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पूनम दईया : तेरे, मेरे, सबके

विश्वनाथ सचदेव
साठ-बासठ की बात है। तब मैं बीकानेर के डूँगर कॉलेज में पढता था। इंटर में था मैं। तभी कविताई की लत् लगी थी। दोष संगत का था जो कॉलेज में मिली थी। संगत यानी हरीश भादानी, श्रीकृष्ण बिश्नाई, भीम पाण्ड्या, यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र, प्रेम सक्सेना.... और पूनम दईया। ये सब उम्र में मुझसे बडे थे। कुछ कम बडे और कुछ ज्यादा बडे। लेखन की दुनिया तो सब कहीं आगे थे। कहीं यानी बहुत आगे। बस आखिरी नाम जो मैंने गिनाया पूनम दईया का वह तीन-चार साल ही बडे होंगे मुझसे। उनकी खासियत यह थी कि वे कविता, कहानी कुछ नहीं लिखते थे। बस बैठते थे उन सबके साथ जो साहित्य की दुनिया में अपनी जगह बनाने के लिए उत्सुक थे। शायद इसीलिए पूनमजी से मेरी पटती थी। उम्र में मुझसे कुछ बडे थे, इसलिए मैं उन्हें पूनमजी कहता था और वे मुझे काका। काका यानी चाचा नहीं, पंजाबी वाला काका। पंजाबी में बच्चे को काका कहते हैं। बीकानेर की इस साहित्य वाली टोली में मैं सबसे छोटा था। इसलिए कुछ ज्यादा ही लाड होता था मेरा। पूनमजी कुछ जब मुझे काका कहते, तो यही वाला भाव होता था उसमें। इसलिए भी अच्छे लगते थे वे मुझे। और यह भी उनकी खासियत थी कि वे अपना बडे होने वाला भाव कभी जताते नहीं थे। सबके लिए एक स्नेह-भरा सम्मान था उनके पास। उनकी विनम्रता छोटे-बडे सबको आकर्षित करती थी।
कॉलज में पूनमजी मेरे बडे भाई के ज्यादा नजदीक थे। एकाध साल पीछे होंगे मेरे जगदीश भैया से। पूनम दईया से जी वाला रिश्ता शायद इसलिए भी बना होगा मेरा।
मैं नहीं जानता क्यों, पर पूनमजी ज्यादा ही सम्मान देते थे दूसरों को। कभी-कभी तो मैं कुछ खीजकर उनसे कहता भी था कि इतना विनम्र होने की जरूरत नहीं है। पर वे हँस देते थे मेरी बात सुनकर।
मैं उनकी पारिवारिक स्थिति के बारे में भी कुछ खास नहीं जानता था। बस यह पता था कि उनका परिवार दर्जी के पेशे में था। शायद इसलिए भी पूनमजी को शौक था कपडे करीने से पहनने का। बढिया प्रेस किया हुआ कपडा पहनते थे वे हमेशा। अच्छा पहनना, अच्छा दिखना उनकी आदत में शुमार था।
एक साहित्यिक संस्था थी बीकानेर में हमारी। साहित्यालोक। मासिक या पाक्षिक गोष्ठी किया करते थे हम। यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र जैसे नामी लेखक से लेकर लेखन से जुडने की तमन्ना वाले विश्वनाथ तक के लिए उसमें जगह थी। कभी-कभी तो डॉ. छगन मोहता जैसे विद्वान भी आ जाते थे साहित्यालोक की गोष्ठी में, मार्ग-दर्शन के लिए। राजानन्द, प्रेम बहादुर सक्सेना, योगेन्द्र किसलय, मंगल सक्सेना आदि सब साहित्यालोक के माध्यम से जुडे हुए थे। इन सबको जोडे रखने में पूनमजी की सक्रियता का बहुत बडा हाथ था। वे कविता-कहानी वगैरह कुछ नहीं सुनाते थे गोष्ठियों में। पर बहुत अच्छे श्रोता थे वे। अपनी तरफ से आगे बढ कर टिप्पणी करने की भी उनकी आदत नहीं थी। पर इस संदर्भ में उनकी राय होती बडी पुखता थी। जब भी बोलते थे, तौलकर बोलते थे। वजनदार। इसलिए सब से पट जाती थी उनकी। मैं जब तक बीकानेर में रहा, उनसे खूब पटी मेरी। १९६४ में मैंने बीकानेर छोड दिया था। अंग्रेजी साहित्य में एम.ए.करने के लिए मैं जयपुर चला गया था। वहाँ से फिर नागपुर पत्रकारिता की पढाई के लिए, और फिर बम्बई (अब मुम्बई) जीविका के लिए। मैंने बीकानेर भले ही छोड दिया था, पर बीकानेर ने मुझे कभी नहीं छोडा। इस बात का श्रेय कामरेड हरीश भादानी और पूनम दईया जैसे मित्रों को ही जाता है।
हम सबने मिलकर एक साहित्यिक पत्रिका प्रकाशित की थी- वातायन। शुरूआत तो इसकी त्रैमासिक पत्रिका के रूप में हुई थी, पर दो साल बाद ही इसे मासिक कर दिया गया था। पूनमजी इस पत्रिका से लगातार जुडे रहे और इसी पत्रिका ने मुझे लगातार बीकानेर से जोडे रखा। शुरूआती दौर में मुझे वातायन का सम्पादक बनाया गया था, पर मेरे बीकानेर छोडने के बाद हरीश भादानी का साथ देने वालों में पूनमजी सबसे आगे थे। सम्पादन और प्रबंधन दोनों में उन्होंने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। इस बीच एम.ए. करने के बाद उन्होंने डाक्टरेट भी कर ली थी। राजस्थान के बात साहित्य पर किया गया उनका शोध कार्य शायद अपनी तरह का अकेला है। मुझे लगता है राजस्थान साहित्य अकादमी का उन्हें अध्यक्ष बनाये जाने में उनके इस शोध-कार्य की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही होगी। उतनी ही महत्त्वपूर्ण रही होगी जितनी साहित्य में उनकी गहरी समझ की।
मैं नहीं जानता जब उन्हें राजस्थान साहित्य अकादमी का अध्यक्ष बनाया गया, तो उनके चेहरे पर कैसे भाव थे, पर इतना जरूर जानता हूँ कि वैसे तो नहीं होंगे जैसे तब थे जब वातायन का पहला अंक हमारे हाथ में आया था। हमारे यानी पूनमजी और मेरे। उस दिन हम दोनों ही गये थे प्रेस में। वातायन के प्रवेशांक की प्रतियाँ लेकर हम बाहर निकले, तो हमारे कदम जैसे जमीन पर नहीं पड रहे थे। पूनमजी के चेहरे पर हमने कुछ कर लिया और हमने कुछ पा लिया का भाव मैं आसानी से पढ पा रहा था। निश्चित ही यही भाव वो मेरे चेहरे पर भी पढ रहे होंगे। वहाँ से हम सीधे डागा बिल्डिग पहुँचे थे, जहाँ हमारे मुखिया हरीश भादानी समेत वातायान के साथी कर्ता-धर्ता हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे। हमारी नहीं, वातायन की।
पाँच डागा बिल्डिंग अर्थात् बीकानेर की एक मुख्य रोड के.ई.एम. रोड पर स्थित एक प्रभावी आकार वाली बिल्डिंग के एक हिस्से का डाक का पता। वही वातायन का डाक का पता था (हम सब का एक ठिकाना। पूनमजी अक्सर वहीं मिला करते थे।) कभी माणकचंद सुराणा जैसे वकील से समाजवाद के प्रश्न पर उलझते हुए और कभी हरीश भादानी जैसे कवि को कुछ व्यावहारिक बनने का उपदेश देते हुए। वैसे, जहाँ तक व्यवहारिक होने का सवाल है, स्वयं पूनमजी इसका कोई आज का उदाहरण नहीं थे। बाद में तो पूनम दईया प्राध्यापक बन गये थे, आर्थिक स्थिति भी ठीक हो गयी होगी, पर बीकानेर में उन दिनों तक उन्हें खर्च करते समय काफी सोचना पडता था। फिजूलखर्ची उन्हें पसंद नहीं थी, कमखर्ची अपनी आदत बन गयी थी। पर यह उनकी व्यावहारिकता का कम, विवशता का उदाहरण ज्यादा था। पर उनकी इस आदत से वातायन का बहुत लाभ हुआ था।
वातायन की शुरुआत चार लोगों की पूँजी से हुई थी। हरीश भादानी, सीता भटनागर, पूनज दईया और विश्वनाथ ने डेढ-डेढ सौ रूपये डालकर वातायन की नींव रखी थी। इस तरह कुल छह सौ रुपये से शुरुआत हुई थी वातायन की। इसमें भी डेढ सौ रुपये रसीद बुक, पोस्ट कार्ड, लेटर हैड आदि छपवाने में खर्च हो गए थे। पर रसीद बुक का बडा लाभ मिला। पाँच रूपये सालाना चंदा था वातायन का और पूनम दईया और मैं शुरुआती दिनों में रोज रसीद बुक लेकर निकल पडते थे। बाद में तो लोग जुडते गये और कारवाँ बनता गया। हम लोगों ने तब छह सौ ग्राहक बना लिए थे वातायन का पहला अंक निकलने से पहले। हमारे सभी दोस्त, दोस्तों के दोस्त और उनके भी दोस्त.... शायद ही कोई बचा था ग्राहक बनने से। इस काम में पूनमजी की भूमिका वैसे थी संभाल कर रखने की थी। वे खजांची नहीं थे। कोषाध्यक्ष थे। उनकी एक विशेषता यह भी थी कि जब किसी काम के लिए पैसे नहीं देने होते थे तो वो प्यारी-सी मुस्कान देकर बात को टालने की कला जानते थे।
उनकी यही कला या विशेषता उन्हें पूनमजी भी बनाती थी। मुझे हमेशा यह लगा है कि पूनमजी जो और जैसे दिखते थे, मुझसे कहीं ज्यादा बडे थे वो। आइसबर्ग की तरह जो एक तिहाई ऊपर दिखता है और दो तिहाई पानी के नीचे होता है। आइसबर्ग का एक गुण और थी था उनमें- बर्फ की तरह ठण्डे थे वे। मुझे याद नहीं पडता मैंने उन्हें कभी गुस्से में देखा हो। ऐसा तो हो नहीं सकता कि उन्हें गुस्सा कभी आता नहीं होगा, पर शायद वे अच्छी तरह जानते थे कि गुस्से को छिपाया कैसे जाता है। मजे की बात है कि उनके गुस्से का पता भी उनकी मुस्कान से लगता था। ऐसे में उनकी सहज मुस्कान कुछ न कर पाने वाली विडम्बना को उजागर करने वाली होती थी और सम्मानित व्यक्ति उनके बिना कुछ कहे ही सब कुछ समझ जाता था।
वे दिखावा नहीं करते थे, और दूसरों का दिखावा करना उन्हें पसंद नहीं था। किसी से अपनी निकटता जता कर अपना कद बडा समझने या करने की आवश्यकता उन्हें कभी नहीं पडी। मुझे याद है एकबार बच्चनजी बीकानेर आये थे। डूँगर कॉलेज की हिन्दी पत्रिका की ओर से उन्हें कविता-पाठ के लिए आमंत्रित किया गया था। डूँगर कॉलेज और बीकानेर, दोनों के लिए यह बडी घटना थी। समिति के सचिव के नाते आयोजन का भार मेरे कंधों पर था, पर बोझ उठाने वालों में पूनमजी जैसे मेरे कई दोस्त थे। हर कोई जिसे उस दौरान बच्चनजी क कुछ भी नजदीक जाने का मौका मिला, वह कॉलर ऊँचा किये घूम रहा था। पूनमजी को इन सबकी चुटकी लेने में बडा मजा आता था। उन्होंने ऐसे लोगों के लिए एक शब्दा गढा था- मैं बच्चन। उस आयोजन के अर्से बाद तक अपनी शान बघारने वालों को वे मैं बच्चन कहा करते थे। जिन्हें ऐसा कहा जाता था वे भले ही इसका मतलब न समझ पाते हों, पर पूनमजी के मेरे जैसे दोस्त इसका बडा मजा लेते थे। आदरणीय बच्चनजी को तो यह अंदाजा भी नहीं हुआ होगा कि उनके नाम के साथ इस तरह का भाव भी जुड सकता है। डॉ. हरिवंशराय बच्चन अपने स्नेहिल व्यवहार और विनम्रता के लिए जाने जाते थे। उनके साथ किसी भी रूप में जुडना किसी के लिए भी गौरव की बात होती। इसलिए मैं उन्हें कोई दोष नहीं देता जो बच्चन जी के सम्फ में आते के बाद अपनी कॉलर ऊँची करके चल रहे थे। पर पूनमजी ने ऐसे लोगों की जो चुटकी ली, वह उनके सब दोस्तों के लिए अर्से तक मनोरंजन का माध्यम बनी रही थी। चुटकी लेने वाली पूमनजी की यह विशेषता उनके निकट के लोग ही जानते हैं।
मैंने पहले पूनमजी की तौल कर बोलने की बात कही थी। यह चुटकी वाला प्रकरण इसका भी एक अदाहरण है। साहित्यालोक की गोष्ठियों में भी कम बोलने वाला यह सजग श्रोता अक्सर अपनी सारगर्भित टिप्पणियों से माहौल हल्का कर देता था। सिर पर बोझा लादकर चलना उन्हें पसंद नहीं था। यह भी कट जायेगा वाला भाव लेकर जीते थे वे। जीवन के सारे उतार-चढावों को उन्होंने इसी भाव से समझा, इसी भाव से जिया।
लोगों के नाम भूल जाने की पुरानी बीमारी है मुझे। मुझे याद है जब भी पूनमजी के साथ मैं उनके किसी अपरिचित से मिलता था और उनका परिचय उनसे नहीं करवाता था, तो वे समझ जाते थे, इसे नाम याद नहीं आ रहा है। ऐसे में वो आगे बढकर हाथ बढाते हुए कहते थे मैं पूनम दईया, आपका शुभ नाम? उन्हें नाम पता चल जाता था, मुझे नाम याद आ जाता था। उस व्यक्ति के जाने के बाद पूनमजी बडी प्यारी मुस्कान देते हुए आँखों ही आँखों में पूछते थे कैसी रही?
आज मेरा मन हो रहा है, पूनमजी से पूछूं, कैसी रही? मजेदार थी न हमारी वह बीकानेर वाली जिन्दगी, वे वातायन के दिन वह राजस्थानी बातां वाली अदा? उनसे पूछने का मन तो यह भी कर रहा है कि जब वे प्राध्यापक बन गए थे तो क्या सचमुख पैंतालीस मिनट का लैक्चर देते थे? बोलते-बोलते रूक नहीं जाते थे बीच में यह सोचकर कि ज्यादा बोल गये?
यदि मेरा लिखा यह लेख वे पढते तो जरूर कहते, काका कुछ ज्यादा ही बोल गये हो तुम।
और मैं कहता नहीं, पूनमजी, बोलना तो और भी बहुत कुछ चाहिए था....

सम्पर्क : एम-801, पंचशील गार्डन,
महावीर नगर, कांदीवली,
वेस्ट मुम्बई - ४०००६
मो. ९८२१०४६३१६