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नयेपन से दीप्त यथार्थपरक कविताएँ

वेद मित्र शुक्ल
आलोचना विधा में चर्चित एवं राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत किताब साहित्य का रंगचिंतन के लेखक लहरी राम मीणा का कविता-संग्रह जिस उम्मीद से निकला का भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित होना हिंदी साहित्य समाज की रचनाकार-आलोचक वाली परम्परा के लिए एक संतोषप्रद विषय है। आलोचनात्मक विषय की भाषा और सैद्धांतिकी यदि काव्यात्मकता और संवेदनशीलता से युक्त हो तो सोने पर सुहागा से कम नहीं है। पिचहत्तर से अधिक कविताओं को समोए संग्रह के प्रारंभ में ही शीन काफ निजाम, इंदुशेखर तत्पुरुष और मधु आशावादी आचार्य जैसे महत्त्वपूर्ण साहित्यकारों द्वारा इस संग्रह पर स्नेहिल अभिमत अब तक पुरस्कृत युवा आलोचक के रूप जाने गये लहरी राम को निश्चित रूप से संभावनाशील कवि के रूप में स्थापित करते हैं।
संग्रह की कविताएँ पढते हुए यह बात सरलता से समझी जा सकती है कि कविताओं में खुद के भीतर बसे गाँव, कस्बे और महानगर को एक-एक करके या कभी एक साथ जीने की कोशिश में रचनाएँ उपजी हैं। कवि की प्रवृत्ति शब्दों से खेलने की न के बराबर है। जिस कारण से कविताओं में सहजता और सादगी की ताकत है। ऐसे में कई कविताओं में व्यंग्य सरसरी तौर पर नहीं, बल्कि ठहर कर पढने पर दीप्त होता है। संग्रह की कविताएँ आज के समय की विसंगतियों और विडम्बनाओं को उजागर करती हुईं जहाँ एक ओर सीधे-सीधे दिल और दिमाग में उतरती हैं, वहीं दूसरी ओर कवि की युवा और ताजगी से भरी अनुभूतियों से पैदा हुए सहज सौंदर्य की आभा से भी परिपूर्ण हैं। संग्रह के प्रारंभ से अंत तक कविताओं से गुजरते हुए नयेपन का अहसास बचा रहता है। घिसे-पिटे पुराने ढर्रे की बातों से बाहर निकलकर कवि इन कविताओं में अधिकांश समय तीखेपन या नकारात्मकता से दूर ही रहता है। उदाहरण के लिए कवि की अनुभूतियों में गाँव और शहर दोनों के प्रति एक सम्मान का भाव है। गाँव की समस्याएं महानगर पर या महानगर की गाँव पर लादने के पुराने साहित्यिक ढर्रे से कवि खुद को बहुत हद तक मुक्त रखता है। दोनों ही परिवेशों की सच्चाई निर्भीकता और ईमानदारी से बयान करने का जोखिम उठाता है। इस दृष्टि से शहरों से जुडने और सदैव जुडे रहने की आमजन की इच्छा को सकारात्मकता के साथ शहर का दिनमान नामक कविता में पढा जा सकता है। जहाँ कवि कहता है,
आता है जब
कोई अजनबी
पहली बार
नहीं जाता फिर
लौटकर
आ जाता है
उसके आडे
इस शहर का दिनमान
चाहता है वो भी
इस मान-सम्मान से भरे
इस हरे-भरे जंगल के बीच
अपना भी एक
हरा-भरा पेड (पृ. 13-14)।
इसी प्रकार दूसरी कविता तुम ही मेरे शब्द हो में एक समय के बाद किसी आत्मीय की भौतिक उपस्थिति के बिना भी उस व्यक्ति की यादें और उससे जुडा शहर एक अलग परिवेश का निर्माण करते हैं। वह परिवेश कैसा भी हो, लेकिन कवि-हृदय के लिए सब कुछ होता है,
हम
एक ही शहर में
पढे-बढे
तुम
इस शहर में
नहीं हो अब...
मैं
इस शहर का हूँ
और शहर मेरा
पाया बहुत कुछ इससे
जो तुम जानती हो
आज भी
स्मृतियों में है
तुम ही मेरे शब्द हो
बनता हूँ रोज इससे
बिगडता भी हूँ इसी से
मेरी दुनिया इसी में
रचती है
अपना विन्यास
और मैं
उसमें विन्यस्त हो जाता हूँ । (पृ. 15-16)
वर्तमान के गाँव और गँवईं मन पर भी कविताएँ लहरीराम के कविता संग्रह की उपलब्धियाँ हैं। इस संदर्भ में ताश की चालें, नहीं बिकता अन्नदाता, बड का पेड, चौपाल आदि कविताएँ पढी जा सकती हैं। ताश की चालें कविता में ग्रामीण जनों में आजकल एक अलग प्रकार की जो एकरसता उपजी है उसका सटीक और यथार्थ से भरा दृश्य उभरता है। वहीं दूसरी कविता नहीं बिकता अन्नदाता आज के सबसे महत्त्वपूर्ण, लेकिन प्रायः अनदेखा किए जाने वाले कथ्य की काव्यमयी अभिव्यक्ति है। जैसा कि कविता के शीर्षक से ही पता चल जाता है कि कवि क्या कहना चाहता है, लेकिन उसके कहने का अंदाज कुछ इस तरह से उल्लेखनीय है,
आज बिकती है बाजार में
भारतेंदु के ‘अंधेर नगरी’ की तरह
हर चीज टके सेर
नहीं बिकता तो सिर्फ
इस देश का अन्नदाता
जिस पर नहीं लगाता कोई बोली। (पृ. 22)
बड का पेड शीर्षक से लिखी गई कविता में बड के पेड का बिम्ब देखते ही बनता है। गँवईं प्रकृति और परिवेश के साथ पली-बढी पीढी की उसी परिवेश के प्रति उदासीनता से उपजी चिंता को लक्षित करते हुए कवि लिखता है,
गाँव के कोने में
खडा था/ बरसों से
वह एक अकेला ठूँठ
बड का पेड/
जो कभी हरा-भरा
लहलाता था
सम्मान का वह प्रतीक
कभी गाँव के लिए
देता था आने-जाने वाले
राहगीरों को राहत...
मैं सोचता हूँ
उस बरगद की दुर्दशा को देखके
कभी हम भी/ हो जायेंगे/
इस पेड की तरह/ निरीह और सूखे/
ठूँठ की तरह
अकेले.../... जैसे पेड की जडें
निकल आई हैं/ बाहर
अब उस पर नहीं देता/ कोई ध्यान/
उसी तरह हमको भी/
जडों की तरह नहीं देखेगा/
कोई एक दिन... (पृ. 48-50)।
वहीं कुछ कविताएं जैसे नीम का पेड, गाँव की याद आदि भी उल्लेखनीय हैं। जहाँ शहरी समस्याओं से जूझते मन को ग्रामीण परिवेश की यादें सुकूनदायक होती हैं।
गाँव से जुडीं कविताओं में जैसे बड का पेड, नीम का पेड’ आदि में प्रकृति-वर्णन स्वभाविक रूप से हैं। इसी कडी में बहुत कुछ है बारिश, और अद्भुत-शक्ति जैसी कविताओं में सीधे-सीधे प्रकृति की मनोहारी छटा पढी जा सकती है।
जिस उम्मीद से निकला कविता-संग्रह में प्रेम विषय पर सर्वाधिक कविताएँ हैं। तुम्हें अर्पित करूँ कैसे, एक आदत-सी, मूँद लेती अपनी पलकें, दिल के दरवाजे, यादों के फर्श पर, तुम जैसा,’ किलकारी, अधूरे-शब्द, आँसू, पता ही नहीं चला, अब हुआ ऐसा, तुम्हारी याद, दर्द, नामुमकिन, माँ, प्रेम का हाथ, एहसास, तुम्हारी उपस्थिति, प्रेम की रेखा का जीवंत अंकुर, एक-दूसरे को, वह आएगा शहर से, हे प्रिये!, प्रेम की गुणवत्ता, नहीं जानता, बहुत कुछ, सुंदर किताब आदि शीर्षक से कविताएँ प्रेम के कई रंग लिए हैं। प्रेम का मर्म समझ पाना कितना कठिन होता इस बात को एक छोटी सी कविता दिल के दरवाजे’ में कुछ इस प्रकार से व्यक्त किया गया है, तुम्हारे लिए/ मान लेता हूँ/
अपराधी हूँ/ पर नहीं किए थे/
दिल के वे दरवाजे/ कभी बन्द/
जहाँ से तुम/ आ सकती थीं भीतर/
तुमने देखी ही नहीं/ वह एक और खिडकी/
जो सामने से ही/ खुली हुई थी/ पूरी तरह। (पृ. 35)
इसी मर्म को न समझ पाने से उपजी पीडा की अभिव्यक्ति एक अन्य प्रकार से तुम जैसा कविता में भी पढी जा सकती है, मैं नहीं हो पाया/ तुम्हारी नजर में/ तुम जैसा/ और तुम/ जो भी हो/ नहीं हो पायी/ मेरी नजर में/ मुझ जैसी/ तुम्हारी नजर में/ मैं/ तुम जैसा होना चाहता हूँ/ और चाहता हूँ/ तुम हो जाओ/ मुझ जैसी। (पृ. 3।)
सहजोक्ति से उपजी एक लघु कविता किलकारी में वात्सल्य की छटा मनोहारी है,
अरसे बाद/ आँगन में/
गूंजी/
एक किलकारी/
मैंने उसे/ गोद में उठाया/
और चूम लिया। (पृ. 38)।
इसी भाव से पुष्ट एक और कविता एहसास है। इसमें कथ्य का दोहराव सा प्रतीत होता है लेकिन कहने का तरीका पाठक को लुभाता है, सोचता था/ कितनी/ सुंदर होगी/ यह दुनिया/ जिसके आगोश की/ किलकारियों से/ तारतार होता रहता था/ मेरा अपना स्वप्नलोक/ आज एहसास हुआ/ तुम्हारे ही आने पर/ कि सच में/ कितनी सुंदर है/ यह दुनिया/ यकीन मानो/ यह बिलकुल/ सुंदर नहीं लगती/ अगर तुम न/ आई होती/ मेरे आँगन में (पृ. 65)।
आज के समय में पिता होना क्या है? इसका एक रंग धीरे से बोलता आइना में बडे सलीके से ध्वनित होता है। कवि लिखता है, बढ गईं अब/ मेरी जिम्मेदारियाँ/ बाहर से दिखता है घर/ फूलों से भरा/ सच पूछो तो/ फूलों से ज्यादा/ काँटों से भरा है घर/ ललाट पर लकीरें/ चेहरे पर झुर्रियाँ/ दिखने लगी हैं/ पास आकर/ धीरे से बोला आईना/ आप दिखने लगे हैं/ पिता की तरह/ कुछ-कुछ ...(पृ. 6।)। वर्तमान के प्रेम का एक और यथार्थ एक अन्य कविता में कुछ यों दृष्टव्य है, अब/ प्रेम की शक्ति/ होने लगी है/ कमजोर/ नहीं मिलता आज/ प्रेम का कोई/ जीवंत अंकुर (प्रेम की रेखा का जीवंत अंकुर, पृ.।0)।
युवा कवि की कविताओं में प्रेम की छवियाँ अत्यंत नजदीक से देखने का आनंद होता है। पाठक ऐसी अनेक कविताएँ पढ सकते हैं जिनमें अनुभव के धरातल पर गुजरने जैसा है। उदाहरण के लिए अधूरे शब्द कविता में कवि कहता है, जिस अधूरे/ शब्द को/ पूरा करने की/ कोशिश करता हूँ/ पता नहीं/ क्यों और कैसे?/ नहीं हो पाता है/ शब्द पूर्ण/ लगता है डर/ कहीं अर्थ का अनर्थ न हो जाए/ जिस शब्द को तुमने/ वर्षों पहले/ आधा-अधूरा/ छोड दिया था/ तुम/ उस अधूरे शब्द को/ पूर्ण करोगे/ एक दिन/ इसी आशा में/ उस अधूरे शब्द का अर्थ/ आज भी/ तुम्हारी दी हुई/ डायरी के पन्नों में/ ढूंढता हूँ/ बार-बार (पृ. 39-40)। इसी संदर्भ में तुम्हारी उपस्थिति कविता है। कवि कहता है, जरूरी नहीं है/ तुम्हारा होना/ न होकर भी/ तुम हो मेरे साथ/ स्मृतियों में घुल रहे/ हो निरंतर/ एक दूसरे के लिए/ सोचना ही प्रमाण है/ दोनों की उपस्थिति का (पृ. 66)। प्रेम पर सर्वाधिक रचनाओं वाला लहरी राम का कविता-संग्रह जिस उम्मीद से निकला वर्तमान समय के यथार्थपरक प्रेम को अभिव्यक्ति देने में सक्षम है। सादगी और सहजता से भरी भाषा में प्रेम से जुडे कथ्य आमजन के अनुभवों को छूते हैं। अभिजात्यपन से मुक्त और उथलेपन से दूर ये प्रेम-कविताएँ आज हिन्दी साहित्य की एक बडी आवश्यकता हैं। इन प्रेमकविताओं की रचना शैली से गुजरना उभरते रचनाकारों को कुछ देने में अवश्य ही समर्थ होगा।
आज की सच्ची कविता में व्यंग्य खुद-ब-खुद उभरता है। संग्रह की कुछ कविताएँ व्यंग्य-कविता हैं, तो कई व्यंग्यात्मकता का पुट लिए हुए हैं। बुद्धिजीवी, मुखौटा, जानने से पहले, समझ, मुस्कुराता लडका,’ संस्कार आदि कुछ ऐसी ही रचनाएँ हैं। कविता बुद्धिजीवी एक व्यंग्य-कविता है। यह आज के बुद्धिजीवियों पर कसा गया एक प्रभावशाली तंज है,
मुझे तीर, चाकू/
तलवार, बंदूकों से/
डर नहीं लगता/
मुझे साँप, बिच्छू/
गोरिए, बघेरों से/
डर नहीं लगता/
मुझे आग, धूप/
काँच और काँटों से/
डर नहीं लगता/
मुझे डर लगता है/
बुद्धिजीवियों और सज्जनों से। (पृ. 19)
शहरी और ग्रामीण स्तर पर अलग-अलग पालन-पोषण, शिक्षा-दीक्षा, नई आवश्यकताओं की पूर्ति आदि अनेक कारणों से आज पुरानी और नई पीढियों में मतभेद आम बात है। इसके बावजूद दोनों पीढियों में अलगाव अथवा मनभेद की स्थिति बहुत समय तक नहीं टिकती है। गूढता के साथ व्यंग्यात्मक पुट देते हुए इसी बात को कवि लहरी राम अपनी लघु कविता संस्कार में कुछ यों बयां करते हैं-
बचपन में/
बाबा द्वारा/
दिए संस्कार/
और सलाह/
अच्छे लगते थे/
अब बडा होने के बाद/
वहीं न अच्छे हैं न बुरे/
हाँ, फीके नजर आते हैं/
पर, काम लायक और उपयोगी। (पृ. 93)।
गाँव, शहर, प्रेम, प्रकृति और व्यंग्य प्रधान रचनाओं के अतिरिक्त कुछ अन्य विषयों पर भी महत्वपूर्ण कविताएँ इस संग्रह में पढी जा सकती हैं। जैसे भ्रष्ट मीडिया की ओर संकेत करती कविता कुछ बदलने के लिए, मानवीय मूल्यों को बचा लेने की जिद के साथ अडी मनुष्यता को स्वर देती कविता अभी तो, वर्तमान में रिश्ते-नातों के कमजोर ताने-बाने को उभारती एक छोटी कविता रिश्ते, यौन-शोषण के मुद्दे को उठाती कविता आठ साल की बच्ची, मोबाइल जैसे अत्याधुनिक साधनों के शिकार होते आज के युवा पर चिंतित कविता कैमरे में कैद हुआ चेहरा, आदि हैं। इसी कडी में शीर्षक कविता पूरे यकीन से घर लौटा सहित जिम्मेदारियाँ, उम्मीदों के पंख, अपना बचपन, उस आईने में, सच का आईना, उत्सव, दुःख, स्वाभिमान, संघर्ष, पूर्वजों का घर आदि भी उपरोक्त रचनाओं से भिन्न कथ्यों को समेटे मनोहारी कविताएँ हैं।
संग्रह की हर एक कविता से गुजरते हुए विभिन्न महत्वपूर्ण समसामयिक कथ्यों को पढने जैसा अनुभव होता है। परन्तु, समग्रता के साथ लहरी राम मीणा का कविता-संग्रह जिस उम्मीद से निकला आज के परिदृश्य को सहजतम तरीके से कविता के माध्यम से प्रस्तुत करता है। भविष्य या भूत कहीं भी विचरण करती इस संग्रह की कविताएं वर्तमान का साथ नहीं छोडती हैं। सभी आज के समय में गुँथी हुई हैं। ये कविताएँ समाज में व्याप्त जटिल अनुभवों, भावों और विचारों को यथार्थपरक दृष्टि के साथ पाठकों तक नयेपन और सहजता के साथ संप्रेषित करने में समर्थ हैं। निश्चित रूप से यह कविता-संग्रह एक उल्लेखनीय संवेदनशील प्रयास के रूप में जाना जाएगा।

पुस्तक - जिस उम्मीद से निकला
लेखक - डॉ. लहरी राम मीणा,
प्रकाशक - भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली,
वर्ष - 2020
मूल्य - 220/- (सजिल्द),
पृष्ठ - 108

सम्पर्क : अंग्रेजी विभाग, राजधानी महाविद्यालय
(दिल्ली विश्वविद्यालय), राजा गार्डन, नई दिल्ली - 110015
मोबा.: 9599198121, ईमेल- vedmitra.s@gmail.com