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ठहरे हुए पल

वीणा चूंडावत
धनक स्कूल से लौटी ही थी। काम के कारण आराम से बैठ नहीं पाई। कपडे बदलकर सीधा रसोई घर में नजरें घुमाई। आज थोडी थकान महसूस होने के कारण उसे चाय पीने की इच्छा हो रही थी। गैस पर चाय चढा दी। चाय उबलती तब तक धनक ने सोचा कि सब्जी ही काट लूँ। आज लौकी की सब्जी और दाल बनाई। चाय उतारकर कप में छान ली। एक चूल्हे पर सब्जी एवं दूसरी चूल्हे पर दाल में छौंक लगा दिया। दाल बनती तब तक धनक ने बैठकर चाय पी ली।
बच्चे स्कूल से वापस आ गए थे। खाना भी लगभग तैयार हो चुका था। धनक ने जोर से दोनों बच्चों को खाना खाने के लिए आवाज लगाई। सब्जीयाँ और रोटियाँ बन चुकी थी, लेकिन एक-दो रोटी बनानी रह गई थी। बच्चों को खाना परोस कर वह बाकी का काम करने लगी।
धनक की रसोई से खिडकी बाहर झाँकती है। कुछ आवाजों उसके कानों में पडी तो उसने खिडकी से देखा कि उसकी किराएदार विभा तेजी से दौडते हुए गेट की तरफजा रही है। यह क्या? उसके पीछे तेजी से उससे मिलने आए मित्र की पत्नी तपस्या भाग रही थी। इन दोनों के पीछे आशुतोष(विभा का पति) था। यह देख कर धनक की समझ में कुछ नहीं आया उसने सोचा कि इनके घर से कोई ऐसी खबर आई है जो यह सुनकर विभा सहन नहीं कर पाई। बाहर की तरफ दौड पडी। उसे संभालने के लिए दोनों उसके पीछे-पीछे आ गए।
चौंकाने वाली बात उसके सामने यह थी कि विभा ने अपने आप को कमरे में बंद कर लिया। वह जोर जोर से रो रही है। उसकी आवाज धनक आसानी से सुन पा रही है।
धनक ने जल्दी से काम निपटा कर विभा के कमरे की तरफ लपकी। चिंता के साथ उसने आवाज दी, विभा -विभा।
विभा ने पाँच-दस मिनट बाद दरवाजा खोला और उससे लिपट कर रोने लगी।
रोते हुए- दीदी में बच्चों के साथ ऊपर वाले कमरे में जाना चाहती हूं। अब यहाँ इस कमरे में मुझे डर लग रहा है। ऐसा लग रहा है कि कोई मेरा गला दबाना चाहता है।
धनक ने उसे समझाया और कहा कुछ नहीं होगा तुम बच्चों के साथ ऊपर कमरे में चली जाओ। कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर लेना।
तेज कदमों से फिर धनक रसोई की खिडकी पर जाकर खडी हो गई। बाहर का नजारा बडा ही अजीब था। तपस्या का व्यवहार बेतरतीब था। एक तरफ मुंह पूरा सूजा हुआ था और जोर जोर से चिल्लाते हुए मैं तुझे मार दूंगी। पापा मुझे बचा लो।
आशुतोष उसका हाथ पकडकर अंदर लाने की सारी कोशिश बेकार थी। चिंता की बात यह थी कि तपस्या अकेली नहीं थी। एक नन्हा जीव, उसमें सांसों से अपना जीवन बुन रहा है। आशुतोष ने अपने एक मित्र को फोन करके बुलाया और कहा कि तुम तो बस इनका ध्यान रखो। यह जो करती है, जहाँ जाती है, जाने दो। पर नाराजगी में स्वयं को नुकसान ना पहुँचाए। इस बात का ध्यान रखना।
इतना कहकर आशुतोष एयरफोर्स की यूनिफॉर्म पहनकर तपस्या के पति को बुलाने चला गया। इतनी देर में धनक रसोई घर से निकल कर कमरे की खिडकी से बाहर देखने लगी। तपस्या का खुद पर नियंत्रण ही नहीं था। बडी व्याकुल दिख रही थी। उसका बर्ताव असहज था।
तपस्या आशुतोष के मित्र से कहने लगी कि हम नचनिया हैं, नचनिया क्या दस रुपये में हमारा नाच देखोगे? अपना पैसा निकाल, नहीं तो हम कपडे ऊपर कर देंगे।
यह सुनकर धनक दंग रह गई। उसकी कॉलोनी में यदि बिजली गुल हो जाए, तो कोई पडोसी बाहर नहीं निकलता। लेकिन उस दिन जैसे मोहल्ले के जितने लोग थे घर के आसपास जमा हो गए। उसे थोडी शर्मिंदगी भी हो रही थी, लोग क्या सोचेंगे कि कैसे लोग रहते हैं? लोगों को बात करने का बहाना मिल जाएगा। तपस्या के गुस्से और चिंता को देख कर कुछ लोग तो उसे ऊपरी हवा का असर बता रहे थे। कुछ ड्यूल पर्सनैलिटी डिसऑर्डर और कुछ अन्य बीमारियों के नाम गिना रहे थे।
धनक मन ही मन प्रार्थना कर रही थी की कि तपस्या किसी भी बीमारी से पीडित हो, लेकिन वह यहाँ से चली जाए। दिन के दो बजे से शाम के चार बजे तक उसका घर एक रंगमंच बन गया था। शायद भगवान ने उसकी सुन ली और तपस्या के पति को आशुतोष लेकर आ गया।
आते ही तपस्या के पति ऋषि ज़ोर से बोलते हुए, क्या हाल बना रखा है, देखो कहाँ बैठी हो? चलो अंदर चलो। वह बहला-फुसलाकर उसे सडक से घर के पोर्च में ले आया। ऋषि तपस्या की जिद एवं थकान की वजह से वहीं बैठ गया। शर्म से पानी-पानी होता वह सभी से नज़रें चुरा रहा था। लेकिन तपस्या मनगढंत बोले जा रही थी।
शोर सुनकर धनक के पडोस में रहने वाली सुमन आंटी स्कूल से लौटी ही थी। वे गाडी से उतर कर सीधे उसके घर में आ गई। सुमन आंटी को तपस्या ने अपनी ओर आते देख कर घूंघट ओढ लिया- तुम हमारी मैया हो?, फिर सुमन आंटी की साडी पकडकर खींचने लगी। उन्होंने पैर झटकते हुए, आंखें चौडी करके पूछा- तू कौन है,तेरा क्या काम है? तपस्या फिर भडक उठी, गुस्से से लाल पीली होती हुई नाचने- गाने वालों को क्या कहते हैं? और जोर-जोर से ताली पीटने लगी। ऋषि भी उसे अपनी पकड में नहीं रख पा रहा था। इतने में अजान सुनकर वह घुटनों के बल बैठ गई। सिर दुपट्टे से ढक लिया। दोनों हाथ ऊपर कर। आँखें मींच बुदबुदाने लगी। अपनी गर्दन को दायें, बायें घूमाते हुए सिर झुका कर माथा जमीन पर टेक दिया।इस समय उसके चेहरे पर शान्त भाव नज़र आ रहे थे।
धनक के घर जो आता एक राय साथ लेकर आता। कोई कहता, गंगाजल का छिडकाव करो, तो कोई अगरबत्ती लेकर धूप। जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा था तपस्या आपे से बाहर होती जाती। उसका मिज़ाज कभी उत्साही तो कभी उदासीन, ऐसा प्रतीत होता था कि बांध में आए पानी के उफान पर किसी का नियंत्रण नहीं होता ,उसकी हालत बद से बदतर हो रही थी।
धनक को एंबुलेंस की आवाज़ सुनकर राहत महसूस हुई। एंबुलेंस को देखकर तपस्या ने अपने पैर अंगद की मानिंद जमा लिए। मजाल है कि पाँच पाँच व्यक्ति भी उसे हिला पाए। आखिरकार उसे बेहोशी का इंजेक्शन देकर एंबुलेंस में ले जाया गया। यह सारा नज़ारा धनक अंदर कमरे की खिडकी से देख रही थी। डर के कारण उसका खून जमा जा रहा था।
एंबुलेंस को जाता देख विभा और बच्चे उतर कर नीचे कमरे में आ गए। विभा को धनक ने आश्वस्त किया कि सब कुछ ठीक है, डरने की जरूरत नहीं। जब तक विभा का गुस्सा भी थोडा शांत हो गया था।
धनक को रात घर के आगे का बगीचा रहस्यमय-सा लगा। हरे भरे पेडों में चारों ओर सन्नाटा पसरा था। पेडों से गिरे सूखे पत्तों की खडखडाहट से वह चौंक पडती। उसका कोमल हृदय अनजाने डर से आशंकित हो जाता कि कहीं तपस्या हॉस्पिटल से भाग कर वापस यहाँ ना आ गई हो। उसकी कल्पना से ही धनक का कोमल हृदय दहशत से सिहर उठता। दबे पाँव, आहट किए बिना, धडकते दिल से आगे बढते हुए ,उसने खिडकी का पर्दा हटा कर देखा, तो शरीर में झुरझुरी-सी दौड गई। अंधेरा तेजी से उसके भीतर उतर गया। दिन भर काम में खटतीं। थका शरीर। आखिर नींद की आगोश में समा गया।
दूसरे दिन धनक ने विभा से पूछा कि क्या हुआ था? विभा बोली- दीदी यह तपस्या मुझे पहले दिन से फूटी आँख नहीं भाती। लेकिन आशुतोष के कारण यह सब कुछ हुआ है। ऋषि और तपस्या को जब खाने पर बुलाया था। तब से वह मेरे साथ अजीब-सा बर्ताव कर रही है। वह मुझे ऐसे घूरती है, जैसे डराने के लिए उसके अंदर से कोई और ही झांक रहा हो। उसकी आँखों से मुझे बहुत डर लगता है। आज मेरी तबीयत भी ठीक नहीं लग रही थी ,इसलिए मैंने आशुतोष से कहा था कि किसी को खाने पर मत बुलाना मैं दिन में थोडा आराम करूंगी।
तपस्या और ऋषि दो दिन पहले ही जोधपुर आए थे। उनका सामान बिखरा हुआ था। इसीलिए आशुतोष ने उसे घर पर खाने के लिए बुलाया था। विभाग की आँखों में आँसू आ गए। रोते -रोते वह कहने लगी दीदी तपस्या पहले दिन घर आई थी। तो ऋषि और आशुतोष दोनों सोफे पर बैठे थे। यह पलंग पर पैर चौडे करके लेट गई। कहने लगी विभा, तुम्हारा बिस्तर बहुत अच्छा है, हम सो लें क्या? आशुतोष आओ हम दोनों इस पर सो जाएँ विभा और ऋषि को बाहर...। और जोर से हँस दी।
मैं तो सुनकर ही चुप रह गई। कैसी औरत है। पराए लोगों के सामने भी बोलने -बैठने का ढब नहीं। आशुतोष को देख कर तपस्या कहने लगी, हमको खीर खिलाओ, तुम्हारे खीर खिलाने से हमारा मुँह का जायका बढ जाएगा। पलंग से उठकर आशुतोष के साथ चिपक कर बैठ गई।
आज फिर से जिद्दकर के घर आ गई। ऋषि ने समझाया कि रोज-रोज किसी को तकलीफ देना अच्छी बात नहीं है। ऋषि की सभी कोशिशें बेकार हो गई और आखिरकार उसे लेकर यहाँ आना ही पडा।
आते ही तपस्या बोली, खाना तो विभा के हाथ का ही खाऊँगी। ऋषि सकुचाते हुए वहाँ रुका नहीं और ऑफिस में छुट्टी की अर्जी देने चला गया। तपस्या की हरकतों से ऋषि को परेशान कर रखा था इसलिए दो दिन के अन्दर ही गाँव लौटने का रिजर्वेशन करवा लिया ।
आशुतोष भी काम से लौट ही था, विभा खाना बना रही थी। तपस्या ने आते ही विभा से पूछा-क्या बनाई हो।
विभा ने कहा- रोटी,सब्जी और गाजर का हलुवा।
हलुवे में बादाम, काजू, किसमिस डाले कि नहीं। रोटी में घी अच्छा लगाना। इतना कहते ही तपस्या ने अपनी थाली खुद लगा ली।
विभा को यह सब अजीब लग रहा था। तपस्या थाली लगाकर आशुतोष के पास सटकर बैठ गई कहने लगी हम दोनों साथ खाएँगे। आशुतोष ने विभा को खाने के लिए कहा। विभा उसे अनसुना कर मन ही मन तपस्या को कोस रही थी कि यह कहाँ से आ गई।
रोटी का एक ग्रास लेते तपस्या विभा को घूरते हुए- तुम मेरे खाने में कितने बाल मिलाई हो। खाना बनाना नहीं आता।
विभाग गुस्से से उठकर कमरे से रसोई घर में आ गई। यह सब देखकर तपस्या बडी खुश हुई और आशुतोष से कहने लगी पिक्चर देखने चलें। विभा को अपने साथ नहीं ले जाएंगे ऽऽऽऽ.....। आओ हम दोनों इस बिस्तर पर लेट जाएँ। उसे अपनी दोनों बांहें आशुतोष के गले में डाल दी। आशुतोष कुछ समझता इतना सुनते ही विभा ने उसे आवाज लगाई। लेकिन बिजली की फुर्ती से तपस्या विभा की तरफ भागी। डर से विभा रसोई घर का दरवाजा खोलकर बाहर दौड पडी। आगे जो हुआ वह धनक की आँखों के सामने था।
धनक विभा को समझाते हुए कहा कि, इसमें आशुतोष की क्या गलती है, वह तो अपने मित्र की बीमार पत्नी की मदद ही कर रहा है।
विभा ने आशुतोष पर तंज कसते हुए कहा, नहीं दीदी इन पुरुषों को आप नहीं जानती। यह दोनों हाथ में लड्डू रखना चाहते हैं।
आशुतोष और धनक के हंसी के फव्वारें छूट पडे। विभा इतनी गुस्से में थी कि बात की न*ााकत को समझ ही नहीं पा रही थी।
आशुतोष ने ऋषि से पूछा, कैसे हैं आप दोनों?
असहज होते हुए ऋषि, तपस्या की हरकतों के लिए मैं तुमसे माफी माँगता हूँ।
आशुतोष ने कहा, नहीं, ऐसी कोई बात नहीं, मुझे पता है कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है।
ऋषि ने तपस्या के गाँव जाकर उसके पिताजी से कहा, देखिए अब तपस्या मेरी पत्नी है। उसे इस बीमारी से बाहर निकाल कर ठीक करना होगा। इसके लिए आपको शुरू से सारी बातें बतानी होंगी। पहले तो वे सकुचाए फिर धीरे-धीरे बीते समय की जमी गर्द को साफकरते- करते कहने लगे।
तपस्या उसके साथ पढने वाले लडके से प्यार करती थी। उससे ही शादी करना चाहती थी। वह लडका दूसरी जाति का था। इसलिए मैंने शादी के लिए मना कर दिया। लेकिन एक दिन तपस्या मौका देखकर उस लडके के साथ घर छोडकर भाग गई। मेरी बिरादरी के लोग परिवार पर थू-थू करने लगे। तरह-तरह की बातें होने लगी। मेरा बेटा होशियार था। पुलिस की मदद से उसने तपस्या और उस लडके को मुंबई में जाकर पकड लिया। उन दोनों ने निकाह कर लिया था और अपने रिश्तेदार के घर पर रुके हुए थे।
मुंबई से लौटने पर सीधे उन दोनों को पुलिस स्टेशन ले जाया गया। तपस्या को देख कर उसकी माँ रोते-रोते, बेटा तू कहाँ चली गई थी?
आप कौन हैं? मैं आपको नहीं जानती। तपस्या माँ का हाथ हटाते हुए बोली। माँ ने उसके गाल पर एक तमाचा जड दिया।
मैं बालिग हूँ। अपनी मर्जी से किसी के भी साथ शादी कर सकती हूँ। कहती हुई तपस्या रोने लगी।
मेरी पुलिस में जान-पहचान थी।
इसलिए इस मामले को रफा-दफा कर दिया। उस लडके को छः महीने की कैद हो गई। तपस्या की तुमसे शादी।
इस हादसे के बाद तपस्या बिल्कुल चुप हो गई। उसमें अजीब परिवर्तन आ गया। वह सभी को शक की नज़रों से देखती। शंका करना जैसे उसका स्वभाव बन गया था। धीरे-धीरे उसने अपनी अलग दुनिया बना ली थी। हमने सोचा शादी के बाद शायद पति का प्यार पाने के बाद तपस्या ठीक हो जाएगी। पर इस का ऐसा दुष्परिणाम होगा मैंने सोचा भी नहीं।
ऋषि ने दुखी होकर कहा आपने अपनी बात रखने के लिये तीन जिंदगियाँ को बसने से पहले उजाड दी। तपस्या हर पल अपने प्रेमी के लिए छटपटाती है। उसकी छटपटाहट हर पल ख्वाब के जाले बुनती है जिसमें वो खुद मकडी की तरह कैद है। उसका समय अपने प्रेम में ठहर गया है। वहीं ठहरे हुए पल उसकी जान ले रहे हैं। खैर अब जो हुआ उसको बदला नहीं जा सकता। मगर मैं पुरजोर कोशिश करुँगा कि वह लौट आए। अपने बीते समय से निकल फिर वर्तमान में आ जाए और वर्तमान ही नहीं वर्तमान के यथार्थ से भी रिश्ता बनाएँ।
सम्पर्क : ह.नं.109, सेंट्रल स्कूल स्कीम,
एयर फोर्स एरिया, जोधपुर (राजस्थान)