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दस कविताएँ

रुस्तम

1.
मत आना।
अब आयेगी मृत्यु।
उसके साथ मैं अकेला होना चाहता हूँ।
2.

पेड ने मुझे पास आने को कहा।
और पास आओ, और पास, वह बोला।
मैं उसके तने पर चढा, ऊपर चला गया।
फिर उसकी टहनियों से घिरा हुआ मैं बैठ गया।
गिलहरियाँ आ-जा रही थीं।
चिडियाँ फुदक रही थीं, चहचहा रही थीं।
धूप के चकत्ते लहरा रहे थे।
वहाँ कुछ चींटे भी थे। वे भी अपने काम में लगे थे।
मैंने देखा कि मैं बदल रहा था, खाली हो रहा था,
गहरा रहा था।
मेरा भय, मेरा ज़िक्र मुझे छोडकर जा रहा था।
यह एक भिन्न संसार था
और अब मैं उसका नागरिक था।

3.

एक चट्टान मेरे रास्ते में खडी थी।
भूरी, लाल, नीली और पीली,
एक चट्टान मेरे रास्ते में खडी थी।
आह मैं वहाँ रुक गया, मैं वहाँ रुका रहा
क्योंकि एक चट्टान मेरे रास्ते में खडी थी।
मैं और क्या करता? मैं उसे देखता रहा
क्योंकि एक चट्टान मेरे रास्ते में खडी थी।
वह स्थिर थी, वह हिल नहीं रही थी।
और कैसे उस धूप में वह चमक रही थी !
विभिन्न रंगों की हजारों किरणें
उससे फूट रही थीं !
क्या उसने रोक ली थी मेरी राह?
क्या उसने छीन ली थी आगे बढने की
मेरी इच्छा ? ....
भूरी, लाल, नीली और पीली
वह जो चट्टान मेरे रास्ते में खडी थी?
मुझे नहीं पता। मुझे नहीं पता।
मुझे बस इतना याद है
कि एक चट्टान मेरे रास्ते में खडी थी।

4.

पहली बार जब हम मिले,
तुमने द्वार खटखटाया,
मैंने खोला।
तुम्हारे चेहरे पर उत्कंठा, झिझक,
भय और पता नहीं क्या-क्या था।
मैंने तुम्हें भीतर बुला लिया,
कुर्सी पर बैठने को कहा,
चाय बनायी।
मुझे नहीं पता था तुम कौन थीं, क्यों आयी थीं।
एक-दूसरे के सामने हम चाय पी रहे थे,
तुम्हारे घुटने मेरे घुटनों को हल्का-सा छू रहे थे।
तुम्हारी आँखें मेरे चेहरे पर गढी थीं,
उनके भाव मैं पढ नहीं पा रहा था।
सच बताऊँ तो मैं भी कुछ डरा हुआ था,
अन्दर ही अन्दर मैं थरथरा रहा था।
इस तरह अँधेरा होने तक हम यूँ ही वहाँ बैठे रहे।


5.

हम वहीं पर आ पहुँचे हैं जहाँ से हम चले थे, हालाँकि यह जगह काफी बदल गयी है। तुम्हें लगता है कि वह हमें पहचानती है? हमारे घोडे थके हुए हैं। गालें धँसी हुई हैं। हम धूल से सने हैं। जो लोग हमें जानते थे वे कहाँ हैं? यह कैसा लौटना है? देखो कैसे हम अजनबियों की तरह खडे हैं!
लेकिन दूर
वह जो बूढा बरगद है
उसकी स्मृति में हम अब भी शायद बचे हुए हैं।
और निश्चित ही
उस सूखी नदी के
तल पर
पडे हुए पत्थर
हमें भूले नहीं होंगे।

6.
तुम्हें याद है वह दिन
जब शहर को घोडों ने घेर लिया था?
याद करो -
लोग उठ चुके थे, कामों पर जा रहे थे,
जब उन्होंने देखा कि
शहर की चौहद्दी पर घोडे खडे थे।
वे कितने थे? कहना कठिन था।
शहर के चहुँ ओर दूर-दूर तक बस घोडे ही घोडे थे।
वे धीरे-धीरे आगे बढे। सबसे पहले उन्होंने सडकों को रोक लिया।
फिर वे गलियों में घुसे, कॉलोनियों में।
घुसते ही गये।
शहर में हर स्थान को उन्होंने खुद से भर दिया।
वे आपस में यूँ सटे हुए थे और इस तरह से बढ रहे थे कि उन्हें रोकना असम्भव था।
दिन गु*ारता गया। दोपहर हुई, फिर शाम।
लोग घरों में, दुकानों में और छतों पर सिमट गये।
उस क्षण जब सूरज डूब रहा था
पूरे शहर में सिर्फ घोडे ही घोडे न*ार आ रहे थे।
वे हिनहिना रहे थे, नथुने फडफडा रहे थे, सिर हिला रहे थे
और
अँधेरा होने तक
इसी तरह एक-दूसरे से सटे हुए
खडे थे।

7.

इक्कीसवीं मंजिल पर एक घर है।
बूढा होता मैं हूँ।
तुम हो।
वस्तुएँ हैं।
मैं कुर्सी पर बैठा कुछ पढ रहा हूँ।
तुम खडी हो,
खिडकी से बाहर देख रही हो,
तुम्हारी पीठ मेरी ओर है,
तुम्हारे काले बाल खुले हुए हैं।
सब कुछ श्वेत और श्याम है।
सब कुछ स्थिर है।
कुछ भी हिल नहीं रहा ...
न मैं, न तुम, न वस्तुएँ।

8.
एक और दिन सब कुछ चल रहा था -
गाडियाँ, बसें,
लोग, सब वस्तुएँ,
गलियाँ और सडकें।
इमारतें तक स्थिर नहीं थीं।
कुछ धीरे-धीरे आगे बढ रहा था,
कुछ सरक रहा था,
कुछ दौड रहा था।
कुछ नीचे उतर रहा था,
कुछ ऊपर चढ रहा था।
सब हिल रहा था,
घूम रहा था,
आ रहा था
या जा रहा था।
मैं भी इसी गति में फँसा था,
चक्कर खा रहा था।
रुकना कठिन था।

9.

न दिन खत्म होता है,
न रात।
न कोई जागता है,
न सोता है।
जो चल रहा है वह रुका हुआ है।
जो शीतल है वह जल रहा है।
तुमको किसने कहा था मेरे पास आओ
यदि तुम्हें रंग चाहिए था?
तुमको किसने कहा था मुझे छुओ
यदि तुम्हें स्पर्श की इच्छा थी?
तुम्हारा आना, नहीं आना,
तुम्हारा छूना, नहीं छूना
मात्र एक मुद्रा बनकर रह गया
जो एक मुद्रा नहीं थी।
घर खडा रहा और ढह गया,
ढह गया और खडा रहा।
अभी-अभी मैंने
तुम्हें उसके द्वार में से
भीतर जाते
या बाहर आते हुए देखा
और नहीं देखा।

1॰.

मैं तो वही हूँ
टेढा-मेढा,
आडा-तिरछा,
बेढंगा।
तब भी आना है तो आओ।
मेरे साथ बैठकर तुम्हें थोडा अजीब तो लगेगा, असुविधा होगी।
मैं चुप बैठा रहूँगा,
तुम्हें घूरूँगा,
टेढी निगाह से देखूँगा,
इधर-उधर हिलूँगा,
अचकचाऊँगा।
तुम अचरज से देखोगी इस अजूबे को,
सोचोगी यह आदमी है या घोडा।
वैसे तुम्हें
मुझ पर सवारी करने का विचार
यदि सूझे तो वह बुरा नहीं होगा।



: फ्लेमिंगो 88, आकृति इकोसिटी,
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