हें योगतत्त्व का उपदेश देते। पर प्राणांतक फोडे से उनका शरीर जर्जर होता जा रहा था। इसी साल 1885 में अपने एकमात्र पुत्र जीवानंद के पास तर्कवाचस्पति ने क्षणभंगुर पार्थिव कलेवर को त्याग कर मोक्ष प्राप्त किया।

इसके बाद उनके पोते और भाई बंधु तथा आत्मीयजन चाँदी के सिक्के लुटाते हुए उनका शव मणिकर्णिका घाट पर ले गए। चंदन की चिता पर जल कर तर्कवाचस्पति का शरीर राख हो गया। इसी क्षण एक अपूर्व घटना वहाँ उपस्थित लगों ने प्रत्यक्ष देखी। शरीर दाह होने के तुरत बाद गंगा की लहरें ऊपर उठती हुई आईं, और उन्होंने तर्कवाचस्पति के भस्मावशेष को आप्लावित कर दिया। आसपास जा रहे शवों को गंगा के पानी के नहीं छुआ। यह घटना उस दिन अंग्रेजी पढे धनी मानी लोगों ने भी अपनी आँखों से देखी।

तर्कवाचस्पति के इस निधन से दुखी देश के अनेक महाराजाओं, गुणी ज्ञानी जनों ने जीवानंद के पास शोकसंवेदना के तार भेजे। उनमें से कुछ का सारांश यहाँ दिया जा रहा है।

काश्मीरनरेश महाराज रणवीरसिंह ने तार मे लिखवाया था कि अफ पिता के निधन से मैं बहुत शोकाकुल हूँ। वे केवल आफ ही पिता नहीं थे, मेरे भी पितृतुल्य थे। उनके निधन से केवल आप ही नहीं, मेरे राज्य की सारी प्रजा शोकाकुल है।

त्रावणकोर के महाराजा रामवर्मा ने तार में लिखा था कि आप के पिता के निधन से आज भारतवर्ष के सारे लोग संस्कृतशास्त्रों के सूर्य्यालोक के दर्शन से वंचित हो गए हैं। आफ दुःख में सहभागी हूँ। बडोदरा के महाराजा ने तार में लिखा था कि आफ पिता के निधन से हम लोग अत्यंत शोकाकुल हैं। उनकी मृत्यु से भारतवर्ष की संस्कृतशास्त्र परंपरा का एक समुज्ज्वल मणि हमने खो दिया। मैसूर राज्य के प्रधान सचिव रंगाचारलु ने तार में लिखा कि आफ पिता के निधन से मैसूर राज्य की प्रजा उतनी ही शोकाकुल है, जितने आप। हम मानते हैं कि उनकी मृत्यु नहीं हुई, उनकी कीर्ति जीवित है। जब तक उनका वाचस्पत्यम् कोश तथा दूसरे ग्रंथ भारतवर्ष में हैं, तब तक उन महात्मा की अक्षय कीर्ति बनी रहेगी। इसी तरह के तार नेपाल, विजयनगर, कपूरथला, जयपुर, बूँदी, अलवर आदि राज्यों के राजाओं की ओर से भी प्राप्त हुए। ईश्वरचंद्र विद्यासागर को जब यह समाचार मिला, तो उनकी आँखों में आँसू आ गए, और उनके मुख से यह वाक्य निकला - ओह, आज भारतवर्ष पण्डितशून्य हो गया!

इसके बाद महात्मा तर्कवाचस्पति के अंतिम कृत्य उनके पुत्र विद्वान् जीवानंद विद्यासागर ने पूरे किए।





सम्पर्क : कर्नाटक प्राच्य विद्यापीठ भंडारकर,

ओरियंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट,

812, शिवाजी नगर, चिपलूणकर मार्ग,

आई.एल.एस. लॉ कॉलेज के पास,

पुणे- ४११००४