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एक-दूसरे में समाती दो रूहें

शंभु गुप्त
(सन्दर्भ -सरमद-जामा मस्जिद की सीढियों पर एक नंगे-फकीर के कत्ल की दास्तान)
कृष्ण कल्पित की ग्यारह खण्डों की 100 पंक्तियों की यह लगभग लम्बी कविता आज के हिन्दी के आदाब बजा लाने वाले आपा-धापी भरे साहित्योत्सव-धर्मी माहौल में एक तनकर सीधे खडे होने का अक्स मुहैया कराते हुए लगभग एक नजीर बनकर उभरती दिखाई देती है। कृष्ण कल्पित ने अपने काव्य-सृजन से पिछले दिनों लगातार चौंकाया है। धीरे-धीरे साफ हुआ कि इस कवि को लेकर चौंकने की नहीं, बल्कि इसके मार्फत इतिहास, संस्कृति, सामाजिक सम्बन्धों, सौन्दर्यशास्त्र इत्यादि का नए सिरे से पुनरावलोकन किए जाने की जरूरत है। फेसबुक के खुले मैदान को दृष्टि-सम्पन्न बनाने वालों में वे अव्वल रहे हैं। यह कविता भी सबसे पहले वहीं आई और सबका ध्यान खींचा। ज्यादातर वे सनसनी से शुरू करते हैं, पर बात जब अपने ऊरूज़ पर पहुँचती है, तो किसी अंतःस्रोत की तरह प्रतिरोध का झरना पग-पग से फूटता चलता दिखाई देने लगता है। यह सिर्फ इस कविता की नहीं, उनके इधर के ज्यादातर लेखन की पहचान है। वे जैसे एक नई दुनिया हमारे सामने खोल देते हैं और ठसके से एक चुनौती फेंकते हैं कि लो, सँभल सको, तो सँभलो! ...एक बेचैन कवि की यह भी एक मूलभूत पहचान है ही तो सही!
यह कविता सरमद : जामा मस्जिद की सीढियों पर एक नंगे-फकीर के कत्ल की दास्तान ; एक कविता है या नहीं; इस पर बहस हो सकती है। लोग नाक-भौं सिकोडेंगे शायद इसीलिए कवि ने उसे अथवा लगाकर काव्याख्यान भी कह दिया है। लेकिन विधाओं के भारी परस्पर समन्वय और अंतर्विलय के इस वैश्विक जमाने में विधा की अस्पृश्यता की बात करना एक प्रकार का शुद्धतावाद ही कहा जाएगा, जो शातिर दुराग्रहों से भरा ही होता है। कृष्ण कल्पित एक नई तरह की विधागत संश्लिष्टता के प्रवाचक के तौर पर अरसे से सक्रिय हैं, यह बात ध्यान में रखे जाने योग्य है। जहाँ तक इस कविता की बात है तो परम्पराप्रेमियों को यह बता देना काफी होगा कि अमूमन जिसे कविता की आन्तरिक लय कहा जाता है, वह इस कथित काव्याख्यान की असली जान है, जो हर पाठक के दिल में बसती है। दस दरवाजों को पारकर ग्यारहवें की देहरी पर हमें जो यह लिखा मिलता है कि खूने कि इश्क रेजद हरगिज़ न बाशद (इश्क में जो खून बहता है वह कदापि व्यर्थ नहीं जाता!); वह इस सारे काव्य-श्रम का निचोड कहा जा सकता है, हालाँकि इश्क में खून बहने की नौबत तभी आती है, जब सत्ताएँ उसके बीच रास्ते में आ जाती हैं और उसे अपने हिसाब से हाँकने की कोशिश करती हैं। खून बहने की नौबत दरअसल तब आती है, जब प्रेम के दीवाने सत्ता के दखल की परवाह न करते हुए अपनी राह बदस्तूर चलते जाते हैं और न केवल चलते जाते हैं; सत्ता को ठेंगा भी दिखाते जाते हैं कि कर लो, जो करना है; हम तो ऐसे ही चलेंगे! यहाँ देखने वाली बात यह है कि प्रेम-दीवाने तो लगभग सब-कुछ से बेखबर अपनी धुन में बिना आगा-पीछा देखे चलते जाते हैं, उन्हें सत्ता से ज्यादा कोई वास्ता रहता भी नहीं है पर इन सत्ताओं का क्या किया जाए, जो इसे अपने लिए एक चुनौती समझती हैं और उन्हें लगता है कि उन्हें सेटा नहीं जा रहा है!
बात हालाँकि मात्र इतनी भी नहीं है। बात असल में यह है कि इन सत्ताओं को लगता है कि लोग उसके अनुसार; उसकी बनाई लीक, उसके बनाए नियमों, उसकी विचारधारा, उसके सोच, व्यवस्था, व्यवहार के अनुसार; नहीं चल रहे हैं, लोग अपने हिसाब से जीवन जी रहे हैं, हमारी अपेक्षानुसार उनकी जीवनचर्या नहीं है; यह सरासर मनमानापन है, स्थापना की अवहेलना है, व्यवस्था का विरोध है। यह सह्य नहीं है! सत्ताओं का यह सर्वसत्तावाद असल मसला है। प्रेम जैसे मामले में खून का क्या काम? लेकिन जब सत्ता इसी बात पर आमादा हो कि अगला जिए तो हमारे हिसाब से, वरना तो उसे जीने का हक ही नहीं; तो खून बहना ला*ामी हो जाता है। सत्ता इसका एक विकल्प भी देती है कि यदि आप खून नहीं बहाना चाहते, तो हमारे साथ समायोजन/समझौता कर लो और हमारी शर्तों के अधीन हो आओ! लेकिन सरमद जैसे कुछ सिरफिरे नंगे-फकीर होते हैं, जो फिर भी नहीं मानते और अपनी *ाद पर अडे रहते हैं!
कृष्ण कल्पित ने लिखा है कि वे दो महीने से इस मुश्किल कविता में लगे थे। सामग्री इतनी ज्यादा थी कि उसमें फँस के रह गए! दरअसल फँस के रहे नहीं; सकुशल और सशक्त होकर बाहर निकल आए और अकेले नहीं, झोली-भर हीरे-मोती, जवाहरातों के साथ कि समेटो, जो जितना समेट सको! ये हीरे-मोती, जवाहरात ही तो हैं, जो इस कविता को इतना कीमती बनाते हैं।
मित्रों! ये हीरे-मोती, जवाहरात हैं, प्रतिरोध और संघर्ष और निडरता और निर्लोभ और असमायोजन और सत्य-भाषण और बेबाकी और अपनी आजादी को हर हाल में बनाए-बचाए रखना और सचेतनता और अपने स्टैंड पर अडिग रहना और तार्किकता और साधारणता और आत्मसम्मान.... ये तो वे चीजें हैं, जो पाठक से ताल्लुक रखती हैं।
लेखक और उसकी रचना-प्रक्रिया से ताल्लुक रखने वाली चीजों की फेहरिस्त तो बहुत ही बेमिसाल और दूरगामी है। इनकी सूची यह हो सकती है- एक आत्मसंघर्षपूर्ण और बेतरह खराद पर चढाकर आगे-पीछे, दाएँ-बाएँ, ऊपर-नीचे सब तरफ से परखी और बरती गई बेलाग इतिहास-दृष्टि, अतीत और वर्तमान दोनों को एक-दूसरे को आईना दिखाना, इतिहास से सबक न सीखने वाले समाजों की स्थिति का अंतरीक्षण, शाहे-वक्त की सही-सही पहचान, ऐतिहासिक घटनाओं/परिघटनाओं पर सामान्य लोकमत की तलाश, यथार्थ के प्रति झोली-फटकार अभावुक रवैया, इतिहास के बीहड की अंदरूनी खँगाल, तार्किक जीवन-दृष्टि और मूल्यबद्धता ....
पाठक और लेखक के इस द्वन्द्वात्मक सहमेल से जो तीसरी चीज निकली है, वह सबसे अनमोल है। वह चीज है, अपनी समकालीन राजनीति, राज्य का चरित्र, मौजूदा समय की दुशवारियाँ, सत्ताधारियों के सर्वसत्तावादी मंसूबे, समय की बौद्धिकता (इंटलेक्ट) पर छाए संकट के बादल, व्यक्ति की सोचने और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर मँडराते भीषण खतरे, धर्म/धार्मिक कूढमगजी का भयावह पुनरुत्थान, हिंसा/हत्या का राजनीतिक इस्तेमाल, विकल्प या विमत का दमन, उसे नेस्तनाबूद करने के लिए राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, न्यायिक संस्थाओं का इस्तेमाल और उन संस्थाओं का सत्तावादी धु*वीकरण; इन सब जलते-उबलते समसामयिक मुद्दों पर गहन अन्तर्दृष्टिपूर्ण विचार और विमर्श और एक रचनाकार और एक व्यक्ति के बतौर न्याय का पक्ष-ग्रहण और उसके प्रति अटूट, अपनी ओर से आत्मसात की गई प्रतिबद्धता! एक व्यक्ति और कवि के बतौर कृष्ण कल्पित द्वारा अपने लिए की गई यह कमाई अद्भुत है और आज के बेहद संक्रमित समय में बहुत दुर्लभ है।
आज का कोई कवि इतिहास को इतने मौजूँ तरीके से पुनराख्यायित/पुनरुत्पादित/पुनर्प्रासंगिक बना सकता है; कृष्ण कल्पित के रूप में यह सुखद आश्चर्य यहाँ हम देखते हैं। सत्रहवीं शताब्दी के सरमद का बेरहम दुःखान्त तो इस काव्याख्यान का मूल विषय है ही; कृष्ण कल्पित उससे भी सात सौ-आठ सौ साल पहले के अन अल हक की उद्घोषणा करने वाले मंसूर अल हल्लाज के बगदाद में सरे-आम निर्मम यंत्रणाओं के बाद टिगरिस नदी के किनारे सर कलम किए जाने के वाकये तक हमें ले जाते हैं और वह भी इतने संक्षेप में, इस कुशलता के साथ कि किसी काव्य-कौशल की जरूरत ही नहीं रह जाती- मंसूर की प्रसिद्धि पुरानी हो गई। मैं सूली पर चढने का दृश्य नये सिरे से पैदा करता हूँ। किसी कवि के लिए इससे बडा दुर्भाग्य क्या होगा कि किसी के सूली पर चढने का दृश्य उसे पुनर्रचित करना पडे; लेकिन जब यथार्थ वास्तविकताएँ इतनी बेहूदा हों और लगातार योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दी जा रही हों कि इतिहास खुद को दुहराता है, यह तथ्य भी एक पैरोडी नजर आने लगे तो कोई न कोई रास्ता तो निकालना ही पडता है। इतिहास खुद ब खुद अपने को कभी नहीं दुहराता। इतिहास अपने को दुहराता है, यह इतिहास-दृष्टि उन आततायी शासकों, राष्ट्राध्यक्षों इत्यादि की कारस्तानियों को हल्का कर देती है, जो अपने से असहमत लोगों पर राज्य की संस्थाओं का सहारा लेकर जुल्म ढाती हैं, उन्हें नेस्तनाबूद करने में कोई कसर नहीं छोडतीं। अपने-आप को इतिहास नहीं, राज्य दुहराता है, राज्य के सर्वसत्तावादी अहमन्य मुखिया दुहराते हैं, समयों के अंतरालों में वे पुनरुत्थित/पुनरावतरित होते हैं; कृष्ण कल्पित की इस लम्बी कविता का पहला बडा अभिप्राय यह है! ....मंसूर अल हल्लाज -सरमद- गोविन्द पानसरे, दाभोलकर, कलबुर्गी, गौरी लंकेश....! हम सब जानते हैं, यह सिलसिला अभी जारी है और न जाने कब तक जारी रहेगा! इन कुछ नामों के अनुक्रम में वे कुछ नाम भी शामिल किए जा सकते हैं, जो कत्ल किए जाने के प्रोसेस में हैं; जो झूठे और पूर्व-आकलित मुकद्दमों में जेलों में डाल दिए गए हैं, जिन्हें डिजिटली और फिजिकली लगातार ट्रोल किया जा रहा है, जो लिंच किए जा चुके हैं या किए जा रहे हैं!
इसलिए यह न समझा जाए कि कवि इतिहास पर केन्द्रित है, उसे दुहरा रहा है; कवि सोलहों आने अपने समकालीन राज्य और राजनीति पर केन्द्रित है; इतिहास से सिर्फ प्रमाण जुटा रहा है कि देखो, यह है, हमारे महान भारत देश की राज्य/राजनीतिक परम्परा; कि तुम उसकी शान में कोई गुश्ताखी करके तो दिखाओ! राज्य/राजनीति की हमारी लम्बी परम्परा में बाकायदा इसके पुख्ता इन्तजामात हैं! यह कविता हमारी इस समृद्ध राजनीतिक परम्परा की प्रामाणिक खोज करती है; यह इसकी दूसरी बडी उपलब्धि है।
इसकी तीसरी बडी उपलब्धि है, बिना किसी को कोई भला-बुरा कहे, बिना कोई उत्तेजना फैलाए, बिना कोई दार्शनिकता झाडे; लगभग उतने ही ठंडे और कूटनीतिक तरीके से जैसे शहर काजी मुल्ला कवी बादशाह की सहमति से कलमदान का पहले ढक्कन खोलता है, फिर कलम की नोक उसमें डुबोता है और फिर कागज पर सरमद के मृत्युदण्ड का फरमान लिखता है! कवि ने जिस स्लो-मोशन में यह दृश्य अंकित किया है, वह प्रविधि राज्य की उस ठंडी हिंस्र क्रूरता को मूर्तिमान कर देता है, जिसने उसे एक संस्था की जगह एक गिरोह में तब्दील कर दिया है। कविता यह स्थापित और संप्रेषित करने में पर्याप्त सफल रही है कि एक संस्था की जगह एक गिरोह में बदल जाने की राज्य की यह फितरत हमारे इतिहास की एक ऐसी भयावह सच्चाई है, जो, जैसे ही स्थितियाँ उसे अपने अनुकूल दिखाई देती हैं, अपनी कब्र से वह निकल आती है और एक नया रूप धर कर सक्रिय हो जाती है; लगभग उसी चरित्र और गुणों के साथ, जो अब तक इसके रहते आए हैं! केवल धड बदलती है, कलेजा वही रहता है! पहले राजशाही थी तो बादशाह की सहमति सीधे-सीधे थी, उसमें किसी के डिसेंट नोट की गुंजाइश नहीं थी; आज हमारी सत्तर-साला जनतान्त्रिक राज्य-प्रणाली में असहमति की ढेरों प्रविधियाँ हैं, लेकिन देखने में आ रहा है कि सर्वसत्तावादी राजनीतिक प्रबन्धन ने लगभग सब की सब हजम कर ली हैं। मौजूदा सर्वसत्तावादी राजनीतिक ऑपरेशन किसी मायावी क्रिएचर की सांघातिक लीलाओं की तरह जारी है, जहाँ सारी राजनीति जैसे एक ब्लैक होल में समाती जा रही है। मैंने कहा कि कवि एकदम ठंडे और अनलाउड तरीके से अपनी बात कहता है। लेकिन आप कवि की एक ऐसी मुद्रा की कल्पना करें, जो अपने ऊपरी निष्कंप में भी भीतर धधकते अनगिनत ज्वालामुखियों का आभास करती चलती है! सरमद जैसे चरित्र को उठाना और उसे नितांत मौजूँ बना देना और इस तरह से कि सब-कुछ आईने की तरह साफ होता चले और हम अपने समय की विकरालता को मूर्तिमान रूप में खडा देख पाएँ; यह कोई हँसी-ठट्ठा नहीं! इसके लिए ज्ञान के साथ-साथ गहरी जनप्रतिबद्धता भी चाहिए!
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सरमद के आख्यान सम्बन्धी जो सामग्री मिलती है, उसमें अन्य के अलावा मौलाना अबुल कलाम आजाद का लिखा लेख (Votary of Freedom) सबसे काम का है। इस लेख में अपनी तेईस साल की उम्र में आज से कोई एक सौ आठ साल पहले मौलाना आजाद ने सरमद के बारे में जो कुछ लिखा, वह उस समय चाहे जितना *ारूरी रहा हो, आज द्वन्द्वात्मक रूप से वह कई गुना प्रासंगिक हो गया है। उस समय औपनिवेशिक राज्य-सत्ता थी, उसकी अपनी धर्म/सम्प्रदाय-आधारित गृह-नीति थी, उसे अपना वर्चस्व बनाए रखना था, कथित प्रगतिशीलता के आवरण में उसने दकियानूसी, परंपरावाद को खूब बढावा दिया, लोगों को बाँटा और एक-दूसरे से लडाकर खुद मुद्दा बन उनकी कमजोरियों का फायदा उठाया; क्या दक्षिणपंथी सरकार के राज्य तले आज फिर वही परिदृश्य आ खडा हुआ है? अबुल कलाम आजाद को उस समय अपने समय के सवालों के जवाब के रूप में सरमद शहीद याद आया और आज हिन्दी के एक वरिष्ठ हरफनमौला कवि को भी वही जरूरी महसूस हुआ!
अबुल कलाम आजाद का सरमद को याद करने का जो आधार उस समय था, आज एक शताब्दी बाद हमारे कवि के लिए भी वही बना हुआ है; क्या इसके कुछ निहितार्थ नहीं हैं? मेरा खयाल है कि इन्हीं निहितार्थों को समझने की प्रत्रिज्या में यह कविता लिखी गई है।
अबुल कलाम आजाद ने अपने लेख में जो सबसे महत्त्वपूर्ण मुद्दा उठाया था, वह था- व्यक्ति की सोचने और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता।
दूसरा मुद्दा उठाया था- धर्म तथा अन्य समस्त प्रकार की एकता और अभेद। सरमद जन्म से यहूदी था, फिर मुसलमान हुआ, फिर हिन्दू। इसका अर्थ यह हुआ कि धर्मों के बीच जो फर्क है, वह बनावटी है और सारे धर्म एक ही हैं। इससे एक तरफ धार्मिक सौहार्द का सन्देश मिलता है तो दूसरी तरफ धर्मनिरपेक्षता का। सरमद के बारे में यह भी कहा जाता है कि धीरे-धीरे वह सभी धर्मों के प्रति क्रिटिकल होता चला गया था। अपनी खुद की एक रुबाई में उसने बाकायदा यह कहा था कि न तो वह यहूदी है, न मुस्लिम है न हिन्दू है। वह प्रचलित धार्मिक मत-मतांतरों से ऊपर हो गया था और सूफी परंपरानुसार ज्यादा से ज्यादा आध्यात्मिक हो चला था। सरमद एक तरह से निरीश्वरवादी और गैर-दकियानूसी धर्माचरण का हिमायती हो गया था।
सरमद का व्यक्तित्व बहुत ही समाहारी तथा संश्लिस्ट था। धर्म के, समाज के, या और किसी भी तरह के विभेद को सरमद एक विभ्रम समझता था। उसका कहना था कि हम यानी पूरी की पूरी मनुष्य-जाति एक है, हम अनेक, अलग और परस्पर भिन्न हैं; यह एक विभ्रम है। Issac A.Ezekiel ने 2005 में प्रकाशित अपनी पुस्तक Sarmad...Martyr to Love Divine (Mystics of the East Series) के आमुख में लिखा है कि "He was not bound by the illusion that there is more than the one- the illusion that we are many, separate and different from each other. He left behind all concepts about God and religion, and even himself.
उक्त के अलावा और जो सबसे महत्त्व की बातें सरमद के व्यक्तित्व और कल्पित की इस कविता से उपलब्ध होती हैं, वे ये हैं-
- मनुष्यता के प्रति बहुलतावादी रवैया। अनेक संस्कृतियों
के बीच पुल का काम।
- सहिष्णुता तथा सह-अस्तित्व।
- अन्धधर्मवाद/धार्मिक दोगलेपन का निषेध।
कल्पित की यह कविता जैसे सरमद की रूह में समाकर उसे हमारे सामने दुबारा जिन्दा कर देती है। कहा जाता है कि रूहों को दुबारा जिन्दा करने की कोशिश कर परेशान नहीं करना चाहिए। वे दुबारा जिन्दा होती भी नहीं हैं। लेकिन यह दो कवियों और झोली-फटकार शख्सियतों का मुआमला है! वे एक-दूसरे की रूह में समाना ही चाहते हैं तो कोई क्या कर सकता है भला! इन रूहों की कुछ खताएँ तो अल्लाह भी मुआफ कर देगा!

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