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विधा और रचनाकार

ब्रजरतन जोशी
हम भारतीय लेखक उस विधा के बारे में कम सोचते हैं, जिसे स्वयं अपने सृजन के लिए चुनते हैं। हमारे लिए विधा महज माध्यम है, लक्ष्य कुछ और है; साहित्य, समाज और दर्शन । इसलिए साहित्यिक साहित्य की रचना करते हैं। हम नहीं सोचते कि लेखक की नैतिकता उसके विचारों में या उसकी अभिव्यक्ति की विभिन्न शैलियों मे निहित नहीं होती, उसकी नैतिकता इस बात में निहित होती है कि उसका अपनी विधा और भाषा के प्रति क्या रूख है ? दो शब्दों में कहें कि जिस चीज को हम समाज की आलोचना का औजार मानते हैं, खुद उस औजार का निरीक्षण जरूरी नहीं समझते।

निर्मल वर्मा, शब्द और स्मृति, पृ.सं. 46

निर्मल वर्मा का यह कथन भारतीय लेखक चरित्र के एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पक्ष की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करता है। बहुधा यह पक्ष हमसे अस्पृश्य या कह लें, हमारे ध्यान के परिसर का हिस्सा ही नहीं बन पाता। हिन्दी अपनी परम्परा की सनातन यात्रा को जारी रखें हैं। दुर्भाग्य से लेखक और विधा के बीच के रिश्ते पर मौन पसरा है। सृजन प्रान्तर भूगोल में घुसते ही कई जैविक-रासायनिक परिवर्तन हम पर यह दबाव बनाते हैं कि हम इस नीरव प्रदेश में प्रवेश न ही करें, तो ज्यादा ठीक रहेगा क्योंकि यहाँ स्वयं लेखक का किसी अन्य से नहीं वरन स्वयं का स्वयं से संवाद है। अपनी भाषा, विधा और अनुभव के साथ आत्मसाक्षात्कार है। यह प्रक्रिया बडी ही जटिल एवं पीडादायी है। संभवतः इसी कारण सृजन की पीडा को प्रसव वेदना के समान कहा गया है।

जब यह कथन पढते हैं, तो हम पाते हैं कि यह कथन हमारे लेखकीय चरित्र का एक जबर्दस्त आकलन है। लेकिन जैसे ही थोडा विचार कर, ठहर कर और विशेष ध्यान के साथ इस कथन के मर्म में प्रवेश करेंगे, तो सत्य का एक अन्य उजला पक्ष भी हमारे सामने आता। यह ठीक है कि डेढ सौ वर्ष की अल्पायु में हमारे आधुनिक लेखन ने बहुत कुछ सीखा है और नया किया है, पर यह भी उतना ही ठीक है कि अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है। निर्मल वर्मा का यह कथन उस शेष के ही एक महत्त्वपूर्ण पक्ष की ओर इशारा है। अगर हम कहें कि रचनानुभव और विधा का संबंध अन्योत्पाश्रित है, तो कोई अतियुक्ति नहीं होगी। इसक ा अर्थ यह हुआ कि हमारे लेखक को विधारूपी देह, जिसके सहारे उसका अस्तित्व है, उसी के बारे में दृष्टि साफ नहीं है। यानी हम अपनी सृजनात्मकता के मूल से भली-भाँति नहीं जुडे हैं। जबकि अपनी प्रकृति में यह संबंध नाभिनालबद्ध है। इसका अर्थ हुआ कि हमारा सृजनात्मक अनुभव अभी उस गहराई का स्पर्श ही नहीं कर पा रहा है, जिसका स्पर्श करना उसकी प्राथमिक एवं आधारभूत जरूरत है। जाहिर है कि देह की प्रकृति और विशिष्टता के अनुसार ही रचनाकार का भाव अपने मूल सत्त्व के साथ पाठक तक पहुँचेगा। इसलिए जो रचनाकार अपनी देह के अस्तित्व और उससे जुडे गहन प्रश्नों से जितना रूबरू होगा, उसकी सृजनात्मकता का तेज उतनी ही प्रखर होगा, उसका प्राण तत्त्व उतना ही परिपुष्ट होगा इसका कारण स्पष्ट है कि प्राण कोई तरल पदार्थ नहीं है। हमारा रचनात्मक या सृजनात्मक अनुभव विधा रूपी देह में संचरण अवश्य ही करता रहता है, पर उसकी प्रकृति में द्रव्य की-सी तरलता नहीं है, वरन् अपने विशिष्ट आत्मअन्वेषण या उसकी प्रक्रिया से उपजे अनुभवों के साथ विधा के उस विशिष्ट प्रारूप में अवस्थित होकर उस देह को परिपुष्ट करता रहता है।

यह तो हम जानते ही हैं कि प्रत्येक कृति के संघटन में अनुभूति के अतिरिक्त और भी कईं तत्त्व सृजन प्रक्रया के सहभागी होते हैं। विधा उस प्रक्रया का रूप है, जिसके माध्यम से अनुभव, भाव, संवेग आदि अपने अमूर्त भाव को भाषा में मूर्त करते हैं।

इसे महज संयोग ही कहा जाए कि हिन्दी आलोचना के परिसर में अभी काव्य संरचना के निर्माण में स्वयं लेखक या कवि की भूमिका क्या रही है? इस पर पर्याप्त ध्यान ही नहीं जा रहा है। हमने रचनाकारों की सृजन प्रक्रिया पर तो विस्तार से चर्चा कर अन्यान्य अनुशासनों के साथ उसके रिश्ते पर और तुलनात्मक दृष्टि से भी पर्याप्त काम किया है, पर स्वयं रचनाकार जिस विधा में रच रहा है उसकी अपनी सृजन की प्रत्रि*या और विचार के अन्तर्तोक में काव्य संरचना के सम्बन्ध में अभी पर्याप्त सामग्री उपलब्ध नहीं है।

ऐसे में जब इस विषय गहरे में उतरें, तो लगता कि निर्मल वर्मा का यह कथन अधिकांशत सत्य है, पर सम्पूर्ण सत्य नहीं है। यह जानने की जिज्ञासा भी मन में निरन्तर उठती रही है कि जिन अत्यल्प कवियों ने इस कठिन कार्य को साधा है क्यों न उनके सृजन के अन्तर्लोक की यात्रा की जाए। यह ठीक है कि आधुनिक हिन्दी के भीष्म पितामह कहे जाने वाले भारतेन्दु के काल में रचनाकारों ने अपनी विधा के साथ स्वयं के रिश्ते पर ध्यान नहीं दिया। इसका एक कारण तो उस समय की विशिष्ट परिस्थितियाँ रहीं। दूसरे, उन्होंने राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन में साहित्य को जनजागृति के एक उपकरण की तरह इस्तेमाल किया। यह शायद उस समय की तात्कालिक माँग और पश्चिमी प्रभाव का परिणाम था। यह सिलसिला द्विवेदीकाल तक भी चलता रहा। हालांकि सरस्वती जैसी पत्रिका में निरन्तर देश-विदेश के साहित्य सिद्धान्तों एवं सर्जकों के विशिष्ट अनुभव प्रकाशित होते रहे, पर विधा के रूप पर किसी का ध्यान या अपनी रचना प्रक्रिया के बहाने रचना के साथ रचनात्मक संवाद का कोई प्रामाणिक उदाहरण अभी अलक्षित ही है। हो सकता है कि गहन शोध-अनुसंधान के साथ कुछ चीजे कालान्तर में सामने आएँ, पर अभी तक हमारे सामने कोई विशिष्ट दृष्टव्य उदाहरण नहीं है। अब जब हम इस दृष्टि से साहित्य के इतिहास में जैसे-जैसे उतरेंगे, तो पाएँगे कि प्रसाद से आरम्भ होकर निराला, पंत, दिनकर, विजयदेव नारायण साही, अज्ञेय, मुक्तिबोध, धर्मवीर भारती, गिरिजाकुमार माथुर, रघुवीर सहाय, केदारनाथ सिंह, अशोक वाजपेयी, नन्दकिशोर आचार्य, राजेश जोशी, आदि एक पूरी परम्परा हमारे साहित्य प्रांगण में है, जिन्होंने न केवल अपनी-अपनी विधाओं में महत्त्वपूर्ण और उल्लेखनीय कार्य कर साहित्य को समृद्ध किया है, साथ ही अपनी विधा के साथ आत्मसाक्षात्कार करने की गंभीर पहल की है और इस पहल ने विधा के पारम्परिक रूप, और तत्त्वों की उपस्थिति पर प्रश्न खडे किए हैं। इस सूची में कुछ और नाम जोडे या घटाए जा सकते हैं।

जब इस परम्परा पर दृष्टिपात करते हैं, तो यह तो कहना समीचीन जान पडता है कि संख्यात्मक दृष्टि से तो अत्यल्प कवियों या लेखकों के इस सघन संवेदनात्मक कार्य को सम्पन्न करने की कोशिश की है, पर जिन कवियों ने अपनी लेखनी को विधा के रूप पर चलाया है, वह मात्रा में कम होने के बावजूद गुणवत्ता में तो वह बहुत ही सार्थक, प्रभावी और विधा के भविष्य को दिशा देने वाला रहा है। ऐसे में निर्मल वर्मा का यह कथन अधिकांशतः के नवीन पथ को प्रशस्त करता हुआ हमारे लिए अखण्ड अनुभूतियों के असंख्य प्रवेश द्वार भी खोलता है। क्योंकि व्यवहार में ऊपर की सूची में आए इन सभी रचनाकारों का सृजनकर्म इसकी साक्षी है कि उन्होंने विधा के तात्विक रूप, दर्शन, सोच एवं व्यवहार यानी समग्र पक्ष पर पर्याप्त सोचा एवं विचार-चिन्तन किया है।

अब तक की आलोचना में इन कवियों के काव्य संसार पर समाजशास्त्रीय. साहित्यशास्त्रीय दृष्टि से चिन्तन मनन हुआ है, पर स्वयं कविजन का अपनी विधा एवं प्रक्रिया के बारे में क्या विचार हैं? इस पर गंभीर दृष्टि सम्पन्न अध्ययनों की आवश्यकता अभी भी बरकरार है। एक सच्चे आलोचक का दायित्व है कि उनके काव्य विषयक चिन्तन को उनकी काव्यभाषा, काव्य संरचना, लय और शब्द विधान आदि के जरीये देखा-परखा जाए। उनकी काव्य प्रक्रिया क्या है? इन कवियों की प्रक्रिया पर तुलनात्मक दृष्टि से जो सृजनात्मक सत्य सामने आता है, उसका स्वरूप क्या है ? आदि का उद्घाटन हो।

दुर्भाग्य से हमारी आलोचना का वर्तमान अभी अधिकांशतः दरोगाई भूमिका निभाने में प्रवृत्त है। जो थोडे बहुत प्रयास इस दिशा में हुए भी हैं, तो इस दरोगाई दंगल के कनफोड शोर में दब गए हैं। आलोचक का काम किसी को गिराकर किसी को उठाना नहीं है, वरन् उसका काम रचना के सच का साहित्य के अपने स्वभाव और अध्यात्म से उसके रिश्ते की पडताल करना है। हिन्दी में कवि आलोचना ने यह काम करने की गंभीर कोशिश की है। प्रश्न उठ सकता है कि कवियों को यह काम करने की जरूरत क्यों पडी? इसके उत्तर में हम कह सकते हैं कि जब कवियों ने देखा कि यह सही है कि हमारा मूल कार्य है रचना का सृजन। लेकिन जब लोग हमारे लिखे के मर्म तक पहुँचने में या हमारे संप्रेषण चैनल से सहजता से महसूस नहीं हो पा रहे हैं, तब उन्हें अपने सृजन के मर्म का उद्घाटन करने के लिए आलोचना के मैदान में उतरना पडा। छायावाद का जो मजाक बना, उसके मूल में यही कारण काम कर रहा था। तब कुछ कवियों ने कमान संभाली और अज्ञेय के तार सप्तक और पंत के पल्लव की की भूमिका को हम इसी राह के श्रेष्ठ उदाहरणा केरूप में देख सकते हैं। कवि आलोचक और आलोचक के देखने में पुर्क होता है। अज्ञेय के कवि-आलोचक कर्म से इसे हम बहुत ही स्पष्ट और साफ ढंग से समझ सकते हैं। उन्होंने अपने लेखन से यह स्थापित किया कि सृजन में केवल वह ही नहीं होता, जिसे कवि देखता है, या रचनाकार देखता है। क्योंकि जब कवि या रचनाकार इस देखे हुए के भीतर उतरने की प्रक्रिया को भी देखता है। तो ऐसे में वह देखना ठीक-ठीक वहीं देखना नहीं रह जाता है जो कवि कर्म में प्रथम सोपान है। वह बदल जाता है। इसी अर्थ में कहते हैं कि काव्य सामग्री कवि की परिचित है, काव्य नहीं। क्योंकि काव्य सृजन के व्यापार में अचानक कुछ कौंधता है। इसी कौंध से नई अनुभूति का उदय होता है। कवि एक नई चेतना, उमंग और रस से भर उठता है। इसलिए कहा गया है कि कवि काव्य को नहीं काव्य की सामग्री को जानता है। इसलिए कवि के दर्शन को भी जानना हमारे लिए अत्यन्त आवश्यक है। कवि आलोचना के प्रमुख कवियों ने इस गंभीर कार्य को पूरी खामोशी से करते हुए हिन्दी आलोचना को परिपूर्ण करने की सार्थक कोशिश की।

आलोचक का प्राथमिक दायित्व है कि वह कृतिकारों/सर्जकों के काव्य चिन्तन के मूल हेतु, प्रयोग और प्रासंगिकता को तार्किक सरणि में रखते हुए देखें कि विधा के स्वरूप एवं पक्ष पर उनका अपना तर्क किस आधार पर खडा है और उसके सहायक तर्क क्या हैं। विभिन्न विचारकों के विचारों के साथ रखकर देखेंगे, तो उनके एक विनम्र सहमति और असमति हो सकती है, लेकिन सहमति-असहमति पर रूकना नहीं है वरन् आलोचक का असली सफर तो वहीं से ही आरम्भ होता है कि उसके रास्ता, उसकी सोच एवं काव्य व्यवहार की दिशा के साथ संगति बनती है या नहीं। अगर यह संगति बनती है, तो कैसे और नहीं बनती तो किस तरह। इस तरह के अध्ययन ही हमारी आलोचना की दशा-दिशा, गति-मति को सम्यक बनाएँगे।

हम आभारी है अन्तरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त भाषा विज्ञानी प्रो. अन्विता अब्बी के, जिन्होंने हमें यशस्वी कवि भारतभूषण अग्रवाल पर विशिष्ट दृष्टि सम्पन्न सामग्री उपलब्ध कराई । हमेशा की भाँति नियमित कॉलम में आफ लिए विशेष सामग्री हैं। मधुमती को प्रदेश ही नहीं वरन् देश में शीर्षस्थ रचनाकार आगे आकर सहयोग कर रहे हैं, यह हमारे लिए शुभ संकेत है। मधुमती परिवार सबसे मिल रहे रचनात्मक सहयोग के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता है। घर पर रहें, स्वस्थ रहें, सुखी रहें, सुरक्षित रहें। इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ-