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बेदखल

माधव राठौड
इस साल के अंत में पाँच लाख चालीस हजार शरणार्थी जर्मनी पहुँचेंगे
( जिनमें आधे से अधिक सीरिया के हैं।)
अखबार के मुख्य पृष्ठ पर खबर थी।
भीतर संपादकीय पृष्ठ पर आलेख छपा था कि अनुच्छेद 14 प्रत्येक व्यक्ति को सताए जाने पर दूसरे देशों में शरण लेने का अधिकार देता है।
यह खबर थी रोज की तरह, खबरों का क्या! रोज ही आती है कुछ न कुछ।
सुबह का अखबार घडी भर में रद्दी बन जाता है।
लोग सोशल मीडिया के दौर से गुजर रहे हैं।
अखबारी और टीवी की खबरें अब इन्हें ज्यादा ठहरा नहीं सकती ,प्रभावित करना तो दूर की बात, इसलिए खबरवालों ने भी खबरों के शीर्षक बदल दिए,खबरें अब चटपटी हो गई।
अखबार के बीच के पन्नों पर एक कोने में यह खबर भी दबी हुई थी-
बाडमेर का यह गाँव पूरा खाली करवाया जाएगा, यहाँ होगा कोयले का मेगा टन उत्पादन ।
जर्मनी और सीरिया की खबर राजस्थान में रहने वाले व्यक्ति को क्यों परेशान करेगी।
करना भी चाहे तो यह खबर करती कि उसके पडोसी जिले का पूरा गाँव खाली हो गया । लेकिन वह भी खबर प्रभावित नहीं कर सकी।
यह सेल्फी का दौर है । प्रभावित होने का नहीं। असल में, प्रभावित करने का दौर है, इसलिए जिधर देखो हर कोई चमत्कार दिखाने में लगा है, चाहे राजनीति हो, सरकार हो, समाज हो, साहित्य हो।
खबरें अब हमें ज्यादा परेशान नहीं करती मगर चमकृत जरूर करती है ।
अखबार खून से लथपथ, गैंगरेप से पीडित, सडांध मारते हॉस्पिटल की गन्ध से भरे, सड चुकी अर्थव्यवस्था से चिथडे मिलते हैं। अखबार खोलो तो घर और दिमाग दोनों में गंध भर जाए। दिन भर घर में तैरती रहती है डरावनी गन्ध। अब इस गन्ध के आदि भी हो चुके है हम।
इसलिए तीन साल की बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार की खबर को पढते हुए भी हम आराम से चाय पी सकते हैं ।
लेकिन प्रोफेसर एस.एन. अजीब किस्म के जीव हैं ।
प्रोफेसर सर्द-धूप में आराम कुर्सी डाल अखबार पढते है।
प्रोफेसर कुर्सी को हिलाते डुलाते थिर होने की चाह में स्थिर करते कि कहीं से दुनिया स्थिर दिखे। अखबार में किसी कोने में यह खबर मिले की दुनिया में शांति है।
अखबार के पन्नों के पलटने के साथ ही प्रोफेसर की कुर्सी भारी होने लगती।
कुर्सी के पाँव हाथी से भारी लगते ।
फिर से पाँच लाख चालीस हजार शरणार्थी!!!
जडों से उखडना। विस्थापन। पुनर्स्थापित होने का संघर्ष। धूप तीखी हो गई। प्रोफेसर का सिर भारी।
यह रोज का काम है। खबरों के बीच माथा मारते रहते हैं। वैसे प्रोफेसर अर्थशास्त्र पढाते हैं। इनके कई साथी लेखक भी हैं तो वे उनकी चर्चाओं का हिस्सा भी बनते हैं।
हर चीज से असंतोष से भरे हुए हैं । हर आने वाले से पूछते हैं - क्या तुम अपने समय से संतुष्ट हो ?
क्या तुम्हें डर नहीं लगता इस भयावह समय से?
जर्मनी के एक अखबार में जर्मन सरकार के प्रवक्ता का प्रमुखत से बयान छपा है - इस बार जर्मनी में शरणार्थी उसी तरीके से आएँगे। थोडा-सा सीमा नियंत्रण का मतलब यह नहीं कि हमने सीमाएँ बंद कर दी हैं। जर्मनी हमेशा की तरह उदार भाव और सेवा भाव के साथ ही शरणार्थियों को जगह देगा।
इस खबर को पढकर म्यूनिख शहर के भव्य कॉरपोरेट ऑफिस में बैठे मार्क पोलो मीटिंग में कर्मचारियों को सही एन्यूल प्रोग्रेस रिपोर्ट नहीं बनाये जाने पर डांट रहे हैं । उसे आज जर्मन सरकार के मंत्री से बात करनी है। उनके पास कई सेवागृह है, जो समय-समय पर सरकार को लीज पर देकर शरणार्थियों के लिए जगह बनाते हैं ।
कहने को तो यह सेवाश्रम कहलाते हैं लेकिन मार्क पोलो जैसे लोगों के लिए शरणार्थी एक उद्योग है। वे जानते हैं हर साल जर्मनी लाखों शरणार्थियों को जगह देती हैं, इसलिए इस बार भी मार्क चाहता है उसको दो चार सेवागृह लीज पर जाए, तो कंपनी को अच्छा खासा प्रॉफिट मिल सकता है।
प्रोफेसर साहब रोज शाम को रेलवे मैदान में घूमने जाते हैं । प्रोफेसर एक एन.जी.ओ. से जुडे हैं, जो रैन्डमाइज्ड कंट्रोल ट्रायल्स (आर.सी.टी.) प्लान के तहत उपचाराधीन झुग्गी-झोपडियों को सीधे प्रभावित करने वाले कार्यक्रमों और उनके प्रभावों पर काम करते हैं।
पटरियों के दोनों तरफ अस्थाई टेंटों में बसे लोगों से मिलते हुए वे देश की नीतियों को कोसते है। फिर मैदान की तरफ तेज कदमों से चलते हैं, पर आज एक नई झुग्गी को देखकर रुक गए।
लूणे खाँ ढोली का परिवार 71 के युद्ध के समय पाकिस्तान से माइग्रेट होकर हिंदुस्तान आया था।
लूणे खाँ पाकिस्तान के कण्ठे के पार का निवासी था । उसके दादा परदादा गायकी का काम करते थे। युद्ध के दौरान पूरा गाँव खाली हो गया । हिंदू सब भारत जा रहे थे। लूणे खाँ मुसलमान था। उसे पाकिस्तान में कोई खतरा नहीं था। लेकिन जिनके साथ पीढियों के संबंध थे उनसे अलग रहना संभव नहीं था। कुम्हला जाएगा। इनके बिना, गीतों में राग नही रहेगी, कमायचे के तार बिन्ध जाएँगे।
इसलिए 71 में ही उनके साथ आकर बाडमेर के इस गाँव में बस गया था। गाँव की ओर उसे छोटी-सी जगह दी गई, जहां उसने अपनी ढाणी बनाई।
लूणे खाँ की हिंदुस्तान आने के बाद मृत्यु हो गई। पत्नी फरीदा और बेटे भूरे खाँ व जुम्मे खाँ के साथ गाँव में रहकर अपना गुजर-बसर कर रहे थे। फरीदा को अल्लाह तआला ने ऐसी आवाज नवाजी थी कि जब वह गाती थी तो आसपास का सब ठहर जाता था। शादी-ब्याह उत्सव में आसपास के गाँवों में भी सम्मान के साथ बुलाया जाता था।
वे इस गाँव में रच-बस चुके थे। सब ठीक था। जीवन की गाडी फिर से पटरी पर थी।
मार्क की पहली मीटिंग असफल हुई।
विपक्ष और चुनावी माहौल को देखते हुए शरणार्थियों को लेकर जर्मनी ने इस साल नियम कडे कर रखे हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बडा दबाव है । इधर जर्मनी में इस साल चुनाव है। प्रधानमंत्री नहीं चाहती कि शरणार्थी मुद्दे पर सरकार गँवानी पडे।
लाखों लोग सीमा पर अटके हुए हैं। दरवाजे खोलने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर दबाव हैं।

लेकिन मार्क हर हाल में शरणार्थी गृह की लीज लेना चाहता है।
गाँव में कोयले खनन के लिए खाली होने के नोटिस चस्पा होने लगे । अखबारों में सार्वजनिक इतिला हुई कि जिनको भी मुआवजा चाहिए वे अपनी जमाबंदी, गिरदावरी आदि पटवारी से लेकर 7 दिन में दावा करें।
अखबार में हर रोज चार गाँवों को कॉल सीम बताते हुए ड्रिलिंग का काम जल्दी शुरू होने के दावे होते थे । कोयला कंपनी का कैंप कार्यालय खोलने की तैयारी होने लगी ।
गाँवों के ब्लॉक में मिलियन कोयला उत्पादन से जिले का होगा विकास। - आए दिन अखबारों की मुख्य खबरें होती थी।
प्रभावित गाँवों के लोगों को रोजगार दिया जाएगा । उनको प्रत्यक्ष रूप से निर्माण कार्यों में जोडा जाएगा। सभी 4 गाँवों को पुनर्वास नीति के अनुसार सही जगह पर पुनर्वासित किया जाएगा।
फरीदा जब भी गाँव में किसी घर में जाती हर जगह एक ही बात सुनती गाँव खाली हो रहा है। पूरा गाँव कोयले में चला जाएगा। हर कोई अपने भविष्य की चिंता में था । कोई ससुराल में जाएगा, कोई बहन के यहाँ, कोई बेटी के यहाँ ,कोई पडोसी शहर में रहने जाएगा।
फरीदा घर वापस लौटती तो चिंतित होती, जब गाँव खाली हो जाएगा तो वह कहाँ जाएगी।
****
मार्क नहीं चाहता उसकी कंपनी के शेयर इस बार गिरे। वो वीकेंड पर निकल जाता है, शायद कोई आइडिया क्लिक कर जाए।
मार्क धूप स्नान करने आया है। वेटर एक बडा मग कॉफी पकडाता है।
घूंट भर से कॉफी मुँह में फैल जाती हैं। ऊर्जा से भर जाता है।
लौटकर उसने दाँव खेला पार्टी फंड के लिए लाइजनिंग ऑफिसर से संफ कर बडा हिस्सा चुनाव खर्च के लिए डोनेट कर दिया।
सप्ताह भर में मार्को को दो शरणार्थी सेवा स्थल अलॉट हो गए। दो अगले माह मिलने का आश्वासन मिला।
मार्क की टीम उनकी सेवा में लग गई। शरणार्थी खुश थे उन्हें छत मिल गई।
गाँव में पुनर्वास कैंप लगा है।
कलेक्टर आए हैं, भूमि अवाप्ति अधिकारी आए हैं, उनके साथ तहसीलदार, कानूनगो, पटवारी का पूरा लवाजमा है। पूरा गाँव एकत्र हो रखा है। सब अपनी जमीन के हिसाब से मुआवजे का क्लेम कर रहे हैं। फरीदा अपने बच्चों के साथ मुआवजे का मांग करने पहुँची ।
पटवारी ने लिस्ट देखकर कहा की तुम मुआवजे की हकदार नहीं हो। तुम पाकिस्तान से आए हो, यहाँ की नागरिकता भी नहीं मिली। अतः जमीन की स्वामी नहीं हो। शत्रु देश के नागरिकों को मुआवजा मिल नहीं सकता।
फरीदा हैरान,परेशान। यह क्या हो गया!!!
सब गाँव वालों के पास गई, लेकिन कोई कुछ भी मदद करने की स्थिति में नहीं था । सब अपना सामान समेटने में लगे थे। सभी के चेहरों पर दुख थे- गाँव, खेत-खलियान, घर-गवाडी छोडने की।
सब चाहते थे पर्याप्त प्रतिकर मिल जाए, तो नई जगह पर ढंग से स्थापित हो सके ।
कुछ माह बाद पूरा गाँव खाली हो गया। सरकारी मशीनरी ने फरीदा को वहाँ से हटने का दस दिन का नोटिस दिया । नहीं हटने पर बाहर फेंकने की धमकी भी ।
कुछ दिन बाद फरीदा बच्चों को लेकर इस शहर में आ गई।
फरीदा गाती थी, भूरे खाँ गाता था, जुम्मे खाँ बजा सकता था । गाकर कमा सकते थे ।
यही इनके पास पीढियों का हुनर था ।
लेकिन इस भागते महानगर में ना कोई मेजबान है ना मेहमान, जो इनके लोक संगीत को समझ कर आश्रय दे सके ।
जीवन की गाडी पटरियों से उतर कर पटरियों के ईद-गिर्द आ गई। फरीदा कभी हिंदुस्तान के इस गाँव को तो कभी पाकिस्तान के उस गाँव को याद करती हुई कुरलाती रहती।
बच्चे कभी दिहाडी तो कभी प्लास्टिक कचरा चुनकर काम चला रहे थे ।
एक दोपहर भूखा सांड प्लास्टिक की थैलियों को सूँघते हुए उसके टेंट में घुस गया।
सोती हुई फरीदा को उठाकर फेंक दिया एक हाथ और पांव टूट गया। सरकारी हॉस्पिटल में ले गए। जितना फ्री दवा दारू कर सकते थे किया।
उसी दिन शहर के भीतरी मोहल्ले में आवारा सांड को टैक्सी वाला टक्कर मार भाग गया। मोहल्ले वालों ने जाम लगा दिया। पार्षद साहब दौडे-दौडे आए। पुलिस आई। गौ भक्त आये। मीडिया आया।
सुबह अखबार की खबर थी -
सांड को मारी टक्कर, पार्षद के प्रयास से टैक्सी चालक गिरफ्तार।
प्रोफेसर साहब अपने साहित्यिक मित्र के साथ जब भी रेलवे क्लब जाते फरीदा को देखते तो रुक कर बात करते।
हाथ में मवाद पड गई, फिर कीडे पड गये। फरीदा दिनभर दर्द से कुलबुलाती रहती।
रात को फरीदा नींद में कुनमुनाती। उसे आधी नींद में सपने आते। पटरी के उस पार रेलवे के सामुदायिक भवन में विवाह चल रहा है ।
गाना बज रहा है - केसरिया बालम पधारो म्हारे देश
फरीदा गाती हैं -
ढोला थारे देश में निपजे तीन रतन
आवाज कमजोर, मरियल-सी।
बच्चे कहते हैं- माँ क्यों बडबडा रही हैं सोने दो ना।
फरीदा जाग में आती हैं। सपने की मीठी राग का स्वाद कसैला हो जाता है।
वह करवट बदलती हैं । पैर में चिरमिराहट हो रही हैं । हाथ में दर्द बढ रहा है।
मालाणी ट्रैन धड-धड गुजरती हैं। फरीदा का दर्द शोर में दब जाता है।
सर्दी को सूरज जल्दी घर चला जाता है।
हवा में ठंड है।
अंधेरा जल्दी गिर रहा है।
रेलवे स्टेशन के बाहर तिब्बती मार्केट की रौनक।
गर्म ऊनी कपडों से सजा हुआ। रंग-बिरंगे फुगे वाली बच्चों की रंग बिरंगी टोपियाँ, मोजे, गरम और नरम फाहों वाले स्वेटर।
प्रोफेसर अपने लिए विंटर कोट देख रहे हैं।
साहित्यिक मित्र प्रोफेसर साहब को डॉक्टर साहब कहते थे इसलिए फरीदा हर बार उम्मीद भरी नजर से प्रोफेसर साहब को पूछती -डॉक्टर साहब क्या मैं ठीक हो जाऊँगी?
फरीदा प्रोफेसर को इस कदर देखती, जैसे वो सब समझ लेंगे।
डॉक्टर साहब मैं मर जाऊँ, तो क्या गाँव की जमीन नसीब होगी?
प्रोफेसर साहब के पास कोई जवाब नहीं होता।
आज के अखबार की खबर थी- म्यांमार के रोहिंग्यों के खिलाफ होगी कडी कार्रवाई।
इधर प्रोफेसर क्लास में पढा रहे हैं- वैश्विक अर्थव्यवस्था पर शरणार्थियों का प्रभाव।
जर्मन की सत्तासीन पार्टी को चुनाव में हार दिख रही है। विपक्ष पार्टी ने शरणार्थियों के मसले को लेकर खिलाफ हवा बना रखी है।
पार्टी की आपातकालीन बैठक हो रही है राजधानी बर्लिन में।
दिन भर तेज बुखार।
फरीदा देर रात तक जगती रही। भोर तक घडी भर आँख लगी। पूरे शरीर में हरारत रही ।
आँखें कटोर के भीतर धस गई।
सत्तासीन पार्टी आंतरिक दबाव के आगे झुक गई। दूसरे दिन पार्टी प्रवक्ता का बयान था- देश हित सर्वोपरी रहेगा।
फरीदा 1॰ दिसंबर के दिन मर गई।
अखबार में मानवाधिकारों पर बडे-बडे आलेख थे।
प्रत्येक व्यक्ति को उसे और उसके परिवार के स्वास्थ्य एवं कल्याण के लिए ऐसे जीवनस्तर को प्राप्त करने का अधिकार है जिसमें रोटी कपडा छत और दवा भी शामिल है।
प्रोफेसर को सबसे महत्त्वपूर्ण लाइन लगी कि सभी को बेकारी, बीमारी, वैधव्य और बुढापे में साधन न होने पर सुरक्षा का अधिकार प्राप्त है।
वे हाईलाइटर से इस पैरा को बोल्ड करते है।
बच्चे मां को गाँव में दफन करना चाहते थे, बाप की कब्र के पास।
लेकिन शहर में गाँव तक कैसे ले जाएं उनके पास इतना पैसा नहीं था।
छोटे बेटे ने निर्ममता से बोरी में डालकर मां का शव लेकर गाँव पहुँचे।
प्रोफेसर अपनी अर्थशास्त्र की क्लास में नई भूमि कानून के नफे-नुकसान पढा रहे थे ।
पर दिमाग बार-बार रेलवे पटरी के आस पास फरीदा के डेरे पर जा रहा था।
फरीदा उनके आरसीटी की हिस्सा बनने जा रही थी ।
वे उस पर प्रयोग कर रहे थे। इस बार अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार भी उस व्यक्ति को मिला था जिसने अपने आरसीटी के प्रयोग करते हुए बिहार और मुंबई की गरीब झुग्गी झोपडयिों पर काम किया था।
प्रोफेसर चिंतित थे पिछले सप्ताह से वह डेरा गायब था।
मार्क की कंपनी के शेयर धडाम से गिरे। उसे पिछले सप्ताह से नींद नहीं आ रही थी। वह नींद की दो गोली लेकर सो जाता है। वह कल की फ्लाइट से म्यूनिख से बर्लिन की तरफ उडेगा।
गाँव अब गाँव नहीं रहा। कोयला कंपनी का बेस ऑफिस खुल चुका था। प्रदेश से बाहर के मजदूर आ चुके थे। उनके अस्थाई घर बन चुके थे।
उधर मार्क बर्लिन में लॉबिंग कर रहा था, शायद नई सरकार नियमों में अब ढील दे दे। उसे फिर से अलोटेड शरणार्थी गृह मिल सके।
उधर प्रोफेसर राष्ट्रीय सेमिनार में एग्रीकल्चरल ट्रांसफॉरमेशन एण्ड रूरल डेवलेपमेन्ट इन इण्डिया पर पर्चा पढते हुए बता रहे हैं कि किस तरह ग्रामीण क्षेत्रों की आय दोगुनी करने हेतु केन्द्र और राज्य के नीति निर्माताओं को अर्थ-नीति बनानी चाहिए जिससे युवाओं को कृषि की तरफ कृषि स्टार्ट अप के जरिये जोडा जा सके और शहरों के प्रति गाँवों के दबाव को कम किया जा सके।
इधर सुबह अखबार में खबर थी- गृहमंत्री ने पेश किया नागरिकता बिल, पडोसी देशों से पीडित हिन्दू सिख, ईसाई शरणार्थियों को मिलेगी नागरिकता।
पूरा दिन इधर उधर भटकने के बाद भी कंपनी के सुरक्षा-गॉर्ड ने उन्हें अंदर नहीं आने दिया। कंपनी गार्ड ने उन्हें डांट-डपट कर वहाँ से भगा दिया।
वे बेदखल थे, ताउम्र बेदखल रहे, पहले एक देश से, फिर एक गाँव से और अंत में कब्रिस्तान से भी बेदखल कर दिया गया।

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