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एक छिपी हुई जगह

मंगलेश डबराल
गंगोत्री जाते समय सुक्खी-धराली की संकरी सडक से गुजरते हुए विनोद कुमार शुक्ल की एक कविता याद आती है जिसमें एक चट्टान के ऊपर दूसरी चट्टान इस तरह रखी हुई है जैसे गिरने-गिरने को हो, लेकिन वह कभी गिरती नहीं। यह दोनों तरफ बहुत सारी चट्टानों से घिरा हुआ रास्ता है और वे इस तरह एक के ऊपर एक जरा-सी अटकी हुई लगती हैं कि हवा का एक झोंका ही उन्हें गिरा दे। लेकिन वे अनंत काल से ऐसी ही, एक अद्भुत संतुलन में अवस्थित हैं और गिरने का क्षण जैसे उनके भीतर कही अटक गया है। हिमालय जैसे अपेक्षाकृत नए पहाड में इन कठोर, आदिम पत्थरों को देखकर एक साथ आश्चर्य, रोमांच और कुछ भय की अनुभूति होती है। इस सुरंग जैसे रास्ते के बाद सहसा एक बहुत चौडी जगह इस तरह प्रकट होती है जैसे वह कोई छिपी हुई जगह हो : विस्तृत पाट, चमचमाती हुई सफेद रेत, सफेद-भूरे पत्थर और उनके बीच पहाडी रास्ते जैसी घुमावदार नीले-हरे रंग की भागीरथी, जिसकी तीन धाराएँ कुछ झरनों के साथ नजर आती हैं। चारों ओर त्रिभुज के आकार की चोटियाँ और उनके बीच बहती भागीरथी का वेग इस मैदान में आकर कुछ थम जाता है जैसे कोई चंचल-चपल किशोरी अचानक शांत हो गयी हो। यहाँ रेत में एक खास तरह की आभा है जिसे देर तक देखते रहने की इच्छा होती है।
यह हरसिल है। करीब आठ हजार फुट की ऊँचाई पर उत्तरकाशी से 73 किलोमीटर दूर और गंगा के उद्गम गंगोत्री से 23 किलोमीटर पहले। हम चार लोग हैं..लीलाधर जगूडी, वीरेन डंगवाल, सुन्दर चंद ठाकुर और मैं, जो उत्तरकाशी से यों ही तफरीहन आ गए हैं। आसमान में फिलहाल बादल नहीं हैं और हरसिल के ऊपर गंगोत्री ग्लेशियर और हिमालय की कुछ दूसरी चोटियाँ दिख रही हैं। पूरा कस्बा इतना शांत है कि दिन में भी भागीरथी के पानी की बुदबुद और स्यूंसाहट सुनाई देती हैं, जो पूरे कसबे में फैली हुई है। दरअस्ल यहाँ तीन जल-धाराएँ मिलती हैं जिन्हें लोग भागीरथी, विष्णुगंगा और जलंधरी कह कर इसे भी एक संगम मानते हैं। उनमें कहीं-कहीं झरने हैं और चारों ओर देवदारु के स्याह रंगत के हरे पेड हैं। शायद कालिदास ने ऐसा ही परिवेश देखकर कुमारसंभव में निर्झरों की फुहारों से देवदारु वृक्षों के कांपने का दृश्य उकेरा होगा :भागीरथी निर्झरसीकराणाम वोढामुहु-र्कम्पितदेवदारु कालिदास के जन्मस्थल को लेकर काफी मतभेद हैं, लेकिन उनकी कुमारसंभव और मेघदूत जैसी कृतियों में उत्तराखंड के इतने विश्वसनीय चित्रण से साफ लगता है कि वे यहाँ की यात्रा पर जरूर आए होंगे। मेघदूत में हरिद्वार के पास कनखल कसबे का भी उल्लेख है। उत्तराखंड के कई इतिहासकार उनका जन्म गढवाल का मानते हैं।
यहाँ आलीशान बाजार नहीं हैं, बल्कि छोटी-छोटी दूकानें और ढाबे हैं जहाँ ताजा पकडी हुई जायकेदार मछलियां खाने को मिल सकती हैं। एकांतप्रिय सैलानियों के लिए हरसिल से ज्यादा सुगम, सस्ती और सहज जगह शायद और नहीं है। यहाँ संपन्न सैलानियों की उतावली भीड नहीं दिखाई देती और न पाँच सितारा सुविधाएँ हैं, बल्कि भागीरथी के विस्तृत तटों या किसी पेड के नीचे नदी का स्वर सुनते हुए पूरा दिन बिताया जा सकता है। ट्रेकिंग के शौकीनों के लिए आसपास सात ताल, डोडी ताल, दयारा और बेदिनी बुग्याल जैसी कई जगहें हैं और वे अक्सर हरसिल को बेस कैंप की तरह इस्तेमाल करते हैं।
हरसिल के बसने की भी एक कहानी है। सन् 1857 के सिपाही विद्रोह के दौरान (जिसे अंग्रेजों के खिलाफ पहली जन-क्रान्ति माना जाता है) मेरठ छावनी का एक कैप्टन फ्रेडरिक विल्सन फौज से भागकर इस उम्मीद में यहाँ आया कि उसे टीहरी रियासत में शरण मिल सकती है जो अंग्रजों के अधीन नहीं था। उसने देखा कि जाड जनजाति के लोगों के इस गाँव का मौसम स्कॉटलैंड जैसा है। टीहरी राजा के इनकार के बावजूद उसने यहाँ डेरा डाला, शिकार करना शुरू किया और एक जाड युवती से विवाह भी कर लिया। उन दिनों बगावत से भयभीत अंग्रेज शासक भारत में तेजी से रेलवे का जाल बिछा रहे थे ताकि आगामी विद्रोहों का दमन करने के लिए फौजों की आवाजाही सुगम हो सके। उन्हें पटरियाँ बिछाने के लिए उम्दा स्लीपरों की जरूरत थी। इसके लिए विल्सन ने लंदन की एक कंपनी से ठेका लिया और देवदार के पेड काटकर उन्हें भागीरथी की धाराओं के जरीये पहुँचाना शुरू किया और खूब पैसे बनाए। इस तरह विल्सन भारत में नदी-यातायात शुरू करने वाला पहला व्यक्ति बना। कहते हैं, विल्सन ने टीहरी के राजा को इस व्यापार से जितना राजस्व दिया, उतना कभी उसे नसीब नहीं हुआ था। विल्सन को स्थानीय लोग राजा विल्सन कहने लगे थे। उन्हीं दिनों विल्सन ने हरसिल में स्कॉटलैंड से सेब के बीज मंगाकर बागीचे लगाए और भागीरथी के पानी से बिजली का उत्पादन भी शुरू किया। हरसिल के सेब अपने स्वाद के लिए देश भर में प्रसिद्ध हैं हालांकि उनका उत्पादन बडे पैमाने पर शुरू नहीं हो सका। विल्सन की योजना हरसिल में स्कॉच बनाने की भी थी, लेकिन तब तक उसका एक बेटा पागल हो गया था और विल्सन की बंदूक से कई लोगों को मार चुका था। विल्सन ने हरसिल में देवदारु की लकडी से एक भव्य घर बनाया जहाँ बाद में अपनी तिब्बत यात्रा के दौरान महापंडित राहुल सांकृत्यायन और जनकवि बाबा नागार्जुन भी रुके थे। बाबा बीमार पडने के कारण लौट आए, लेकिन राहुलजी आगे तिब्बत की ओर चले गए। एक बार इंदिरा गाँधी भी उस घर में आकर रुकी थीं। विल्सन की लोकप्रियता कम होने लगी तो राजा ने उसे मसूरी भेज दिया जहाँ कहते हैं, उसने लंढौर का बाजार बनाया। बाद में इस मकान में दो बार आग लगी लेकिन फिर उसे बनाया नहीं गया और उसकी जगह भारत-तिब्बत बॉर्डर पुलिस ने सीमेंट का एक स्मारक बना दिया जो अब सिंदूरी रंग की पुताई के कारण हनुमान और शिवलिंग के बीच की कोई वस्तु लगती है। भारत-तिब्बत बॉर्डर पर पुलिस के अलावा यहाँ सेना की महार रेजिमेंट भी है इसलिए हरसिल का पूरा विकास अवरुद्ध-सा ही है। दरअसल, देश की ज्यादातर सुन्दर-ठंडी जगहें अंग्रेजों ने खोजी और बसाई थीं। कुछ अफसरशाही के लिए और कुछ फौजों के लिए। यह दुर्भाग्य ही है कि आजाद हिन्दुस्तान में बहुत कम पर्यटन स्थल बनाए गए, और उनमें भी ज्यादातर अविकसित रहे। उत्तराखंड का औली इसका एक उदाहरण है। उसे कृत्रिम बर्फ में ग्रीष्मकालीन खेलों के लिए निर्मित किया गया था, लेकिन अब वहाँ न बर्फ है और न खेल। पहाडी ठंडी जगहों में सभी निर्माण कार्यों के लिए सेना की स्वीकृति लेना जरूरी होता है, लेकिन सुरक्षा और फौजी वर्चस्व के कारण प्रायः मंजूरी नहीं मिलती। हरसिल ही नहीं, रानीखेत, कौसानी, लैंसडाउन, चकराता जैसे मनोरम कस्बों का विस्तार इसीलिए नहीं हो सका और साधारण नागरिकों के लिए वहाँ बसने, घर-दूकान-होटल बनाने की आजादी बहुत सीमित है। अंग्रेजों के जाने के बाद इन जगहों को आम जन और देसी-विदेशी पर्यटकों के निर्बाध रहन-सहन के लिए उपलब्ध होना चाहिये था भले ही सैनिक-अर्ध-सैनिक बलों को कहीं और स्थानान्तरित किया जाता, लेकिन हमारी पर्यटन नीति ही अंग्रेजों की औपनिवेशिक लीक पर ही चलती रही।
हरसिल को पिछली बार अपने दो मित्रों के साथ देखा था : जनसत्ता दैनिक के संस्थापक-सम्पादक प्रभाष जोशी और कवि लीलाधर जगूडी। प्रभाषजी के साथ हम लोग भी गंगोत्री यात्रा पर थे और रात हरसिल के एक गेस्ट हाउस में डेरा डाले हुए थे। प्रभाष जोशी कुछ महीने पहले भी गंगोत्री यात्रा पर आये थे और रास्ते में एवरेस्ट की पहली महिला पर्वतारोही महेन्द्री पाल के गाँव नाकुरी में उनके परिवार से मिलने गए थे। तभी भारी बारिश होने लगी। नीचे एक बरसाती नदी थी, जिसका पानी उफना और सडक के किनारों को काटता हुआ वहाँ खडी उनकी गाडी को बहा ले गया। किसी तरह गाडी निकाल ली गयी, लेकिन प्रभाष जोशी और उनके परिवार को गंगोत्री गए बिना वापस आना पडा।
लेकिन दूसरी बार उन्होंने इरादा पुख्ता करके जगूडी को और मुझे साथ लिया। जगूडी तब उत्तरकाशी में थे। प्रभाष पहले काफलपानी में हमारे घर माँ-पिता से मिलने आये। माँ और बडी दीदी भुवनेश्वरी ने उनके परिवार के लिए खाना बनाया था। दोनों परिवारों का यह मिलन उदास और सुखद था। उन्हीं दिनों मेरा दूसरा कविता संग्रह घर का रास्ता छपा था जो पिताजी को समर्पित था और उसकी एक प्रति मैंने डाक से उन्हें भेजी थी।
प्रभाष जोशी ने पिता से पूछा, क्या आपने मंगलेश जी का नया संग्रह घर का रास्ता देखा है?
पिता ने कहा, जी हाँ इसने घर का रास्ता लिख कर मुझे भेंट कर दिया और खुद घर का रास्ता भूल गया!
अरे! प्रभाष पिता के गले लिपट गए, पिताजी अपने हाथ में मेरी किताब लिए हुए थे।
प्रभाष भावुक हो उठे। उनकी पत्नी उषा भाभी और बेटी सोनाल की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने कहा, मंगलेश, तुम यह बहुत बुरा करते हो।
यह एक दारुण सचाई थी कि इकलौता पुत्र होने के बावजूद मैं घर बहुत कम जा पाता था और पिता के दिन मेरी चिट्ठियों के इंतजार में ही बीतते थे।
उत्तरकाशी से लीलाधर जगूडी के साथ जब हमारा काफिला गंगोत्री को निकला, तो काफी रात हो गयी थी और पडाव हरसिल में करना पडा। वह सर्द चांदनी रात थी, हर जगह वीरानी व्याप्त थी जिसमें हिमालय की झलझल करती बर्फानी चोटियाँ अकेलेपन को कई गुना बढा रही थीं। इतनी रात गए हरसिल में लोकनिर्माण विभाग के गेस्ट हाउस में खाने की व्यवस्था नहीं हो पायी, सो हमने कोशिश की कि कहीं कोई ढाबा ही मिल जाए। बमुश्किल एक ढाबा मिला जहाँ हलकी रोशनी थी। हमने कहा कि कुछ न हो तो आलू की सब्जी और रोटी खिला दीजिये। बहरहाल, लगभग आधी रात को स्वादिष्ट पहाडी आलू खाने को नसीब हो गए। रात में ठंड बहुत बढ गयी और हम लोगों के पैर रजाइयों के भीतर भी ठंडे ही रहे।
गंगोत्री में हम स्वामी सुन्दरानन्द के घर कुछ देर रुके। वे हिमालय के बडे छायाकार, किसी मैथ या सम्रदाय से न जुडी हुई साधना के पक्षधर और गंगोत्री के पर्यावरण बिगडने और साधुओं आदि द्वारा अवैध कब्जों के विरुद्ध सक्रिय थे। उनके बारे में स्थानीय साधुओं के ताकतवर गुट ने ऐसी अफवाहें भी फैलाई थीं कि वे संन्यासी के वेश में कुछ और हैं- चीन या भारत सरकार या सीआईए के एजेंट वगैरह। मैंने जनसत्ता में उनका एक इंटरव्यू भी किया था। स्वामीजी के चित्रों का संग्रह देखना रोमांचक था। हिमालय के शिखर पर बर्फ में की जिस आकृति का आभास होता है, वह उन्हीं की खींची हुई तस्वीर है। फिर लगे हाथ हम सबने भागीरथी में डुबकी भी लगाई और देर तक कंफपाते, शरीर में जान लौटने का इंतजार करते रहे। रात का पडाव उत्तरकाशी में जगूडी का घर था, जहाँ उनके बेटे विशेष का एक होटल भी था।
दूसरी यात्रा में इस बार जगूडी के अलावा कवि-मित्र वीरेन डंगवाल और सुंदरचंद ठाकुर भी हैं। हम देर तक हरसिल के निबिड विस्तार में बैठे रहे। इस यात्रा पर वीरेन डंगवाल ने एक कविता भी लिखी जिसमें हरसिल की भागीरथी को वन की नाचती किशोरी का एकांत उल्लास कहा गया है। हरसिल के पास ही दो गाँव हैं : मुखबा और धराली। मुखबा में गंगोत्री मंदिर के पुजारियों का निवास है। जाडों में जब गंगोत्री के कपाट बंद हो जाते तो गंगा की प्रतिमा मंदिर से मुखबा ले आयी जाती है जिसे लोक-विश्वास में गंगा का मायका माना जाता है। धराली सेबों और शिव मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। सर्दियाँ खत्म होने वाली हैं, लेकिन मौसम अब भी खराब है और गंगा की प्रतिमा अभी मुखबा से गंगोत्री नहीं ले जाई गयी है। गंगोत्री मंदिर या प्रतिमा में हमारी कोई रुचि नहीं, लेकिन हमें सलाह दी गयी है कि रास्ते में मौसम और भी बिगड सकता है इसलिए गंगोत्री न जाना श्रेयस्कर होगा।
बहरहाल, मुखबा के छोटे से बाजार में कुछ पर्यटकों की गाडियाँ दिखती हैं। एक महंगी चार में कोई अमीरजादा शायद किसी जनजाति की लडकी के साथ बैठा है। यह दृश्य कुछ अजब और रहस्यमय लगता है। हम एक स्थानीय वृद्ध को अपने साथ चाय और आलू की गजब स्वाद वाली पकौडियाँ पेश करते हैं तो पता चलता है वह एक रिटायर्ड फौजी है। वह स्थानीय देसी शराब बेचने का काम भी करता है और अपनी ही शराब के नशे में टुन्न लगता है। वह पूछता है कि क्या हमारे पास कुछ बिलायती शराब होगी। ना कहने पर कुछ निराश हो जाता है। संकेतों में वह यह भी बताता है कि कुछ आदिवासी लडकियाँ उसकी कोशिशों से उपलब्ध हो सकती हैं। मुझे एकाएक घबराहट सी होती है और आँखों के आगे कई अवकाश-प्राप्त फौजी घूम जाते हैं जिन्हें बेकारी भीतर से पतित बनाने लगती है और वे पता नहीं कैसे-कैसे काम करने लगते हैं। वीरेन फौजी से बात करके मजे ले रहा है, लेकिन जब फौजी महाशय देखते हैं कि हमारा मकसद न शराब खरीदना है न कुछ और, तो चिढ जाते हैं। पहाडों के जीवन की बर्बादी का एक पहलू यह भी है।
लौटते हुए हम एक बार और हरसिल को, भागीरथी के तटों के विस्तार और शाम की पतली धूप में उजास बिखेरती सफेद रेत को देखते हैं। कुछ आगे एक मोड के नीचे वह जगह है जहाँ राजकपूर ने राम तेरी गंगा मैली की शूटिंग की थी और जिसके कुछ विवादास्पद दृश्यों में अभिनेत्री मन्दाकिनी (बेचारी, वह बॉलीवुड से विदा ही हो गयी!) झीने कपडों और अर्धनग्न-सी स्थिति में स्नान करती हुई गाती है। हरसिल में पोस्ट ऑफिस की काठ की वह ऐतिहासिक इमारत भी है जहाँ कहते हैं कि मंदाकिनी अपनी डाक लेने आयी थी!
लेकिन हरसिल का जादू बीहड चट्टानों और घने पेडों से भरे रास्ते को पार करने के बाद अकस्मात् एक आश्चर्य की तरह प्रकट होने में है। इस छिपे हुए होने में ही उसका कुतूहल और सम्मोहन है।
हरसिल पर एक कविता : गंगा-स्तवन
वीरेन डंगवाल
(लीलाधर जगूडी, मंगलेश डबराल और सुन्दरचंद ठाकुर के साथ, हरसिल-गंगोत्री के रस्ते पर)
1
यह वन में नाचती एक किशोरी का एकान्त उल्लास है
अपनी ही देह का कौतुक और भय!
वह जो झरने बहे चले आ रहे हैं
हजारों-हजार
हर कदम उलझते-पुलझते कूदते-फाँदते
लिए अपने साथ अपने-अपने इलाके की
वनस्पतियों का रस और खनिज तत्त्व
दरअस्ल उन्होंने ही बनाया है इसे
देवापगा
गंग महरानी!

2.
गंगा के जल में ही बनती है
हरसिल इलाके की कच्ची शराब!

घुमन्तू भोटियों ने खोल दिए हैं कस्बे में खोखे
जिनमें वे बेचते हैं
दालें-सुई-धागा-प्याज-छतरियाँ-पॉलिथीन
वगैरह
निर्विकार चालाकी के साथ ऊन कातते हुए

दिल्ली का तस्कर घूम रहा है
इलाके में अपनी लम्बी गाडी पर
साथ बैठाले एक ग्रामकन्या और उसके शराबी बाप को
इधर फोकट में मिल जाए अंग्रेजी का अद्धा
तो उस अभागे पूर्व सैनिक को
और क्या चाहिए!



3.
इस तरह चीखती हुई बहती है
हिमवान की गलती हुई देह!

लापरवाही से चिप्स का फटा हुआ पैकेट फेंकता वह
आधुनिक यात्री
कहाँ पहचान पाएगा वह
खुद को नेस्तनाबूद कर देने की उस महान यातना को
जो एक अभिलाषा भी है

कठोर शिशिर के लिए तैयार हो रहे हैं गाँव
विरल पत्र पेडों पर चारे के लिए बाँधे जा चुके
सूखी हुई घास और भूसे के
लूटे-परखुंडे
घरों में सहेजी जा चुकी
सुखाई गईं मूलियाँ और उग्गल की पत्तियाँ

4.
मुखबा में हिचकियाँ लेती-सी दिखती है
अतिशीतल हरे जल वाली गंगा!

बादलों की ओट हो चला गोमुख का चितकबरा शिखर

जा बेटी, जा वहीं अब तेरा घर होना है
मरने तक
चमडे का रस मिले उसको भी पी लेना
गाद-कीच-तेल-तेजाबी रंग सभी पी लेना
ढो लेना जो लाशें मिलें सडती हुईं
देखना वे ढोंग के महोत्सव
सरल मन जिन्हें आबाद करते हैं अपने प्यार से
बहती जाना शान्त चित्त सहलाते-दुलराते
वक्ष पर आ बैठे जल-पाखियों की पाँत को
सम्पर्क : ई-२०४, जनसत्ता अपार्टमेन्ट,
सेक्टर-९, वसुंन्धरा, गाजियाबाद-२०१०१२
मो. ९९१०४०२४५९