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इस तहरीर का भेद अभी अंधकार में है

लीलाधर मंडलोई
1
मेरे मकान के मुख्य द्वार पर गुलमोहर का विशालकाय पेड है। सीधा और इतना लंबा कि दो मालों को पार करता आकाश को चूमने को आतुर। हमने इस मकान में उससे झरते फूलों के बीच प्रवेश किया। आयुदार गुलमोहर सूख रहा है। दीमक और दूसरे जीव-जंतुओं ने उसे घेर लिया है।
शाखाएँ सूख गयीं हैं। हवा के आघातों से टूटकर बिखर रही हैं। मैं फूलों की जगह उन्हें बीनता हूँ और भीतर से सूखता जाता हूँ। उसकी देह से क्रमशः उतरती छाल मेरी त्वचा से उतरती खाल सरीखी अनुभव होती है।
मैं गुलमोहर में पूरे जंगल के बीच अपने होने की अनुभूति को सूखता अनुभव करता हूँ। एक पेड मात्र के सूखने में एक ऐसी मृत्यु का मुल्जम हूँ कि चश्मदीद गवाह, कह नहीं सकता। गुनहगार होने के खयाल में पेड के मरने में अपनी आखिरी साँसों को सुनता हूँ और रोज थोडा मर जाता हूँ।
2
आजकल नेकियों की खबर खोज कर पढता हूँ। एक चित्र देखा। चित्रों पर भरोसा होता है। चित्र में सुखेद टोपियाँ पहने चार इंसान हैं। वे अपने कांधों पर एक अर्थी उठाये पूरब की ओर चल रहे हैं।
3
हर चित्र में लोग सिर्फ जाते हुओं की भीड है। आता हुआ एक भी नहीं।
4
स्त्री ,पुरुष,बच्चे, बुजुर्ग हैं। हाथों में प्लास्टिक के डिब्बे, लोटे, थाली, गिलास और गमछा फैलाये... प्रतीक्षारत।
भीड है,भूख है,प्रार्थनाएँ हैं,आँसू हैं ,मास्क और कपडों से बँधे से मुँह-नाक। पुरुषोत्तम दूर-दूर तक दिखाई से बाहर ....।
5
दृश्य ...नामुराद। एक औरत। गोद में रोता हुआ शिशु। औरत के पोलके से झाँकता निचुडा एक स्तन। जो होना चाहिए था वहाँ, वह आँखों से टपक रहा है...बेतरह।
6
इस गली में दिन-भर भूंकते रहते हैं कुत्ते। कुछ परिंदों के स्वर हैं भीगे-भीगे से। उनमें कौव्वों के कटु स्वर हैं फैलते ओर-छोर। पास-पडोस में इंसानी स्वरों की जगह तत्सम में जयघोषों की चीख-पुकार है...।

7
कोई और रास्ता नहीं। पहाड कब रास्ता देते हैं? वे रास्ता मांग नहीं रहे। वे लाँघ रहे हैं।
8
लहू जलाने वाले उन्हें एक पल को याद न आये। दिए जलाने वालों से भर गया मीडिया।
9
बैठा मिल जाता है दूरियों के नजीक, कोई न कोई हतभागी..। चंद बचे रुपल्ली, चंद सिक्के दूर से उछालते हुए, आगे निकलने के पहले ठिठकते हैं। भयवश मन में दूरियों को चुफ से नापते हैं। फिर इत्मीनान से अज्ञात पाँव -सुख में बढ जाते हैं ..।
10
देख लिया। सुन भी लिया। बताई हुई जगहों पर पहुँचे भी। बोलते-बोलते आवाजों भर्रा उठीं। गले रुँध गये। उनकी आवाजें अब सूखी आंखों में हैं।
11
करुणा के इस समय में करुणा नहीं। दूकानदार की निष्ठुरता चार-सू है। यहाँ लहू के भाव में सामान बिक रहा है।
12
ये जो रोज नये बने-बनाये आँकडे हैं। इनके बीच सच को ढूंढकर पढता बैचेन होता हूँ। कल के आँकडों में मौत की संख्या के इजाफों से एक बार फिर सिहर जाऊँगा।
13
डर से काँपते लोग घरों में बंद हैं। बस कुछ परिंदे हैं, इधर से उधर तक फडफडाते..उडते ...
14
ये खामोशी है डरावनी कि मौत का ऐलान है???
15
पिछले पाँव में जख्म है गहरा। कुछ दिनों से वह नहीं आ रहा। वह करुण रिरियाहट में बमुश्किल जोर से भौंकने का यत्न करता है। गली सुनसान है। झाँकता हूँ। और ओसारे में भर रखे दो कटोरे उठाएँ, उसकी गुहार के सम्त निकल जाता हूँ....
16
मैं गली का फिर एक चक्कर लगाता हूँ। पडोसी जो कल तक मेरे साथ पार्क में बतियाते हुए चलते थे। अपनी-अपनी छतों पर मरे-मरे से टहल रहे हैं।
17
लोग हैं। लोगबाग हैं। बाहर कुछ-कुछ दीखते से। फरिश्ता सा कोई नजर में एक नहीं...
18
मैं अकेला हूँ। उदास और तन्हा। ये सदा किसकी है। अपना-सा यहाँ कोई तो है..
19
उनके होने से कितना आसान था सबकी साँसों का जहाँ। वे छोड गये। और शहर में कोई खलबली तक नहीं....

20
सैकडों काम थे। सैकडों राहें। न सही यहाँ दो-जून की रोटी का एक अदद रास्ता तो था। कल जब आँख खुलेगी, तो क्या बची होगी, लौटने की कोई एक झीनी-सी भरोसेदार राह ....
21
न घर है कोई अपना। न परायी छत ही बची। पाँवों में लेकर गिरस्ती खानाबदोश हैं अब...
22
अजब तमाशा है सूनी-सूनी सडकों पर। लोग इक्का-दुक्का ही हैं। तिस पर दूर....दूर......चलते हुए
24
बीच राह से घाटी की तरफ भाग रहे हैं लोग। लगता है, आज फिर कुछ हुआ है यारों...
25
आखीर में एक अदद ब्रेड बची और चार ग्राहक हैं। तीन ने देखा जो पीछे के चौथे को, हट गये एकाएक। अब वो एक ब्रेड थी और बच्चे की मुसकान।
26
दो नये और मकतल भी कम पड गये। कितने और कोविड 19 अभी रास्ते में हैं..
27
कोई-कोई ऐसा भी है,जो निपट अकेला नंगे पाँवों सफर पर निकला है। पार करने को हैं पूरे 2400 मील। न जाने कैसे अकेले में जिंदगी सफर होगी...

28
है नहीं पेट में जरा सा कुछ भी बचा। जो है, वो पानी भी है जरा-जरा...सा..
29
चार कदम दूर और आगे कहीं बस्ती होगी। कहीं- वहीं पर शायद बच्चों का आबो-दाना हो...
30
और कितने अमंगल चित्रों को देखना अभी बाकी हैं। अब इन आँखों को हटाकर कहाँ पर रख दूँ ?
31
कई दिनों बाद आई है उसकी आवाज आज। गली में आज फिर गूँजे हैं पडोसियों के स्वर -चलो-चलो सब्जियाँ ले लें....
32
आज आस-पास बचे कूडों के ढेर हैं यारों कल यह मलबा हटाना कितना मुश्किल होगा...?
33
हरेक विशेषज्ञ पढकर हैरान -हलकान-सा है। इस तहरीर का भेद अभी अँधकार में है।
34
एक, दो, तीन नहीं, कई गलियों में घूम आया हूँ। हरेक में खिडकियाँ खामोश हैं.... कोई मानुष स्वर नहीं..
35
म इतना बेबस हूँ कि जरूरी धूप लेने, अब पडोस के अहाते तक भी जा नहीं सकता .....।
36
निकलने की जद लिये किलसता -बिसूरता एक बच्चा पकड से छूटता बाहर को भाग रहा है। भूतों-चुडैलों का डर बताकर उसे डराया गया। कई धमकियाँ दीं। वह न माना किसी हिकमत-जुगत से। वो अब भी बाहर आने के मन से हारा नहीं। वह अपने को छुडाने की कोशिश में अभी छटपटाहट से भरा है।
38
हाँ! ये सच है कि यह दिल भी अब टूट गया। एक ही सहारा कम न था। जिसके तरफ रुख करूं, वही दूर भागे हैं। टूटा-फूटा है कोई बात नहीं। कम से कम अपना है। धडकता। मेरे साथ तो है।
39
अब चिट्ठियाँ नहीं आतीं। लोग तो आने से रहे। बचा है तो उस अकेले का फोन। और वह भी गहरे द्वंद, अयाचित आत्म -संघर्ष में अक्सर हाँ रूठ जाए है।
40
हम दिन में लंबे समय तक फोन की शरण में हैं। इसे खोलते हैं खैरियत जानने के वास्ते। खोलते ही जीवन से खैरियत गुम हो जाने की आशंकाएँ बढ-बढ जाती हैं।
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जो था वजूद हम सबका । कुछ समय पहले तक। एक महीना हुआ है शायद। मुमकिन है दो-चार दिन ऊपर।
जो हम थे कल आज हैं? न-न ऐसा तो मन नहीं कह रहा..,न -न कोई न मानेगा। मैं तब भी कह रहा हूँ। मैं किनसे कह रहा हूँ?
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कितनी तंगहाली है। किस कदर तंग हैं दिल। इसी गली से गुजर रहा है वह आखिरी सफर को..। तंग गली से निकले तो निकले दो...रिटायर्ड जईफ..।
43
मेज पर फैली हैं इस दौर की कई तस्वीरें। जो थे वहाँ उनका दूर-दूर का नामो-निशां नहीं। इतिहास लेखक उन्हीं को मसीहा कहेंगे, जिनके नाम अनुबंध में आने के लिए चंद शर्तों पर बातचीत करने के आखिरी दौर में हैं।
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इन दीवारों पर लिखी हैं धुँधली सी कई इबारतें, कई तस्वीरें .....। जो अलिखा है, वह उसने लिखा ही नहीं ..
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एक माह होने को हैं....तकता रहता हूँ सूनी गलियों को। इन गलियों में मेरे घर की दीवारों रो रही हैं...मेरे लिखे हर्फ उनसे जुदा होकर जमीन पर बिखरे पडे हैं.....
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आईना टूट गया। और मैं दुखी नहीं। इसमें मैं था। मेरे होने में उसका भरोसा न था। आईना तोडा कि अब मैं खुद को न कभी देख सकूँ....
47
वह बे-आवाज खडा रहा दर पर..। जब तक आवाज देता .....। उसकी आवाज छीन ली उनके लोगों ने।
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अद्भुत था दृश्य, बारिश के बाद मौसम का। इक जईफ महिला ने कहा- निकलो चार बूँद अबेर लो। दो बात कर लो ....दो मिनट तो रुक जाओ...आज साथ मेरे।
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एक ही लम्हा मिला और साँस का बुझता चराग।
मैं समय पर पहुँचा तब भी बहुत देर हुई ..।
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अजीब मंजर है इस देश में यारो,जमाने भर का दुख था जिसे । जमाने भर में उसके साथ कोई न था....

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