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भारतभूषण अग्रवाल : कैसे कहूँ?

अन्विता अब्बी
किसी के इस दुनिया से चले जाने के 45 वर्ष बाद कुछ भी कहना, सोचना और याद करना किसी गठरी को खोलने जैसा नहीं वरन, एक पिटारा खोलने जैसा है, और वह भी तब जबकि दिवंगत आत्मा आफ पिता हों। इतने सालों के बाद भी ऐसा एक भी दिन नहीं जाता जब मैंने पापा को हम उन्हें पापा ही कहते थे याद न किया हो। उनकी अच्छी-बुरी आदतें, उनका मेरे हर कार्य-कलाप में दखल-अंदाजी, उनकी डाँट-डपट, उनका प्यार, उनका व्यंग्य और सबसे ज्यादा उनका खिलखिला कर हँसना। उन्होंने जन्दगी के छप्पन वर्ष भी पूरे नहीं किए थे कि अकस्मात् दिल के दौरे के कारण 23 जून 1975 को इस दुनिया से चले गए। हम सब सकते में आ गए थे और मेरी माँ (श्रीमती बिंदु अग्रवाल) तो मरते दम तक इस सदमे को झेलती रहीं।
मैं उनकी पहली संतान थी और मेरे भाई-बहनों में मैंने ही उनको सबसे ज्यादा देखा, और समझा था। उनका बहुत समय आकाशवाणी की सेवा में कटा। क्योंकि इस नौकरी में तबादले बहुत होते थे, उनको सामान बान्धने और खोलने में बहुत मजाआता था, फिर चाहे समान टूटे या सही- सलामत पहुँचे, वो रेल विभाग का दोष हुआ करता था। इसको लेकर एक वाकया याद आता है दिसम्बर 1959 का। जब हम भोपाल छोड कर दिल्ली जा रहे थे, तो उन्होंने जिद करके मेरे वे सारे इनाम और कप, जो मैंने नृत्य और नाटक प्रतियोगिता में जीते थे, एक पानी पीने की टोंटी वाली बाल्टी में रख कर पैक किए। नतीजा यह हुआ कि बीस-पच्चीस कप में एक भी सलामत नहीं पहुँचा। जब मैं बहुत रोई और सुबकी, तो उन्होंने मुझे भारतीय कला केंद्र में दाखिल करवा दिया था। यह वो जमाना था जब अमजद अली सरोद सीख रहे थे और बिरजू महाराज कथक सिखाया करते थे। यह पापा की पुरानी आदत थी। कोई गलती कर बैठें, तो प्रायश्चित के तौर पर कुछ न कुछ ऐसे उपाय ढूँढते थे कि उस गलती के अहसास को कम किया जा सके। यही नहीं उनका गुस्सा भी बहुत तेज था और अक्सर आपे से बाहर भी हो जाते थे। बचपन में मैं तो कई बार उनसे पिटी भी, पर हर हादसे के बाद वो माथा पकडकर बैठ जाते और फिर थोडी देर बाद पुचकारते और माफी भी माँग लेते। उनको झूठ से बेहद नफरत थी और एक यही वजह थी जिसके कारण मेरे छोटे भाई-बहन को भी उनके गुस्से का सामना करना पडा।
पापा एक कट्टर सैद्धांतिक व्यक्ति थे और इस वजह से हम सब उन कई सुविधाओं से वंचित रहे, जो मेरी अन्य मित्रों को आसानी से उपलब्ध थीं। किसी से उधार न लेना, किसी की पैरवी न करना, कोई घूस न देना और न लेना, पंक्ति में ही खडे होना चाहे कितनी ही जलदी क्यों न हो, वक्त के पाबंद रहना और सबसे बडी बात हर काम सुघड, सलीकेदार और अनुशासित ढंग से करना और करवाना। धन के प्रति उनका कोई लगाव नहीं था और इसी कारण उन्होंने अपने जीवन में कई ऊँचे-ऊँचे पद छोड कर आकाशवाणी की नौकरी की क्योंकि वे साहित्यकार बनना चाहते थे। जन्दगी की जरूरतों की चीजें पूरी हो जाएँ, यही उनका लक्ष्य था। न उन्होंने कभी कोई जमीन खरीदी और न ही कोई मकान।
उनकी अनुशासनप्रियता का नतीजा हमने हर क्षेत्र में देखा है। वे करीने से जीना चाहते थे और हमें भी करीने से जीना सिखाना चाहते थे। और तो और, रोज खाने में क्या बनेगा इसका महीने भर का टाईमटेबल पहले से ही हमारी रसोई में टाँग दिया जाता ताकि नौकर बार-बार आज क्या बनेगा? कह-कह कर माँ को परेशान न करे और उनको पढने दिया जाए। यहाँ यह बताना जरूरी होगा की मेरी माँ ने सारी पढाई शादी के बाद की थी। बल्कि उन दोनों ने 1943 में शादी ही इसलिए की थी कि पापा एक अनपढ लडकी को पढाना चाहते थे और माँ ऐसे व्यक्ति से शादी करना चाहती थीं जो उनको तब तक पढाये जब तक वे पढना चाहती हैं। और पापा ने अपना वादा निभाया। यह एक अलग बात है कि वे एक-दूसरे को पहले से जानते थे क्योंकि माँ नेमिचंद्र जैन की छोटी साली थीं और अक्सर गर्मियों की छुट्टियों में अपनी जीजी रेखा जैन के घर जाया करती थीं, जहाँ पापा का आना जाना काफी था। एक आठवीं कक्षा में पढने वाली लडकी को पापा ने पीएच.डी तक की शिक्षा दी और उन सभी सुख सुविधाओं को प्रदान किया जिससे वे बिना किसी अडचन के अपनी पढाई पूरी कर सकें। यह कम क्रान्तिकारी मसला नहीं था। मैंने उन्हें कई बार कहते सुना था पढी-लिखी पत्नी सब चाहते हैं, पर है कोई ऐसा जो अपनी पत्नी को इतना पढाये कि वो उसके बराबर आ सके और उससे intellectual लेवल पर बात कर सके? माँ ने हिंदी साहित्य में ही डाक्टरेट नहीं की वरन् पापा की कविताओं को समझा, बूझा और हर वक्त उनकी सृजन प्रक्रिया में हाथ बढाया। पापा के जाने के बाद उन्होंने पापा की लिखित एवं अलिखित रचनाओं को भारत भूषण अग्रवाल रचनावली के चार भागों में प्रकाशित भी किया। यह आसान काम नहीं था, पर उनका मन इस काम में ऐसा रमा की वे पापा को हर वक्त अपने चारों ओर ही पातीं। वे दिल्ली के प्रसिद्ध लेडी श्रीराम कॉलेज में वरिष्ठ प्राध्यापिका थीं, पर बखूबी पापा की मन-पसंद की चीजें बनाया करती थीं। पापा को सूजी का हलवा बहुत पसंद था और जब तक मैं उनके साथ रही, मुझे नहीं याद पडता कि ऐसा कोई भी इतवार गया हो जब घर में हलवा न बना हो।
बचपन से हमने अपने घर में हर दस्तावेज को सही ढंग से फाइल में रखा पाया और आज भी हम सबने यह परम्परा कायम रख छोडी है। लेखकों और कवियों से आई चिट्ठियाँ को तो वे बडे जतन से सँभालते थे। यही नहीं ऐसे खत जो वे दूसरों को लिखते थे और उन्हें महत्त्वपूर्ण लगते थे उनकी कार्बन कॉपी रख लेते थे ताकि याद रहे कि किसको क्या लिखा है। तब न फोटोकॉपी का जमाना था न स्कैन का। इस तरह ढेरों खत, जवाब समेत माँ को उनकी फाइलों में मिले, जो अज्ञेय, नेमिचन्द्र जैन, शमशेरबहादुर सिंह, मोहन राकेश, मुक्तिबोध, यशपाल, हरिवंश राय बच्चन, नरेश मेहता, उपेन्द्र नाथ अश्क, अमृत राय आदि को लिखे गए थे। वे तमाम खत अपने आप में हिंदी साहित्य के बदलते रंगों का दस्तावेज हैं, साथ ही साथ पत्राचार की पूरी विधा ही निराली थी, जिसकी कल्पना ईमेल के दौर में नहीं की जा सकती। इनमे से कुछ पत्र श्रीमती बिंदु अग्रवाल द्वारा सम्पादित पुस्तक पत्राचार में सम्मलित हैं।
इलाहाबाद की कई शामें ऐसी थीं, जब तार सप्तक के कवि अक्सर हमारे घर आया करते थे और साथ ही होते थे बालकृष्ण राव और उनकी सुघड पत्नी उमा राव। मुझे तो बस इतना याद है कि हमारा घर साहित्य का अड्डा समझा जाता था। आये दिन बैठकों का होना, कवियों का अपनी-अपनी नई कविताओं का पढना, चाय की चुस्कियों और सिगरेट के धुँए से घिरी बैठक, मैं और मेरी छोटी बहन अर्पिता का रसोई घर से बैठक के बार-बार चक्कर लगाना, कभी पानी देने के बहाने कभी कोई नाश्ता परोसने के और कभी यों ही कोतूहलवश।
बच्चनजी के घर भी थोडा-बहुत आना-जाना था। हाँ, अमिताभ की तो याद नहीं है, पर उनके छोटे भाई अजिताभ से, जिसे प्यार से बंटी कहते थे हमारी बहुत पटती थी। पापा प्रयोगवादी कवि थे और जब तक इलाहाबाद पहुँचे, वे छायावादी कविता छोड मुक्त छंद की कविता रचने लगे थे। फिर भी मुझे खूब याद है वे शामें जो हमने सुमित्रानंदन पन्त और महादेवी वर्मा के घर उनकी कविताएँ सुनने में गुजारी थीं। पन्तजी तो हमारे पडोसी ही थे, सो हर सुख-दुःख में उनका साथ रहा। उनके घुँघराले बाल देख कर हम दोनों बहनों को बडी ईर्ष्या होती थी कि हमारे बाल ऐसे क्यों नहीं हैं। आज के संदर्भ में देखे, तो आश्चर्य होता है कि कैसे पापा ने हमें इतनी छोटी उम्र में *मैं तब छह-सात साल की रही होऊँगी*, इतने दिग्गज रचनाकारों से मिलाया।
पापा के अभिन्न दोस्तों में थे अमृतलाल नागर। वे जब भी इलाहाबाद आते हमारे यहाँ ही ठहरते। उनका जाडों की धूप में छत पर दरी बिछाकर मसनद के सहारे बैठ कर लिखना और बीच-बीच में एक चाँदी की डिबिया में से छोटी-छोटी गोलियाँ फाँकना हम दोनों बहनों को देखने में बहुत मजाआता था। हम उन्हें ताऊजी कहा करते थे। बहुत मनुहार करने पर भी वे गोलियाँ हमें कभी नहीं देते थे। बाद में पता लगा वे भाँग की गोलियाँ थीं। अमृतलाल नागर अर्पिता को बहुत चाहते थे और उसकी बातों से प्रभावित हो कर यह कहते कभी न थकते बेटा, तेरा जवाब कहीं नहीं। वो छूटते ही बोल पडती है कैसे नहीं, है! आप ढूँढिएगा, तो जरूर मिलेगा। वे मुस्करा कर रह जाते। फिर वे जब भी लखनऊ से आते दरवाजाखोलते ही अर्पिता का प्रश्न होता ताउजी, मेरा जवाब मिला? और उनका वही उत्तर नहीं बेटा, नहीं मिला। हमने उनका नाम जवाब वाले ताऊ जी रख दिया था।
पापा कभी भी कविता लिखते थे, जब मन में कुछ भी कौंध जाए। गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की भाँति उनका लिखने का कोई समय नहीं था। हाँ, क्योंकि दफ्तर जाना नियत था, तो अक्सर रात को ही लिखा करते। या फिर दफ्तर से आते ही कहते बिंदु एक प्याला चाय बनाना मुझे बस में एक कविता सूझी है और स्रद्बह्यह्लह्वह्म्ड्ढ नहीं करना और ऐसा कह कर वे अपनी मेज पर बैठ जाते। पापा के रचना-काल का मतलब होता था घर में पूर्ण शांति की व्यवस्था। उस समय उन्हें किसी भी प्रकार का शोर बर्दाश्त नहीं होता और हम सब फुसफुसा कर ही बात करते। कविता लिखते ही वे सबसे पहले माँ को सुनाते। जब कोई लम्बी रचना लिखनी हो, तो दफ्तर से छुट्टी भी ले लेते थे। जब उन्होंने अपना उपन्यास लौटती लहरों की बाँसुरी लिखा तब छह-छह घंटे लगातार लिखते।
उनके पास काले मुलायम चमडे की जिल्द वाली एक मोटी नोटबुक थी जिसके पन्ने बेहद महीन शायद राइस पेपर के बने थे। वे अपनी सभी कविताएँ इस नोटबुक में सफाई से लिखते। उनकी लिखाई मोती के सामान सुंदर थी। वो नोटबुक उनके कविता-रचना काल का पूरा इतिहास है। उनके चले जाने के बाद माँ ने अशोक वाजपेयी के आग्रह पर वो नोटबुक उनको भेंट दे दी क्योंकि वे उस वक्त अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्विद्यालय के कुलपति थे और एक अद्भुत संग्रहालय बना रहे थे जिसमें सभी प्रसिद्ध कवियों की पांडुलिपियाँ रखने का विचार था।
पापा बहुत जोर से और कागज पर गडा-गडा कर लिखते थे अतः कई बार अगले दो-तीन पृष्ठों में कलम के निशान पड जाते थे जिससे कई बार पहला पन्ना फाडने के बावजूद अगले पन्नों में पहले की लिखी गई पंक्तियाँ मौजूद रहती थीं। मैं उन्हें चिढाया करती थी कि आपको तो कार्बन की जरुरत ही नहीं है। दूसरा पन्ना सँभाल कर रख लिया कीजिए।
यही नहीं 1967 में जब उन्होंने पीएच.डी. करने की ठानी, तब 16-16 घंटे लिखते रहते थे। अँगूठे और उँगली में गाँठे पड जातीं जिसकी सिकाई और मलवाई वे रात को माँ से करवाते। वे बहुत कर्मठ इंसान थे और हर वक्त कुछ न कुछ करते रहते। उनका बहु-आयामी व्यक्तित्व ही था जिसके कारण उन्होंने कविताओं के अतिरिक्त रेडियो नाटक, लेख, कहानियाँ, संस्मरण, बच्चों के लिए अलग से कहानियाँ, कविताएँ और crossword पहेलियाँ (जो आज भी नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा बिक रही हैं), लघु-उपन्यास, बंगला और अंग्रेजी से ढेरों अनुवाद, और तुक्तक भी लिखे। हिंदी साहित्य में तो वे तुक्तक के जन्मदाता थे। उनके लिखे तुक्तकों का कोई सानी नहीं हैं। पर जब भी उन्हें मंच पर कोई इस खिताब से परिचय कराता, तो वे पसंद नहीं करते। वे कवि के रूप में और खासतौर से व्यंग्य के कवि के रूप में ही जाने जाना चाहते थे। अनुवाद से याद आया बंगला से हिंदी अनुवाद फर्राटे से करते। मुझे अभी तक याद है खाने की मेज पर एक तरफ माँ कॉपी लेकर बैठ जातीं और वे बंगला कृति हाथ में लेकर घूम-घूम कर हिन्दी में बोलते जाते जैसे कि रचना हिन्दी की ही हो। इस तरह वो अनुवाद की डिक्टेशन माँ को दिया करते। ऐसा बहुत कम होता था जब उन्हें अपना अनुवाद बदलना पडा हो या फिर सुधारना पडा हो। रवीन्द्रनाथ ठाकुर का ताशेर देश का उनका किया अनुवाद अब तक मंचन होता है। शंकर का उपन्यास निवेदिता रिसर्च लेबोरेट्री भी उन्होंने इसी तरह किया था।
कुछ अनुवाद वे इसलिए करते थे क्योंकि उन्हें कृति से प्यार था, पर कुछ इसलिए क्योंकि उससे अर्थिक सहायता होती थी। मुझे खूब याद है जब 1970 में मुझे अमेरिका के प्रख्यात कॉर्नेल विश्वद्यालय में भाषा विज्ञान में पीएच.डी. के लिए फेलोशिप मिली, तो मुझे विदेश भेजने के लिए 5000 रुपयों की जरुरत थी, जो उनके पास नहीं थे। किसी से उधार वे लेना नहीं चाहते थे सो उन्होंने अकादमी से ही एक अनुवाद का काम लिया और दिन-रात बैठ कर पूरा किया। इस तरह मैं अमेरिका पहुँची। यही नहीं वे अनुवाद का काम लोगों की आर्थिक मदद के लिए भी करते थे। परिवार में कोई भी मेधावी बच्चा होता और उसे पैसों का अभाव होता, तो उसकी स्कूल या कॉलेज की पढाई वे इसी माध्यम से करते। सहिष्णुता उनमें कूट-कूट कर भरी हुई थी। दूसरों का मर्म वे तुरंत पकड लेते थे। वे कठोर (strict) जरूर थे पर मैंने कभी उन्हें शिष्टाचार की रेखा लाँधते नहीं देखा-न भाषा प्रयोग में और न ही जीवन व्यवहार में, और न ही किसी रचनाकार की समीक्षा लिखते हुए। उनका व्यक्तित्व बहु-आयामी होने के साथ-साथ विशाल हृदय वाला भी था।
उन्हें बंगला की कविताएँ और अपनी अप्रकाशित काव्यसंग्रहों की कविताएँ कंठस्थ थीं, जिनका वे सस्वर पाठ किया करते थे। बच्चन की मधुशाला भी वे बडे शौक से गाया करते थे। तुलसी कृत रामचरित मानस के कुछ दोहे और चौपाइयाँ वे बडे मन से गाते थे। बाद में अधिक सिगरेट सेवन के कारण उनका गला साथ नहीं देता था जिसका उनको बहुत रंज भी था, परन्तु लाख कोशिशों के बावजूद वे सिगरेट पीना नहीं छोड सके।
पापा अपने से छोटी उम्र के कवियों को बहुत प्रोत्साहन देते थे और यही वजह थी कि बहुत व्यस्तता के बावजूद युवा-कवियों के लिए उनके पास हमेशा वक्त रहता। वे अशोक वाजपेयी को बहुत पसंद करते थे। उनके खुले विचार, मेधावी व्यक्तित्व, और हर मसले को एक नई दृष्टि से समझना- बूझना उन्हें बहुत भाता था। अब पूरी तरह से याद नहीं है पर जब अशोकजी की अज्ञेय के बारे में धर्मयुग में बूढा गिद्ध... शीर्षक से कोई लेख छपा था, तो घर में काफी बहस हुई थी। कईं युवा कवि तो अपनी ताजा रचनाओं को पढाने और सुझाव लेने के लिए आते थे। उनमें से मंगलेश डबराल, और सुनीता (जैन) का मुझे खास ध्यान है। आने वाली पीढी को वे हमेशा उत्साहित करते। उनके युवा-कवियों के प्रति इस स्नेह को देख कर ही उनके जाने के बाद माँ ने युवा-कवियों के प्रोत्साहन में भारत भूषण अग्रवाल कविता पुरस्कार की स्थापना की, जो 35 वर्ष से कम उम्र के कवि को ही मिलता है। आज इस पुरस्कार को चलते 40 साल से भी अधिक हो गए हैं।
पापा एक सफल कवि तो थे ही, पर उसके साथ-साथ एक सफल पारिवारिक व्यक्ति भी थे। उनके ख्याल में वही कवि उत्तम है जो अपनी कविता के साथ अपने परिवार को भी गढे और उसकी उन्नति का भी ध्यान रखे। माँ के अलावा उन्होंने हम तीनों भाई बहनों की पढाई-लिखाई और सृजनात्मक रुचियों को पूर्ण रूप से प्रोत्साहन दिया। मेरी छोटी बहन अर्पिता कवि और चित्रकार थी। छोटे भाई अनुपम को हाथ से चीजें बनाने का बहुत शौक था। वे उसके लिए तरह-तरह के किट्स लाया करते, और तो और, हर महीने कनाट-सर्कस की एक मशहूर दुकान जहाँ अनेक उपकरणों को बनाने की सामग्री मिला करती थी उसमें ले जाया करते थे। जब पापा का देहांत हुआ, अनुपम स्कूल में था। बाद में उसकी शिक्षा आई.आई.टी से पूरी हुई और वो आज एक सफल इंजीनियर है।
पन्द्रह वर्ष की उम्र से मैंने कहानियाँ लिखना शुरू कर दिया था और मेरी सर्वप्रथम कहानी ज्ञानोदय से पुरस्कृत भी हुई थी। पापा की खुशी का कोई हिसाब नहीं था क्योंकि मैंने बिना उन्हें बताये चुफ से अपनी कहानी प्रतियोगिता में भेज दी थी। बीस वर्ष की उम्र में जब मेरा पहला कहानी संग्रह मुट्ठी भर पहचान छपा तो उसकी भूमिका में श्रीकांत वर्मा ने जो लिखा उसे देखकर वे फूले नहीं समाते थे।
मुझे उन्होंने अपने सिद्धांतों के अनुरूप पाला और ढाला। इस प्रक्रिया में मैं अपनी मर्जी की कईं चीजों को न कर सकी। मैं अर्थशास्त्र की विद्यार्थी थी और दिल्ली के प्रसिद्ध कोलेज दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स में मैंने उनकी मर्जी के खिलाफदाखिला भी ले लिया था। उन्होंने सुना, तो आग-बबूला हो गए। वे चाहते थे मैं साहित्य में एम.ए. करूँ। मेरी साहित्य में रूचि तो बचपन से ही थी, पर मैं कक्षा में बैठ कर अनुशासित रूप से साहित्य नहीं पढना चाहती थी। असल में तब तक मेरा नाम हिंदी कहानियों में जाना जाने लगा था और कईं कहानियों का विभिन्न देशी-विदेशी भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका था। यह सब देखते हुए उनको लगता मैं गलत राह पर चल पडी हूँ और अपना जीवन नष्ट कर रही हूँ। उन्होंने मुझे अर्थशास्त्र से जबरदस्ती निकाल कर भाषा-विज्ञान में दाखिला दिला दिया। उनका कहना था क्योंकि मुझे भाषाओं से शुरू से प्यार है और मेरा दिमाग बहुत विश्लेषणात्मक (एनालिटिकल) ढंग से चलता है। अतः मध्यम-मार्ग यही है कि मैं भाषा-विज्ञान में आगे की पढाई करूँ। मैंने रोते-बिसूरते उनका कहना मान लिया। पर अब सोचती हूँ, तो लगता है उन्होंने मुझे कितना अच्छा समझा और सही मौके पर इतना सही निर्णय लिया। बाद में जब दिल्ली विश्वविद्यालय से मुझे स्वर्ण पदक मिला, तब तक मैं देश छोड चुकी थी, पर माँ बताती थीं कि वो मेरा पदक बार-बार देख कर बहुत खुश होते थे।

बाद में जब मैं कोर्नेल पहुँची और उनका पहला पत्र *एरोग्राम* आया, तो मैं अपने आँसू थाम न सकी। वो पत्र आज तक मेरे पास है। उन्होंने लिखा था, तुमने खासतौर से मेरे अरमान जिस शान से पूरे हैं, उसके बल पर मैं गर्व से कह सकता हूँ कि मेरी कविताएँ ही नहीं, मेरी बेटी को भी देखो और तब बताओ कि मैं सफल रचनाकार हूँ या नहीं। तुम मेरी सबसे महत्त्वपूर्ण कृति हो, मेरी सब कविताओं से मीठी कविता हो। और तुम्हारे प्यार में मैं कितना ही तुम्हें याद क्यों न करूँ, मैं भीतर तक संतुष्ट और सुखी हूँ। (अगस्त 1970)
कोई बेटी क्या कभी ऐसे पिता को भुला सकती है?

सम्पर्क : बी-2/2159, पार्कव्यू अपार्टमेन्ट, वसन्त कुँज, नई दिल्ली-110070,
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