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ग्यारह कविताएँ

कृष्ण कल्पित
सरमद : जामा मस्जिद की सीढियों पर एक नंगे-फकीर के कत्ल की दास्तान
उम्रेस्त कि आवाज-ए-मंसूर कुहन शुद
मन अज सरे नो जलवा देहम दारो रसनरा !
(मंसूर की प्रसिद्धि पुरानी हो गई। मैं सूली पर चढने का दृश्य नये सिरे से पैदा करता हूँ।)
(1)
-आप इतने बडे विद्वान हैं, फिर भी नंगे क्यों रहते हैं ?
दिल्ली के शहर काजी मुल्ला कवी के सवाल के जवाब में सरमद ने कहा :
- शैतान बलवान (कवी) है !
शहर काजी को लगा कि सरमद उसे शैतान कह रहा है। मुल्ला की भृकुटियाँ तन ही रही थी कि सरमद ने फिर कहा :
- एक अजीब चोर ने मुझे नंगा कर दिया है!
(2)
शहर काजी मुल्ला कवी को आलमगीर औरंगजेब ने सरमद के पास भेजा था - उसकी नग्नता का रहस्य जानने के लिये। औरंगजेब शाहजहाँ के बाद दारा शिकोह को ठिकाने लगाकर बादशाह बना था। औरंगजेब जानता था कि दारा शिकोह सरमद की संगत में था और उसके बादशाह बनने की भविष्यवाणी सरमद ने की थी।
औरंगजेब के दिल में सरमद को लेकर गश था - वह उसे भी दारा शिकोह की तरह ठिकाने लगाना चाहता था, लेकिन कोई उचित बहाना नहीं मिल रहा था। औरंगजेब जानता था कि बिना किसी वाजिब वजह के सरमद का कत्ल करने से उसे चाहने वाले भडक सकते थे - जिनकी सँख्या अनगिनत थी।
औरंगजेब कातिल होने के साथ धर्मपरायण भी था और बादशाह होने के बावजूद टोपियाँ सिलकर अपना जीवन-यापन करता था।
(3)
काजी मुल्ला कवी ने दरबार में उपस्थित होकर सरमद का हाल सुनाया और सरमद की मौत का फतवा जारी करने के लिये कलमदान का ढक्कन खोल ही रहा था कि औरंगजेब ने उसे इशारे से रोक दिया और कहाः
नग्नता किसी की मौत का कारण नहीं हो सकती।
औरंगजेब जितना अन्यायप्रिय था उतना ही न्यायप्रिय भी था !
(4)
तब आलमगीर ने अन्याय को न्याय साबित करने के लिये धर्माचार्यों की सभा आहूत की। सरमद को भी बुलवाया गया।
सर्वप्रथम औरंगजेब ने सरमद से पूछा :
सरमद, क्या यह सच है कि तुमने दारा शिकोह के बादशाह बनने की भविष्यवाणी की थी?

सरमद ने स्वीकृति में सर हिलाया और कहा :

मेरी भविष्यवाणी सच साबित हुई। दारा शिकोह अब समूचे ब्रह्मांड का बादशाह है।

इसके बाद धर्मसभा के अध्यक्ष सिद्ध-सूफी खलीफा इब्राहिम बदख्शानी ने सरमद से उसकी नग्नता का कारण पूछा। सरमद खामोश रहा। फिर पूछा गया, तो सरमद ने वही जवाब दिया, जो उसने शहर काजी को दिया था :

एक अजीब चोर है, जिसने मुझे नंगा कर दिया!

तब खलीफा ने सरमद को इस्लाम के मूल सूत्र कलमाये तैयब (लाइलाहा इल्लल्लाह अर्थात कोई नहीं अल्लाह के सिवा) पढने के लिये कहा।

सरमद के विरुद्ध यह भी शिकायत थी कि वह जब भी कलमा पढता है, अधूरा पढता है । अपनी आदत के अनुसार सरमद ने पढा :

लाइलाहा।

सरमद को जब आगे पढने को कहा गया, तो सरमद ने कहा कि मैं अभी यहीं तक पहुँचा हूँ कि कोई नहीं है। आगे पढूँगा, तो वह झूठ होगा क्योंकि आगे के हर्फ अभी मेरे दिल में नहीं पहुँचे हैं । सरमद ने दृढ शब्दों में कहा कि मैं झूठ नहीं बोल सकता।

बादशाह औरंगजेब, धर्मसभा के अध्यक्ष खलीफा बदख्शानी, शहर काजी मुल्ला कवी के साथ समूची धर्मसभा और पूरा दरबार सरमद का जवाब सुनकर सकते में था। खलीफा ने कहा :

यह सरासर इस्लाम की अवमानना है, कुफ्र है। अगर सरमद तौबा न करे, क्षमा न माँगे तो इसे मृत्युदंड दिया जाए।

(5)

जब सरमद ने तौबा नहीं की क्षमा माँगने से इंकार कर दिया तो धर्माचार्यों की सभा और बादशाह की सहमति से शहर काजी मुल्ला कवी ने कलमदान का ढक्कन खोला, उसमें कलम की नोक डुबोई और कागज पर सरमद के मृत्युदंड का फरमान लिख दिया।

अपनी मौत का फरमान सुनकर सरमद को लगा, जैसे वह बारिश की फुहारों का संगीत सुन रहा है। वह भीतर से भीग रहा था, जैसे उसकी फरियाद सुन ली गई है, जैसे उसे अपनी मंजल प्राप्त हो गई है।

सरमद अब कुफ्र और ईमान के परे चला गया था। सरमद ने सोचा :

कितने फटे-पुराने वस्त्रों वाले साधु-फकीर गुजर गये - अब मेरी बारी है।

(6)

सरमद, तू पूरी दुनिया में अपने नेक कामों के नाते जाना जाता है। तूने कुफ्र को छोडकर इस्लाम धारण किया। तुझे खुदा के काम में क्या कमी नजर आई जो अब तुम राम नाम की माला जपने लगा !

सरमद को अपनी ही रुबाई याद आई और अपना पूरा जीवन आँखों के सामने चलचित्र की तरह घूमने लगा ।

पहले अरमानी-यहूदी, फिर मुस्लिम और अब हिन्दू !

सरमद जब अरब से हिंदुस्तान की तरफ चला था, तो वह एक धनी सौदागर था। उसे वह लडका याद आया, जिससे सिंध के ठट्टा नामक कस्बे में उसकी आँख लड गई थी। इस अलौकिक मोहब्बत में उसने अपनी सारी दौलत उडा दी। सरमद दीवानगी में चलते हुए जब दिल्ली की देहरी में घुसा तो एक नंगा फकीर था।



उसे वे धूल भरे रास्ते याद आए, जिस से चलकर वह यहाँ पहुँचा था।

और सरमद को उस हिन्दू ज्योतिषी की याद आई, जिसने उसकी हस्त-रेखाएँ देखकर यह पहेलीनुमा भविष्यवाणी की थी :

तुम्हारे मजहब के तीसरे घर में मृत्यु बैठी हुई है!

(7)

अगले दिन सरमद को कत्ल करने के लिये जामा मस्जिद की सीढियों पर ले जाया गया, जहाँ इतनी भीड थी कि पाँव धरने की जगह नहीं थी। कुछ तमाशा देखने तो अधिकतर अपने प्रिय सरमद की मौत पर आँसू बहाने आये थे। जामा मस्जिद की सबसे ऊँची सीढी पर खडे होकर सरमद ने यह शे’र पढा -

शोरे शुद व अज ख्वाबे अदम चश्म कशुदेम

दी देम कि बाकीस्त शबे फितना गुनूदेम !

(एक शोर उठा और हमने ख्वाबे-अदम से आँखें खोलीं, तो देखा - कुटिल-रात्रि अभी शेष है और हम चिर-निद्रा के प्रभाव में हैं। )

इसके बाद अपनी गर्दन को जल्लाद के सामने झुकाकर सरमद फुसफुसाया-

आओ, तुम जिस भी रास्ते से आओगे, मैं तुझे पहचान लूँगा !

(8)

सरमद का कटा हुआ सर जामा मस्जिद की सीढियों से नृत्य करता हुआ लुढकता रहा। सरमद के कटे हुये सर को उसके पीर हरे भरे शाह ने अपने आगोश में ले लिया। पवन पवन में मिल गई - जैसे कोई विप्लव थम गया हो!

(9)

मुस्लिम इतिहासकार वाला दागिस्तानी ने अपनी किताब में लिखा है कि वहाँ उपस्थित लोगों का कहना था कि जामा मस्जिद की सीढियों से जमीन तक पहुँचते हुये सरमद के कटे हुए सर से यह आवाज निकलती रही- ईल्लल्लाह ईल्लल्लाह ईल्लल्लाह और यह भी प्रवाद है कि सरमद के कटे हुये सर से बहते हुये लहू ने जामा मस्जिद की सीढियों पर जो इबारत लिखी गई उसे इस तरह पढा जा सकता था -

लाइलाहा लाइलाहा लाइलाहा!

(10)

इतिहास की किताबों में सरमद शहीद का जक्र मुश्किल से मिलता है, लेकिन जामा मस्जिद के सामने बने सरमद के मजार पर आज भी उसके चाहने वालों की भीड लगी रहती है। यह जुडवाँ मजार है। हरे भरे शाह और शहीद सरमद के मजार। हरे भरे शाह और सरमद। जैसे निजामुद्दीन औलिया और अमीर खुसरो। पीरो-मुरीद। एक हरा। एक लाल।

इन के बीच नीम का एक घेर-घुमावदार, पुराना वृक्ष है जिससे सारे साल इन जुडवाँ कब्रों पर नीम की निम्बोलियाँ टपकती रहती हैं।

और जब दिल्ली की झुलसा देने वाली गर्मी से राष्ट्रपति-भवन के मुगल-गॉर्डन के फूल मुरझाने और घास पीली पडने लगती है, तब भी सरमद के मजार के आसपास हरियाली कम नहीं होती। सरमद की कब्र के चारों तरफ फूल खिले रहते हैं और घास हरी-भरी रहती है !

(11)

खूने कि इश्क रेजद हरगिज न बाशद

(इश्क में जो खून बहता है वह कदापि व्यर्थ नहीं जाता!)



सम्फ - के-701, महिमा पैनोरमा,

जगतपुरा, जयपुर - ३०२०१७

मो. ७२८९०७२९५९