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सहजीवन के उजले और धुँधले पक्ष

नीतू परिहार
मन्नू भण्डारी और राजेन्द्र यादव
साहित्य के फलक पर मन्नू भण्डारी का नाम धुव्रतारे जैसा चमकता हुआ है। वे स्वयं तो ये मानती हैं कि उन्होंने बहुत कुछ नहीं लिखा है लेकिन हम सब जानते हैं कि वे अच्छी ही नहीं बल्कि सफल और लोकप्रिय लेखिका रही हैं। पिछले कुछ सालों में कईं लेखिकाओं ने अपनी आत्मकथा लिखी है, जिनमें प्रभा खेतान (अन्या से अनन्या), अमृता प्रीतम (रसीदी टिकट), मैत्रेयी पुष्पा (कस्तूरी कुंडल बसे), कृष्णा अग्निहोत्री (लगता नहीं है दिल मेरा), पद्मा सचदेवा (बूँद बावडी), कुसुम अंसल (जो कहा नहीं गया), डॉ. प्रतिभा अग्रवाल (दस्तक जिंदगी की मोड जिंदगी का) आदि प्रमुख हैं।
इन लेखिकाओं में से कुछ ने अपने बहुत अंतरंग जीवन के क्षणों को भी आत्मकथा में स्थान दिया जो चर्चा का विषय भी बना और आलोचना का भी। आत्मकथा के माध्यम से स्त्रियों ने समाज और परिवार की भीतरी सच्चाइयों को उजागर किया है जिनकी चुभन जूते की कील की तरह सिर्फ पहनने वाला ही जानता है। राजेन्द्र यादव के शब्दों में-स्त्री की हर आत्मकथा अपनी यातनाओं की ऐसी निजी दास्तान जो घर-घर में घटित होती है। खैर, जो भी हो, मन्नू की आत्मकथा को पढते हुए हम उनके जीवन की यात्रा के विभिन्न सोपानों से रूबरू होते हैं, हालांकि मन्नू ने स्वयं ये कहा है कि वे इसे आत्मकथा नहीं मानती क्योंकि आत्मकथा में तो व्यक्ति अपने जीवन की झूठी-सच्ची, अच्छी-बुरी, चाही-अनचाही सभी घटनाओं के पक्षों के उजाले-अंधेरों का बयान बहुत ईमानदारी से करता है।
मन्नू कहती हैं कि उपन्यास और कहानी में जितना अंतर है उतना ही अंतर उनके और इस कहानी में भी है। वे कहती हैं-आगे बढने से पहले एक बात अच्छी तरह स्पष्ट कर देना चाहती हूँ कि यह मेरी आत्मकथा कतई नहीं है, इसीलिए मैंने इसका शीर्षक भी एक कहानी यह भी ही रखा। जिस तरह कहानी जिंदगी का एक अंश मात्र ही होती है, एक पक्ष, एक पहलू उसी तरह यह भी मेरी जिंदगी का एक टुकडा मात्र ही है, जो मुख्यतः मेरे लेखकीय व्यक्तित्व और मेरी लेखन यात्रा पर केन्द्रित है।
मन्नू ने इस कहानी में अपने लेखन के साथ-साथ राजेन्द्र यादव के साथ जिए जीवन के दिनों को भी याद किया ह। राजेन्द्र यादव अब हमारे बीच नहीं रहे हैं। साहित्य को उनका बहुत देय है। ऐसे समय में उन पर बात करना और भी जरूरी हो जाता है जब वे हमारे बीच नहीं हैं। इन दस वर्षों में साहित्यिक परिवेश में बहुत परिवर्तन देखे गए हैं। कथेतर गद्य बहुत लुभावनी और मंथर गति से साहित्य के केन्द्र में आ गया है। विविध विमर्शों पर चर्चाएँ अब बोझिल होने लगी हैं। परिवर्तन सदा ही सहज स्वीकार्य रहा है, अतः कथेतर गद्य का केन्द्र में होना भी समय की माँग है।
इस आलेख में मैं मन्नू और राजेन्द्र यादव के जीवन की कुछ घटनाओं, उनके विवाहित जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों तथा लेखकीय जीवन पर पडने वाले प्रभावों की बात करूँगी।
ये तो सर्वविदित है कि मन्नू और राजेन्द्र यादव दोनों ही अच्छे लेखक हैं। मन्नू का जब राजेन्द्र यादव से पहली बार मिलना हुआ था तब उनका उखडे हुए लोग उपन्यास छप चुका था। छपने के साथ ही थोडा चर्चित भी हो गया था। सर्वप्रथम राजेन्द्र यादव से मुलाकात बालीगंज शिक्षा सदन के पुस्तकालय की सूची बनवाने के सिलसिले में हुई। धीरे-धीरे मित्रता म बदला परिचय जिसका मुख्य कारण लेखन ही था।
दोनों के बीच में लेखन ही था जो मित्रता को प्रेम में बदलता गया। मन्नू जी कहानियाँ लिखतीं और राजेन्द्र यादव को पढकर भी सुनाती वे कहानी सुन, सलाह भी देते। मन्नू कहती हैं वे मेरी कहानियाँ सुनते, उनपर सलाह-सुझाव भी देते। कुछ बातें जरूर मेरे गले उतरती पर अधिकतर को पचा पाना मेरे बूते के बाहर था। मेरी कहानियाँ होती थी सीधी, सहज और पारदर्शी और राजेन्द्र के सुझाव होते थे बडे पेंचदार और गुट्ठल उनके व्यक्तित्व की तरह ही।
मन्नू के अनुसार जितनी सीधी-सरल-सहज वे थीं उसके ठीक विपरीत राजेन्द्र यादव थे। उनके व्यक्तित्व में सहजता कम उलझापन अधिक था, लेकिन ये भी कम बात नहीं कि कितना भी उलझापन हो वो मन्नू को लिखने के लिए सदा प्रेरित करते रहते थे। वे याद करती हैं कि कुछ कहानियाँ लिखने और एक कहानी संकलन आ जाने के बाद भी वे अपने आपको कहानीकारों में सम्मिलित नहीं करती थीं।
सन् 1957 में जब अमृत राय ने प्रगतिशील लेखकों का सम्मेलन करवाया तो निमंत्रण उन्हें भी प्राप्त हुआ। निमंत्रण प्राप्त कर मन्नू खुश तो बहुत हुईं, होना भी चाहिए था क्योंकि बडे-बडे लेखकों को देखने-सुनने का सुअवसर प्राप्त हुआ था लेकिन सम्मेलन में अकेले कैसे जाए यह चिंतनीय विषय था। राजेन्द्र यादव ने उन्हें इस चिंता से मुक्त कर दिया वे उन्ह सम्मेलन में साथ लेकर गये। उस सम्मेलन में ही वे पहली बार मोहन राकेश, कमलेश्वर, रेणू, अमरकांत और नामवर सिंह से मिलीं। महादेवी और हजारी प्रसादद्विवेदी के अद्भुत और अविस्मरणीय भाषण भी तभी सुना।
राजेन्द्र यादव से धीरे-धीरे मित्रता गहरी होती चली गई। इसका प्रभाव मन्नू के लेखन में भी रोमानी रंग के रूप में दिखाई देने लगा। मन्नू जिस भारतीय संस्कृति में पली-बढी थीं, उसके हिसाब से वे इस मित्रता को एक नाम देना चाहती थीं किन्तु राजेन्द्र यादव को लगता था कि गृहस्थी के लिए आर्थिक आधार आवश्यक है। बात ठीक भी थी क्योंकि लेखन की अनिश्चित आमदनी गृहस्थी की गाडी नहीं खींच सकती। उन्होंने दिल्ली जाना तय किया, साहित्यिक गतिविधियों के लिए दिल्ली ज्यादा अनुकूल है यह मन्नू भी जानती थीं इसलिए रोकने का तो प्रश्न ही नह था। राजेन्द्र यादव रीति-रिवाजों में विश्वास नहीं करते थे सो मन्नू की बडी बहन को कह दिया कि यूं तो मन्नू मेरी है, काम के इंतजाम होने तक वे आफ पास हैं।
राजेन्द्र यादव के दिल्ली जाने के बाद सहज ही बिना किसी दबाव के 22-23 दिनों में एक उपन्यास लिख दिया। राजेन्द्र के पास सुझाव के लिए भेजा तो वे चकित रह गए मन्नू की लेखन गति को देखकर उन्होंने सुझाव भी दिए। लेकिन वह उपन्यास दूसरे डॉफ्ट के इंतजार में पडा रहा।
बिना मजबूत आर्थिक आधार के भी दोनों का विवाह एक आयोजन कर संपन्न कर दिया गया। मित्रों और परिचितों के सहयोग से। मन्नू ने कलकत्ता में एक नौकरी की, तो राजेन्द्र यादव दिल्ली में तलाश जारी रखे थे। जब कुछ नहीं हुआ, तो वे भी कलकत्ता आ गए। दोनों गृहस्थी को किसी छोटे से मकान में रहकर चला लेना चाहते थे, लेकिन मकान की तलाश में मन्नू को बहुत समस्या आई क्योंकि लोग लेखक की तारीफ तो करते हैं पर उसे कामकाजी नहीं मानते। मन्नू कहती हैं कि करीब-करीब सारी बातें तय हो जाने के बाद जैसे ही मकान मालिक पूछते कि पति क्या करते हैं, तो मैं बडे गर्व से कहती कि लेखक हैं, लेकिन यह सुनते ही उसके तो तेवर ही बदल जाते और फिर कोई ऐसा टालू-सा जवाब पकडा दिया जाता कि मैं अवाक-संगीत, कला और साहित्य का गढ समझे जाने वाले कलकत्ते में लेखक की ऐसी बेकद्री।
भारतीय संस्कृति में पली-बढी स्त्रियों के दिमाग में वैवाहिक जीवन का एक खाका बना हुआ रहता है। वह यह देखती आई होती हैं कि पुरुष कमाकर लाएगा और स्त्री उस कमाये हुए से घर चला लेगी। दोनों अलग-अलग तरह का श्रम कर घर गृहस्थी रूपी रथ को आहिस्ते-आहिस्ते खींच लेंगे और जीवन बहुत ही आसानी से कट जाएगा। मन्नू ने शायद अपने वैवाहिक जीवन की कल्पना ऐसी ही की होगी, पर दोनों ही व्यक्ति साधारण हैं कहाँ। मन्नू-राजेन्द्र दोनों बडे लेखक थे। दोनों का ही लेखकीय संप्रदाय में नाम था। राजेन्द्र यादव तो प्रतिष्ठित लेखकों की श्रेणी में सम्मिलित थे। थीं तो मन्नू भी पर यह और बात है कि वे स्वयं को बडा नहीं मानती थीं।
वैवाहिक जीवन साथ-साथ जीने के लिए बहुत सपने देखे थे मन्नू ने। नए जीवन को लेकर बहुत उमंग, उत्साह था। मन्नू ने सोचा था एक ही रुचि, एक ही पेशा होने से जीवन एकदम सुगम रहेगा। लेखन की दृष्टि से उनके लिए राजमार्ग खुल जाएगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं। वे कहती हैं-एक ही पेशे के दो लोगों का साथ जहाँ कई सुविधाएँ जुटाता है, वहीं दिक्कतों का अम्बार भी लगा देता है-कम-से-कम मेरा यही अनुभव रहा।
इसमें कोई दो राय नहीं कि राजेन्द्र यादव के साथ मन्नू को साहित्यिक दृष्टि से अनुकूल वातावरण मिला। जिस घर में साथ रहे वहाँ पुस्तकें, पत्रिकाएँ लिखे-पढे पर बात-बहस साहित्यकारों से मेल-मिलाप लिखने के लिए पूरा अवसर मिला। लेकिन इस अवसर का भरपूर फायदा उठा सके ऐसी सुविधा नहीं मिली। इसलिए भी मन्नू को लगता है कि वे बहुत कुछ लिख नहीं पाई।
विवाह के बाद जैसा मन्नू ने पारंपरिक दृष्टि से सोच लिया था वैसा कुछ नहीं हुआ। इसमें मुझे किसी एक का दोष नजर नहीं आता। वास्तव में मन्नू ने एक विशेष व्यक्ति से साधारण जीवन की आशा कर ली थी। जो मन्नू की अपनी सोच थी और कहीं-न-कहीं उनकी कमजोरी भी। राजेन्द्र यादव ने भी मन्नू से विशेष जीवन की अपेक्षा की जबकि वे साधारण थीं। जैसा कि वे स्वयं मानती हैं कि वे तो सीधी-सहज थीं, राजेन्द्र यादव ने पारस्परिक जीवन जीने की सोची नहीं थी। उन्होंने शादी कर भले ही ली थी लेकिन वे कहते है-मेरा सारा विद्रोह पत्नीत्व नामक इस संस्था से है। हमें साथ रहना चाहिए था मगर शादी नहीं करनी चाहिए थी। शायद यही कारण था कि वैवाहिक जीवन जैसा चलना चाहिए था वैसा नहीं चला।
राजेन्द्र यादव रीति-रिवाजों में विश्वास नहीं करते थे सो मानते भी नहीं थे। उन्होंने विवाह के पश्चात मन्नू से कहा कि हम समानांतर जिंदगी जीयेंगे। उन्होंने लेखकीय अनिवार्यता के नाम पर नया पैटर्न मन्नू को थमाया-देखो, छत जरूर हमारी एक होगी लेकिन जिंदगियाँ अपनी-अपनी होगी बिना एक-दूसरे की जिंदगी में हस्तक्षेप किए बिल्कुल स्वतंत्र, मुक्त और अलग।
मन्नू ने ऐसे किसी जीवन की कल्पना ही नहीं की थी सो वे अवाक रह गईं राजेन्द्र यादव की आधुनिकतम जीवन के इस पैटर्न से। यहीं से शायद दोनों के बीच स्नेह की दीवार में दरार आना शुरू हो गया। राजेन्द्र यादव ने कभी किसी परंवरा का अनुगम नहीं किया। पति-पत्नी के पारस्परिक संबध में भी वे कभी राजी नहीं रहे। वे अपनी आत्मकथा में इस बात का जिक्र करते है। मन्नू की नाराजगी पर सफाई देते है-मन्नू आरोप लगाती है कि मैं जिम्मेदारियों और जिंदगी से भागता हूँ मुझे लगता है मैं जिंदगी से नहीं, जिंदगी में भागता हूँ इसलिए मुझे भीड-भाड, बडे शहर और वहाँ की कैलोडोस्कोपिक रंगबिरंगी जिंदगी बहुत पसंद है। कपडे, खाना, सोना और गप्पे सभी कुछ पसंद है। जीवन का अच्छे से अच्छा रूप, लेकिन बुरे से बुरे के साथ बिना खलिश निबाह किए जाता हूँ। चाहता हूँ, सारे संस्कारों को तोडकर अपने को इस समंदर निर्बाध छोड दू और सच्चे अर्थों में बाहेमियन-जिंदगी जीकर देखूँ-यह क्या कि घर-बार बसाए, मध्यवर्गीय मूल्यों को सहलाते बैठे है। यही कारण है कि वे पति रूपी पद और जिम्मेदारियों से दूर रहे।
आधुनिकता के नाम पर जो बंटवारा हुआ उसमें घर की सारी जिम्मेदारियाँ और समस्याएँ मन्नू के हिस्से में आईं। लिखने का तुरूप का पत्ता राजेन्द्र यादव ने अपने पास रखा जिसमें वे कहीं भी कभी भी जा सकते थे। राजेन्द्र यादव मन्नू के अधिकार क्षेत्र में झांकते भी नहीं थे साथ ही यह भी चाहते थे कि उनके क्षेत्र में भी कोई न झांके। जबकि मन्नू ने सभी तरह के अलगाव को दूर कर, एक दूसरे में पूरी तरह घुल-मिलके जीने के सपने संजोए। उनको समानांतर जीवन की यह नींव ही ठीक नहीं लगी।
नए जीवन की शुरूआत ही जिसे राजेन्द्र यादव ने सहजीवन समारंभ नाम दिया, एक अजीब किस्म के अलगाव से हुई। जब मन्नू गर्भवती हुईं तब भी उनके व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आया। बच्ची होने पर मन्नू ने खूब चाहा कि राजेन्द्र अकेले में आकर उनके पास बैठें, बच्ची को निहारें लेकिन वे हमेशा भीड में आते और चले जाते। यह तटस्थता, उदासीनता मन्नू को तकलीफ देह लगती। यह उपेक्षा धीरे-धीरे कुंठा में बदलने लगी जिससे बोली में कडवाहट बढने लगी। मन्नू खुद स्वीकार करती हैं-प्रतिरोध का तो मेरे पास एक ही हथियार था, मेरी जुबान और आज इसे कबूल करने में मुझे कोई संकोच भी नहीं कि उसमें छुरी-काँटे उग आए थे। मैं गुस्से में भर कर कहनी-अनकहनी सब सुनाती थी, जिसे बिना प्रतिवाद किए राजेन्द्र चुपचाप सुनते रहते थे।
राजेन्द्र यादव ने कभी अलग होने का प्रयास नहीं किया, जबकि मन्नू ने कई बार सोचा लेकिन हो नहीं पाई। मन्नू जिसके बचपन में रगो में खून की जगह लावा बहता था, उसी के अब रगो में पानी बहने लगा था। जाने क्या कारण थे कि वे चाह कर भी राजेन्द्र को नहीं छोड पाईं। इसके पीछे भी वे कई कारणों का हवाला देती हैं-या कि दो वर्ष की मित्रता में मैं राजेन्द्र से इतने गहरे तक जुड गई थी कि उनको नकार देना मुझे अपने आपको नकार देने जैसा लगने लगा था.... या कि पिता जी की इच्छा के विरुद्ध अपनी इच्छा से की हुई इस शादी को मैं किसी भी कीमत पर असफल नहीं होने देना चाहती थी।
मन्नू ने यह किताब 1992 में शुरू की थी लेकिन आत्मकथ्य साल-दर-साल आगे सरकता गया। सारी कचोटों, तकलीफों, तना-तनी के बाद दोनों सहज-सामान्य जीवन जीने का प्रयास करते रहे। मन्नू को लिखने-पढने की सुविधा तो थी लेकिन मानसिक तनाव व भावात्मक झटकों के कारण उस सुविधा का भरपूर उपयोग नहीं कर पा रही थीं। वे भी जीवन में थोडी-सी निश्चिंतता, थोडा-सा लगाव और सहयोग, थोडा-सा तनाव मुक्त और बेफिऋी चाहती थीं फिर भी लेखन ही वह बडा कारण था जो उन्हें इन सब मुश्किलों का सामना करने की ताकत देता था।
एक इंच मुस्कान उपन्यास दोनों का सहयोगी उपन्यास था। यह उपन्यास अपने तरह का नया प्रयोग था और सफल भी। इस उपन्यास को लिखना दोनों ने यह सोच कर शुरू किया कि इस बहाने कुछ लिखना हो जायेगा। यद्यपि यह वही उपन्यास था जिसे मन्नू शादी से पहले 20-22 दिन में लिख चुकी थीं। यह उसका पुनर्लेखन था तथा राजेन्द्र यादव भी इसमें जुड गए थे। दोनों की भाषा-शैली, नजरिया और स्तर बिल्कुल अलग-अलग होने के बावजूद यह बहुत अच्छा उपन्यास बना।
अपने अहम् और सामंती संस्कारों से लाचार राजेंद्र ने जीवन को असहज और तकलीफ देह बनाया। कब कौन-सी बात राजेंद्र को बुरी लग जाती है, कब वे छोटी-सी बात से आहत हो जाते पता नहीं चलता। मन्नू मानती हैं कि यदि हम अपना गुस्सा या तकलीफ बोल कर कह दं तो हल्के हो जाते हैं। लेकिन राजेंद्र इसके विपरीत चुप हो जाते और अपने आचरण से जता देते कि वे रूष्ट हैं। गृहस्थ जीवन में कई छोटी-छोटी बातें रोज होती हैंजिन्हें दरकिनार कर सहज जीवन की कोशिश होती रहती है। मन्नू और राजेंद्र भी करते रहें होंगे, फिर भी स्थितियाँ सामान्य नहीं रह पायी।
बच्ची के जन्म के बाद मन्नू की जिम्मेदारियाँ और बढ गईं। पहले बच्चे के जन्म की जो खुशी होनी चाहिए थी वह सब जिम्मेदारियोँ ने सोख ली। नौकरी तो मन्नू ने रानी बिरला कॉलेज में शुरू कर दी थी। बच्ची आया के भरोसे छोड कॉलेज जाती। लेकिन तकलीफ तब होती जब आया छुट्टी पर होती। यद्यपि राजेंद्र दो साल की बच्ची को नहीं रख सकते थे, फिर भी कोशिश तो करते, लेकिन नहीं-उसे देखना न राजेंद्र के बस का काम था और न ही वे उसके लिए तैयार थे क्योंकि उनके मन की असली गाँठ तो यह थी कि मेरे कॉलेज जाने के पीछे अगर उन्होंने बच्ची को देखा तो वे उसकी आया बनकर रह जाएंगे और उनका अहं उन्हें इस बात की अनुमति नहीं देता था।
राजेंद्र का अहम् उन्हें सामान्य नहीं रहने देता। सामंती संस्कारों में रहे राजेंद्र का पौरुषीय अहम् ही उन्हें कहीं भी नौकरी नहीं करने देता था। वरना अवसरों की कमी उन्हें कभी नहीं रही। आर्थिक मजबूती भी सामान्य जीवन के लिए जरूरी है वरना गृहस्थी की गाडी पटरी से उतरने लगती है। मन्नू राजेंद्र के बीच जिम्मेदारियों का बराबर बँटवारा न होना उनकी आपसी कलह को बढा रहा था। इन सबके बाद भी लेखन का प्रयास सतत् चलता रहता।
मन्नू जी बताती हैं कि राजेंद्र को अपनी बेटी से प्यार तो बहुत था। लेकिन उस प्यार के साथ का जो दायित्व होता है वह राजेंद्र में बिल्कुल नहीं था। इसलिए बच्ची अधिकतर मन्नू की बडी बहन सुशीला के पास रही। नौकरी के कारण बच्ची की शंटिग यूं ही चलती रही।
राजेंद्र यादव का व्यक्तित्व उलझा हुआ है यह मन्नू जान गई थी। इसलिए जब सभी घर के लोग और मित्र उन्हें सारिका पत्रिका के संपादन के लिए मुंबई जाने को कह रहे थे तब मन्नू जानती थी कि वह नहीं जाएंगे। क्योंकि उस जमाने में राकेश राजेंद्र का बहुत बडा काम्पलेक्स थे। इस बात को सफल होने पर राजेंद्र ने स्वयं स्वीकार भी किया। योग्यता, प्रतिभा और क्षमता के बावजूद हाशिए में पडा व्यक्ति सारे प्रयासों के बाद भी पिछड जाए तो मन की गाँठें नहीं खोल पाता और सफलता का स्पर्श मिलते ही वह गाँठें भी खोलता है और सहज स्वीकार भी करता है कुंठाओं को।
- लेखकीय मित्रों के बार-बार आग्रह और मिरांडा हाउस में नौकरी मिलने के बाद मन्नू जी ने दिल्ली में राजेंद्र के साथ रहने आ गईं। यहाँ भी दिक्कतें वही थी कि तीन साल की बच्ची की देखभाल कौन करेगा। मन्नू जी कॉलेज जाए तब उस बच्ची का ध्यान कौन रखे। रखने को राजेंद्र रख सकते हैं लेकिन-मैं नौकरी करने जाऊँगी और वे बच्ची को लेकर घर में रहेंगे, तो उनके लेखक मित्र यही तो समझेंगे कि यह तो बच्ची की आयागिरी कर रहे हैं। जो इन्हें किसी भी... किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं था।
- अपने आप को प्रगतिशील कहने वाले यहाँ रूढिवादी कैसे हो जाते हैं यह आश्चर्य की बात है। खुद के बच्चे ही लेखन में व्यवधान बनने लगे तो मुश्किल होता है ऐसे व्यक्तियों का साथ। इसका खामयाजा बेटी को ही भुगतना पडा, उसे फिर कलकत्ते भेज दिया गया। जन्म से लेकर चार साल तक टिंकू माँ और मासी के घर के बीच घूमती रही।
- टिंकू मन्नू को माँ के बजाय मासी को ही सगी माँ समझती। तब मन्नू को भी ठेस लगी कि राजेंद्र ने समानांतर जिंदगी का नाम देकर खुद को मुझसे अलग कर लिया और बेटी ने भी उन्हें असली माँ नहीं माना। यह सारा त्रास आँसुओं में निकला। कलकत्ता और दिल्ली के माहौल में बहुत अंतर था। जो अपनत्व कलकत्ता में था, वैसा दिल्ली में बिल्कुल नहीं। पर धीरे-धीरे मन्नू दिल्ली में रचने बसने लगी। कॉफी हाउस की बैठकें... कभी घर की बैठकें पढी लिखी चीजों पर चर्चा, भविष्य की योजनाएँ आदि चलती रहती।
- आपका बंटी जब मन्नू ने लिखना शुरू किया, तो हॉस्टल में कमरा लेकर रही। केवल शनिवार शाम घर जाती और सोमवार सुबह वापस आ जाती। बेटी टिंकू के घुटने पर लगने जब पूछा कि कैसे लगी तो टिंकू ने जो कहा वह सुन मन्नू को लगा कि काल्पनिक बंटी के सुख-दुख में तो मैं जी मर रही हूँ जबकि मेरा असली बंटी मेरे बिना उपेक्षित है। उन्होंने तुरंत सब छोड घर जाने का मन बना लिया और राजेंद्र को अपने घर आने की सूचना देने के लिए फोन किया। लेकिन राजेंद्र जानते थे कि यदि इस वक्त उपन्यास बीच में छूटा तो फिर यह कभी पूरा नहीं हो सकेगा। सो वे फोन पर ही मन्नू को समझाने लगे। मन्नू लिखती हैं-नहीं, अब और नहीं और नीचे उतरकर मैंने राजेंद्र को फोन किया कि मैं कल सामान समेटकर आ रही हूँ तो राजेंद्र ने मुझे केवल समझाया ही नहीं बल्कि पूरी तरह कन्विन्स भी कर दिया कि इस समय आ गई तो इससे बडी गलती और कोई नहीं होगी।
आपका बंटी उपन्यास ने मन्नू को बहुत ख्याति दिलाई। मन्नू ये मानती है कि चाहे उन्हें लिखने के अवसर कम मिले हों पर उनका मन सदैव लिखने के लिए व्याकुल रहता। आपका बंटी लिखने के बाद वे एक और उपन्यास की योजना पर काम करना चाहती थी। लेकिन समय और जिम्मेदारियाँ उन्हें रोक लेती।
राधाकृष्ण प्रकाशन के ओम प्रकाश से मन्नू ने वादा किया था कि वे नया उपन्यास जो भी लिखेंगी उनको ही देगी। उनकी बात मान ओम प्रकाश ने उन्हें अनुबंध पत्र के अनुसार एडवांस भिजवा दिया। मन्नू को अब दबाव लगने लगा कि लिखना है। लेकिन समय बीत रहा था और मन्नू लिख नहीं पा रही थी। संयोग से मन्नू परिवार के साथ शिमला गई। वहाँ गेस्ट हाउस में कुछ दिन रुक उपन्यास लिखने का मन बनाया। राजेंद्र यादव ने भी मन्नू का साथ दिया। वे बेटी के साथ दिल्ली आ गए और मन्नू वहीं रूकी। एक लेखक ये बात तो भली प्रकार से समझता है कि लेखन के लिए व्यक्ति का चिंतामुक्त होना आवश्यक है। राजेंद्र, मन्नू को चिंतामुक्त कर गए थे। शिमला का एकांत रंग लाया और मन्नू ने वहीं लिखा महाभोज। ओम प्रकाश को वादे के अनुसार पांडुलिपि भी सौंप दी।
- राजेंद्र यादव की पत्रिका निकालने की बहुत प्रबल इच्छा थी। वे कई वर्षों से पत्रिका निकालने की आकांक्षा मन में पाले थे। कइयों से बात भी होती, योजना भी बनती, लेकिन जाने क्यूँ योजना बनते-बनते रह जाती। ऐन मौके पर क्या कुछ हो जाता की पत्रिका की योजना कार्यान्वित नहीं हो पाती। बार-बार योजना बनते-बनते रह जाने के पीछे राजेंद्र की ही ऐसी होती की बात आगे नहीं बढती। राजेंद्र का जैसा व्यक्तित्व है मन्नू के हिसाब से वे किसी भी काम में किसी का हस्तक्षेप नहीं चाहते। मन्नू उनके व्यक्तित्व के बारे में लिखती हैं-मैं जानती हूँ कि राजेंद्र कहीं भी, किसी भी तरह का हस्तक्षेप तो बर्दाश्त ही नहीं कर सकते....न अपनी जिंदगी में, न अपने काम में। और शायद किसी की बॉसगिरी के तले ये काम भी नहीं कर सकते (इसलिए तो नौकरी करने से हमेशा कतराते रहे) तो बात कैसे बनती?
- खैर, जो होता है अच्छा होता है यह भी सही है। राजेंद्र ने गौतम नवलखा के सहयोग से अक्षर प्रकाशन से हंस का पहला अंक अगस्त सन् 1986 में निकाला। राजेंद्र की वर्षों की आकांक्षा पूरी हुई थी। हंस प्रकाशन जब शुरू हुआ तो राजेंद्र ने बडे आग्रह से मन्नू को भी कहानी लिखने को कहा। मन्नू भी हंस के निकलने से खुश थी और राजेंद्र की खुशी के कारण भी कहानी लिखने का मन बन गया। वे कहती हैं-राजेंद्र ने बडे आग्रह के साथ कहा था कि हंस के पहले अंक में तुम्हारी कहानी जानी ही चाहिए....समझ लो कि अनिवार्य है यह और बस।
नायक, खलनायक और विदूषक कहानी लिखी और राजेंद्र ने कहानी की सराहना भी की। हालांकि इस कहानी के मुख्य पात्र राजेंद्र ही थे इसलिए भी मन्नू डर रही थी कि उन्हें कहानी पसंद नहीं आएगी। लेकिन कहानी हंस में छपी। राजेंद्र का मन्नू को कहानी लिखने का आग्रह यह तो बताता ही है कि वे मन्नू को एक अच्छी लेखिका मानते थे। जब वे मन्नू की कहानियों के शीर्षक देते तो कहीं न कहीं प्रेम और लगाव ही इसके पीछे कारण होंगे।
राजेंद्र की आर्थिक स्थिति कभी भी बहुत मजबूत नहीं रही। हंस के अस्तित्व पर संकट के बादल सदा छाये रहते। उनके व्यवहार से मन्नू हमेशा ही तनाव में रहती। लेकिन राजेंद्र का अलगावपूर्ण साथ और संवादहीनता मन्नू को तनावग्रस्त रखता। इसी कारण उन्हें न्यूरोलजिया की बीमारी हो गई। तनाव से बचने के लिए मन्नू ने राजेंद्र को अलग रहने को कहा। वे कहती हैं मैंने बेहद ठंडे, निरावेग लेकिन दृढ शब्दों में कहा-राजेंद्र जी आप एक महीने में अपने लिए किसी मकान की व्यवस्था कर लीजिए क्योंकि अब मेरे लिए आफ साथ रहना संभव नहीं। अच्छा है, अलग रहेंगे तो आप भी ज्यादा स्वतंत्र रहेंगे और मैं भी ज्यादा तनावमुक्त।
इस कथन से राजेंद्र के अहम् को ठेस बहुत पहुँची होगी लेकिन वे अपने व्यवहार में कोई सुधार नहीं कर पाए। कुछ समय इधर-उधर निकाल फिर उसी घर में आ गए। और न्यूरोलजिया के अटैक के समय साथ में ही रह रहे थे, पर तब उन्हें मन्नू की चिंता कम थी। मन्नू की बहन सुशीला आई हुई थी सो उन्होंने ही संभाला पर राजेंद्र ने गोष्ठी को ज्यादा जरूरी समझा, वहीं गए।
मन्नू को लगता है कि कोई व्यक्ति इतना भी कैसे संवेदनहीन हो सकता है जिसके साथ तीस साल बिताए हों, उसके बीमार होने पर भी कहीं जाने का सोचा भी कैसे जा सकता है। लेकिन राजेंद्र इस मामले में हमेशा ही ऐसा करते थे। मन्नू हो या टिंकू बीमारी में सदैव ही संवेदनहीन ही रहे। संवेदनहीनता की हद भी ऐसी कि फोन पर भी मन्नू को सुनाने के लिए जोर-जोर से कहते हैं-अरे मन्नू नहीं जा रही है तो क्या हुआ, मैं तो हूँ-देखिए तो क्या मौज करवाता हूँ-अरे खूब मस्ती मारेंगे....आप अपना कार्यक्रम बिल्कुल कैंसिल नहीं करेंगी।
बीमार व्यक्ति को यह सब सुनकर कैसा लगता होगा ये हम सब समझ सकते ह। मन्नू की बीमारी का इलाज सिर्फ दवाइयाँ नहीं थीं बल्कि तनावमुक्त रहना भी जरूरी था। लेकिन राजेंद्र के व्यवहार से ऐसा ही हो पाना कठिन ही नहीं नामुमकिन भी था। मन्नू स्वयं स्वीकार करती हैं कि स्वभाव से ही वे तनावग्रस्त हैं, लेकिन साथ ही वे यह भी कहती हैं- लेकिन यदि अनुकूल परिस्थितियाँ मिलतीं ... अपनत्व भरा साथ मिलता, तो निश्चित रूप से मेरे सारे तनाव ढीले ही नहीं होते बल्कि समाप्त ही हो जाते।
जो कुछ सोचकर राजेंद्र का हाथ थामा था, वैसा कुछ भी मन्नू को नहीं मिला। जिस प्यार, अपनत्व की चाह पति से थी वो राजेंद्र से नहीं मिली इसलिए वे कभी तनावमुक्त हो ही नहीं पाई। अपने साथी का सहयोग, प्यार भरा लगाव यदि निरंतर मिलता रहे तो विभिन्न जिम्मेदारियों में खर्च हुई ऊर्जा की क्षतिपूर्ति होती रहती है। लेकिन मन्नू की ऊर्जा सिर्फ खर्च होती रही, आखिर में वे बिल्कुल खोखली हो गई, शरीर रोग-ग्रस्त हो गया।
संदर्भ ग्रंथ
1. मन्नू भंडारीः एक कहानी यह भी, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 2011
2. राजेन्द्र यादव, प्रभा खेतान एवं अभय कुमार दुबे पितृसत्ता के नये रूपः स्त्री एवं भूमण्डलीकरण, राजकमल प्रकाषन, नई दिल्ली, 2003
3. https://hindi.webdunia.com/article/hindi-books-review मुड-मुड के देखता हूँ।

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