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भारतीय नवजागरण और गुरु गोरखनाथ

सूर्यप्रकाश दीक्षित
नाथ संप्रदाय का पुरोधा माना जाता है गुरु गोरख को। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने जनश्रुतियों के आधार पर चार योगेश्वरों को नाथ संप्रदाय का प्रवर्त्तक माना है। प्रथम गुरु आदिनाथ अथवा शिव हैं। उनके दो शिष्य थे-जालंधर नाथ तथा कृष्णपाद अथवा कान्हपाद। चौथे गुरु मत्स्येन्द्रनाथ के शिष्य थे गोरखनाथ। जनश्रुतियों के अनुसार गोरखनाथ ने अपने गुरु मत्स्येन्द्रनाथ का स्त्री संसर्ग से उद्धार किया था। जलंनारनाथ-कृष्णपाद की साधना पद्धति अलग-अलग थी और मत्स्येन्द्र-गोरखनाथ की अलग। गोरखनाथ के रचनाकाल के सम्बन्ध में विद्वान एकमत नहीं हैं। गोरखनाथ की रचनाओं में मुहम्मद और मुसलमान का उल्लेख इस ढग से मिलता है, जैसे दोनों भारतीय समाज में घुल-मिल गए हो। गोरखनाथ कहते हैं कि उत्पत्ति (जन्म) से हम हिन्दू हैं, जरा के कारण योगी है और अक्ल के कारण मुसलमानी पीर की-उत्पत्ति हिन्दू जरणां जोगी अकलि पीर मुसलमानी (सबदी 14)। दूसरे स्थल पर वे कहते हैं- हे-काजी मुहम्मद-मुहम्मद मत करो। मुहम्मद का विचार बहुत गम्भीर और कठिन है-
महम्मद महम्मद न करि काजी
महम्मद का विषय विचार
-(सबदी 3)
ज्ञातव्य है कि भारत में मुसलमानों का प्रभाव ग्यारहवीं शताब्दी से बढने लगा था। इसी तर्क के आधार पर अधिकतर विद्वानों में गोरखनाथ का समय 10वीं शताब्दी माना है। गोरखनाथ के नाम से प्रचलित चालीस ग्रंथों का उल्लेख किया गया है। इनमें से कुछ संस्कृत में लिखे गए हैं, और कुछ आधुनिक भारतीय भाषाओं में। अधिकांश ग्रंथ गोरखनाथी मत (पथ) के संग्रह हैं। डॉ. पीताम्बरदत्त बिडथ्वाल ने गोरखनाथ द्वारा रचित चौदह रचनाओं का उल्लेख किया है। इन ग्रंथों के अतिरिक्त आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने गोरख गणेश गोष्ठी, गौरखदत्त गोष्ठी अथवा ग्यानदीप बोध, महादेव गोरखगुष्ट, सिस्टपुराण, दयाबोध, छन्द गोरख, नवग्रह अष्ठपार छया, रहरास, ग्यानमाल, आत्मबोध, व्रत निरंजनपुराण, गोरखवचन, इन्द्रीदेवता, मूलगर्भावती, खाणवारुणी, गोरखसत, अष्टमुद्रा चौवी सिधि, उक्षरी, पंच अग्नि, अष्टचक्र, अवलिसिलूक, काफिर बोध आदि नाम गिनाए हैं। इनमें से कुछ गोरखनाथ की रचनाओं के संग्रह प्रतीत होते हैं और कुछ नाथ पंथ की गरिमा को प्रतिष्ठित करने के लिए बाद में लिखे गये ग्रंथ ज्ञात होते हैं। कुल मिलाकर डॉ. पीताम्बर बडथ्वाल द्वारा उल्लिखित ग्रंथ ही प्रामाणिक प्रतीत होते हैं। डॉ. बडथ्वाल ने गोरखनाथ की रचनाओं का एक संकलन गोरखबानी नाम से किया है। इसके दो भाग हैं। पहले भाग में गोरखनाथ की बानी है और दूसरे भाग में अन्य योगियों की बानियाँ हैं। सबदी, पद, सिष्या दरसन, प्राण संकली. नरवैबोध , आत्मबोध, अभैमात्रा, जोग, पंद्रह तिथि, सप्तवार, गोरखबोध, रोमावली, ग्यान तिलक और पंचमात्रा का संकलन प्रथम भाग में गोरखबानी नाम से किया गया है। परिशिष्ट 1 में गोरखगणेश गुष्टि, ज्ञानदीप बोध, महादेव गोरखगुष्टि, सिस्ट पुराण, दयाबोध और तीन पद संकलित हैं। परिशिष्ट 2 में सप्तवार, नवग्रह, व्रत, पंच अग्नि, अष्टमुद्रा, चौबीस सिद्धि, बत्तीस लच्छन, अष्टन् आदि संकलित है। परिशिष्ट 3 में गोरखनाथ के 27 पदों को रखा गया है।
डॉ. बडथ्वाल के अनुसार ये किसी निरंजनी साधु द्वारा लिखित प्रतीत होते हैं। गोरखपुर में गोरखनाथ के आध्यात्मिक विचारों की दृष्टि से सबदी सबसे महत्त्वपूर्ण है। पद के अन्तर्गत नाद, बिन्दुः सहस्रार, कुण्डलिनी, अमृतनाव आदि की बातें की गई हैं। इसकी भाषा अलंकारिक और प्रतीकात्मक है। गोरखनाथ की रचनाओं में हठयोग साधना की चर्चा प्रमुख है। वे योग साधना के लिए गुरु को आवश्यक मानते हैं। इन्द्रिय निग्रह के बिना योगी अपनी साधना पूरी नहीं कर सकता है। गोरखनाथ ने पहली बार हिन्दी में योग मत पर जो कहा, उसी को कबीर आदि संतों ने अविकल ग्रहण कर लिया है। उनके रूप और प्रतीकों का भी कबीर ने व्यवहार किया है। कहीं-कहीं तो लगता है कि कबीर गुरु गोरखनाथ की वाणी का छायानुवाद कर रहे हैं। वस्तुतः कबीर ने गोरखनाथ के आध्यात्मिक विचारों का काफी पल्लवन किया है। उनकी प्रतीक योजना, भाषा संरचना और अलंकार योजना का विकास कबीर के काव्य में हुआ है। गोरखनाथ ने पण्डितों और काजियों की आलोचना की थी। जैसे, पण्डित न वेदान्त को समझ पा रहा है और न काजी मुहम्मद की बातों को। इसी सूत्र का प्रचार प्रसार कबीर ने किया है। इस प्रकार स्पष्ट है कि गोरख की रचनाएँ संत-साहित्य का प्रस्थान बिन्दु है और उनकी शैली ही सन्तों की प्रेरणास्रोत बनी हैं। गोरखनाथ एक महान योगी, सिद्ध साधक तथा क्रान्त द्रष्टा थे। वे हठयोगी थे, लेकिन समाज में मानवीय मूल्यों के प्रतिष्ठापक भी थे। गोरखनाथ ने मानव जीवन को स्वीकार करते हुए उस का उदात्तीकरण किया व कहा कि इस शरीर के भीतर ही परम ज्ञान है। पंडित लोकाचार में फँसा हुआ है। पाखण्डों के बीच यह अपने को ही नहीं पहचान पा रहा है। यह शरीर है तो मन है और मन है तो माया है। काम और क्रोध इसकी दुर्बलतायें हैं। गोरखनाथ ने सबको इस माया का भोग करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने देखा कि एक परब्रह्म में ही अनन्त सृष्टि का वास है और यह ब्रह्म योगी की अन्दर ही है। त्रिकुटी या ब्रह्मरन्ध निवास करने से वह शब्द सुनाई पडता है, जिसके ताले में ब्रह्म बन्द है। जब वह ताला खोला जाता है तो ब्रह्म का साक्षात दर्शन होता है। गोरखनाथ का योगी मन अनाहत नाद में निवास करता है। साधना के द्वारा ब्रह्मरन्ध* तक पहुँचकर उन्होंने अनहद नाद को सुना और फिर उन्हें यह लगा कि सारा वाद-विवाद झूठा है। भारतीय दर्शन में योग व्यक्ति की चेतना के उत्थान का एक सशक्त माध्यम है। इसमें हठयोग, विरक्ति और वैयक्तिक साधना पर बल दिया जाता है। गोरखनाथ ने उसे लोक से जोडा। हठयोगी योग की साधना को प्रधान मानता है। उसके अनुसार शरीर में एक बहिर्मुखी शक्ति होती है और दूसरी आन्तरिक शक्ति होती है। यही प्राण और अपान है। प्रतीक की भाषा में इन्हें सूर्य और चन्द्र कहा गया है। प्राणायाम, आसन आदि के द्वारा इन बहिर्मुखी तथा आन्तरिक प्रवृत्तियों में समरसता उत्पन्न होती है। जब साधक समरसता का अनुभव करता है, तो सहज समाधि सिद्ध हो जाती है। हठयोगी यह मानता है कि जो पिण्ड में है, वही ब्रह्माण्ड में है। इसलिए इस ब्रह्माण्ड में जो शक्ति व्याप्त है, उसे पिण्ड में ही प्राप्त किया जा सकता है। गोरखनाथ इसको ही मोक्ष मानते हैं। उन्होंने वेदान्त, मीमांसा, तंत्र आदि में उल्लिखित मोक्ष को अस्वीकार ही नहीं किया है, बल्कि उसे मूर्खता पूर्ण घोषित किया। उनके अनुसार जब मन ही मन को देखने लगे, तो वह अवस्था सहज समाधि की होती है। गोरखनाथ के अनुसार यही मोक्ष है और साधक का यही परम लक्ष्य है। आचार्य हजारीप्रासाद द्विवेदी ने सहज समाधि की व्याख्या करते हुए इसे स्वसंवेदन ज्ञान की अवस्था कहा है। गोरखनाथ और कबीर की सहज समाधि में भी थोडा अन्तर है। गोरखनाथ की सहज समाधि में मन ही मन को देखता है। साधक को अपनी संवेदनाओं का स्वतः साक्षात्कार होता है। यह अवस्था क्रियाशून्यता की अवस्था है। कबीर ने क्रिया व्यापार में भी सहज समाधि को माना है साधो सहज समाधि भली में वे कहते है कि मैं जहाँ चलूँ, वहीं उसकी परिक्रमा हो और जो करूँ, वह उसकी पूजा है। जीवन के सारे कर्मों को उसी का व्यापार मानकर काम करना ही सहज समाधि है। यहाँ केवल संवेदना ही नहीं, बल्कि स्वकर्मों के बीच भी समाधि की कल्पना की गयी है। गुरु गोरखनाथ ने योगी के आचरण को महत्त्वपूर्ण माना है। ये योगी के रहने-बोलने को और आचार-आहार को भी महत्त्वपूर्ण मानते हैं। रात-दिन मन को उन्मनावस्था में लीन करना चाहिए। बाल्यावस्था से यौवनावस्था तक इन्द्रियों को निग्रह करना चाहिए। थोडा बोलना और थोडा खाना चाहिए। योगी को उतना ही भोजन करना चाहिए, जितने से शरीर चले। निद्रा का भरसक त्याग करना चाहिए। योगी को गृही नहीं होना चाहिए। उसे तीन गुणों (सत्व, रज और तम) से भी विवर्जित होना चाहिए। मन रूपी जोगी शरीर रूपी मढी में रहता है, अतः शरीर का नहीं मन का योग ही वास्तविक योग है। यही मन शिव है और यही शक्ति है।
यहु मन पाँच तत्त्व का जीव।
यहु मन ले जै उनमन रहै
तौ तीनि लोक की बाताँ कहै।
(गोरखबानी-सबदी 50)
गोरखनाथ ने आत्मसंयम को हठयोग का आधार माना है। उसके लिए जिह्वा के स्वाद का त्याग कर देना चाहिए। नारी त्याग, माँस का त्याग, पराई निन्दा का त्याग, सर्वस्व त्याग, अहंकार का त्याग तथा माया का त्याग योगी के लिए आवश्यक है। उसके लिए देवालय व्यर्थ है। शून्य की यात्रा ही देवालय है। गोरखनाथ कहते हैं कि अवधू मन चंगा है तो कठवती में गंगा है। बन्धन में पडे हुए मन को मुक्त कर दिया तो संसार चेला हो गया-
अवधू मन चंगा तो कठौती ही गंगा,
बांध्या मेल्हा तौ जगन्न चेला।।
बदंत गोरख सति सरूप।
तत बिचारै ते रेष न रूप।।
(गोरखवानी-सवदी 153)
गुरु गोरखनाथ ने धार्मिक सामाजिक विसंगतियों यानी अन्तर्विरोधों का उल्लेख भी अपने काव्यों में किया है। उनकी रचनाओं में कुछ ऐसे स्थल मिल जाते हैं, जहाँ वे पंडितों, संन्यासियों, काजी तथा मुल्ला को वास्तविक धर्म का निर्देश करते हैं। वे कहते हैं कि सन्यासियों को तीर्थ का भ्रम सताता है। देवालय की यात्रा की जगह शून्य की यात्रा को महत्त्व नहीं देते है। काजी और मुल्ला केवल कुरान पढते हैं। पडित वेद तो पढते हैं, किन्तु धर्म के वास्तविक स्वरूप को नहीं जानते हैं। ये सारी बातें वे आत्मालोचन के रूप में करते हैं। गोरखनाथ बहिर्मुखी प्रवृत्तियों का शमन करके साधक को अन्तर्मुखी बनाना चाहते हैं। गोरखनाथ गलतियों पर प्रहार कम करते हैं। वे सही रास्ता बताते हैं। वे कहते हैं कि हिन्दू देवालय में ध्यान करते हैं, मुसलमान मस्जिद में, किन्तु योगी परम पद का ध्यान करते हैं, जहाँ न दिवालय है, न मस्जिद है-
हिन्दू ध्यावै देहुरा, मुसलमान मसीत।
जोगी ध्यावै परमपद, जहाँ देहुरा न मसीत।।
वे राम और खुदा से परे अलक्ष्य का ध्यान करने की बात करते हैं-
हिन्दू आषै अलख की,
जहाँ राम आछै न खुदाई।।
गोरखनाथ बहुत धीर-गम्भीर योगी रहे हैं। वे सबदी और पद में निराकार ब्रह्म, कुण्डलिनी जागरण, ब्रहारन्ध्र, अमृता स्राव, उन्मनावस्था, पवन को उलट कर अह्मरन्ध्र में लीनता, मन की गति, नाडी की गति, शब्द की प्राप्ति, नवद्वारों को बन्द करके वायु की गति का अवरोध सहस्रार से अमृत स्राव और उसमें चन्द्रमा के निवास की बातें करते हैं। उनके लिए ब्रह्मरन्ध्र मैदान है। मनसा उनकी गेंद है, वे अनहद को लेकर सुरति का चौगान खेलते हैं। गोरखनाथ कहते है कि मन को लेकर उन्मनावस्था में लीन करने से साधक सर्वज्ञ हो जाता है। गोरखनाथ के कवित्व का प्रश्न भी विचारणीय है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने उनकी रचनाओं को साहित्य में सम्मिलित नहीं किया। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी उनमें साहित्यिकता देखते हैं। गोरखनाथ ने हठयोगी की साधना का अनुभूतिपरक चित्रण किया है। उन्होंने ब्रह्म के स्वरूप, नाद, बिन्दु, कुण्डलिनी के जागरण आदि को जो स्थितियाँ बताई हैं, वो अब तक योगी तक ही सीमित थीं। गोरखनाथ ने पहली बार इसे इस प्रकार से प्रकट किया कि ये जन-सामान्य को प्रभावित कर सकें। योगी के सम्मान में वे कहते है कि योगी उन्मन समाधि की क्रीडा करता है। रात-दिन इच्छा अनुसार देवता का समागम करता रहता है और क्षणक्षण में नाना रूप धारण कर सकते हैं-
परचम जोगिया उनमन बेला
अहनिसि इंछया करै देवता स्यूं मेला।
षिन षिन जोगी नाना रूप
तब जानिबा जोगी परचम स्वरूप।।
(गोरखबानी-सबदी 168)
गोरखनाथ की कुछ कविताओं में हठयोगजन्य अनुभव को सीधी-सादी भाषा में कहा गया है। उनकी दूसरी शैली वह है, जहाँ सरलता के साथ-साथ अनुभूति की गहराई भी है। ऐसे स्थलों पर कुछ अलंकृति और भाषा की भंगिमा भी दिखाई पडती है। योगी की रहनि बताते हुए वे कहते हैं कि नौ लाख चतुरियाँ उसके आगे नाचती हों और सहज ज्ञान-वैराग्य का अखाडा उसके पीछे हो- ऐसी स्थिति में भी योगी साधना में लीन रहे तो उसका भीतरी भंडारण हो सकता है-
नौ लष पातरि, आगे नाचै पीछैं रहै आषाडा।
ऐसौं मन लै जोगी षेले, तब अन्तरि बसै भंडारा।
(गोरखबानी-ग्यानतिलक 31)
अंजन अर्थात् माया में निरंजन को प्राप्त करने की विधि इस प्रकार बताते हैं-
अंजन माहिं निरंजन भेट्या, तिल मुख भेट्या तेल।
मूरति माहिं अमूरति परस्या, भरा निरन्तर षेल।
(गुरुवाणी-मधून तिलक 41)

वे अजपाजाप के द्वारा चंचल मन को स्थिर करने की क्रिया बताते हुए सांग रूपक की योजना करते है-
मैं जाति का सुनार हूँ। मुझसे रस-रूप सोना लो। मैंने श्वास की क्रिया को धौंकनी (अजपाजाप) से सिद्ध किया है।

सोना ल्यौ रस सोनां ल्यौ,
मेरी जाती सुनारी रे।
धंमणि धमीं में रस जांमणि जांभ्या,
तब गगन महारस मिलिया रे।
(गोरखबानी-पृष्ठ 81)
वे माया का रूपक (पृष्ठ 16) इला-पिंगला और सुषुम्ना का रूपक (पृष्ठ 85), सहज के जीवन और पवन के घोडे का रूपक (पृष्ट 103), नदी और हंस का रूपक (पृष्ठ 96), उन्मनी अवस्था सिन्दूर के तिलक का रूपक (पृष्ठ 106), तत्व की बेल का रूपक (पृष्ठ 107). काशी जैसे तीर्थ और त्रिकुटी का रूपक (पृष्ठ 116), शरीर और नगर का रूपक (पृष्ठ 121), काया और गढ का रूपक (पृष्ठ 134), कामिनी और माया का रूपक (पृष्ठ 146), आम्रवक्ष और माया का रूपक (पृष्ठ 152), माया और वृक्ष का रूपक (पृष्ठ 153), और निरंजन परब्रह्म की आरती का ऐसा सांगरूपक बाँधते हैं, जो अच्छे से अच्छे कवियों के कवित्व से प्रतिस्पर्धा करता है। गोरखनाथ सहज, निरंजन सहस्रार और अनहद नाद की बातें अनुभव की गहराई में जाकर सहज सरल भाषा में करते हैं। उनकी अभिव्यक्ति कहीं प्रतीकों और लक्षणा द्वारा प्रकट होती है और कहीं प्रभावशाली अलंकरणों के सहारे। गोरखनाथ ने प्रतीक की भाषा में मन को मछली, मृग, माया को शशक, व्याध*, बिल्ली, चंचला नारी, ब्रह्मानुभूति को गाय के दुग्ध का क्षरण, प्राण को पवन, शरीर को पर्वत, पिंगला नाडी को यमुना, इडा नाडी को गंगा, अन्तर्मुखी जीवन को चूहा, आत्मा को पनिहारिन हंस, मूलाधार चक्र में स्थित सूर्य को बछडा, जीवन को रात्रि, इन्द्रिय को मृग, काल को पारधी, ब्रह्मरन्ध* को आकाश मंडल, दसवाँ द्वार, भम्रर गुफा, शुक्र को बिन्दुश् अजपामंत्र सोहं हंस को सुशब्द सुषुग्ना को सरस्वती, वाणी, सहस्रार को स्वर्ण कमल, चन्द्रमा, सुषुम्ना मार्ग को सुरही धर, त्रिकुटी को त्रिवेणी तथा शरीर को कंधा कहा है। इन प्रतीकों का कबीर आदि संतों ने भी अपनी बानियों में व्यवहार किया है। उन्मनावरथा, अजपाजाप, सहज, निरंजन, अनहद नाद दशम द्वार आदि शब्द गोरखनाथ के काव्य से होते हुए संतों के काव्य तक पहुँचे हैं। इस तरह स्पष्ट है कि गोरखनाथ संत काव्य के प्रेरणास्रोत थे। उनके रूपकों, प्रतीकों से पारिभाषिक शब्दों का विकास संत साहित्य में दिखाई पडता है। वस्तुतः गुरु गोरखनाथ का महत्त्व युगदृष्टा, आचार्य, दार्शनिक, कवि, समाज सुधारक और नवजागरण के पुरोधा रूप में युग-युग तक अक्षुष्ण रहेगा।

साहित्यिकी
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