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पाँच कविताएँ

राहुल बोयल
1. रिक्तता

मैं जितने भी व्यक्तियों से मिला

उनसे खाली नहीं लौटा

स्त्री हो या पुरुष

जो भी मिला

वह प्रयासरत रहा कि रिक्त न लौट जाऊँ मैं

कुछ स्त्रियों ने मुझे

स्नेह और घर लौटने के कई अवसर दिए

कुछ स्त्रियों ने दिये आशिष

और कुछ ने तो अपने पल्लू से

बाँधे रखने का हुनर भी दिया मुझको

कुछ ने मुझसे रिक्तता उधार ली

और मुझे ही ऋणी करके चलीं गयीं

कुछ पुरुषों ने मुझे

सहयोग दिया और कुछ तो

जिन्दगी भर मेरी जिन्दगी के सहकर्मी बने रहे

कुछ ने मेरे बोझे को कम करने में हाथ बँटाया

कुछ ने मन के निर्वात में

चंचल हवा की तरह प्रविष्टि की

और एक अविश्वसनीय धोखे के साथ

कहीं अनन्त में लौट गये

मैं जब भी रिक्त होता हूँ

उन सबको याद करता हूँ

कितनी अजीब बात है

कि मैं कभी रिक्त नहीं होता

कहीं भीतर उनकी याद हमेशा रहती है।

2. कवि नहीं थे



कवि नहीं थे

वो खाये- पीये - अघाये लोग थे

वो अपने एकान्त में

चीजों की बहुलता से तंग आये लोग थे

उनकी करुणा उधार की थी

उनके रिश्ते खरीदे हुए थे

वो शालीनता का दिखावा थे

वो संवेदनाओं से अलगाये लोग थे

वो गधों की तरह खपे नहीं थे

वो मानवता- स्केल से नपे नहीं थे

उनके हँसने-रोने में भी अनुशासन था

वो परोपकार की छवि नहीं थे

कवि नहीं थे

वो नशे मे धुत मुस्काये लोग थे

वो मिट्टी से थोडे ऊपर के थे

दिन में दस बार नहाये लोग थे।

उन्होने हरियाली की बातें की

वो फूलों को चूमा करते थे

वो जडों से जुडे रहने के हिमायती थे

पर कभी उन्होने पौधे लगाये नहीं थे

वो पसीने की करते थे पैरोकारी

अमन और क्रान्ति के लबादे ढोते थे

पर बरक्स खुद के भी कभी

कांधे तक उचकाये नहीं थे

उन्होंने स्त्रियों पर विमर्श लिखा

पितृसत्ता के खिलाफ कई शब्द उछाले

उन्होंने शान्ति का उत्कर्ष लिखा

वो भाग्य के सताये नहीं थे

वो यजमान थे, हवि नहीं थे

कवि नहीं थे

वो भरे पेट के चुगली खाये लोग थे

वो अतिरेक से उबकाये लोग थे

कवि नहीं थे

वो सबकुछ थे, बस कवि नहीं थे

वो खाये- पीये - अघाये लोग थे।





धिक्कार



हमने लडने के लिए

अपने - अपने पक्ष चुने

हमने अपने- अपने विचार गढे

एक दूजे के तर्क सुने

मतभेदों को स्वीकारा

विविधताओं का स्वागत किया

हमने पृथक - पृथक संस्कार धरे

हमने सैंकडों त्रासदियाँ भोगी

पर हम अर्हताओं के कथानक रहे

हमारे भीतर युगों के दुर्खह थे

पर हम सुन्दरताओं के मानक रहे।



हमने दुनिया के भूगोल को ललकारा

हमने प्रेम में प्रतिष्ठा पायी

हमने वैश्विक जिम्मेदारियाँ उठायीं

किन्तु अपनी मिट्टी से प्यार करना नहीं छोडा

हमने नदियों का वरण किया

जीवन-कला में वैचिर्त्य पाया

हम घावों को पढकर बडे हुए,

हमने चोटों से प्रतिवाद किया

हमने हर कालखण्ड को चुनौती दी

हमने तमाम घृणाओं को धूल चटायी।

फिर समय के एक टुकडे ने स्वाँग किया

हमें श्रेष्ठ - हीन के बीच में टाँग दिया

हम बेसिर-पैर की लडाइयों के पुरोधा हुए

हजारों अवांछित युद्धों में सम्मिलित हुए

हम गर्व से फूलकर कुप्पा हुए

अपनी ही दृष्टि में योद्धा हुए

हमने धीरे- धीरे धैर्य खोया

हम विपाक भूले, वीर्य खोया

हमने वैकुण्ठ और स्वर्ग के फ*ाीर् स्वप्न देखे

हमने हठधर्मिता भोगी, हमने कृतघ्न देखे।



हमने परिष्कार से मुँह मोडा

हमने चिरपरिचित मार्ग छोडा

हमने बेशर्मी की हदें लाँघी, दाँत चिराये

हमने धूमिल किया अपने को, गरियाये

धिक्कार! हम धिक्कार की ध्वनि सुनते गये

ओह! प्रतिकार में हम भी यही दोहराते गये

अपने गीत भूलते रहे, बस गालियाँ गाते गये

धिक्कार ! छिः छिः ! थू -थू ! मैं - मैं ! तू- तू!



हम बैल थे



हमने हल जोते

खेतों की सफाई में हाथ बंटाया

कुओं से पानी निकाला

हमने ऊख पेरी

घाणी से तैल निकाला

हमारी पीठ ने तुम्हारे कूल्हे ढोये

बगैर हमारे सारे चूल्हे रोये

हमारे दुःख से धरती हरी थी

हमने हस्ती गिरवी धरी थी

हम बस गोबर-मैल लगे

हाँ, हम नहीं थे पक्की छत की मानिन्द

पर हम निर्धन की खपरैल थे

हम बैल थे

केवल बैल थे।

हम भादो की काली चौदस को जन्मे

और केवल अमावस तक जीवित रहे

बस एक दिन जिये,

पोला- पिठोरा में एक दिन सजे

बस एक दिन तुम्हारी खीर खायी

बस एक दिन पूरणपोळी चखी

तुमने हमारे सींग संवारे

पर नकेल धँसा कर यूँ ही रखी

कहीं अन्नमाता ने गर्भ धारा

कहीं धान में उतरी दुग्ध की धारा

बस सधा तुम्हारा काज

बस मना तुम्हारा पर्व

हम जोडी में दौडे

दौड कर जिताया तुम्हे

मगर हम हारे

कि हम नहीं थे होरी के हीरा- मोती

हम बिगडैल थे

हम बैल थे

केवल बैल थे।



हम वृषभ थे

हम ऋषभ थे

हम बारात में तुम्हारे रथ बने

कहीं खिलौनों की तरह बिके

कभी मिट्टी के हुए

कभी पत्थर के हुए

सडक पे कट के मरे

हम आवारा कहलाये

पीछे पडे डण्डों से डरे

हमारे खेत छूटे

हमारे भाग फूटे

हम ताकतवर थे

न कि गुस्सैल थे

हम बैल थे

केवल बैल थे।



हमने साथी खोये

हम कितने तन्हा रोये

हम गाढी अंधेरी रात में

तेज धूप - बरसात में

बर्फानी शीत में तुम्हारे काम आये

हमने लकडियों के गट्ठर खींचे

हम चलते रहे आँखें मींचे

हमने छींके देखे

हमने खुराई झेली

हमने जलते जंगल देखे

हमने उगते मकतल देखे

हम भूखे रहे, खेतों को छाना

सबने हमें लावारिस माना

हम शिव के नन्दी नहीं थे

हम शैल थे

हम बैल थे

केवल बैल थे।



(पोला-पिठोरा मूलतः कृषकों से जुडा हुआ बहुत ही सुन्दर त्योहार है। भाद्रपद की अमावस्या को यह पर्व विशेषकर महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं छत्तीसगढ में मनाया जाता है। पूरणपोळी नामक विशिष्ट आहार इस दिन बनाने का रिवाज है।)







शिशुओं का रोना



मेरी दृष्टि में

सभी शिशुओं के रोने का स्वर

तकरीबन एक जैसा होता है

और हँसने की ध्वनि भी लगभग समान



किसी अंधेरी रात में

रो रहे हों यदि

तीन-चार शिशु एक साथ

तो क्या तुम पूरे विश्वास से

कह सकते हो कि

तुम्हारा बच्चा नहीं रो रहा!



सारे शिशुओं को भाती है

गोद की सघनता

और दुग्ध की तरलता

अस्वस्थ माँ में भी होती है अहर्ता

कि रोक सके वह

अपने शिशु का ऋन्दन



ओ पिताओ!

तुम भी अपनी बाँहें खोलो

घर के बाहर

अबोध शिशुओं का भयंकर क्रन्दन है

माँ तो सदियों से बेचैन है

बच्चों के लिए

क्या तुम निश्चिन्त हो कि

बाहर रोता बच्चा तुम्हारा नहीं है?

सम्फ -

द्वारा राव करण सिंह,

पोस्ट ऑफिस वाली गली, एलआईसी के सामने,

तहसील बाली, जिला- पाली- ३०६७०१

मोबाइल नम्बर- 7726॰6॰287

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