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जितना कान पकड सके

निधीश त्यागी
विष्णु दिगम्बर जयंती संगीत समारोह के दौरान लिए गये नोट्स
हम संगीत में जाते वक्त अकेले होते हैं। पर फिर न कोई अकेला होता न साथ। एक रौ की तरह आवाज़ आपको बहा ले जाती है आफ अपने गहरे बियाबान में भीतर के बाहर में जो शायद स्पेस और टाइम से भी परे है। और एक ऐसे सच की तरह जो हमेशा से था, जो पलटकर छूता है हमें हमसे हमारे ही बिछुडे की तरह बिलखता हुआ रोता हुआ चुप करवाता हुआ मुस्कुराता हुआ.. हद में। अनहद में।
वो जो अकेला अपने आपसे बात करता है अकेलेपन से बाहर है। वह मूर्त के परे जाकर कौंधता है। या फिर सूर्योदय की तरह फैलता है और गोधूलि की तरह सिमट जाता है। वह दूर किसी और वक्त में किसी और जगह पर गायी जा रही कीर्तन मंडली में हुमकता हुआ। वह जो लम्बी साँस के लम्बे आलाप और साज के बजने के बीच एक पल चुप लगा जाता है। अकेला होना मौजूदगी को दर्ज करना है, पर किवाड के उस तरफ न कर्ता है न कर्म न विशेषण। सच उस क्रिया में यहीं कहीं वहीं है, होता हुआ, हो रहे में।
मेरी समझ और ट्रेनिंग नहीं है। मैं पेंटिंग्स को देख और संगीत को सुनते हुए खुद में जो खदबदा रहा होता है वह देखने की कोशिश करता हूँ। मैं उस नशेडी की तरह हूँ जो संगीत का स नहीं जानता पर संगीत उसे थोडा-मोडा बदल देता है। यह अपने आपसे बाहर जाकर भीतर देखने की हरकत मुमकिन हर उस बार होती है जब मनुष्य रचित एक विलक्षण अभिव्यक्ति में खुद को जाहिर होता पाते हैं। आनंद में होना और उसे दर्ज करना दोनों एक दूसरे को छोटा करते हैं। जो हो रहा होता है हो चुकने के बाद, हमारी अपनी जैविकता में वह हमें सहजता के साथ दर्ज करता है। जैसे एक अच्छी किताब हमें पलट कर पढती है।
पोहणकर साहब को सुनते हुए
किसी और ही तल पर बहुत खुरदरे बारीक कई जगह मल्लिकार्जुन मंसूर की तरह किसी पहाडी पर बने मंदिर पर पताकाओं की तरह फरफराते हुए। तबलची और बाजे वाली को जगह और अहमियत देते। बह रहे होते। उनके शिष्य उनकी छुटी साँस को लपकते हुए आगे बढाते हुए। शब्द सुरों में बदलकर अपने अर्थों से दिगम्बर होते हैं और फिर अपने आपमें एक अलग ही आत्मा और एक अलग ही शरीर हो जाते हैं। आत्मा एक साँस जितनी लम्बी है, छोटी भी हर बार सम पर लौटती हुई। हमारे होने के खाली और रूखे मर्तबान को अपने तरल से भरती हुई उन गतिशील ध्वनियाँ से जो अभी अभी यहीं था और पता नहीं किधर निकल गया।
बारिश सृजन की केंद्रीयता है। उसका संगीत प्रकृति की उन इंद्रियों में गूँजने की ख्वाहिश तरल से मिलकर एक पुराने ठोस को नये विस्तार में ले जाता है खोलता हुआ, खिलता हुआ, खुलता हुआ।।। बारिश एक पूरा उपक्रम है निजी का, दुनिया का, अरण्य का, नदियों का, पहाड का, प्रतीक्षा का, संसर्ग का, कोमलता का, जडों से निकल कर आसमान हो जाने का।। शब्द हमें स्टीरियोटाइप करते हैं, पर बारिश का हर पल हर बार हर जगह अलग रंग अलग छवि अलग महक अलग सीलन अलग ताप लेकर आता है।
हमारी आवाजों में कितना कुछ है बारिशों की तरह जो शब्दों के शिकंजों में न फँस सका।
हमारी औघड मनुष्यताओं की तरह।
ताकाहीरो अराई का संतूर सुनते हुए
एक जापानी नौजवान को संतूर बजाते देख पहले थोडा कौतुक होता है। पर वह जो छेड रहे हैं, हिंदुस्तानी है। मोबाइल फोन साइलेंट मोड पर है, पर हम दुनिया के हर कोने में जाकर उसे अपने हासिल में दाखिल कर लेना चाहते हैं फोन से फोटो खींच कर। या वीडियो बना कर। संगीत आपको गवाही की बहुत गुंजाइश नहीं देता। उसके साथ भागीदार बनता पडता है, बहते हुए अपने खयालों में अपने एकांत में एक नये सिरे से एक एक नये कोने पर एक नया जैसा एकांत पकडते पकडाते हुए... गतिशीलता में... डूबते में तैरते में उतराते में ध्यान में तंद्रा में।
हम दर्ज करें। या दर्ज हो जाएँ। पल को हम दबोच लें या दबोच लेने दें। बह जाने दें या बहा ले जाने दें इस पल को। जो जमा होता रहा है सतह पर जमती धूल की तरह। गवाह बने या भागीदार। कर्ता रहे या विशेषणों की कमीजउतार क्रिया होने को उपलब्ध हों।
और छलाँग लगा दें स्वर लहरियों की आकाशगंगा में।
हम अपनी चुप्पियों को पंक्चुएट होते हुए सुन रहे हैं। उन आवाजों का विन्यास एक अनूठे कॉन्फ्लूएंस की तरह इस पल में बह रहा है।। संतूर की लकडी और तार, जापानी के हाथ, एक पुराना कोई राग, तबले की थाप और पूरा मजमा। मनुष्य होने की हर जगह शिनाख्त करते हुए।
कान लगा कर सुनते हुए उस आखिरी आवाज को सुनने, जो ताकाहीरो लगभग बुदबुदाहट के स्तर तक ले जाते हैं। इस पल की खामोशियों को रेखांकित करते हुए। वह अपने संतूर में डूबे हुए हैं, जैसे उन्हीं की उँगलियों की छेड का एक विस्तार हो और जैसे वे एक कविता भी हो और नृत्य भी। चेहरा लगभग भावहीन है जब भी उठता है हिलते हुए। प्लेफुलनेस के साथ। आदर, प्यार और प्रार्थनाओं की तरह।
मैं पहली बार संतूर ठीक से सुन रहा हूँ। और क्योंकि ये शिव कुमार शर्मा नहीं है, मैं किसी पूर्वाग्रह के साथ नहीं हूँ। पर मैं घर लौटकर फिर से इन्हें सुनूँगा इंटरनेट पर ढूँढ कर, क्योंकि ताकाहीरो के संतूर में कई सफरनामे बज रहे हैं बहुत खरामा-खरामा बहुत चैनदारी के साथ और बहुत फाहा-फाहा।
मैं फिर इस पल में घुल रहा हूँ। प्रवाहित प्रार्थनाओं वाले।
पंडित व्यंक्टेश कुमार का गायन
स्पीकर ठीक नहीं है, पर गुरु वह बडे हैं और अपनी गहरी भारी आवा*ा में मगन हो कर गा रहे है। स्पीकर की हिस्स को पार कर वे आप तक पहुँचते हैं। जो घना गहरा मौन भीतर कहीं झंकृत कर जाते हैं, उसे महसूस तो किया जा सकता है, ठीक ठीक लिखा/कहा नहीं जा सकता। व्यंक्टेश के सामने सुरों का दरबार लगता है। उनकी ग्रेन्यूलरिटी बताती है कि वे कितने निश्चित हैं उन गलियों से गुजरते हुए जिसका अभ्यास और तप दोनों उन्होंने सालों किया है। कहाँ फैल कर निकलना है कहाँ जगह बनानी है कहाँ जगह बचानी है, कहाँ ठहरना है, कहाँ तेज चलना है। वे शेर भी हैं, हिरन भी और परिंदे भी। सब एक दूसरे को जानते हुए। गाता हुआ मनुष्य कैसे खुद एक हवा के वाद्ययंत्र में बदल जाता है, उनके डूबने से पता चलता है। वे गले से लेकर अपने गहरे पेट तक ट्यून्ड हैं। उनके हाथ पकडते हैं आकाश को प्रार्थनाओं में बदलते हुए।
बडे आलापों से लेकर बारीक और नाज़ुक छेडखानियों तक उनके पास एक रेंज है जहाँ एक भी सुर न अतिरिक्त लगता है, न पराया। यहाँ से वहाँ तक तरल और प्रवाहित।
इस वक्त वह तान छेडे हुए हैं और सिर्फ आवाज़ का अपना शरीर है अपनी आत्मा। इस वक्त वे अपनी सतह से उठे हुए हैं। आँख बंद कर सुनो तो न उस व्यक्ति का खयाल रहता है न उस जगह का। आप अपने भीतर में उनकी आवाजों के साथ चढते उतरते घूमते हैं। उनका गायन आफ सुनने में अपना महल बनाता है, अपना जंगल और भाव छवि। वे आपको अपने अवाक तक ले जाकर छोडते हैं बार बार। बहुत सारे आश्वस्तिबोध और करीने के साथ। उन्हें पता है कि तीन एक सौ लोग जो उन्हें सुन रहे हैं वे उनके इस गतिशील तरल में डूब रहे हैं, तैर रहे हैं।
जाने हुए को फिर फिर जानने की अपनी गहराई है। एक का जाना दूसरे के लिए जाना नहीं होता। हम उनके बहुत जाने में से अपनी जान थोडी सी बढाते हैं। वे अपने भीतर कोई नई परत नहीं तोडते किसी नये अज्ञात में कोई दरवाजा या खिडकी नहीं खोल रहे होते, पर सुनने वालों के साथ ऐसा नहीं होता.. कि वे धारवाड से हैं, कि वे खुद संगीत के पंडित ही नहीं गुरु भी है, कि वे थोडा देर से संगीत के मंच पर उतरे, कि वे नौकरी को मारे बहुत ज्यादा कंसर्ट नहीं करते। उस गायक के बारे में जरूरी जानकारी है, जिसका उन्हें सुनने से बहुत वास्ता नहीं।
सुनते वक्त मनुष्यता थोडी गाढी हो जाती है जो सुनने को बहुत बाद तक आपको गाती रहती है।
पंडित उल्हास काशलकर को सुनते हुए
उसमें न विरह है न प्रणय न रति। न कोई चौथी ऐंद्रिकता जिससे रीतिकाल का काव्य पटा पडा है। वे बारिश के बारे में गा रहे हैं। शायद मियाँ की मल्हार है, पर काशलकर साहब कईं राग मिला के भी गाते हैं। मुझे उन रागों की जानकारी नहीं।
बारिश का गान बारिश के शब्दों से शुरू होता है। पर फिर शब्द ध्वनियों में बदल जाते हैं। बारिश की बहुत सारी ध्वनियाँ हैं- एक भरा पूरा ऑरकेस्ट्रा है। ध्वनियाँ बारिश को पकडने की कोशिश करती हैं। बारिश के पंचतत्वों को उनकी गतिशीलता के साथ। बादल, गर्जन, दामिनी, बूंदें, जमीन और उन सबके बीच चल रहा घर्षण, आकर्षण और हिलोरें। ध्वनियाँ शब्द को छोडकर प्रकृति को छेडती हैं, पकडती हैं। पकड लेती हैं। हो जाती हैं। शब्द छूट जाते हैं। आवाज हैं मानसून का संगीत, उसका विन्यास, उसका उत्सव, उसका उतार-चढाव-बहाव में बदलते हुए। शुरू में पता नहीं चलता। धीरे-धीरे आप पर सवार होने लगता है। आप बिना सपनों वाली नींद के उस तरफ बारिश को सुन रहे हैं एक ऑडिटोरियम, एक भीड, एक साउंड सिस्टम, साजिंदों के बीच बिराजे एक ओजस्वी आवा*ा के उस तरफ। स्मृति में बारिश कल्पना में। जैविक में। मनुष्य में। आत्मा में। एक मायालोक रचा जा रहा है। जो मानसून लेकर आता है। हर बार। पहली बार।
काशलकर साहब हर बार नई पगडंडी बनाते हैं। बारिशों के बीच। मैं सोचता हूँ जसपुर की बारिश और बस्तर की और रीवा की बारिश। नदी पार करते की बारिश। अगले पहाड पर से इस पहाड पर आती बारिश। मैहर की पहाडी की बारिश जहां एक बादल का एक भटका टुकडा एक ग्यारह साल के गाल को छूकर गायब हो जाता है। बिजलियों का गिरना और गोल घूमते हुए गिरना। बारिश अपनी रफ्तार बदल रही है। तबला पकडता है इस बदलाव को। हारमोनियम पीछे चल रहा है। एक तर आत्मा से निकलती है बारिश छलकती है कईं दूसरी आत्माओं को तर करती हुए।
मैं एक ब्लर में हूँ। जहां सब गड्डमड्ड है। उत्तेजना है। स्मृति है। कल्पना है। नींद है। ऐंद्रिकता है। जैसा बारिशें करती हैं हमारे साथ। हम धुल रहे होते हैं उसे देखते हुए भी। भीग रहे होते हैं सुनते हुए भी। हमारे भीतर भी चलता है हर बार ढंग से हो रही बारिश का साइट और साउंड शो। एक उत्सव स्निग्ध का। स्पंदित का। हरितिमा का। प्रकृति का। पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु, आकाश का। वह उत्सव है, नाटक नहीं।
बार-बार काशलकर साहब एक क्रेसेंडो तक ले जाते हैं। मैं नहीं चाह रहा कि वे रुकें।
मैं अपने बचपन के जसपुरनगर में हूँ, जहाँ मैं लाल मुरूम में उग रही घास वाले टीले पर बारिश को सामने से आते देख रहा हूँ। बारिश के आगे हवाएँ मुझे फरफरा रही हैं।
मैं बारिश की तरफ दौडता हूँ।
फिर सपनों की तरह। जादू टूटता है।
मुझे लगता है मैं रो पडूँगा।
शास्त्रीय संगीत और टैक्नोलॉजी
पलुस्कर साहब ने जब हिंदुस्तानी संगीत की नींव रखी थी, तब न इतनी टैक्नोलॉजी थी, न माइक्रोफोन्स, न मिक्सर, न स्पीकर्स। मैं अक्सर आदिम आवाजों और उनके हाथों से ज्यादा मशीनरी आवाजों को सुनता हूँ आदमी की आवाज़ और उसके साजों को लघुता प्रदत्त करते हुए, उसमें दखल देते हुए, बीच-बीच में बेसुरा होते हुए। अभी जो तबले, सितार और सरोद राग मेघ चल रहा है, बार-बार टूटता है किसी स्पीकर या मिक्सर के यहाँ वहाँ होने से। तीन बार सरोद बजाने वाले और दो बार सितार बजाने वाले के चेहरे पर साऊंड सिस्टम वाले को गोली से उडाने वाले खयाल पढे जा सके। बाद में दो बडे गुरुओं को सुनते वक्त भी लगा कि साउंड सिस्टम के पार जाकर उन्हें सुनना पड रहा है। कभी बहुत हिस है कभी तबला और हॉरमोनियम गायक की आवाज से ज्यादा मुखर। मशीनों के आगे मनुष्य होना एक खामियाजा उठाने की तरह है। टैक्नोलॉजी और साउंड सिस्टम वैसे भी पश्चिम की संगीत परम्परा को ध्यान मं् रखकर विकसित हुए हैं। उसमें भी जो लोकप्रिय संगीत है वह तीव्र नोट वाले हैं। एकॉस्टिक्स की जो बारीकियाँ जरूरी हो गई हैं, वह हमारे यहाँ कम देखने को मिलती हैं। एक टुच्ची सी रिंग टोन भी काफी होती है, किसी मियां के मल्हार की ऐसी तैसी करने के लिए।
(संगीत की जानकारी का कोई दावा नहीं है। पर सुनने का शौक है, जिसके बारे में गवाही पेश करने की कोशिश है)

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