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चार कविताएँ

विनोद पदरज
1.
स्त्रियाँ

एक बुढिया आँधी में झाडू निकालती है
एक प्रौढा आँधी में झाडू निकालती है
एक नवोढा आँधी में झाडू निकालती है
एक बच्ची आँधी में झाडू निकालती है

स्त्री जीवन लेकर आई हैं वे
जिसमें थमती नहीं आंधियाँ
और वे
आंधी में झाडू निकालती हैं


2.

मैंने जितनी भी कहानियाँ सुनी बचपन में
दादी से नानी से
सबमें बेटियाँ दुखियारी होती थीं
जनम से ही उन्हें मारने के अनेक जतन होते थे
पर वे जैसे तैसे बच जाती थीं
फिर नदी नाले गदर, गिरि कंदराएँ
कंटकादीर्ण राहें पार रकती हुईं
अंततः सुखी होती थीं
सौभाग्य पाती थीं
जैसे मेरी दादी पिच्यासी की उम्र में
पडपोते का मुँह देखकर
सोने की नसैनी चढ जाना चाहती थी
पर यह तो तब की बात है जब विकास नहीं हुआ था
गर्भ में ही मारने की तकनीक तो बाद में विकसित हुई


3.
धरती माँ

ठहरी हो गई है माँ
स्तन सूख गए हैं
फिर भी झिंझोडता हूँ

चिडी चुडकले
ढोर डांगर
पेड, पौधे वनस्पतियाँ भी तो संतान हैं

कोई राही झिंझोडता
मैं झिंझोडता हूँ सबसे चैतन्य पुत्र

जबकि कह चुकी कई बार
यह खून पीता है मेरा

आखिर कब तक चिपटायेगी
किसी दिन धक्का देगी वह मुझे।

4.
तुम

जब जेठ की झकर में
भूखा प्यासा
मीलों चलता हूँ
पानी की खोज में
छाँव की खोज में

जब धरा सार बारिश में
राह भूलकर
जंगल में भटकता हूँ
घन घमड गरजते हैं
बिजरियाँ कडकती है
रात थिरती है

जब दारुण ठंड में
ठिठुरता काँपता हूँ
एक जीर्ण वस्त्र में
ओलों की मार सहता हूँ
बियाबान में

बेतरह याद कर हूँ तुम्हें
अनंग ऋतु बसंत में याद नहीं आती तुम मुझे

सम्पर्क : 3/137, हाऊसिंग बोर्ड कॉलोनी,
सवाईमाधोपुर - ३२२०८१
मो. ९७९९३६९९५८