fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

घर

जयशंकर
घ्आज कुछ ज्यादा पन्नों का अनुवाद कर पायी। नींद जल्दी खुली थी। होली के बाद की हल्की गर्मियों के दिन हैं। इन दिनों प्रसिद्ध अभिनेत्री हंसा वाडकर की आत्मकथा का अनुवाद कर रही हूँ। उनका जीवन अत्यंत कठिन बना रहा। उनके जीवन में अनेक उतार-चढाव आते रहे। इतना नाटकीय जीवन। इतनी आधी-अधूरी, अवसादों से भरी अबूझ और अमूर्त जिन्दगी। एक घर के लिए ऐसी ललक और लालसा।
भले ही कुछ कम लोगों ने लेकिन सदियों से कुछ लोगों ने अपना जीवन अपनी शर्तों पर जीने का, अपनी तरह से जीने का जोखिम जरूर उठाया है। मीता के इम्तहान करीब है। विजया अपने गाने की प्रैक्टिस में घर-बाहर के कामों में व्यस्त रहती है। ऐसा न होता तब इन दोनों के सामने अब तक किये गये अपने अनुवाद को पढ सकती थी। इन दोनों का मत मेरे लिए मददगार बन सकता था। मीता अपनी सैंडिल पहन रही है।
क्या कॉलेज जा रही हो, मैंने पूछा
अभी नहीं, बाबा की दवाइयाँ खत्म हो गयी हैं... ग्याराह बजे जाना है।
दुकानें खुल गई होंगी
दस बज रहे हैं, आजी
अभी तक धूप नहीं निकली क्या बाहर, बदली छायी हुई है।
सुबह-सुबह बारिश हुई थी, ढेर सारे आम नीचे पडे ह, रात में आँधी-तूफान रहा होगा। रात में तुम्हारी खिडकी बंद करनी पडी।
क्या होता जा रहा है मौसम को, गर्मियों में बार-बार बारिश हो रही है।
ग्लोबल वार्मिंग का समय है आजी।
मीता ने बाहर का गेट खोला है। प्रफुल्ल के कमरे से उसके खाँसते रहने की आवाजें आ रही हैं। विजया कॉफी के दो कप लिए आयी है। मेरी पलंग के सामने की कुर्सी पर बैठ गयी है।
इस अनुवाद के काम को निपटाना है।
क्या कुछ काम हो पाया?
आज दस पन्ने पूरे किए.... क्या रात में बारिश होती रही थी?
खूब ते*ा पानी गिरा.... प्रफुल्ल रात भर खाँसी से परेशान रहे...हमारा पीछे का आँगन आमों से भरा हुआ है।
ऋषि से कहो कि सारे आमों को एक जगह कर दे.. हम आस-पडौस के लोगों में बाँट देंगे।
वह दो दिनों से मुझसे बात ही नहीं कर रहा। कल रात भी देर से लौटा था। कल भी जनाब नशे में थे। उसकी गाडी को मीता ने अंदर किया... खाना भी नहीं खा रहा।
क्या होता जा रहा है इस लडके को।
आज शाम मेरा गाना है, थोडी-सी प्रेक्टिस करनी है। रात को आपसे कुछ जरूरी बात करनी है।
प्रफुल्ल को बता दिया है?
नहीं, उनको नहीं बताना है, मीता को मालूम है।
क्या बात है विजया
ऋषि बता रहा है.......
उसकी आँखों में गीलापन उतर आया है। प्रफुल्ल की लम्बी बीमारी ने उसे थका दिया है। साँवले चेहरे पर उतरी थकान साफ-साफ नजर आती है। हमारे घर में यह लडकी कभी भी सुख-चैन से नहीं रह पायी। इसकी नौकरी से ही घर चलता रहा। प्रफुल्ल चालीस की उम्र में एक दुर्घटना का शिकार हो गया। एक प्राइवेट फर्म में था। नौकरी चली गयी। थोडा-सा पैसा मिल गया। सोलह बरसों से घर में रह रहा है। बीच-बीच में बीमार हो जाता है। विजया की नौकरी न होती तो पता नहीं सबका क्या होता? मेरी पेंशन का थोडा-सा सहारा है। बीच-बीच में मुझे कुछ पैसे अनुवाद के काम के मिल जाते हैं। विजया को कभी-कभार अपने गाने का कुछ पैसा मिल जाता है। ऋषि की कानून की पढाई पूरी हुयी है। मीता मेडिकल कॉलेज में आखरी बरस में आयेगी।
मेरे बेटे और विजया के विवाह के शुरू के बरसों में भी विजया को समझने में भूल करती रही थी। मुझसे भी बडी-बडी भूलें हुई। धीरे-धीरे मैंने जानना शुरू किया कि मेरी बहू में कितनी ज्यादा सहनशीलता, कितनी ज्यादा कर्मठता रची-बसी है। अपने घर में ही वह बहुत ज्यादा मेहनती रही है। तेबीस-चौबीस की उम्र में अध्यापिका की हैसियत से काम करने लगी थी। हमारे यहाँ जब आई तब उसे सास-ससुर, देवर-ननदों के लिए बहुत कुछ करना पडा। प्रफुल्ल को नौकरी के सिलसिले में दूर-दराज के इलाकों में दौरे करने पडते और वे अकेले ही बच्चों की देखभाल करती रहती थीं। मैं अपने बीमार पति की देखभाल में, अपने दूसरे तीनों बच्चों की पढाई-लिखाई में, शादी-ब्याह और नौकरी से जुडी बातों में व्यस्त रहा करती थी। इस तरह विजया अपने पूरे परिवार के साथ-साथ, अपनी नौकरी को, अपने दोनों बच्चों की शिक्षा-दीक्षा की और अपने गाने को भी सम्हालती रही थी।
याद करती हूँ तो याद आता है कि हमारे परिवार के सभी लोगों ने, विजया को न जाने कितनी ही बार, कितना ज्यादा भला-बुरा कहा था। कभी-कभार वह नाराज भी हो जाती थी। प्रफुल्ल तक ने अलग हो जाने का फैसला कर लिया था लेकिन इसने किचन तक को अलग नहीं होने दिया। इसे पता था। अच्छी तरह से मालूम था कि घर के लोगों को एकसाथ रखना ही सबसे ज्यादा व्यावहारिक, सबके हित का निर्णय रहेगा। हमारा घर काफी पुराना लेकिन बहुत बडा है। चार-चार लोगों के पास अपना खुद का कमरा। बडा-सा आँगन। पीछे की जगह पर आम, जामुन और पपीते के पेड। मकान रास्ते पर नहीं है। गली के आखिरी छोर पर। शोरगुल कम रहता। धूल और धुँए से दूर। इस घर के ऐसे होने से ही प्रफुल्ल की फेफडों की तकलीफें बढी नहीं।
चालीस बरस की उम्र में उसका एक्सीडेंट हुआ। उसकी हड्डियों को जोडना पडा। अभी बिस्तर से उठ ही रहा था कि उसे तपेदिक ने अपनी दबोच में ले लिया। ऋषि और मीता नौ-दस बरस के रहे होंगे। उनके दादा गुजर गये। उनके चाचा नौकरी के लिए और उनकी दोनों बुआएँ शादी हो जाने से घर से बाहर जा चुकी थीं। मैं थी और विजया। इन दो छोटे-छोटे बच्चों के साथ।
विजया अपने गाने की प्रैक्टिस कर रही है। मुझे नहाकर अपने अनुवाद के काम को आगे बढाना होगा। अभी गर्मियाँ कम हैं। जब बढ जाएगी तब काम करना मुश्किल होगा। अब कूलर की हवा भाती नहीं है। पच्चहत्तर बरस की उम्र में, देह की तकलीफें, दिनों-दिन बढती ही जाती है। कभी आँखों में धुँधलापन उतर आता है। कभी घुटनों का दर्द चैन नहीं लेने देता। कभी दिन भर, बार-बार नींद आती है और कभी रातभर सोना नहीं हो पाता। मन भागता रहता है। शरीर थक जाता है।
कभी इसी जर्जर देह के भीतर कितनी ताकत हुआ करती थी। समूचे घर के इस्तेमाल के लिए पानी पब्लिक नल से भरना पडता था। पिता का घर किराये का था। दूसरी मंजिल पर। पडौस के स्कूल के नल से मैं अकेले ही पानी भरा करती थी।
अब वह देह कहाँ चली गयी है? कहाँ चला जाता है एक भरापूरा जीवन? हम क्यों धीरे-धीरे जीवन से दूर होते जाते हैं?
और कॉफी बना दूँ?
विजया पूछ रही थी।
नहीं, खाने के बाद। ऋषि कहाँ है, वह दाढी क्यों नहीं बना रहा।
अभी लौटा नहीं है। शाम को मीता मेरे साथ रहेगी कंसर्ट के बाद हमारा खाना भी वहीं है।
मंदाबाई को बता दिया है?
वह आज यहीं रहेगी। हमारे लौटने के बाद घर जाएगी। आप तीनों को खाना खिलाने के बाद।
अब अपना काम करती हूँ... खाने तक के वक्त में कुछ और पन्ने हो जाएँगे।
ज्यादा हलाकान होने की जरूरत नहीं।
जुलाई में गीता की कॉलेज की फीस भरनी होगी। यह रुपया काम आ जाएगा।
अब मैं अभिनेत्री हंसा बाडकर के जीवन के साथ हूँ। उनके जीवन की छोटी बडी तकलीफों, छोटी-छोटी खुशियों के साथ। इतना आधा-अधूरा, अमूर्त और अन्धेरा जीवन। तब की औरतों को क्या यही सब देखना सुनना पडता था? गाने-बजाने के काम को इतनी नीची नजर से देखा जाता था?
खिडकी से बाहर खूब सारी धूप नजर आ रही है और ढेर-सा उजाला भी। दूर से बादलों की गडगडाहट भी सुनायी दे रही। कल कडी धूप के बीच में बारिश होती रही। आधा आकाश किसी और रंग का और बाकी आधा किसी और रंग में। इतना और ऐसा अर्मूत आकाश बहुत कम बार देखा है। प्रफुल्ल की खाँसी थम ही नहीं रही है। मौसम बदलता है और उसकी परेशानी बढ जाती है। अपना थोडा-सा काम कर लूँ, फिर उसके पास आकर बैठूँगी।
वह ट्राँजिस्टर पर दुपहर की न्यूज सुन रहा है। मुझे देखते ही उसने ट्राँजिस्टर बंद कर दिया।
दवाइयाँ ले ली थी तुमने? मैंने पूछा
गीता देकर गयी थी, रात की बारिश का असर होगा.... आंधी चली थी।
नींद आई थी?
नहीं
क्या डॉक्टर को बताना पडेगा?
नहीं...नहीं...ऋषि की चिंता सता रही है। ...पता नहीं उसके मन में क्या चल रहा है। ।
मैंने एडवोकेट संन्याल से कहा है वे इसके लिए कोई न कोई इंतजाम कर ही देंगे।
नौकरी की बात नहीं है।
फिर क्या बात है?
मैंने चुफ से उसकी और विजया की बातें सुनी है।
क्या बात है।
वह एक शादीशुदा लडकी से प्रेम करने लगा है... उस लडकी की एक बच्ची भी है... अपनी माँ से उससे शादी करने की बात कह रहा था।
हे भगवान! विजया मुझसे यह बात कहना चाह रही है? मैंने सोचा। वह सब नहीं होगा तुम अपनी फिक्र करो... यह सब हम लोगों पर छोड दो।
विजया तुझे बताना नहीं चाहती होगी।
मीता को सब पता है। वह भी बहुत परेशान नजर आ रही है। ऋषि घर में खा नहीं रहा है।
ऋषि तुम्हारे पास कभी आता है?
बहुत ही कम.... उसे लगता है कि मैंने उसे बम्बई जाने नहीं दिया और .... उसे हमारी आर्थिक स्थिति का अनुमान ही नहीं है।
अब तुम आराम करो... खाना बन ही रहा है। मंदाबाई बना रही है।
तुम क्या कर रही हो आई?
अनुवाद का एक काम पूरा करना है।
कौन-सी किताब है?
हंसा वाडकर की आत्मकथा है।
मैंने इस किताब पर श्याम बेनेगल की फिल्म देखी है... स्मिता पाटिल भी उस शो में आयी थी।
मैंने भी देखी है। गजब का काम था स्मिता पाटिल का। ... वे एकदम निराली एक्ट्रेस थीं।
मुझे पढकर सुनाना... दिलचस्प जीवनी होगी।
ठीक है....अभी बहुत बाकी है।
आजकल ज्यादा काम नहीं कर पाती हूँ।
बाहर बादलों की गडगडाहट शुरू है। बीच-बीच में बिजली चमक जाती है। दीवार घडी में डेढ बजने को आ रहे हैं। यह घडी भी इस घर की सबसे पुरानी ची*ाों में से एक है। इसी घडी के नीचे मेरे ससुर आराम कुर्सी पर बैठे रहा करते थे। अब वह आरामकुर्सी प्रफुल्ल के कमरे में रहा करती है। मीता ही उसका सबसे ज्यादा उपयोग करती है। उस कुर्सी के साथ हमेशा रहने की कहा करती है।
मीता भी हमारे परिवार में एकदम अलग-सी नजर आती है। बहुत कम बोलती है। अपनी जिम्मेदारियों को समझती है। घर के काम में मदद करने के आद अपनी पढाई करती रहती है। ऋषि नहीं, मीता इस घर का बडा सहारा है। कुछ दिन पहले की बात है, वह मेरे लिए कॉफी तैयार कर मुझे देने आयी थी।
तुम ठीक से तैयार क्यों नहीं होती। मैंने पूछा था।
और कैसे तैयार हुआ जाता है? वह हँसने लगी।
कॉलेज के लोग क्या सोचते होंगे?
मैं नहीं जानती, जानना भी नहीं चाहती।
वह मुस्कुराते हुए मेरे कमरे से बाहर निकली थी।
मीता इन गर्मियों में चौबीस बरस की हो जाएगी। ऋषि से दो बरस ही छोटी है। कम से कम खर्च में अपना जीवन गुजारती है। मुझसे उसने कभी भी पैसे नहीं माँगें हैं। ऋषि जरूर मुझसे पैसे लेता रहता है। ऋषि मीता तक से पैसे माँगता है।
तुम्हारा मन नहीं करता है या तुम हम पर बोझ बढाना नहीं बनना चाहती हो?
दोनों ही बातें हैं- आई... कितना ज्यादा काम करती हैं। आप लोग इतना पढा रहे हैं यह क्या कोई कम बडी बात है... मुझे ज्यादा तडक-भडक अच्छी भी नहीं लगती है।
सोचती हूँ कि वह सब कैसे होता होगा, क्यों होता होगा कि परिवार में कोई न कोई, कभी न कभी एक ऐसा आदमी चला आता है जो मानवीय स्थिति को अच्छी तरह से लेता है, ठीक ढंग से देखने समझने लगता है। मेरे अपने चारों बच्चों में यह कमी बनी ही रही कि उनको हमारी आर्थिक हालत का जरा-सा भी अनुमान नहीं रहा। अब भी उनके बीच इस घर को बेचने, उसकी राशि को चारों में बाँटे जाने की बातें होती ही रहती है। विजया और मीता ही है जो ऐसा होने नहीं दे रहे हैं, ताकि पुरखों का घर बना रहें। पुरखों की यादें बनी रहे।
काका इस घर में रहने आ सकते हैं। मीता कहती है।
हम इसके तीन कमरों को उनके लिए खाली कर देंगे। विजया का कहना है।
प्रफुल्ल और ऋषि को इसकी जमीन की कीमत का ध्यान रहता है। बाजार के करीब है। बहुत अच्छे दाम मिल जाएँगे। मेरा छोटा बेटा और मेरी दोनों बेटियाँ भी यही बात कह रही हैं। समझ में नहीं आता कि मेरे मरने के बाद इस घर का क्या होगा?
पचास से भी ज्यादा बरस हो गये, जब इस घर में पहली बार अपने कदम रखे थे। तब यह जगत इतनी आबाद नहीं थी। बहुत पुराना पिछली सदी का कैथेड्रल वहीं खडा हुआ था। एक लम्बे-चौडे मैदान के बीचो-बीच। कैथेड्रल की मोथिक शैली की इमारत को जाते रास्ते के दोनों तरफ नीलगिरी के पेडों की कतारें खडी थी। लिबर्टी थिएटर बाद में बना। उसके बाद ही सदर बाजार बसा। माउंट होटल बनी। उन दिनों यहाँ जंगल-सा वातावरण फैला रहता। झाडियों से नेवले बाहर आते रहते। पेडों पर गिलहरियाँ चढती-उतरती रहतीं। रात की निर्जनता को अराजक-सा अँधेरा घेरे खडा रहता।
तुम अकेले गई थी? मेरी सास पूछती
आम की फलियाँ लानी थी। मैं जवाब देती।
अब कभी मत जाना। पडौस में ही इमली का पेड है उसके पास जवान लडकियाँ नहीं जाती।
उससे क्या होता है?
ऐसी जगह भूत-प्रेत रहते हैं। चुडैलें घूमती हैं।
आपने देखा है?
नहीं... तुम्हारे बाबा उस भूत के ताँगे में बैठे थे... किसी तरह बच गये थे।
मुझे हँसी आ गयी थी। प्रफुल्ल के पिता ने बुरी तरह डाँटा था। वह बडों का मजाक था। वह भी एक ऐसी औरत का जिसका पूरे घर पर दबदबा था। प्रफुल्ल के पिता भी कुछ नहीं करते थे। मेरी सास के घर में खेती-बाडी थी। शहर के एक हिस्से में उनके कुछ मकान थे, जिनका किराया मेरी सास के पास आता रहा था। मेरी सास के सामने मेरी एक भी नहीं चली। मैं कॉलेज की शिक्षा लेने के बाद इस घर में आयी थी। वह कभी भी स्कूल नहीं गयी। इतना जरूर रहा कि उनके रहने से ही यह घर घर बना रहा। वे गयीं और वह घर टूटता-बिखरता चला गया। इस पर अभावों का आसमान मंडराने लगा। यहाँ के बगीचे की रौनक जाती रही, यहाँ के आँगनों की घास सूखती चली गई।
पोस्टमैन एक रजिस्ट्री दे रहा है। मंदाबाई बोली।
किसके नाम है? मैंने पूछा
ऋषि भैया के लिए।
वह कहाँ है?
घर में नहीं है।
पोस्टमैन ने मुझे सलाम किया है। कभी-कभार मेरे नाम की डाक ही आती है। पत्र इसी शहर से आया है। श्रीमती अदिति ने भेजा है। ऋषि की मेज पर रख दिया है।
मेरा और प्र*फुल्ल का खाना डाइनिंग टेबल पर रखा है। मंदाबाई ताजी रोटियाँ सेक रही है। खिचडी भी बनी है आज।
आज विजया का गाना है। प्रफुल्ल कह रहा है।
तुम्हारा मन हो तो जाओ। मैंने कहा।
खाँसी परेशान कर रही है। तुम क्यों नहीं चली जाती। तुम बाहर ही नहीं निकल रही हो।
चलना नहीं होगा....लाइब्रेरी की सीढियों पर चढना होगा... वहाँ लिफ्ट नहीं है।
मैं सुबह उसकी प्रैक्टिस सुन रही थी अब भी उसकी आवाज अच्छी लगती है ।
ऋषि के कारण बेचैन रह रही हैं।
ऋषि ने खाना खाया?
वह दो-तीन दिनों से बाहर खा रहा है। मंदाबाई ने कहा।
विजया के साजिन्दे आये हुए हैं। उनको विदा कर वह डाइनिंग टेबल पर आएगी मीता को भी कॉलेज से लौटना ही है। बाहर की धूप के बीच बादल गडगडा उठते हैं। मार्च के आखिरी-आखिरी दिनों में रोज ही होती बारिश। इन मौसमों को क्या हो रहा है। कभी मीता से जानना होगा कि यह ग्लोबल वार्मिग क्या बला है?
तुम इतना कुछ क्यों जानना चाहती हो? मीता ने पूछा था।
यह जिज्ञासा ही तो बडी ची*ा है।
तुम ठीक कह रही हो आजी... हमारे यहाँ की लेबोरेटरी की दीवार पर यह लिखा है कि Never lose a holy Curiosity
कितना अच्छा विचार है। मैंने कहा था।
अल्बर्ट आइंस्टीन का है।
हमारा दुपहर का खाना हो चुका है। ऋषि और मीता भी डाइनिंग टेबल पर खाते हुए दिखे थे। प्रफुल्ल और विजया अपने कमरे में आराम कर रहे हैं। मंदाबाई घर गई है। अपने बच्चों को दुपहर का खाना खिलाने के लिए। उसका आदमी एक लॉड्री में काम करता है। अभी खाने के लिए घर आया होगा। मामूली लोगों को सिर्फ जीते रहने के लिए कितनी ज्यादा मेहनत करनी पडती है। ऋषि यह सब क्यों नहीं देखता? उसे जीना इतना सरल काम क्यों महसूस होता है? छब्बीस का हो गया है। नौकरी का कोई ठिकाना नहीं। बाप बीमार है। माँ पर पूरे घर का बोझ आया हुआ है। उस पर वह किसी शादीशुदा लडकी से शादी करना चाह रहा है। उससे घर की और परेशानियाँ बढ सकती हैं। शाम को उसे अपने पास बुलाती हूँ। प्रफुल्ल भी साथ रहेगा। हम दोनों उसे अच्छी तरह समझाएँगे। कुछ देर की नींद ले लेती हूँ। फिर अनुवाद का अपना काम आगे बढाऊँगी।
प्रफुल्ल के कमरे से बहुत धीमी आवाज में बाँसुरी, गिटार और संतूर से बजती एक धुन आ रही है। वह ट्राँजिस्टर सुन रहा होगा। शायद कोई पहाडी धुन है। सुनी-सुनी-सी जान पडती है। क्या Call of the Valley बज रहा है। ऋषि को एडवोकेट संन्याल की मदद से कोई पार्ट टाईम जॉब मिल ही जाएगा। वे किसी वकील के पास भी सहायक के रूप में भेज सकते हैं। शायद अपनी फर्म में ही कोई जगह दे दें। हमारे घर से उनकी पुरानी पहचान है। इस लडके का कुछ हो जाए, तो मीता के ब्याह के लिए भी कोशिशें शुरू करनी होंगी। अगला साल उसका फाइनल इयर होगा। तब तक पच्चीस की हो ही जाएगी। मेरा और अपनी माँ का बडा सहारा हो जाएगी।
मैं पच्चीस की उम्र में दो बच्चों की माँ बन चुकी थी। जब दूसरी को आने में तीन-चार महीने बचे थे तभी मसूरी जाना हुआ। वह जगह कितनी खुली-खुली, सुन्दर और साफ सुथरी थी। एक शाम हम मसूरी के नजदीक एक गाँव में भी गये थे। प्रफुल्ल के कमरे से आती धुन खींच रही है। कोई पहाडी धुन ही होगी। बांसुरी पर कोई कमाल कर रहा है। दुपहर की इस घडी में घर में कितनी शांति है। ऋषि कहाँ होगा? क्या कर रहा होगा? मीता ने उसे खाना खाने के लिए मना लिया होगा। अपने भाई का बहुत ख्याल रखती है। अपने पास के पैसे भी उसे दे देती है। पेट्रोल यह भराती है और गाडी वह चलाता है। कभी-कभार मीता को बस से भी जाना पडता है। बेचारी।
ट्राँजिस्टर से आती धुन मसूरी के आसपास की उस ग्रामीण शाम को मेरे और करीब ले आ रही है। मेरे अपने लम्बे जीवन की एक यादगार शाम। पहाड पर खडे हुए घर पर घर। क्या अपने इस जीवन में मसूरी की सर्दियों की उस शाम में, उन पहाडी घरों और लोगों के पास फिर से दुबारा जाना हो सकेगा?
अब मेरे जीवन के और कितने साल बचे होंगे। कभी भी बुलावा आ सकता है। मैं बिना बीमार हुए, बिना किसी पर बोझ बने, इस दुनिया से विदा लेना चाह रही हूँ। मेरे चाहने भर से क्या होता है? सब उसकी मरजी पर है। हंसा बाडकर ने भी तो जीवन में सिर्फ एक घर, एक अपना, अपना-सा घर ही तो चाहा था। इतनी कडी मेहनत ऐसी समर्पित जिंदगी जीने के बाद भी क्या उसे वह घर मिला था जिसकी आकांक्षा लिए हुए वह जीवन भर बेचैन बनी रही थी।
मैं सौभाग्यशाली रही। अपने घर में बनी रही। जितना बन सका उतना अपने घर को बनाती रही। अपने बच्चों को अपने ही घर में, अपने सामने बडा किया। उन सबको पढाया-लिखाया। अब वे सब अपने-अपने घरों में हैं। मैं अपने घर में। भगवान की दया से भली-चंगी ही हूँ। बिस्तर पर समय नहीं बिता रही। प्रफुल्ल की तरह दीवारों और छत को ताकते हुए अपना दिन और रात गुजारनी नहीं पडती। अभी भी पढ पाती हूँ, सुन पाती हूँ। सुबह विजया जिस राग की प्रैक्टिस कर रही थी वह मारू बिहाग था। इस समय ट्राँजिस्टर से जो धुन आ रही है वह पहाडी धुन है। मुझ पर किसी के आशीर्वाद का साया है कि मैं अपना जीवन अच्छी तरह से, बिना शिकायतों के जी सक रही हूँ।
खिडकी से नजर आता आकाश का टुकडा बादलों के कारण, अमूर्त-सा जान पड रहा है।
सम्पर्क : ४१९, पी.के. साल्वे रोड,
मोहन नगर, नागपुर-४४०००१
मो. ९४२१८०००७१