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मिथक और मूल्य : लोक के आलोक में

शंपा शाह
अलबर्ट आइंस्टाइन के सापेक्षता के सिद्धांत को जाने-समझे बगैर उसका प्रत्यक्ष और गहरी छाप छोडने वाला अनुभव अक्सर बचपन में की गई यात्रा, खासकर रेल यात्रा के दौरान होता है। और यह एक अविस्मणीय अनुभव होता है- सरपट भागती रेल के साथ आगे जाते हुए हम और रेल की खिडकी से बाहर ठीक उलट दिशा में उतनी ही रफ्तार से पीछे भागते पेड-पहाड, खेत-खलिहान, समूची धरती! आगे बढने की रफ्तार जितनी तेज, उतनी ही तेजी से पीछे छूटता परिदृश्य।
बैलगाडी में बैठकर जाते हुए भी दृश्य के उलट दिशा में जाने का एहसास तो होता है, किन्तु हमारे आगे बढने और दृश्य के पीछे छूटने की गति इतनी मंथर होती है कि छूटता हुआ दृश्य देर तक दिखता रहता है- और छूटने की अनुभूति को कम कर देता है। इसके उलट, यदि तेज रफ्तार बुलेट ट्रेन में यात्रा की जाए, तो आगे जाने और पीछे छूटने की दोनों गतियाँ इतनी तेज होती हैं कि खिडकी से दृश्य को देखा ही नहीं जा सकता। यानी, कहीं जाने और कुछ पीछे छूट जाने के दोनों अनुभव हमसे छिटक जाते हैं और हमें रेल में हो रही घोषणा या अपने टिकट पर लिखे गन्तव्य के नाम को देखकर ही यह मान लेना होता है कि हम पीछे नहीं आगे ही जा रहे हैं।
पिछले वर्षों में हमारा हाल तथाकथित विकास नाम की बुलेट ट्रेन में बैठकर कुछ ऐसा ही है। मीडिया और दुनिया भर की सरकारें लगातार यह कह रही हैं कि हमारा गन्तव्य चाँद या अंतरिक्ष में कोई उससे भी नायाब जगह है इसलिए हम यथासंभव जितनी गति से भाग सकते हैं भागें। किन्तु इस तेज रफ्तार दौड में हमारे स्नायुतंत्र के वे पुर्जे जिनसे हमें हमारे होने का बोध होता था, सुन्न पड गए हैं। हमें नहीं पता हम क्यों है? कहाँ हैं? कहाँ से, कहाँ को और क्यों चले? सामने की सीट पर बैठा परिवार क्या वहीं से चढा जहाँ से हम चढे? हम कहाँ से चढे? नहीं, हमारा अनुभव तंत्र पुरानी, बंद घडी-सा, बे-आवाज पडा है, यह कुछ नहीं बता रहा। किन्तु रेल में बैठे अधिकांश लोगों के पास मोबाइल या लौप-टॉप है जिससे ऐन इस वक्त आप धरती पर कहाँ है? दूर अंतरिक्ष की कक्षा में घूमता उपग्रह बिल्कुल ही ठीक बता रहा है। तब प्रश्न यह उठता है कि अनुभूति या अनुभव जनित ज्ञान की अब कोई जरूरत भी है? तकनीकी ज्ञान और सूचना की चौतरफा आतिशबाजी के बीच क्या कोई अँधेरा कोना है जिसे सिर्फ हमारा अवस्थिति बोध का टिमटिमाता दिया ही दूर कर सकता है?
किसी भी दिन का अखबार देख डालिए तो स्थिति साफ हो जाएगी। हिंसा, होड और सब कुछ के बिकाऊ होने के विज्ञापनों को देख जो पहली बात मन में आती है वो यह कि दुनिया में चीजों, घटनाएँ जैसे घटित हो रही है, जीवन जैसा चल रहा है, उसे वैसा नहीं चलना चाहिये। उसे कुछ और होना चाहिये। सत्ता और शक्ति की ऐसी दौड जिसमें हर व्यक्ति किसी भी कीमत पर दूसरे से ऊपर होना चाहता है। हर राष्ट्र दूसरे से समृद्धतर - आर्थिक-राजनीतिक महाशक्ति बनना चाहता है फिर चाहे इसके लिए हमें करोडो लोगों, जीव जन्तुओं, नदी-पहाड-जंगल सबसे हाथ धोना पडे। आधुनिक सभ्यता ने विकास का यह जो प्रारूप चुना है, उसका अंततः वादा क्या है? यही न कि जीवन जैसा है उसकी गुणवत्ता कई गुणा बेहतर हो सकती है और होगी। लेकिन इस रास्ते पर चलते हुए हमें जिनता समय हो गया है, उससे यह साफ होता जा रहा है कि यह वादा सबके लिए नहीं है, नहीं हो सकता। यह चुनिंदा, गिनती के चार लोगों के लिए बाकी सब कुछ की बलि देकर ही संभव है। न सिर्फ लोगों की पर समूची प्रकृति को दाव पर लगा कर ही संभव है। और प्रकृति मानी साँस लेने लायक साफ हवा-पानी, धरती-आकाश ही नहीं बचे, तो क्या वे चुनिंदा लोग भी बचेंगे? और क्या वह गुणत्मक रूप से बेहतर जीवन हो सकता है?
हमारे देश की तीसरी सबसे बडी जनजाति भील का एक सृष्टि मिथक है जिसे कथा गायक (मलंगा) विवाह के अवसर पर घराती-बराती को साथ बिठा कर सुनाता है। उसका संक्षिप्त रूप यह है कि- एक बार पृथ्वी पर बारह वर्ष का भीषण अकाल पडा। समूची धरती त्राहि-त्राहि कर उठी। लोग घर के छप्पर और अनाज की कोठी कूट-कूट कर खाने लगे। तब लोगों को ख्याल आया कि समुद्र में अनंत आकार की रागस मछली रहती है, लोग बडी-बडी छुरियाँ ले समुद्र की ओर दौडे। एक बहुत ही गरीब, दलित भाई-बहन तक भी यह खबर आई और वे भी समुद्र तट पर पहुँचे। पर वहाँ पहुँच कर वे भाई-बहन दंग रह गए- रागस मछली तो जिन्दा थी। शरीर पर हर जगह घाव और टपकता खून लेकिन फिर भी जन्दा। हम जिन्दा मछली को कैसे खा सकते हैं? भूख से आकुल-व्याकुल और मरने की कगार पर भी उस भाई-बहन से यह नहीं हुआ और वे घर की ओर मुडे। तभी, रागस मछली ने आवाज देकर उन्हें रोका और कहा- सारे लोग तो मुझे काट-काट कर कब से खा रहे हैं, तुम दोनों गलत-सही के सोच में क्यों पडते हो और फिर मेरी देह इतनी विशाल है कि तुम्हारे थोडा-सा ले लेने से मेरा कुछ नहीं बिगडेगा और तुम्हारी जान बच जाएगी। किन्तु इस आदि मिथक के भाई-बहन के गले बात उतरी नहीं और वे हाथ जोड रागस मछली को प्रणाम कर लौटने लगे। रागस मछली बोली तुम दोनों के हृदय में अपार करुणा है इसलिए तुम्हें बता रही हूँ कि मनुष्य की दुष्टता मैं अब और नहीं सहूँगी- तीन दिन बाद मैं अपनी पूँछ पलटूँगी और धरती उलट-पुलट हो जाएगी। तुम दोनों लुहार से उडन खाटोला बनवा लो, ताकि तुम बच सको। भील कथावाचक खुमान सिंह (अलीराजपुर) कहते हैं, तीसरे दिन मछली ने पूँछ पलटी और दुनिया जलमग्न हो गई। सिर्फ वो भाई-बहन बचे। युगों बाद पानी उतरा, धरती फिर ऊपर आई, पावागढ पर्वत ने चतुराई से अन्न और जीव-जगत के बीज को अपने ऊपर बचा लिया था और इन्हीं से पूरे जीव-जगत की रचना फिर हुई। लिखमा जोखारी ने सबके काम लिख कर उनके भाग्य तय किया, गाँव-नगर बनाए और जीवन के विधान बताए। उसी विधान के अनुसार आज हम यह विवाह संपन्न करा रहे हैं।
यह मिथक गहन निहितार्थों को धारण किये हुए प्रतीकों का एक पुँज है जो मनुष्य और प्रकृति के प्रबंध और स्वयं मनुष्य के होने के निहितार्थ को आलोकित करता है। प्रकृति रूपी जन्दा रागस मछली कब तक सहेगी? यदि वह अपनी पूँछ पलट दे, तो धरती का उलट-पुलट होना अवश्यंभावी है। किन्तु इससे भी बडी बात जो इस मिथक में आती है, वह है मनुष्य के भीतर की करूणा संपन्न चेतना, जो मृत्यु और जीवन के बीच स्वेच्छा से मृत्यु का वरण इसलिए कर रही है क्योंकि जीवन से भी ऊपर किसी मूल्य को उसने पहचाना है। वरना प्रकृति का नियम तो यही कहता है कि जीवो जीवस्य भोजनम् और आगे इससे भी निर्मम डॉर्विन का सरवाइवल आफ द फिटेस्ट का नियम।
सृष्टि की महागाथा में यही वह बिन्दु है जब आत्मचेतस मनुष्य एक गजब की छलाँग लगाता है। जिस क्षण वह अपने युगों-युगों से संचित संज्ञान में मौन को फोड एक नाम का उच्चार करता है उसी क्षण वह प्रतीक स्रष्टा बन जाता है। वह खुद से बडी एक चीज रच कर प्रकृति के नियंत्रण घेरे से स्वतंत्र हो जाता है। स्वतंत्र होने का यह अर्थ नहीं है कि उस पर प्रकृति के नियम लागू नहीं होंगे। वह प्रथमतः इस प्रकृति के सैकडों जीव-धारियों में से एक है और उसे भूख-प्यास, रोग-शोक, काम-क्रोध व्यापेंगे। वह प्रजनन, जीवन-मरण के मूल नियम से नहीं छूट सकता। किन्तु वह भूख और मृत्यु के कगार पर भी यह चुन सकता है कि अपना जीवन बचाने के लिए वह अमुक साधनों का इस्तेमाल नहीं करेगा। जैसा कि कथा के भाई-बहन ने किया। यानी मनुष्य पहला ऐसा पशु है जो अपनी मृत्यु का स्वतंत्र चेतना से वरण कर सकता है क्योंकि वह अपने लिए जीवन से ऊपर कुछ मूल्य सिरज लेता है। इस मिथक में सब कुछ को लील जाने वाले प्रलय में जीवन का जो बीज बचता है वह उन भाई-बहन की जीव मात्र के प्रति अपार करुणा के कारण बचता है- कथा के अनुसार हम सब उन्हीं की संतति है। प्रकृति केवल उनके कानों में अपना रहस्य फुसफुसाती है। क्योंकि जो स्वेच्छा से दूसरे के लिए अपना उत्सर्ग कर सके, उसी में दूसरे को बचा सकने की शक्ति प्रस्फुटित हो सकती है। अन्यथा, इतिहास गवाह है कि करूणा रहित व्यक्ति या तो स्वयं आततायी होता है या फिर आततायी का मोहरा हो सकता है।
नृतत्त्वशास्त्री लेवी स्ट्राॅस कहते हैं कि किसी भी संस्कृति के मूल्य और नैतिक आधार उसके प्रतीकों और मिथकों में गुँथे होते हैं। वे यह भी कहते हैं कि मिथक की संरचना हूबहू भाषा जैसी होती है। किसी एक भाषा का जानकार किसी अन्य भाषा को यूँ समझने में पूरी तरह असमर्थ हो सकता है, किन्तु जब वह इन दो या अनेक भाषाओं की संरचनात्मक बनकर, उसके शब्द संसार के बीच अंतर्निहित संबंधों के ताने-बाने पर ध्यान एकाग्र करेगा, तो बहुत से साक्ष्य अपने आप उजागर होंगे। ठीक इस तरह से संसार भर के मिथकों के कथानक को जब हम पढते हैं, तो वे हमें असंबद्ध, बेमेल और अर्थहीन जान पडते हैं, पर जब इन मिथकों में घटनाओं में अन्तर्भूत प्रतीकों और फिर कथानक में इन प्रतीकों की परम्परा जमावट और अन्तःक्रिया को देखते हैं, तो पाते हैं कि संसार के सारे मिथक भाषा की ही तरह सृष्टि के विपरीत तत्त्वों, कारकों, के बीच सामंजस्य बिठाने का उपक्रम हैं। इसीलिए भाषा और मिथक दोनों मूल्यरहित ही हो सकते। उदाहरण के लिए जब हम कहते हैं- पेड तब हमारे यह कहे बगैर कि पेड का जीवन से घनिष्ठ रिश्ता है, आदि, मात्र पेड शब्द ही उसके धरती-आकाश, अंधकार प्रकाश से अदृश्य पर अविच्छिन्न अंतर्संबंधों के गझिन जाल को यहीं तक ही प्रतिबिम्बित करता है। इसी तरह मिथक भी उस समुदाय, उस संस्कृति के अर्मूत भय, आकांक्षाओं का स्वप*वत् गान है। किसी भाषा में शब्द सिर्फ अर्थ को वहन या प्रेषित करने का माध्यम भर नहीं होता, बल्कि अर्थ उसमें मर्म की तरह तरंगित रहता है। इसीलिए मिथक भी हमारे जीवन के अर्थ को वहन या प्रेषित करने का माध्यम भर नहीं होता, बल्कि अर्थ उसमें मर्म की तरह तरंगित रहता है। इसीलिए मिथक भी हमारे जीवन के अर्थ को उतना आलोकित नहीं करता, जितना हमारे होने के अपूर्व अनुभव को आलोकित करता है। जयशंकर प्रसाद के शब्दों में -
मैं हूँ यह वरदान सदृश क्यों लगा गूँजने कानों में
मैं था, मैं हूँ और रहूँगा शाश्वत नभ के गानों में।।
लेकिन जीवन की बाहरी आपा-धापी में और लगातार उन बाहरी प्रेरणाओं का पीछा करते हुए जिनका हमारे इस पृथ्वी पर होने और कल उतनी ही अभूतपूर्व तरह से न होने की विलक्षण घटना से कोई लेना-देना नहीं है, हमारे अनुभव करने की क्षमता ही धीरे-धीरे खो जाती है। हम अपने होने के अनुभव से ही लगातार कटते जाते हैं। हमारे होने की अर्थवत्ता क्या है? इस प्रश्न के पहले यह बोध होना होगा कि हम हैं! हमारी अर्थवत्ता सबसे पहले और शायद अंतिम रूप से हमारे आत्मचेतस और स्वाधीन होने के अहसास में हैं। दुर्भाग्य से स्कूल कॉलेज की पढाई-लिखाई और बाद में हामारे चुने हुए जीविकोपार्जन के व्यवसाय इस पृथ्वी और मानव समाज में हमारे होने को आलोकित करने में हमारी कोई मदद नहीं करते। एक आत्मविस्मृति हमें घेर लेती है। एक पुख्ता आत्मा के अभाव में आत्मबोध और अस्मिता भी कैसे हो सकती है? और अपनी अस्मिता खोने का अहसास हमें दूसरे के प्रति असहिष्णु और हिंसक बनाता है। खबरें यह बताती हैं कि गाडी खडी करने के स्थान को लेकर व्यक्ति पडौसी की हत्या कर देता है, परिवार अपनी बेटी के प्रेम करने के लिए न केवल उसकी हत्या कर सकता है बल्कि अपनी झूठे आन और शान के लिए जायज भी ठहराता है। पति-पत्नी एक दूसरे का जन्मदिन याद न रखने या ऐसी ही किसी बात पर तलाक दे देते हैं। कोरकू जनजाति के मिथक में धरती और आकाश का विवाह दृष्टि का पहला विवाह है। उनका विवाह ही धरती पर जीवन को जीवन्त रखता है। इसी अर्थ में वे हम सब के माता-पिता हैं। पर आकाश यानी क्या? आकाश यानी बादल और बादल यानी धरती के गर्भ में और उस पर हिलोर लेता पानी कुम्हारखेडा, खण्डवा के मुंशीजी बताते हैं कि धरती न चाहे तो पानी बादल बन कर ऊपर उड ही नहीं सकते। धरती को वधा कर, पूजा-अर्चना कर ही बादल ऊपर उठते हैं। पर उठते क्यों है? उसी धरती को रिझा कर, उसी के साथ फिर मिल कर एक हो जाने के लिए। इस कोरकू मिथक में विवाह दरअसल दो तत्त्वों का जो मूलरूप से एक थे का पुनर्मिलन है। मिथक और अनुष्ठानों के अभाव में क्यों कि अनुष्ठान इन आदि-मिथकों की रंगमंचीय प्रस्तुति है, जिन्हें समाज के आगे बार-बार खेला जाता है। हमारे पास कोई कसौटी नहीं जिससे हम यह जान सके कि विवाह के अथवा मित्रता में हम दरअसल क्या तलाश रहे होते हैं या किसमें हमें क्या तलाशना चाहिए।
अपने आस-पास और जीवन को समझने के लिए अब आधुनिक समाज के पास कोई मिथक या अनुष्ठान ही बचे हैं। उसने अपने भविष्य के स्वप* को साकार करने के लिए मिथक के आवर्ति-काल बोध की जगह इतिहस की एकरेखीय गति को चुना और ऐसा करते ही निर्मल वर्मा के शब्दों में अब मनुष्य समय का वाहक न हो कर गुलाम बन जाता है। अब मनुष्य अपने को सीधी आँखों से नहीं, इतिहस की आँख से देख्ता है- एक जज की आँख जो मनुष्य की स्थिति पर नहीं, भविष्य के शून्य पर अटकी है। मनुष्य और शून्य के बीच अब ईश्वर नहीं, इतिहास का तराजू है, - अंतर सिर्फ इतना है कि अब इतिहस के देवता की आँखों पर नहीं, मनुष्य की आँखों पर पट्टी बँधी है।
किन्तु क्या अब पार्श्व से आँख पर बँधी इस पट्टी को उतार फेंकने की छटपटाहट का स्वर भी क्रमशः कुछ तेज होता सुनाई नहीं दे रहा? क्या प्रकृत्ति को बचाने, उसकी ओर लौटने का आह्वान स्वयं वैज्ञानिकों, पर्यावरणवेताओं द्वारा नहीं उठाया जा रहा? पिछले वर्षों में वैज्ञानिक जैम्स लवलॉक की जीया या कि गइया (ग्रीक भाषा का शब्द जिसका अर्थ धरती है) अवधारणा ने बहुत लोकप्रियता हासिल की है जिसके अनुसार धरती नामक इस ग्रह के समस्त जैविक और निर्जीव-पदार्थ मिल कर एक भीमकाय संरचना बनाते हैं जिसमें हर पदार्थ या जीव का एक दूसरे से विशेष संतुलन का अनिवार्य संबंध है।
सौरमण्डल के इस नीले पृथ्वी नामक ग्रह की एक संयुक्त इकाई या आर्गेनिजम के रूप में संकल्पना किसी आदिम जनजातीय मिथक की संकल्पना के बहुत करीब चली जाती है, जहाँ प्रकृति का हर जीवन मछली या बादल भी समाज का ही हिस्सा है। क्या यह हमारे लिए आधुनिकता और विकास की नई परिभाषा रचने वाले एक नए मिथक का बीज प्रतीक हो सकता है? क्या हम जनजातीय समाजों और उनके मिथकों की तर्ज पर एक अनूठे, आधुनिक समाज की संकल्पना कर सकते हैं जिसमें जीवन जैसा है, जैसा हम चाहते हैं और जैसा उसे होना चाहिए, इसके बीच कोई फर्क न रहे?

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