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दस कविताएँ

अरुण कमल
कवि ध्रुव शुक्ल के साथ जुगलबन्दी के फलस्वरूप
1.
दिल्ली पटना जहाँ रहो तुम
समझो गजियाबाद
चना चबेना सत्तू चूडा
सब शरीर की खाद
लोग हैं अपने लोक है अपना
नहीं जरा भी गाद
बस उतना ही हासिल अपना
पीठ सके जो लाद

2.
सुरक्षित स्वस्थ प्रसन्न रहो हे शिशिर सुबन्धु
जर्जर नाव तूफान प्रबल हा हा उफनाता
सिन्धु
मैं अपने पिंजरे में करता सर्व शोडष उपचार
देशी नुस्खों का मैं कायल अपनाता पंच मकार
भंगुर अपनी देह इसे सब सुख लेने दो यार
जब तक रस है रास मचा लूँ
रख दूँगा फिर चादर गार

.
हत्यारे आते हैं जब हमें अकेला पाते हैं
जब लगता है मेरी आवाज तुम तक भी नहीं जाएगी
जब लगता है कोई शिनाख्त भी नहीं कर पाएगा मेरी
लाश की बू पसरेगी बाहर तीन रोज बाद
जब मैं इतना अकेला होऊँगा कि
मैं अपनी जाति अपने धर्म से जाना जाऊँगा
जब एक गर्म भाप मुझे दो पर्त कर देगी
तब वे इकट्ठे आएँगे
तब एक अकेला वार भी खर्चीला होगा
मेरी बिनसूद देह पर
तब वे सब अपनी ख्वाहिश पूरी करेंगे
सब
और मैं अकेला चित्त पडा आखिरी बार देखूँगा
अकेला मुरझाता आकाश

4.
कुछ करो कुछ भी न करो
परलय एक दिन होयगा
जो जगता वो भी मरता
वो भी मरता जो सोता
कुछ बात करो कुछ बात
बातों में दिन रात करो
करो न करो ना शुक्ल ध*ुव
चावल को मिल भात करो

5.
मत पूछ बसंता कैसा हूँ
खुद लिखता हूँ खुद पढता हूँ
गंगाजल सेवन करता हूँ
बस चना चबेना खाता हूँ
घर में फरार-सा रहता हूँ
हाजत का मजा उठाता हूँ
हा! बिना हाट के पैसा हूँ
मत पूछ बसंता कैसा हूँ

भाषण भूषण औ काव्य पाठ
दिवस गलचौर, शाम के ठाट
दान दक्षिणा टी ए डी ए
माला गुलदस्ता पीत पाट
हा बसंत वे दिवस गये, अब
बिना बोझ के है-हइसा हूँ
मत पूछ बसंता कैसा हूँ

जिन कवियों ने दाढी डाली
रंग बिरंगी जूँएँ पालीं
उनकी तो कटती है छाली
पर अप्पन के कान-कान पर
रेंग रहीं जूँएँ हडताली
गरमी ऐसी धूप मवाली
बिन गडहे का भाँ भैंसा हूँ
मत पूछ बसंता कैसा हूँ

सबको मेरी याद दिलाना
गुन अवगुन की चर्चा करना
हर नीयत के खोट समझना
जहाँ बुझाए छींट के दाना
सबके मन की थाह लगाना
कोई कुछ बोले तो कहना
कहना जैसे को तैसा हूँ
मत पूछ बसंता कैसा हूँ

6.
साँझ सबेरे नाम भजूँगा
बस एक काम करा दे
बुझते जाते इस कंडे को
फिर से तू धधका दे
छत्ता भरा शहद से लटका
आ तू उसे चुला दे
साँझ सबेरे नाथ भजूँगा

वे पापी हैं अधम कोटि के
रक्त पिपासु खल दल
विघ्न डालते यज्ञ में मेरे
उनको निर्मूल करा दे
मैं हूँ तेरा तू है मेरा
तू मंदिर मैं घेरा
आकर मेरी बाँह उठा ले
साँझ सबेरे नाम भजूँगा

भजते तेरा नाम अहर्निश
भज भज पा-पा जाते
टुकडे टुकडे कर जंबूदीप के
दाम लगाते धाते
आकर अब उद्धारो भगवन
मगरमच्छ से गज को
नाम भजूँगा साँझ सबेरे
नाथ भजूँगा
दीन हीन कवि अरुण कमल
के साथ भजूँगा

7.
पूछते हो क्यों विभाकर
क्या रहूँगा आज घर पर
अब कहाँ की सैर ठहरी
अब यही खूँटा यही तट

देखने को नभ विपुल है
जो बदलता क्षण प्रतिक्षण
नदी लेती लाख करवट
एक बरगद घना शतपथ
द्वार बस इतना सटा है
खोल देगी साँस की पदचाप

8.
न वतन बदर न ही घर बदर
कैद अपने घर में डर
पूछता उडते परिंदों से
कहाँ का है सफर

धूप है बादल भी हैं
चाँद का घट बढ भी है
ताकता हूँ छत पुरानी
वो नहीं आते नजर

दिन भी जैसे रात धोई
बात में हो बात कोई
चोट सहना जख्म सेना
कौन उठता है कहर

आयी जितनी मौत अब तक
पीट साँकल नाम लेती
साँस-सी खामोश कैसी
ये नदी औ ये लहर

याद कर वो सब जो अब तक
राह में तेरे मिले
याद कर वो साँस तेरे फेफडों में
छुप ठहर
अब भी अपनी खुशबुओं से कर तुझे
जाती है तर
बस वही हासिल है तेरा
फूल फल जायेंगे झर


9.
कहाँ के बडे
प्रसन्नता कैसी
अंदर ईर्ष्या
बाहर हँसी
जरा तपस्या
की तापस ने
हुई इन्द्र की
ऐसी तैसी

नहीं किसी को
तू पतियाना
झूठे लबरे
चौक मुहाना
अपनी अपनी छतरी ताने
डाल रहे
कुक्कुट को दाना

अब किसको कविता की चिंता
कैसा गायन
कैसा धिन ता
अपने बिल में
मुग्ध केंचुए कहते
ढहा लवण परबत्ता

सबसे छोटी जाति हमारी
पृथ्वी के हम आदि जारवा
कंद मूल जड बूटी भखते हतो वा
नरोवा कुंजरोवा

हमें पता हैं ढूह ढाणियाँ
कहाँ खोंपडी कहाँ हड्डियाँ
ठठा रहे जो जीत मनाते
उनके कंकालों की गड्डियाँ

तुम बोलो दिन रात कभी भी
कोई तो सुनता है जगता
कोयल गाती बिन जाने, सुन
आमों का रस गाढा पकता


10

पडता रहे नाँद में सानी फिर कैसा गम कैसी बंदी
बिजली बत्ती गैस सिलिन्डर और टेंट में नगदी
दिन दुपहर हो शाम रात हो खाना सोना यही काम हो
घर में सारे सुख के साधन बाहर चाहे पडा
लाम हो
जिसको मरना है वो मरेगा भाग्य में जिसके जैसा
कोई खटमल वाइरस कोई कोई बनेगा
भैंसा
हर सुखाड में बाढ आग में हर आफत में मौजाँ
बंदी हो नकबंदी हो नटबंदी हो या मंदी
मौजाँ भौजी मौजाँ नन्दी-




* सभी कविताएँ ध्रुव शुक्ल, कर्मेन्दु शिशिर, अनिल विभाकर और बसन्त सकरगाए के लिए।

सम्पर्क : फ्लैट नं. 07,
मैत्री शांति भवन,
बी.एम.दास रोड,
पटना - ८००००४
-मो. ९९५५९९८०७६