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प्रभाकर माचवे : सबका घर

रामदरश मिश्र
अपने छात्र जीवन में ही मैं डॉ. प्रभाकर माचवे के नाम से परिचित हो चुका था। तार-सप्तक के कवि के रूप में तो वे जाने ही जाने लगे थे, हम लोगों के बीच एक अहिंदी भाषी विद्वान और आलोचक के रूप में विख्यात थे। सन् याद नहीं किंतु इतना तो याद है कि बीएचयू में डॉ. करवरकर द्वारा संचालित साहित्य सहकार नामक संस्था के विशेष अधिवेशन में उन्हें पहली बार देखा था। उन्होंने भाषण भी दिया था और कविताएँ भी सुनाई थीं। उनके व्यक्तित्व में एक खुरदुरी ऊर्जा थी। और वही ऊर्जा उनकी भाषा और कविता में थी। उनकी कविताओं में एक अलग प्रकार का स्वाद मिला। सन् 1951 में मेरा काव्य संग्रह पथ के गीत प्रकाशित हुआ। यह मेरा सौभाग्य था कि उस पहले संग्रह पर स्वभावतः ही कई समीक्षाएँ आईं, किंतु सबसे बडा सौभाग्य यह था कि उसकी समीक्षा प्रतीक में छपी और समीक्षक थे प्रभाकर माचवे । उन्होंने मेरे कई ताजा गीतों की प्रशंसा करते हुए यह भी कहा कि ऐसी अच्छी कविताएँ लिखने वाला कवि...... की चाशनी भरी शैली में गीत क्यों लिखता है? उस समय मुझे थोडा बुरा तो लगा, लेकिन बाद में मुझे महसूस हुआ कि सचमुच वे ही गीत अच्छे हैं जिनकी प्रशंसा माचवे जी ने की थी। सन् 1964 में दिल्ली में आने के बाद डॉ. माचवे के निकट संफ में आया। ज्यों-ज्यों उनके संफ में आया, उनकी वत्सलता को अनुभव किया। उनके परिवार में बैठकर एक सुसंस्कृत परिवार में बैठने और कुछ समय जी लेने का अनुभव होता था। विचारों और साहित्यिक चेतना में इतने नए डॉ. माचवे के जीवन और परिवार में अद्भुत सादगी और सात्विकता की व्याप्ति दिखाई पडती थी। उनकी धर्मपत्नी भारतीय गृहिणी की उदारता और स्नेह की प्रतिमूर्ति मालूम पडती थी। इस परिवार में मैंने कई आवश्यकता ग्रस्त साहित्यकारों के लिए सक्रिय स्नेह बरसते देखा था।
माचवे जी ने कइयों को नौकरियाँ दिलवाई। वे अंकुठ भाव से बल्कि प्रगाढ स्नेह से नए साहित्यकारों को सुनते चुनते थे और अपनाते थे। वे कई भाषाओं के ज्ञाता थे। साहित्य के ज्ञान दर्शन और धर्म के पंडित थे।
जब मैं दिल्ली आया, तो अनुभव किया कि अनेक नए कवि उनके यहाँ जाते थे। प्रायः वहाँ गोष्ठियाँ होती थीं। और डॉ. माचवे का घर सबको अपना घर लगता था। मैं भी वहाँ बार-बार जाया करता था। एक बार मैंने डॉ. माचवे को अपने घर आमंत्रित किया। सहज भाव से आ गए। उनके साथ ही मोहल्ले के एक और कवि को आमंत्रित किया था। माचवे जी पहले आ गए थे और मोहल्ले के कवि कहीं अटक गए थे। खाना ठंडा हो रहा था और मैं दोहरे संकोच में दबा जा रहा था। एक तो यह कि अच्छा भला खाना ठंडा हो रहा है, दूसरे यह कि माचवे जी मेरे साथ उस दूसरे व्यक्ति की प्रतीक्षा कर रहे हैं। पर माचवे जी के चेहरे पर कोई शिकायत के भाव रेखा उदित नहीं हुई। वे सहज भाव से बतियाते रहे। और वे भी आतिथेय बनकर मेरे साथ मोहल्ले के अतिथि का इंतजार करते रहे।
डॉ. माचवे की कार्य पद्धति की विशेषता अनुकरणीय थी। वह है समय पर कार्य संपन्न करने की चुस्ती। माचवे जी अहमदाबाद गए हुए थे। वे गुजराती के प्रख्यात साहित्यकार उमाशंकर जोशी के यहाँ ठहरे थे। और मिलते ही मेरे नव प्रकाशित उपन्यास पानी के प्राचीर की बात छेड दी। मुझे अच्छा लगा। मेरे यहाँ एक गोष्ठी हुई उसमें खान-पान उमाशंकर जोशी के साथ माचवे जी भी मेरे घर आए थे।
अतः दिल्ली आने पर उनके आत्मीय परिवृत्त में आने में मुझे कठिनाई नहीं हुई। पिछला सूत्र पकडकर उनसे आग्रह कर बैठा कि पानी के प्राचीर पर आप एक समीक्षा लिख देते। उन्होंने पूछ लिया इसके लिए कितना समय दे रहे हैं? मैंने कहा- एक सप्ताह का। सात दिन बाद एक कवि- गोष्ठी थी। प्रभाकर माचवे वहाँ आए और जेब से निकालकर पाँच पृष्ठों की समीक्षा पकडा दी। मैं बहुत प्रफुल्लित हुआ। उन्होंने लिखा था कि पानी के प्राचीर तगडी कृति है। बलचननामा और मैला आंचल की तरह इसका विज्ञापन नहीं हुआ, पर यह तगडी कलाकृति है।
उन्होंने बिना किसी छिपाव-दुराव के डंके की चोट पर यह बात कह दी। एक बार हमें साथ-साथ हरिद्वार जाना पडा। वहाँ कमलकांत बुधकर ने एक द्विदिवसीय साहित्यिक आयोजन रखा था। हम दोनों साथ गए और साथ रहे। मैंने अनुभव किया कि डॉ. माचवे का साथ बहुत सुखद है। वे हंसते-हंसाते रहे और हर समय मेरी सुविधा का ख्याल रखते रहे। हम लोग वर्षा में भीगते हुए ऋषिकेश गए, घूमे-घामे, खाए-पीए, फोटो खिंचवाई। डॉ. माचवे की एक विशेषता थी कि बातचीत के सहज लहजे में बडी से बडी बात कह देते थे। मेरे संपादन में नवान्र नामक एक नई पत्रिका निकलने जा रही थी। पहला अंक कवितांक था। मैंने अनेक कवियों से कविताएँ माँगी, किंतु जिस तत्परता और सहजता से डॉ. माचवे ने कविताएँ भेजी, वह दुर्लभ है।
एक मनोरंजक प्रसंग याद आ रहा है। डॉ. माचवे आगरा विश्वविद्यालय के एक इंस्टीट्यूट में विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में गए हुए थे। ठहरे थे इंस्टीट्यूट के निदेशक डॉ. विद्यानिवास मिश्र के यहाँ मैं भी पहुँच गया। साहित्य की चर्चा चली तो हँसी मजाक का दौर भी शुरू हुआ। बात-बात पे यह बात आई कि नागार्जुन शमशेर और त्रिलोचन, निराला बनने की राह पर थे। माचवे जी ने कहा हां! बन नहीं सके। ये बार्डर केस है। इस पर हँसी फूट पडी।
माचवे जी की प्रतिभा बहुआयामी थी। वे कवि थे, उपन्यासकार थे, निबंधकार थे, चित्रकार थे, प्रवृत्तियों पर व्यंग्य करने वाले मस्तमौला व्यंग्यकार थे। उनकी कविताएँ तार सप्तक में संकलित हैं। स्वप्नभंग पुस्तक में सौ सॉनेट हैं। अनुभाग पैसठ कविताओं का संग्रह है जिसमें विविध शैलियों का प्रयोग किया गया है। मेपल उनका प्रभावशाली काव्य संग्रह है। तेल की पकौडियाँ कविता संग्रह में छद्मवादी शैलियों पर व्यंग्य किया गया है। विश्वकर्मा में मिथकीय कथा है। उनके उपन्यास सांचा में मजदूर नेताओं के दो चितापन चित्रित हैं। वे छाया में परिप्यक्त नारी की पीडा है। परंतु उपन्यास में सामाजिक समस्या उठाई गई है। जो उपन्यास में नीग्रो सत्याग्रहियों का आंदोलन रूपायित है। किस लिए उपन्यास में तीन पीढियाँ विराजमान हैं। निबंध के क्षेत्र में भी माचवे जी की अपनी विशिष्ट जगह है। खरगोश के सींग निबंध-संग्रह में संग्रहीत निबंध डॉ. माचवे की प्रतिभा के व्यंग्यात्मक आयाम की पहचान कराते हैं।
समग्रत माचवे जी के लेखन का रूप सबसे अलग है। तार-सप्तक में संकलित उनकी कविताएँ उनकी विशेष पहचान कराती हैं। जब तार-सप्तक के कईं कवियों पर छायावादी संस्कार हावी दिखाई पडता है, तब माचने की कविताएँ बिल्कुल उससे मुक्त और नये संस्कार की दिखाई पडती है। वसंतागम, मेघ-मल्लार, गेंहू की सोच, वृष्टि, बादल बरसै मूसलधार आदि कविताओं की नई संवेदना-सादगी और लोक-संपृक्ति ने नये पाठकों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया था। कुछ पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-
गा रे गा हरवाहे। दिल चाहे वही तान ।
खेतों में पका धान। (वसंतागम)
माचवे जी सर्जक के साथ-साथ एक अच्छे आलोचक भी थे। उनकी आलोचना का स्वरूप भी सबसे अलग था । वे न कलावादी हैं न प्रगतिवादी। बाहरी मानदंडों की अपेक्षा कलामय मानदंडों में रचनाओं की पहचान करते हैं।

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