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सांप्रदायिक सद्भावना का प्रश्न और महात्मा गाँधी

अम्बरीन आफताब
सामाजिक और राजनीतिक निराशा के वर्तमान दौर में धर्मनिरपेक्षता, सांप्रदायिक सद्भावना तथा लोकतंत्र के विभिन्न मूल्यों को सहेजना और यथावत बनाए रखना जितना कठिन हो गया है, उतना शायद पहले कभी नहीं था। परिस्थितियों की जटिलता का सहज अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि जिस सामाजिक, सांस्कृतिक अथवा भाषागत वैविध्य को हम चिरकाल से देश की संरचना में तंतुओं की भूमिका में देखते चले आ रहे हैं और जो हमारे मानस में शक्ति के रूप में समाहित होकर हमें जोडने का कार्य करती रही हैं, आज यही परस्पर घृणा का माध्यम बनते हुए हमारी दुर्बलता के रूप में उभरकर सामने आ रही है। जिस तीव्र गति से सभ्यता, संस्कृति, देश, धर्म, राष्ट्र आदि से जुडी जनमानस की अवधारणाओं में परिवर्तन आता जा रहा है, उसके हिंसक परिणाम हर ओर दृष्टिगोचर भी होने लगे हैं। विडंबना यह है कि किंचित् प्रयासों के बाद भी हम किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पा रहे हैं और इस प्रकार सामाजिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक स्तर पर निरंतर चेतनाशून्य-सी स्थिति बनी हुई है।

वस्तुतः सामाजिक-सौहार्द्रपूर्ण संबंधों को विकसित करने की दिशा में जब हम आगे बढने के सतत् प्रयत्न करते हैं, तो हमें बरबस महात्मा गाँधी का स्मरण हो आता है और हम पुनः अतीत की ओर मुडकर देखने को विवश हो जाते हैं। संकीर्णताओं के वर्तमान दौर में, महात्मा गाँधी के विचार हमें निरंतर सोचने के लिए उद्वेलित करते हैं। दरअसल, अपने समय में महात्मा गाँधी, सामाजिक और सांस्कृतिक दोनों ही स्तरों पर जूझते हुए, भारतीय समाज में अन्तर्व्याप्त सांप्रदायिक-सद्भावना के जिन अन्तःसूत्रों को पकडने के निरंतर प्रयास करते हैं, आज उनकी आवश्यकता तीव्रता के साथ अनुभव की जा रही है। अतः वैचारिक उदारता और गहन मानवीय दृष्टि से संपृक्त महात्मा गाँधी के धर्म, संप्रदाय-संबंधी चिंतन के विविध पहलुओं का सूक्ष्मता से विवेचन करते हुए हम उन तत्त्वों की खोज करने के प्रयत्न करेंगे जो सांप्रदायिकता की वर्तमान समस्या से जूझने के तमामतर प्रयासों एवं संभावनाओं को नई ऊर्जा और दिशा प्रदान करने में सक्षम हैं।

महात्मा गाँधी जीवन-पर्यन्त सांप्रदायिकता के विरुद्ध लडते रहे। वास्तव में, उनके जीवनकाल में सांप्रदायिकता की समस्या सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण रही क्योंकि भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करती हुई यह देश की स्वाधीनता के रास्ते में बाधाएँ उत्पन्न कर रही थी। महात्मा गाँधी का स्पष्ट रूप से मानना था कि सांप्रदायिक एकता के अभाव में स्वराज की स्थापना नहीं हो सकती। यही कारण था कि देश को औपनिवेशिक सत्ता से मुक्त कराने हेतु प्रारंभ किए गए अपने सभी आंदोलनों में उन्होंने सांप्रदायिक सद्भावना को सर्वोपरि स्थान प्रदान किया। सांप्रदायिक एकता के वास्तविक अर्थ को उद्घाटित करते हुए वे कहते हैं - एकता का मतलब सिर्फ राजनीतिक एकता नहीं है। राजनीतिक एकता तो जोर-जबरदस्ती से लादी जा सकती है। मगर एकता के सच्चे मानी तो है वह दिली दोस्ती, जो किसी के तोडे न टूटे। इस तरह की एकता पैदा करने के लिए सबसे पहली जरूरत इस बात की है कि कांग्रेसजन, फिर वे किसी भी धर्म के मानने वाले हों, अपने को हिन्दू, मुसलमान, इसाई, पारसी, यहूदी वगैरा सभी कौमों के नुमाइन्दा समझें। (मेरे सपनों का भारत, पृ. 257).

विभिन्न धर्मों के लोगों के परस्पर हितों को साझा और एक समान मानते हुए उनके बीच सद्भावना स्थापित करने के उपायों पर गंभीरतापूर्वक विचार करते हुए महात्मा गाँधी मानते हैं कि हिन्दू-मुसलमान एकता इस बात में निहित है कि हमारा एक समान उद्देश्य हो, एक समान लक्ष्य हो और समान सुख-दुख हों। और इस समान लक्ष्य की प्राप्ति के प्रयत्न में सहयोग करना, एक-दूसरे का दुख बाँटना और परस्पर सहिष्णुता बरतना, इस एकता की भावना बढाने का सबसे अच्छा तरीका है। (यंग इण्डिया, 25-2-1920) दरअसल, सांप्रदायिकता की मूल भावना इस तथ्य में निहित है कि भिन्न-भिन्न धर्मों के मानने वालों के हित एक-दूसरे से सर्वथा भिन्न होते हैं। यही आगे चलकर गढे गए विभेदों तथा धर्मगत संकीर्णताओं को बढावा देने का कार्य करते हैं। परन्तु महात्मा गाँधी जब समान लक्ष्य, समान उद्देश्य और समान सुख-दुख के रूप में हिन्दू-मुसलमानों के साझा हितों की बात करते हैं, तो वे सांप्रदायिकता के बुनियादी सिद्धांतों को ही सिरे से नकार रहे होते हैं।

भारतीय जनमानस में सांप्रदायिक चेतना को उभारने में राजनीति एवं उसकी संक्रमणशील परिस्थितियों की भूमिका से महात्मा गाँधी पूर्णतः परिचित थे। राजनीतिक व्यवस्था द्वारा सांप्रदायिक तत्त्वों को मिल रहे प्रश्रय पर चिंता व्यक्त करते हुए वे जनसाधारण पर इसके प्रभावों को भली प्रकार रेखांकित करते हैं -मुझे इस बात का पूरा निश्चय है कि यदि नेता न लडना चाहें तो आम जनता को लडना पसन्द नहीं है। इसलिए यदि नेता लोग इस बात पर राजी हो जाएँ कि दूसरे सभ्य देशों की तरह हमारे देश में भी आपसी लडाई-झगडों का सार्वजनिक जीवन से पूरा अनुच्छेद कर दिया जाना चाहिए...... तो मुझे इसम कोई संदेह नहीं कि आम जनता शीघ्र ही उनका अनुकरण करेगी। (मेरे सपनों का भारत, पृ. 260) इस प्रकार, सांप्रदायिकता की जडों पर प्रहार करते हुए महात्मा गाँधी सामाजिक एकता तथा समरसता स्थापित करने के प्रति सतत् प्रयत्नशील रहे।

यह विदित है कि भारत में सांप्रदायिकता की विष-बेल को सींचने में उपनिवेशवाद की प्रमुख भूमिका रही। ब्रिटिश शासन द्वारा फूट डालो और राज करो की नीति के तहत भारतीय समाज में मौजूद तमाम तरह की विघटनकारी शक्तियों को प्रोत्साहन प्रदान किया जा रहा था। परिणामस्वरूप, साम्राज्यवाद के विरुद्ध राष्ट्रीय एकता का मार्ग लगातार अवरुद्ध होता जा रहा था। स्वतंत्रता-पूर्व उपजे सांप्रदायिक विभेदों के लिए औपनिवेशिक नीतियों की कडी आलोचना करते हुए महात्मा गाँधी तर्क देते हैं- क्या जब ब्रिटिश शासन नहीं था और अंग्रेज लोग यहाँ दिखाई नहीं पडते थे, तब हिन्दू, मुसलमान और सिक्ख हमेशा एक-दूसरे से लडते ही रहते थे? हिन्दू इतिहासकारों और मुसलमान इतिहासकारों ने उदाहरण देकर यह सिद्ध किया है कि उस समय में हम बहुत हद तक हिल-मिलकर और शान्तिपूर्वक ही रहते थे।... यह लडाई-झगडा पुराना नहीं है।.... मैं तो हिम्मत के साथ यह कहता हूँ कि वह ब्रिटिश शासकों के आगमन के साथ ही शुरु हुआ है...। (मेरे सपनों का भारत, पृ. 261) स्पष्ट है कि औपनिवेशिक शासन की छाया में पनप रहे सांप्रदायिकता के कुत्सित चरित्र को महात्मा गाँधी अनावृत्त तो करते ही हैं, साथ ही उससे छुटकारा पाने की दिशा में देश की सांस्कृतिक विरासत के प्रति भी अगाध आस्था व्यक्त करते हैं। उनकी दृष्टि में, संस्कृति का वास्तविक स्वरूप एकरेखीय अथवा एकांगी न होकर विविधताओं के सम्मिश्रण के रूप में है जिसके भीतर विभिन्न धर्मों, जातियों आदि के आत्मसमानीकरण की अद्भुत क्षमता समाहित है। भारतीय संस्कृति का स्वरूपगत विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए वे कहते हैं - वह उन विविध संस्कृतियों के समन्वय की पोषक है जो इस देश में सुस्थिर हो गई हैं, जिन्होंने भारतीय जीवन को प्रभावित किया है और जो खुद भी इस भूमि के वातावरण से प्रभावित हुई है। जैसा कि स्वाभाविक है, वह समन्वय स्वदेशीढंग का होगा, अर्थात् उसमें प्रत्येक संस्कृति को अपना उचित स्थान प्राप्त होगा। (मेरे सपनों का भारत, पृ. 194) इस प्रकार महात्मा गाँधी अपने विचारों के माध्यम से समावेशी दृष्टिकोण, सांस्कृतिक एकता तथा सांप्रदायिक सौहार्द्र के जिन मूलभूत तत्त्वों को साहस के साथ प्रसारित करते हैं, वे भारतीय संस्कृति की जडों में चिरकाल से अंतर्भुक्त हैं। यही कारण है कि संप्रदायोन्मुखी चेतना को धता बताते हुए वे धर्मगत समानता पर बल देते हैं और साफ शब्दों में कहते हैं - हिन्दुस्तान उन सब लोगों का है, जो वहाँ पैदा हुए और पले हैं और जो दूसरे किसी देश का आसरा नहीं ताक सकते। इसलिए वह जितना हिन्दुओं का है उतना ही पारसियों, हिन्दुस्तानी इसाईयों, मुसलमानों और दीगर गैर-हिन्दुओें का भी है। (मेरे सपनों का भारत पृ. 293) इस प्रकार, महात्मा गाँधी धर्म की अपेक्षा संस्कति को कहीं अधिक महत्त्व देते हैं। सांस्कृतिक एकता सुदृढ करने की दिशा में वे सांप्रदायिकता की उस धारणा का खण्डन करते हैं जो धर्म और संस्कृति को एक-दूसरे का पर्याय मानती है। यद्यपि धर्म भी संस्कृति के विभिन्न तत्त्वों में से एक होता है परन्तु केवल धर्म के आधार पर संस्कृति को परिभाषित करने के प्रयास अन्ततः संप्रदायवाद को ही पुष्ट करते हैं। गाँधी इस तथ्य के प्रति सचेत थे, यही कारण है कि वे स्वतंत्र भारत की परिकल्पना में धर्म-निरपेक्षता और समानता को सर्वप्रमुख स्थान देते हैं। वे आशा व्यक्त करते हैं कि आजाद हिन्दुस्तान में राज्य हिन्दुओं का नहीं, बल्कि हिन्दुस्तानियों का होगा, और उसका आधार किसी धार्मिक पंथ या संप्रदाय के बहुमत पर नहीं बल्कि बिना किसी धार्मिक भेदभाव के समूचे राष्ट्र के प्रतिनिधियों पर होगा। (मेरे सपनों का भारत, पृ. 293)

महात्मा गाँधी के जीवन का मूल राजनीति नहीं, धर्म में सन्निहित था और उनके लिए धर्म का पर्याय कर्मकाण्ड, रूढियाँ अथवा सांप्रदायिकता नहीं था। वे स्वीकार करते हैं कि धर्म से मेरा अभिप्राय औपचारिक धर्म या रूढिगत धर्म का नहीं, परन्तु उस धर्म का है जो सब धर्मों की बुनियाद है, और जो हमें अपने सर्जनहार का साक्षात्कार कराता है। (मेरा धर्म, नवजीवन ट्रस्ट, 1960, पृ. 3) धर्म की विशद व्याख्या करते हुए वे न केवल उसमें अन्तर्निहित नैतिकता, मानवता आदि पक्षों को प्रमुखता से उभारने पर बल देते हैं अपितु उसे ऐसी शक्ति के रूप में देखते हैं जो मनुष्य के हृदय में बसकर उसके निज को निरंतर परिष्कृत करती रहती है। धर्म में किसी भी प्रकार की संकीर्णता का सर्वथा निषेध करते हुए वे उसके उदात्त स्वरूप पर विचार करते हैं - यहाँ धर्म का अर्थ संप्रदायवाद नहीं है। इसका मतलब विश्व के व्यवस्थित नैतिक शासन में विश्वास है। वह अदृश्य है, लेकिन कम वास्तविक नहीं है।... मेरा मतलब उस मूल धर्म से है जो हिन्दू धर्म को लाँघ गया है, जो मनुष्य के स्वभाव तक का परिवर्तन कर देता है, जो भीतरी सत्य क साथ हमारा अटूट संबंध जोडता है और जो हमें निरंतर अधिक शुद्ध और पवित्र करता रहता है। वह मानव स्वभाव का शाश्वत तत्त्व है। (मेरा धर्म, नवजीवन प्रकाशन, 1960, पृ. 3) उनकी दृष्टि में धर्म मानवीय सरोकारों से संपृक्त था और उसमें कट्टरता अथवा धर्मगत भेदभाव के लिए लेशमात्र भी स्थान नहीं था। इस प्रकार, महात्मा गाँधी सच्चे धार्मिक थे जो न केवल अपने धर्म की परंपराओं, मान्यताओं तथा पद्धतियों का निष्ठापूर्वक अनुसरण करते थे अपितु दूसरे धर्मों के प्रति आदर का समान भाव रखते थे। उनका समस्त जीवन, आचरण और विचार इस तथ्य को संपुष्ट करते हैं कि धर्म और सांप्रदायिकता दो भिन्न-भिन्न अवधारणाएँ हैं। सामान्यतः धर्म को सांप्रदायिकता की उत्पत्ति एवं विकास का मुख्य कारण समझा जाता है परन्तु धर्म न ही सांप्रदायिकता का मूल कारण है और न ही इससे सांप्रदायिकता को प्रेरणा मिलती है। इसके विपरीत, सांप्रदायिकता अपनी वैधता सिद्ध करने तथा वैचारिक स्वीकृति प्राप्त करने के लिए धर्म के मनमाने तर्कों एवं रूप का प्रयोग करती है। सांप्रदायिक शक्तियाँ अत्यन्त चतुराई से धार्मिक प्रतीकों और आस्था का दोहन करते हुए भौतिक स्वार्थों की सिद्धि का विधान रचती हैं। महात्मा गाँधी धर्म एवं उसमें अन्तर्निहित तत्त्वों को उनके वास्तविक स्वरूप में आत्मसात् करने के पक्षधर थे जिससे कि सांप्रदायिकता उसका अनुचित लाभ न उठा सके।

महात्मा गाँधी एक ऐसे भारत की परिकल्पना को साकार एवं मर्त रूप प्रदान करने के विषय पर विचार करते हैं जिसका प्रधान अंग धर्मनिरपेक्षता हो तथा जिसमें किसी भी प्रकार के धार्मिक वैमनस्य का कहीं कोई अस्तित्व न हो। धर्म को प्रत्येक व्यक्ति का नितांत व्यक्तिगत मामला मानते हुए वे धर्म से जुडे विषयों में राज्य के हस्तक्षेप को अस्वीकार करते हैं। दरअसल, सांप्रदायिकता के मूलभूत सिद्धांतों के विपरीत, धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा सभी धर्मों को समान भाव से देखने का समर्थन करते हुए उनके प्रति तटस्थ रुख अपनाती है। इस प्रकार, विभिन्न धर्मों के अनुयायियों को फलने-फूलने के समान अवसर प्राप्त होते हैं। साथ ही, धर्म को आधार बनाकर किसी प्रकार के पक्षपात या भेदभाव को प्रश्रय नहीं मिलता। एक धर्मनिरपेक्ष राज्य और धर्म के बीच की निश्चित दूरी को रेखांकित करते हुए महात्मा गाँधी कहते हैं-अपने धर्म पर मेरा अटूट विश्वास है। मैं उसके लिए अपने प्राण दे सकता हूँ। लेकिन वह मेरा निजी मामला है। राज्य को उससे कुछ लेना-देना नहीं है। राज्य हमारे लौकिक कल्याण की - स्वास्थ्य, आवागमन, विदेशों से संबंध, करेंसी (मुद्रा) आदि की देखभाल करेगा, लेकिन हमारे या तुम्हारे धर्म की नहीं। धर्म हर एक का निजी मामला है। (मेरे सपनों का भारत, पृ. 293-294)

महात्मा गाँधी सहिष्णुता को धर्म का प्रमुख अवयव मानते हैं। उनकी दृष्टि में, धार्मिक सहिष्णुता के बिना समाज में सांप्रदायिक एकता स्थापित करना असंभव है। दुर्भाग्य से आज समाज में सबसे अधिक यदि किसी जीवन-मूल्य के अभाव को महसूस किया जा रहा है, तो वह सहिष्णुता ही है और निरंतर घट रही हिंसक घटनाएँ इसका स्पष्ट प्रमाण हैं। महात्मा गाँधी के लिए सहिष्णुता का पर्याय उदारता के साथ-साथ अन्य धर्मों के प्रति समान श्रद्धाभाव था। यही कारण था कि वे निरंतर सहनशीलता और आत्म-संयम द्वारा दूसरे धर्म के अनुयायियों का विश्वास जीतने पर बल देते रहे। वे स्पष्ट शब्दों में कहते हैं- यदि मुसलमानों की ईश्वर-पूजा की पद्धति को, उनके तौर-तरीकों और रिवाजों को हिन्दू सहन नहीं करेंगे या अगर हिन्दुओं की मूर्ति-पूजा और गो-भक्ति के प्रति मुसलमान असहिष्णुता दिखाएंगे तो हम शान्ति से नहीं रह सकते।....... हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच के सारे झगडे की जड यही बात है कि दोनों एक-दूसरे पर अपने विचार लादना चाहते हैं। (यंग इण्डिया, 25.2.1920) आगे चलकर गोरक्षा के मुद्दे पर भी महात्मा गाँधी यही दृष्टिकोण अपनाते हैं। दूसरों पर जबरन अपने विचार, विश्वास अथवा मान्यताएँ थोपने की अपेक्षा वे धर्म में आत्म-त्याग के महत्त्व को प्रतिपादित करते हैं। उनके अनुसार, जो धार्मिक गतिविधियों अथवा धर्म-प्रचार के नाम पर हिंसा फैलाते हैं, वह धर्म का प्रयोग करते हुए अपने व्यक्तिगत हितों के लिए छद्म रचते हैं। इससे मानवता की व्यापक स्तर पर क्षति तो होती ही है, साथ ही सांप्रदायिकता का जन-विरोधी चरित्र भी उजागर होता है। धर्म के मूलभूत आदर्शों पर पुनः प्रकाश डालते हुए महात्मा गाँधी स्मरण कराते हैं कि गाय की रक्षा के लिए मनुष्य की हत्या करना हिन्दू धर्म और अहिंसा धर्म से विमुख होना है। हिन्दुओं के लिए तपस्या द्वारा, आत्म-शुद्धि द्वारा और आत्माहुति द्वारा गोरक्षा का विधान है लेकिन आजकल की गोरक्षा का विधान बिगड गया है। उसके नाम पर हम बराबर मुसलमानों के साथ झगडा-फसाद करते रहे हैं, जबकि गोरक्षा का मतलब है मुसलमानों को अपने प्यार से जीतना। (यंग इण्डिया, 6.10.1921) उनका मानना था कि अपनी धार्मिक इच्छाओं का सम्मान करने के लिए एक-दूसरे को बाध्य करना, धर्म के मूल सिद्धांत से इतर, निरा पागलपन है। इसीलिए हिंसा का आश्रय लेने की अपेक्षा प्रेम, सद्भाव और सहिष्णुता द्वारा एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए।

महात्मा गाँधी जानते थे कि सांप्रदायिकता का एक रूप भाषा के माध्यम से भी उभरकर सामने आता है। वे भाषा के संदर्भ में, उदार दृष्टिकोण का परिचय देते हुए उस हिन्दुस्तानी भाषा को कुल हिन्द की भाषा मानने का आग्रह करते हैं जो देवनागरी में लिखने पर हिन्दी और फारसी में लिखने पर उर्दू कही जाती है। वस्तुतः हिन्दी और उर्दू के स्थान पर हिन्दुस्तानी को स्वीकार करने के पीछे उनका लक्ष्य उस व्यापक राष्ट्रीयता और सामाजिक समरसता के बोध को परिष्कृत करना था जो आगे चलकर स्वराज-प्राप्ति में सहायक बनता। महात्मा गाँधी पण्डितों की संस्कृतनिष्ठ हिन्दी और मौलवियों की फारसीमयी उर्दू की अपेक्षा जनता की भाषा हिन्दुस्तानी को वरीयता प्रदान करते हैं। ऐसा करते हुए वे न केवल भाषा के पटल पर अपना वर्चस्व बनाए हुए अतिवादी तत्त्वों का मुखर विरोध करते हैं, बल्कि भाषा को धर्म से जोडकर देखने की संकुचित दृष्टि पर भी समुचित प्रहार करते हैं। भाषा के संबंध में उनकी धारणा थी कि राष्ट्रीय एकता प्राप्त करने का यह एक बहुत जबरदस्त साधन है और जितना दृढ इसका आधार होगा, उतनी ही प्रशस्त हमारी एकता होगी। (सच्ची शिक्षा, पृ. 329) इस प्रकार, महात्मा गाँधी सांस्कृतिक एकता तथा सांप्रदायिक सौहार्द्र को प्रगाढ करने के अथक प्रयत्न करते हैं, फिर चाहे वह भाषा के स्तर पर ही क्यों न हो।

स्पष्ट है कि विभिन्न धर्मों के मध्य समन्वय स्थापित करने के प्रयासों के बीच गाँधी आजीवन सांप्रदायिक शक्तियों से लोहा लेते रहे। उनके समय में, समाज में जो विघटनकारी तत्त्व विद्यमान थे, स्वतंत्रता के उपरांत वे नित नए रूपों में ढलकर निरंतर उग्र होते गए। वर्तमान समय में, देश में गहराते जा रहे सांस्कृतिक संकट के समाधान के लिए जब हम एक युगदृष्टा के रूप में महात्मा गाँधी के विचारों का अवलोकन करते हैं, तो एक संवेदनशील लेखक के रूप में उनके सांप्रदायिकता-संबंधी चिंतन को भी विचार के केंद्र में लाना समीचीन प्रतीत होता है।

वस्तुतः महात्मा गाँधी के जीवन का प्रधान लक्ष्य स्वराज प्राप्ति था और इस महती लक्ष्य के संधान हेतु उनकी दृष्टि में, प्रथम शर्त सांप्रदायिक एकता थी। वे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र एवं उससे जुडे कार्यों में धर्म को सम्मिलित किए जाने के पक्षधर थे, यहाँ तक कि राजनीति में भी। वर्तमान संदर्भों में बात करें, तो यह नितांत अव्यावहारिक प्रतीत हो सकता है। कारण यह है कि धर्म का जो स्वरूप आज प्रचलन में है, वह गाँधी के धर्म-संबंधी दृष्टिकोण से तनिक भी मेल नहीं खाता। गाँधी धर्म के जिन जीवंत तत्त्वों को जीवन में पूर्णतः समाहित करने की बात करते हैं, आज हम उसके मृतप्राय और घोर विकृत रूप को ही ढोते चले जा रहे हैं। गाँधी धर्म में जिस नैतिक शुचिता और मानवीयता के पक्षधर हैं, वर्तमान समय में उसका स्थान घातक संप्रदायवाद ने ले लिया है। संकीर्णता और कट्टरता से इतर रहकर गाँधी धर्म के शुभ्र पक्ष को उद्घाटित करते हैं, परन्तु आज धर्म के नाम पर, जिस व्यापक स्तर पर उन्माद और वैमनस्य हावी है, उसके परिणाम और प्रभावों से कोई भी अनभिज्ञ नहीं है। यह विडंबना ही है कि पापी के स्थान पर पाप से घृणा करने का संदेश देने वाले गाँधी के विचार आज हमारे मानस में धुँधले होते जा रहे हैं। चहुँओर फैलती जा रही सांप्रदायिकता और धार्मिक मतांधता की आँधी में हिंसा, घृणा आदि के विषाक्त कणों ने मानवीय मूल्यों के प्रकाश को आच्छादित कर लिया है। उस आलोक को आज पुनः अपने जीवन में आत्मसात् करने की आवश्यकता को तीव्रता से महसूस किया जा रहा है।

यह विचारणीय है कि आज अगर गाँधी के जन्म के डेढ सौ वर्षों के बाद भी हम उन्हें स्मरण कर रहे हैं, तो इसके मूल में न केवल मानवता से लैस उनका समृद्ध चिंतन और सुस्पष्ट वैचारिकी है वरन् वर्तमान समय का निरंतर विघटित होता हुआ समाज भी है जो किसी भी कीमत पर लोकतांत्रिक मूल्यों की बलि देने को आतुर है। अतएव, गाँधी देश की जिस साझी संस्कृति और उसके बहुलतावादी स्वरूप को अपनाने पर बल देते हैं, जिस समावेशी दृष्टिकोण को जीवन में आत्मसात् करने की बात करते हैं, धार्मिक कट्टरता और भेदभाव का खण्डन करते हुए जिस प्रकार सभी को एक पिता का बालक स्वीकार करते हैं, सर्वधर्म-समभाव और सहिष्णुता के सिद्धांतों पर बल देते हुए जिस प्रकार सांप्रदायिक एकता के सूत्रों को प्रगाढ करने के सतत् प्रयत्न करते हैं; इस कठिन समय में हम इसे पूर्णतः न सही, आंशिक रूप में भी अगर अपने व्यावहारिक जीवन में अपनाने के प्रयास कर सकें तो निश्चित ही समाज में अन्तर्व्याप्त सांप्रदायिक विभाजन-संबंधी समस्याओं से काफी हद तक पार पाया जा सकता है।



सम्पर्क : द्वारा दानिश मोहसीन,

4/465, शराफत लॉज,

शौकत मंजिल, देधिपुर,

कलीगढ, (यूपी) २०२०००१

मो0 7906442743/ 8791411898