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मनस्वी कवि : मुक्तिबोध

जीवन सिंह
मुक्तिबोध अपने समय के एक ऐसे विशिष्ट और विलक्षण रचनाकार हैं, जो मानव मन की उलझनों को बाह्य जगत की द्वंद्वात्मकता में समझ कर कविता की तत्त्व-चिंता में गंभीर और कालबद्ध भागीदारी और उसकी रचना करते हैं। सामान्यतया, हर कवि को अपने समय में कविता लिखने का एक प्रचलित ढर्रा मिलता है, उसी को कवि अपने अनुभवों की जिल्द में लपेट कर प्रस्तुत करने की कोशिश करता है। ऐसे अलग किस्म के कुछ ही कवि होते हैं जो अलग से अपने समय की तत्त्व-चिंताओं में ज्यादा गहराई से शामिल होते हैं और कुछ ऐसा करते हैं जो बुनियादी होता है इसीलिए उनका लिखा--कहा औरों से बहुत अलग होता है। उसको समझाने में भी मुश्किलें आती हैं। पाठक का अभ्यास ऐसा नहीं होता कि वह लीक से हटकर कुछ अलग तरह की तत्त्व--चिंताओं को स्वीकार करे। आधुनिक कविता में निराला इसी वजह से सबसे अलग नजर आते हैं इसके बाद मुक्तिबोध ही हैं जो अपनी नजरों से उन जगहों को देखने का प्रयास करते हैं जिनको दूसरे कवि अपनी प्रचलित सामान्य नजरों से नहीं देख पाते। ऐसे रचनाकार अपने समय के बाहरी जाल में उलझ जाते हैं जबकि मुक्तिबोध सरीखे रचनाकार अपने समय की बहती हवाओं के जाल में नहीं फँसते। वे बहुत सोच समझकर अपना निर्णय करते हैं। इसीलिए ये कविता के बने बनाए ढर्रे को भी तोडते हैं। क्योंकि इनके लिए जितना महत्त्वपूर्ण बाहर का संसार होता है उतना ही व्यक्ति के भीतर का। भीतर-बाहर की द्वंद्वात्मकता का अद्भुत संतुलन ऐसे सजग रचनाकारों के यहाँ मिलता है। ये जितनी बाहर की तैयारी करते हैं उतनी ही व्यक्ति-मन के भीतर की भी। व्यक्ति के भीतर को जाने बिना हम उसके पूरे स्वरुप को नहीं जान सकते, जो कुछ बाहर घटित होता है, उसका गहरा रिश्ता उसकी आन्तरिकता से रहता है। महत्त्वपूर्ण बाहर भी है लेकिन वह आन्तरिकता के बिना सम्पूर्ण नहीं है। मुक्तिबोध बाहरी जगत से व्यक्ति के तालमेल को भीतर तक जाकर देखते हैं। ऐसी द्वंद्वात्मक प्रक्रिया की रचना बहुत सरल नहीं होती, न अंतर्वस्तु के स्तर पर, न ही अभिव्यक्ति के स्तर पर। व्यक्तिकेंद्रित मनस्विदों की तरह ये मानव मन के वैसे एकांत पारखी नहीं होते, जो जीवन के व्यवस्थागत और बाहरी यथार्थ से मन को काट कर उसे उसकी एकान्तता में तलाश करते देखे जाते हैं। जिस परिवेश से मानव मन रचता-पचता है, उसे उस परिवेश से काटकर व्यक्ति और सामूहिक मन की परख वस्तुगत तौर पर खंडित एवं आधी-अधूरी होती है। यह एक तरह से परिणामवादी दृष्टि है, जो कारणों की जाँच करने से बचती है। फ्रायडवादी और अस्तित्त्ववादी चिंतकों और रचनाकारों की जीवन-दृष्टि इसी वजह से सचाइयों का एक सीमा से आगे समग्र बोध नहीं करा पाती। उनकी कदाचित यह सबसे बडी सीमा रही कि वे मानव मन का विश्लेषण और उसकी रचनात्मकता को जीवन-सन्दर्भों की समग्रता से काटकर उसे केवल व्यक्ति-सन्दर्भों में देखते-दिखलाते रहे। वे उन कारणों की पूरी खोज नहीं कर पाए, जो व्यक्ति मन को एक विशिष्ट रूप और स्थिति प्रदान करते हैं। यह तो सभी स्वीकार करते हैं कि यह मानव मन ही है, जो सब कुछ रचता है और विध्वंस करने की उससे भी ज्यादा क्षमता रखता है। यह मानव मन ही है जिसमें जितनी करुणा है, उतना ही क्रोध-रचनात्मक और अहमन्य भी भरा हुआ है। जितनी सदाशयता है, प्यार-मोहब्बत और करुणा है, उतने ही छल-प्रपंच, धोखा, विश्वासघात, पक्षपात भी। परिस्थितियाँ उसे परमार्थी से ज्यादा स्वार्थी बनने की ओर धकेलती हैं। उसकी स्वार्थ--साधना इतनी बलवती होती जाती है कि उसे अपने आगे कुछ भी दिखाई नहीं देता। मुक्तिबोध के शब्दों में सबको अपनी अपनी पडी रहती है, और साधन ही साध्य के मुआफिक सिर पर चढे रहते हैं। मुक्तिबोध का सारा संघर्ष उन साधनों के विरुद्ध रहा है, जो व्यक्ति को उसकी मानवता से च्युत और उसका पतन करते जाते हैं। इसीलिए वे मन के उन गुहा- अंधकारों की खोज करते हुए उसकी भयावह और असली तस्वीर अपने पाठक को दिखाते हैं, जिनमें स्वयं पाठक भी शामिल रहता है। इस तरह वे पाठक को प्रकारांतर से उसकी अपनी तस्वीर भी दिखलाते हैं। व्यक्ति के भीतर की यह एक छिपी हुई और रहस्यमयी दुनिया है, जो अनेक तरह के मिथकों का सृजन स्वयम करती है और स्वयं ही उनसे लडने का नाटक भी करती रहती है। मसलन पूँजी की दुनिया में कौन है, जो उलझा हुआ नहीं है। व्यक्ति सबसे लडना चाहता है, केवल पूँजी के खेल से नहीं। जो लोग सांप्रदायिक संकीर्णता और फासीवाद से लडने की कसमें खाते हैं वे भी पूंजीवाद के आगे पस्त हो जाते हैं जबकि यह पूंजीवाद ही होता है जो इन सबकी जड में रहता है। इसीलिये मुक्तिबोध के निशाने पर सबसे ज्यादा पूंजीवाद ही रहा है। क्योंकि मुक्तिबोध जानते हैं कि पूँजी से जुडा हृदय बदल नहीं सकता। अपनी अँधेरे में कविता में वे पूँजीवाद को केंद्र में रखकर उसकी उन सभी प्रवृतियों की खबर लेते हैं जो उसको ताकत देती हैं। मुक्तिबोध जब अपने मन को पूँजी के चक्रव्यूह में उतारते हैं, तो मालूम पडता है कि इसे बनाने में उसकी भी थोडी-बहुत भूमिका रही है। यह वह दुनिया है, जहाँ सारे कुचक्र चलते रहते हैं। सच तो यह है कि व्यक्ति और व्यक्ति-समूह या उनकी कम्पनियाँ, छल-प्रपंचों से ही दूसरों पर शासन करते है। किन्तु यह भी सच है कि यही मन है, जो उत्साह, प्रेम, करुणा, आश्चर्य, आदि कितनी ही मनोवृत्तियों का वाहक है। यह मन ही है जो अभी जिसके साथ है, जरूरी नहीं कि सदैव उसके साथ रहे। उसकी स्वार्थ भावना बडी प्रबल है। त्याग भी उसकी वृत्ति है किन्तु स्वार्थ की तुलना में बहुत कमजोर। वह किसी भी तरह के प्रलोभन जाल में फँस सकता है और अपने प्रिय का शत्रु बन सकता है और मौका पडने पर उसी तरह परम शत्रु का प्रिय भी। सम्भवतः इसीलिए मुक्तिबोध ने इसे रहस्यपूर्ण बतलाया है। उन्होंने लिखा है कि- मन एक रहस्यमय लोक है। उसमें अन्धेरा है, अँधेरे में सीढियाँ हैं। सीढियाँ गीली हैं। सबसे निचली सीढी पानी में डूबी हुई है। वहाँ अथाह काला जल है। उस अथाह जल से स्वयं को ही डर लगता है। इस अथाह काले जल में कोई बैठा है। वह शायद मैं ही हूँ। यह तो हुआ उनके मन का एक पहलू। इसी मन का एक दूसरा पहलू भी उनके यहाँ मौजूद है, जिसके बारे में वे आगे लिखते हैं-
अथाह और एकदम स्याह अँधेरे पानी की सतह पर चाँदनी का एक चमकदार पट्टा फैला हुआ है, जिसमें मेरी ही आँखें चमक रही हैं, मानो दो नीले मूँगिया पत्थर भीतर उद्दीप्त हो उठे हों । यह कथन उनकी कृति एक साहित्यिक की डायरी में आया हैं, जहाँ उन्होंने खुलकर अपने मन को विस्तृत होने के लिए जगह दी है। कहना न होगा कि यहाँ घनीभूत अन्धकार होने के बावजूद उसके आगे चाँदनी की चमक भी है। यह चाँदनी बाहर से आती है, जैसे हमारे जीवन का बाहर वह है, जिसमें एक ओर को घनघोर अन्धेरा है, तो चाँदनी भी है। गौरतलब है कि मुक्तिबोध के लिए जितना महत्त्व मानव-मन के भीतरी रहस्यलोक का है, उससे ज्यादा महत्त्व उस बाह्य संसार का है, जो इस मन की रचना के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार होता है। अन्धकार और प्रकाश का एक अद्भुत संतुलन उनके रचना संसार में मिलता है। जो उसके लिए परिस्थितियों का एक आकाश और एक धरती प्रदान करता है। सवाल उठ सकता है कि आधुनिक वैज्ञानिक विवेक के जमाने में भी मुक्तिबोध इस तरह के रहस्यलोक की बात क्यों करते हैं? इससे यह भ्रम फैलाया गया और यह बतलाया भी गया है कि उनकी कविता में ये रहस्यवाद की अनुगूँजें ही हैं। इस बात में संदेह की गुंजाइश नहीं कि मुक्तिबोध रहस्य की बात करते हैं लेकिन यह भी तथ्य है कि उनके यहाँ यह रहस्य उस व्यक्ति-मन का रहस्य है, जो अपनी प्रवृत्तियों को छिपाकर रखता है। वे उस रहस्य के यथार्थ को इस तरीके से खोलते हैं, जहाँ व्यक्ति कहता कुछ है और करता कुछ है। वह जैसा बाहर नजर आता है, वैसा वास्तव में नहीं होता। करना कुछ और कहना कुछ,यही रहस्य है व्यक्ति का और यह जीवन का इतना बडा और भयानक रहस्य है, जो न जाने कितने रहस्य-जालों का निर्माण करता है। यह आधिभौतिक रहस्यवाद से भी ज्यादा खतरनाक रहस्यवाद है। सच तो यह है कि मुक्तिबोध रहस्यलोक की बात रहस्य के घेरे को तोडने के उद्देश्य से करते है। जैसा कि साफ है कि मानव विकास यात्रा में चीजों और उनसे रिश्तों का मिथकीकरण लगातार चलता आया है। आज भी चल रहा है। मिथकीकरण से व्यक्ति की मुक्ति नहीं, यही है, जो रहस्य को यथार्थ के आगे खडा कर देता है। व्यक्ति चाहे कितना ही यथार्थ का दम भरता हो लेकिन वह अपने आसपास आज भी एक रहस्य लोक का घेरा बनाता रहता है। साहित्य इस घेरे को तोडने का प्रयास अवश्य करता है, किन्तु साहित्यिक प्रयासों की तुलना में जीवन क्रियाएँ इतनी ताकतवर होती हैं कि यहाँ साहित्य की एक नहीं चलती। प्रसिद्ध कला-चिंतक थियोडोर अडोर्नो की मान्यता इस बारे में यह है कि -उत्तरदायी ढंग से सोचने का अर्थ है मिथकीकरण की प्रक्रिया की रहस्यमयता को तोडना, क्योंकि मिथकीकरण के माध्यम से ही संस्कृति और कला को पराधीनता का साधन बनाया जाता है। आज भी शासक वर्ग के बारे में अनेक तरह के मिथक गढ कर सामान्य जन के बीच प्रचारित कर दिए जाते हैं। इसलिए एक अजीब किस्म की पराधीनता में आज का आदमी रहता है। पराधीनता से मुक्ति कहाँ है? जो लोग मिथक को तोडते हैं, वे अपना मिथक बना देते हैं। जब-जब और जहाँ जहाँ परिवर्तन हुए हैं, वहाँ मिथक ही टूटे हैं, किन्तु उनकी जगह पर दूसरे मिथक गढ दिए जाते हैं। प्रश्न पैदा होता है कि क्या आज का आधुनिक मानव मिथकों की दुनिया से परे है? क्या वह स्वयं एक मिथक नहीं बना हुआ है? क्या इस मिथकीयता को ध्वस्त किये बिना उसके मन की भीतरी परतों तक पहुँचा जा सकता है? सच तो यह है कि आज का व्यक्ति पहले से ज्यादा जटिल और मिथकीय हुआ है। जो उसके भीतर का दुराव है, वह एक तरह का तिलस्म और मिथक ही है। यहाँ हर व्यक्ति अपने जीवन का सत्य छिपा कर रहता है और बाहर एक मिथक बनाकर रहता है। उसके यथार्थ पर रहस्य की अनगिनत परतें चढती रहती हैं। वह बाहर से जैसा दिखता है वैसा भीतर से नहीं होता। वास्तविकता कुछ और होती है। यही उसका रहस्य लोक है। कहना न होगा कि मुक्तिबोध अपने समय और समाज के जीवन-सन्दर्भों में इसी जरूरी दायित्त्व को पूर्ण करने के लिए रचना में प्रवृत्त होते हैं। उनके सारे प्रयत्न जीवन की इसी रहस्यमयता को खोलने के लिए हैं। यही उनकी मौलिकता और विलक्षणता है। इस काम को सभी नहीं कर सकते। इसे वे ही कर सकते हैं, जो अपने रहस्य लोक को उघाड देने का माद्दा रखते हैं, जिन्होंने देने के बदले में लिया बहुत कम है। रहस्यवाद यद्यपि इस दुनिया को समझने का एक पुराना तरीका रहा है और इसके साथ वह घनघोर अज्ञानता और शोषण-उत्पीडन का माध्यम भी बना है। वह कला, कविता और चिंतन-प्रक्रिया को जीवन की सच्चाईयों से विच्छिन्न व विस्थापित करने का काम भी करता रहा है। इसीलिए रहस्यवादी मानसिक प्रवृत्तियों से संघर्ष करते हुए रचनाकार को मिथकीकरण के उस घेरे को तोडना पडता है, जो व्यक्ति को उसकी स्वाधीनता से वंचित करता है। यहाँ पर गौर करने की बात यह भी है कि मुक्तिबोध के लिए जीवन एक रहस्यलोक होते हुए भी वैसी पहेली नहीं है, जैसी कि पुराने आध्यात्मिक रहस्यवादियों के लिए हुआ करती थी। उनका रहस्य लोक दूसरे तरह का है। वह व्यक्ति के उस मन का रहस्य लोक है, जो उसके बाहर-भीतर को अलग करके व्यक्तित्त्व को विभाजित करता है। इसलिए वह यथार्थ का हिस्सा है। सच तो यह है कि रहस्यलोक जैसी शब्दावली यहाँ व्यक्ति मन की उन जटिलताओं को समझने के लिए आयी है, जो उसकी कथनी और करनी के बीच बडा अंतराल बनाती हैं। निस्संदेह, जब व्यक्ति की सोच और आचरण में एक गहरा अंतराल नजर आता है तो वह एक तरह की व्यावहारिक कठिनाई पैदा करता है। यह कहना गलत न होगा कि मुक्तिबोध के लिए व्यक्ति- मन कहीं पहले से बनकर अवतरित नहीं होता, इसलिए यह रहस्यवादियों के अर्थ में रहस्यलोक नहीं है। वह रहस्य इस अर्थ में है कि सामान्य बुद्धि से इसे नहीं समझा जा सकता। इसी वजह से कहा जाता रहा। जैसे कि उपनिषद् में कहा गया- हिरण्यमयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्। स्वर्ण और सत्य का यही रिश्ता व्यक्ति मन को एक रहस्य लोक की तरह बनाता है। इसके निर्माण में व्यक्ति की अपनी और बाहरी परिस्थितियों का बडा योगदान होता है। वैसे बुनियादी तौर पर हर व्यक्ति अपने जन्म से एक खुली स्लेट की तरह होता है, जिसके ऊपर उसका विकसित या अविकसित, आदिम और इतिहासबद्ध, जैसा भी परिवेश उसे मिलता है, वह वैसा ही बनता चला जाता है। उसका पूरा सोच और व्यवहार उससे प्रभावित होते हैं। उसकी स्वार्थभावना और वर्गबद्धता का सबसे बडा कारण उसका वर्गीय परिवेश और वह व्यवस्था होती है, जिसमें वह रहने को विवश होता है। इसीलिये हमारे यहाँ कहा गया कि जैसा खाओ अन्न, वैसा बने मन । ऐसी हालत में व्यक्ति अपने वर्गीय परिवेश- परिस्थितियाँ के अनुरूप एक मौकापरस्त की तरह अपने जीवन की दिशाओं का निर्धारण किया करता है। यह तथ्य है कि कोई व्यक्ति अपने जन्म से न अपराधी होता है, न महात्मा और न विलासी। महात्मा, अपराधी और विलासी उसे उसकी परिस्थितियाँ बनाया करती हैं। ये ही स्थितियाँ हैं, जो उसके चारों ओर रहस्य लोक का घेरा बनाती हैं। कहना न होगा कि इसमें व्यक्ति-मन और उसके बाह्य संसार से अर्जित संस्कारों की महत्त्वपूर्ण भूमिका हुआ करती है। जब परिवेश की हवा में हर कण सफलता-सफलता की तोतारटन्त लगाता है, तो सार्थक जीवन जीने की लालसा सबसे ज्यादा प्रभावित होती है।
कहने की जरूरत नहीं कि पूँजीवादी व्यवस्था के मौजूदा तीसरे और सबसे ज्यादा खतरनाक जन -विरोधी वित्तीय पूंजी के दौर में व्यक्ति-जीवन में रहस्य लोक की रचना पहले से और ज्यादा बढ गयी है। जब व्यक्ति सफल होने के अलावा कदाचित कुछ सोचता ही नहीं या उससे आगे सोचने की क्षमता ही खो बैठता है। वह सफलता के मिथकों का जाल बुनने में लग जाता है। उसका सफलता विषयक सोच तो चालू रहता है, किन्तु महसूस करना लगभग समाप्त हो जाता है। कैसी विडम्बना है कि इस दौर में व्यक्ति ऊपर से तो विकसित, सभ्य और भद्र नजर आता है, किन्तु उसकी भद्रता की भीतरी असलियत कुछ और ही होती जाती है। अनुभव यह बतलाता है कि व्यक्ति भौतिक स्तर पर जितना प्रभुता सम्पन्न होता जाता है, उसका अंतःकरण उतना ही क्षुद्र, तुच्छ, पतित और संवेदनाशून्य होता जाता है। इसमें अपवाद हो सकते हैं। ऐसा उच्च और उच्चमध्य वर्गों के स्तर पर इसलिए बहुत ज्यादा होता है क्योंकि ये वर्ग ही प्रभुता का सर्वाधिक उपभोग करते हैं। समाज के मेहनतकश तबके इसके बावजूद आरोपित क्षुद्रताओं से उबरने के प्रयास में लगे रहते हैं। या उनकी जीवन-परिस्थितियाँ ही ऐसी होती हैं कि जिनसे उनका भीतरी सौंदर्य नष्ट होने से बचा रहता है। करुणा, प्रेम और बुराइयों से घृणा, उत्साह जैसे मानवीय सदगुण उनमें परिस्थितियों के बावजूद बचे रहते हैं।
हमें इस ऐतिहासिक तथ्य को याद रखना होगा कि औपनिवेशिकता के पिछले दो सौ सालों में अपने एशियाई, अफ्रीकी, दक्षिण अमरीकी उपनिवेशों के शोषण-उत्पीडन से प्राप्त अतिरिक्त पूँजी से यूरप -अमरीका का जो वर्ग बेहद धनाढ्य हो गया था, वह अपने सत्कर्मों और सदगुणों की वजह से कम, वरन छल-कपट, धोखा, विश्वासघात और कूटचालों जैसी क्षुद्रताओं की वजह से ज्यादा, प्रभुता और वैभव सम्पन्न बना था। उसने अपने उपनिवेशों के मेहनतकश जन के शोषण, उत्पीडन और दमन से अपार धन-सम्पदा लूटी और बटोरी थी। जिनकी वजह से बाद में उसे पारस्परिक बाजार--स्पर्धा के कारण दो विश्व युद्धों की भयावहता से भी गुजरना पडा। यूरप के इसी वर्गीय जीवन की प्रकट क्षुद्रताओं का अनुभव कर वहाँ के अस्तित्त्ववादी चिंतकों ने कदाचित यह गलत निष्कर्ष निकाल लिया था कि मानव स्वभावतः क्षुद्र प्राणी होता है। वह अकेला होता है। वह अपने अस्तित्त्व के प्रति अजनबी होता जाता है। यह कहना गलत न होगा कि यह सब उस वित्तीय पूँजीवादी व्यवस्था की वजह से होता है जिसमें व्यक्ति द्वारा अर्जित सामाजिकता, सहकार भावना और सामूहिकता का तेजी से क्षरण होता जाता है और वह घनघोर रूप से आत्मकेंद्रित, व्यक्तिवादी, अजनबी और अलगाव का शिकार बनता चला जाता है। पूँजीवादी पद्धतियों से शोषण, भ्रष्टाचार, पापाचार और स्वार्थभावना के ऐसे पहाड खडे होते जाते हैं कि व्यक्ति अपनी भविष्य शून्यता के प्रभाव में आकर अस्तित्त्ववादियों जैसी बातें और हरकतें करने लगता है या फिर वह पुरातन रहस्यवाद की गोदी में सो जाने का प्रयत्न करने लगता है। नतीजतन, वह एक ओर अतिशय लालची बनता चला जाता है तो दूसरी ओर उसे अपना जीवन ही निरर्थक लगने लगता है। एक अजीब तरह की विडम्बना उसे घेरे रहती है। वह हमेशा एक तरह की पापभावना और अपराध- बोध से ग्रस्त रहता है। यह आकस्मिक नहीं है कि पूँजीवादी समाजों में व्यक्ति को सबसे ज्यादा अवसाद, कुंठा,संत्रास और निराशा की स्थितियाँ घेरने लगती हैं। क्या कारण है कि यूरप और अमेरिका के बेहद धनाढ्य होते चले जाने के बावजूद इन देशों में मनोवैज्ञानिक समस्याएँ और संकट प्रबलता में उभर कर आए हैं। इस तथ्य को कौन नहीं जानता कि यूरप के देशों में औद्योगिक क्रान्ति संपन्न होने के बाद और पूँजीवादी दौर में सभ्यतागत ऊँचाइयाँ छू लेने के बाद जब वे दुनिया के पिछडे देशो पर अपना शिकंजा जमाते चले जा रहे थे और अतिरिक्त पूँजी का साम्राज्य खडा करते चले जा रहे थे, तभी जिसकी वजह से वहाँ एक ओर भौतिक- वैज्ञानिक प्रगति हो रही थी, वहीं दूसरी ओर उस तरह के जीवन में अकेलेपन की आहट भी उनको सुनाई पडने लगी थी। जबकि एशिया, अफ्रीका और दक्षिणी अमरीका के देशों की औपनिवेशिक जनता के जीवन में उनके पिछड जाने के बावजूद ऐसा नहीं था। इन देशों के जीवन में सामूहिकता और सहकार भावना बची हुई थी। आजकल आवारा वित्तीय पूँजी के इस नए दौर में हमारे यहाँ भी यह बीमारी बहुत तेजी से अपने कदम जमा चुकी है। पिछले पच्चीस-तीस वर्षों से हमारे यहाँ भी इस आवारा पूँजी का निर्बाध और अनियंत्रित खेल चल रहा है। इसी का परिणाम है कि देश के जीवन पर फासीवाद ने सीधी दस्तक दे दी है। मुक्तिबोध की मशहूर कविता अँधेरे में इसी आहट को आज से पचास-बावन वर्ष पहले समझ लिया था। हम जानते हैं कि देश को आजादी मिलने के बाद से ही मुक्तिबोध विदेशी पूँजी के बढते खेल की आहटों के बारे में जानकर बेहद चिंतित थे। पत्रकारिता से सम्बद्ध उनके छठे और शुरुआती सातवें दशक के अनेक आर्थिक-राजनीतिक लेखों में इस बात पर गहरी चिंता प्रकट की गयी है। कहना न होगा कि यूरोप में भी मेहनतकश वर्ग के जीवनानुभव पूंजी के इस खेल के प्रतिरोध में थे। यह तथ्य है कि आवारा और अतिरिक्त पूँजी के खेल से उच्च और उच्च्मध्य वर्ग का आंतरिक जीवन उनकी उत्पादक परिस्थितियों के अनुरूप तरह तरह की निम्नताओं और क्षुद्रताओं से भरता चला जाता है। इसी के परिणामस्वरूप इस व्यवस्था में बँधा हुआ पराधीन व्यक्ति अपनी स्वाधीनता और समानता के लिए निरंतर लडता रहा है। इस प्रक्रिया में वैचारिक स्तर पर एक नयी आधारभूमि का निर्माण जरूरी होता है, जिसे विचारविद, बुद्धिवेत्ता, साहित्यकार, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता आदि मिलकर किया करते हैं। नतीजन, ऐसे ही तरह-तरह के वर्गीय अनुभवों के आधार पर भाँति-भाँति की दार्शनिक चिंतनधाराएँ जन्म लेती रही हैं। इससे इतना स्पष्ट है कि जैसे व्यक्ति मन के निर्माण में परिस्थितियों की भूमिका रहती है, वैसे ही परिस्थितियों के निर्माण में व्यक्ति मन की भी। जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि मुक्तिबोध अपने दौर के एक ऐसे विशिष्ट रचनाकार हैं, जो व्यक्ति-मन और उसकी परिस्थितियाँ दोनों को साथ लेकर चलते हैं। अन्यथा जनवादी दृष्टि को लेकर चलने वाले रचनाकार समाज के बरक्स व्यक्ति-मन को अक्सर दरकिनार किये रहते हैं। इसके विपरीत ऐसे रचनाकार भी होते हैं जो समाज की बुनियादी परिस्थितियों से अपनी वर्गीय स्थिति के अनुरूप परहेज बरतते हैं। मुक्तिबोध की खासियत इस बात में ज्यादा रही है कि उनके यहाँ मन और इतिहास की एक ऐसी जुगलबंदी रहती है, जिसमें से उनके समय का वास्तविक और ज्ञानसिक्त संगीत निकलता है। उनके यहाँ व्यक्ति मन और समाज दोनों ही इतिहास के बाहर नहीं हैं। समस्या तभी पैदा होती है, जब व्यक्ति और समाज दोनों को को इतिहास से बाहर रखकर रिश्तों को देखने की कोशिश की जाती है।
मुक्तिबोध की काव्यगत कठिनता के पीछे कदाचित यह भी सच है कि वे व्यक्ति-मन को भी उतना ही महत्त्व देते हैं जितना उसके बाहरी सामाजिक संबंधों को। वे व्यक्ति मन की भूमिका के जीवन-सन्दर्भ उसके कोने कोने में झाँक कर उठाते हैं। मुक्तिबोध व्यक्तिमन को उतना ही महत्त्पूर्ण मानते हैं, जितना समाज के बाहरी दृश्यरूप को। इसीलिए वे उसे कविता की अंतर्वस्तु बनाते हैं। यही कारण है कि वे कविता की आलोचना में आभ्यन्तरीकरण और बाह्यीकरण की द्वंद्वात्मकता का सवाल बार-बार उठाते हैं। इसके बावजूद यहाँ पर यह उल्लेख करना उचित होगा कि व्यक्ति-मन की भूमिका को मानते हुए भी मुक्तिबोध साहित्य में व्यक्तिवाद के कभी पोषक और प्रवक्ता नहीं रहे। इस मामले में उनकी भूमिका सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण और उल्लेखनीय कही जा सकती है कि वे समाज के लिए व्यक्ति की और व्यक्ति के लिए समाज के रिश्ते की अनदेखी नहीं करते। उनके लिए जितना महत्त्वपूर्ण समाज है, उतना ही महत्त्वपूर्ण व्यक्ति भी। उनके लिए ये दोनों परस्पर पूरक हैं, विरोधी नहीं। जहाँ समाज पिछड जाता है वहाँ व्यक्ति उसे दिशा दिखाने का काम करते हैं और जहाँ व्यक्ति रास्ता भूलने लगते हैं वहाँ समाज उन्हें रास्ता दिखाता है। व्यक्ति को समाज ताकत प्रदान करता है और समाज को व्यक्ति उसकी मंजिल तक ले जाने का काम करता है। इस तथ्य को मुक्तिबोध ने उन दिनों में समझने और उस पर डटे रहने का खतरा उठाया था, जब प्रगतिशीलता के नए नए वातावरण में समाज के सामने व्यक्ति की भूमिका को बेहद गौण समझा जाता था। व्यक्ति को न समझने का ही परिणाम है कि देश में साम्प्रदायिक ताकतों का प्रभुत्त्व कायम हुआ है। छायावादी कविता की व्यक्तिनिष्ठ छवि के बाद प्रगतिवादी वातावरण में कुछ रचनाकारों पर समाज-समाज का नशा कुछ ज्यादा ही चढा हुआ था। व्यक्ति की भूमिका कितनी महत्त्वपूर्ण होती है, इसे अक्सर विस्मृत कर दिया जाता है। यदि व्यक्ति और समाज का द्वंद्वात्मक सम्बन्ध और संतुलन बना रहता तो आज दुनिया और देश को घनघोर व्यक्तिवाद, आवारा पूँजी के मौजूदा, शैतानी रूप, फासीवाद की आहट और खतरनाक अकेलेपन और अलगाव के दिन शायद देखने को न मिलते। यह सच है कि पूँजी अपनी रक्षा और विस्तार के लिए एक कवच के रूप में अपनी सामरिक बुद्धि और नवीनतम आयुधों का आविष्कार एवं प्रयोग करती रहती है। वह व्यक्ति की पीठ पर अपना हाथ रखती है। उसे अपना वाहक बनाती है क्योंकि व्यक्ति चाहे समाज के प्रति ईमानदार न रहे किन्तु अपने स्वार्थ के प्रति सबसे ज्यादा ईमानदार रहता है। समाज, व्यक्ति की तुलना में ज्यादा अमूर्त होता है। उसका कोई एक रूप नहीं होता। बिखराव और टूटन से हर समाज त्रस्त रहता है। सामजिक एकता एक मिथक की तरह होती है। इसीलिए दुनिया के कामों पर हमेशा व्यक्ति या व्यक्ति-समूहों का आधिपत्य बना रहता है। हमने देखा है कि पुरानी समाजवादी व्यवस्था में भी कुछ व्यक्ति--समूहों का आधिपत्य रहा है। यह बात साफ है कि पूरा समाज कभी शासन नहीं करता। समाज के नाम पर कुछ लोग शासन करते हैं। मौजूदा दौर में लोकतंत्र भी एक मिथक की तरह काम करता है। इसलिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति और समाज का संतुलन बना रहे। इसके लिए व्यक्ति और समाज दोनों के रिश्तों के सच को समझना जरूरी है। मुक्तिबोध की रचनाशीलता की यही खूबी है कि इस संतुलन को लाने का प्रयास उन्होंने किया है। इसी वजह से वे समाजवादी जमात में उतने नहीं समझे गए, जितना समझा जाना चाहिए था। समझा भी गया तो उनकी अपनी अपनी सूरत गढी गयी। अब जब सोवियत संघ का विघटन हो गया तो समझ में आया कि व्यक्ति के उस रहस्यलोक को भी समझा जाना कितना जरूरी है, जो अपनी असलियत में एक रहस्य की तरह जीता है। अन्यथा वह कितनी ही बडी क्रान्ति और परिवर्तन को कभी भी चौपट कर सकता है।
यहाँ पर यह उल्लेख करना उचित होगा कि मुक्तिबोध ने इसी वजह से काव्य और व्यक्तित्त्व के सम्बन्ध के सवाल को न केवल अपनी आलोचना में उठाया है वरन इसे अपनी रचनात्मकता का हिस्सा भी बनाया है। यह बहुत बडा सवाल है, जिसे वे कई तरह से और बार बार उठाते हैं और इसी वजह से वे काव्य और व्यक्तित्त्व का सम्बन्ध जोडने पर विशेष बल देते हैं। वे कहते हैं कि असल बात यह है कि काव्य और व्यक्तित्त्व का सम्बन्ध आपको कहीं न कहीं जोडना होगा। यह नहीं हो सकता कि आप एक ओर सामान्य मानवीयता का त्याग करते चलें और दूसरी ओर काव्य में मानवीय बनें।
उनके यहाँ मानवता काव्य से सिद्ध नहीं होती, वरन वह जीवनधर्मी होती है। रचना का मर्म ही यही है कि वह ज्यादा से ज्यादा मानवीय हो। मानवता के मार्ग की अडचनों पर भी वह वैसे ही विचार करे, जैसे उसकी मंजिलों पर करती है। हमने देखा है कि ज्यादातर रचनाकार मार्ग की बाधाओं से उपजे यथार्थ को छोडकर मंजिल को अपना प्रयोजन बना लेते है क्योंकि यह आसान रास्ता किताबी ज्ञान से निकल आता है। लेकिन ज्ञान और संवेदना का सेतु जब तक न बने तब तक असंगति बनी रहती है। संवेदना का रिश्ता जीवन से होता है। वह कविता में जीवन के मार्फत आती है। उससे पता लगता है कि कवि का जीवन से कितना गहरा नाता है। ज्ञान की भूमिका संवेदना को तार्किक बनाने की होती है क्योंकि एक बिखरे और सीढीनुमा समाज में लोगों के लिए संबंधों के अपने तर्क होते हैं। कहना न होगा कि जो संवेदना तर्क पर नहीं चलती, वह पाठक को शायद ही कहीं पहुँचा पाए। सिर्फ संवेदना ही कवि को मानवीय नहीं बनाती, उसके लिए सम्बन्धों का सही ज्ञान होना भी उतना ही आवश्यक होता है। यही वजह है कि मुक्तिबोध सिद्धांत के साथ बराबर अपने समय के जीवन-व्यवहार को रखकर चलते हैं तभी पता चलता है कि कवि की संवेदना का असली स्वरूप क्या है? विकलता और बेचैनी यदि सैद्धांतिक स्तर तक है, तो इसका आसानी से पता चल जाता है। साफ देखा जा सकता है कि मुक्तिबोध की बेचैनी अनेक कवियों से कुछ अलग तरह की है, जो व्यावहारिक सवालों से पैदा हुई है। यह सामान्य मानवीयता ही है, जो एक व्यक्ति को रचना-कर्म की ओर ले जाती है और इसमें मन की भूमिका अहम् होती है।यही मानव मन की समग्रता है। यही साधन-साध्य की एकता भी है।
यह तो सभी को मालूम है कि कवि मनस्वी होता है। उसकी सबसे बडी परीक्षा मन को जानने के स्तर पर ही होती है। इसीलिये उसे मनीषी कहा गया है। कवि की मनस्विता के बारे में यहाँ पर मुझे वाल्मीकि रामायण का एक प्रसंग याद आ रहा है- प्रसंग यह है कि जब हनुमान लंका- ध्वंस करके अपने साथियों अंगद, जामवंत आदि को खबर देते हैं कि वे सीता का पता लगा आए हैं। वे इस समय रावण की कैद में हैं और बेहद त्रसित हैं। रावण ने उनको अनेक प्रलोभन दिए हैं, किन्तु वे टस से मस न हुई। व्यक्ति की परीक्षा ऐसे ही अवसरों पर होती है कि वह अपनी आस्था पर डटा रहे। सीता इसमें पूरी तरह से सफल होती हैं। तब अंगद आदि कई उतावले वानर यह परामर्श देते हैं कि क्यों न हमीं लोग सीता को जीत कर ले चलें? क्या जरूरत है राम को यहाँ तक आने और उनको कष्ट देने की। किन्तु जामवंत उनको ऐसा करने से रोकते हैं कि इस तरह से हम सीता को तो ले जाएँगे, किन्तु वह बुरी व्यवस्था अपनी जगह पर सुरक्षित रह जाएगी, जो सीता जैसी पराई स्त्रियों का अपहरण कराती है और बुरे -अत्याचारियों को सुखी रखती है तथा ईमानदार-भले लोगों को दुखी करती है। हमारा उद्देश्य इस व्यवस्था को समूल नष्ट करना है, न कि अपने स्वार्थ को साधना। वाल्मीकि ने यहाँ जामवंत जैसे लोगों को मनस्वी कहा है। उन्होंने लिखा है - सर्वे रामप्रतीकारे निश्चितार्था मनस्विनः। मनस्वी का मतलब है मन के भीतर की जान लेने वाला। भविष्य को देख लेने वाला। इस संसार को बाहर से जान लेना तो फिर भी आसान है, किन्तु इसके भीतर को जानना बहुत मुश्किल है। व्यक्ति का भीतर कैसा है, यह केवल स्वयं व्यक्ति ही जानता है और यह व्यक्ति मन ही है जो धोखा करता है। कहना न होगा कि मुक्तिबोध मन के पारखी कवि हैं। वे भीतरी और बाहरी दोनों पहलुओं को लेकर चलते हैं। तभी तो वे अपनी कविता ब्रह्मराक्षस में कहते हैं कि-
पिस गया वह दो पाटों के बीच /
ऐसी ट्रेजेडी है नीच।
मुक्तछंद जैसे जटिल काव्य रूप में लिखी जा रही काव्य परम्परा में सबसे बडी दिक्कत यह आती है कि पाठक का मन यदि उस अद्यतन काव्य-संवेदना से परिचित नहीं है, तो वह उसे स्वीकार नहीं करता। वह उसमें सम्प्रेषण के अभाव की शिकायत करता है। मन, दरअसल, एक ऐसा अगाध और व्यापक जीवन-क्षेत्र है, जिसके निर्माण में व्यक्ति-हृदय के साथ साथ व्यापक जीवनानुभव और उस ज्ञानार्जक बुद्धि की भूमिका भी लगी रहती है, जो मन को चारों दिशाओं से समृद्ध करती है। हमारा मन जितना समृद्ध होगा, कविता रचने और उसे ग्रहण करने की क्षमता भी उतनी ही सूक्ष्म, व्यापक और तीव्र होगी। मन की पहुँच जितनी दूर तक होगी, उसकी रचनात्मक क्षमता भी उतनी ही बढ जाएगी। कहना न होगा कि मुक्तिबोध अपने मन के प्रति सबसे ज्यादा सजग और सावधान रहने वाले कवि हैं। सावधानी भी वे मन और आचरण दोनों स्तरों पर बरतते हैं। इसीलिए वे कविता में ऊँचे शिखरों की यात्रा तक करते नहीं हिचकिचाते। इसी से वे समझ लेते हैं कि पहाडी राह में पडने वाले पत्थर-ढोकों के भीतर झरने कैसे तडपते हैं। मिट्टी के लौंदे के भीतर भक्ति की अग्नि का उद्रेक कैसे भडकने लग जाता है । धूल के कण में अनहद नाद का कम्पन कैसे होने लगता है। यह जो भीतर भीतर चल रहा है या चलता रहता है, इसका आकलन किए बगैर कविता में समग्रता ला पाना संभव नहीं। मुक्तिबोध इस प्रत्रिज्या में सबसे ज्यादा जूझने वाले कवि हैं और यही उनकी कठिनता की एक वजह भी है। पहाड के भीतर झरने की हलचल, मिट्टी के लौंदे के भीतर अग्नि का उद्रेक और धूल के कण में बजने वाला अनहद नाद यही वह प्रत्रिज्या है, जिसे कवि और पाठक दोनों को जानना जरूरी है। कहना न होगा कि यही कवि की भीतरी और तीसरी आँख है, जो अनुदघाटित को उदघाटित करती है। जिससे कवि को कई युग एक साथ दिख जाते हैं। काल और देश का अंतर मिट जाता है। मुक्तिबोध की प्रसिद्ध और सर्वाधिक चर्चित कविता- अँधेरे में -जिस व्यक्ति को उन्होंने गुहा में देखा है, यह व्यक्ति का वही भीतर का सत्य है, जिसे वह छिपाए रखता है। जो उसके सामने सबसे बडा धर्म-संकट उपस्थित कर देता है। इसलिए वह उसकी अवहेलना और अनदेखी करता है। यह बार बार उद्धाटित होता है और छिप जाता है। उसके छिपते रहने का कारण यह है कि वह एक सुविधाजनक सत्य की दुनिया में सिमटकर रहना चाहता है, जिसमें कम से कम जोखिम उठाना पडे। सामान्यतया हर मध्यवर्गीय व्यक्ति अपनी एक आधी-अधूरी और खंडित दुनिया में रहता है, जो सत्य से उसे दूर रखती है। इस वजह से उसे वह परम अभिव्यक्ति हासिल नहीं हो पाती, जो परिवर्तन, कविता और जीवन सभी के लिए जरूरी है। मुक्तिबोध के लिए परम अभिव्यक्ति का सवाल ही मुख्य सवाल बना है एक कवि के रूप में, जिसे वह प्रत्यक्ष करना चाहता है, किन्तु कर नहीं पाता। यह आकस्मिक नहीं है कि उसकी खोज जारी रहती है। यही कारण है कि कविता लगातार अपनी यात्रा जारी रखती है व्यक्ति-चरित्र और मन की सबसे बडी समस्या है कि वह कहता कुछ है और करता कुछ है। देखा जाय तो मुक्तिबोध का सारा साहित्य और जीवन जैसे इसी एक समस्या से जूझता रहा है। उनके यहाँ विभिन्न तरह से और भिन्न भिन्न रूपकों में जैसे यही एक बात घूम घूम कर वापस आती जाती है कि वह क्या बात है जो व्यक्ति को उसकी आत्मा से दूर करती जाती है। दुनिया में सारे संकट इसी वजह से हैं कि यहाँ व्यक्ति जो सोचते हैं, वैसा करते नहीं। सोचने और करने के बीच बडा अंतराल है। जब सोचे हुए को करने की बारी आती है तो लोग रास्ता ही बदल लेते हैं। साहित्य-संस्कृति तक में यही होता है। यहाँ भी जितनी दूसरों की आलोचना की जाती है उतना अपनी ओर नहीं देखा जाता। बाहर किये जाने वाले संघर्षों के साथ आत्मसंघर्ष भी चलता रहे तो व्यक्ति उदातता की स्थिति में रहता है। उसका व्यक्तिवाद सामाजिकता में तिरोहित होता रहता है। अन्यथा व्यक्ति की अहमन्यता सारा खेल बिगाड देती है।
मुक्तिबोध की एक लम्बी कविता है- एक स्वप्नकथा-इसमें कवि व्यक्ति की उस साधना और विकास यात्रा का उल्लेख करता है, जो इतिहास की गति के अनुसार आगामी परिवर्तन का कारक बनती है। कवि अपनी इस कविता की शुरुआत जय और पराजय के बीच जगमगाते विशुद्ध स्व की विचित्र उथल-पुथल से करता है। वह बतलाता है कि उसके दिन और रात सियाह समन्दर के अथाह पानी में उठते-गिरते हैं और उसका मन विक्षोभित- हिल्लोलित लहरों के सांवले जल में नहाता रहता है। वह इसमें से बाहर निकलने की कोशिश जब-जब करता है तो चकाचौंध कर देने वाली किरणें उसकी आँखों के सामने और अगल बगल में नाचने लगती हैं। देखने की बात है कि कविता की शुरुआत द्वंद्वों से होती है -जय-पराजय,काले-सफेद और उजाले-अँधेरे के द्वंद्वों में वह ऐसे अनेक लोगों को नहाते देखता है, जिनके मुखारविंद उसको डराते हैं। और यहीं से अनेक तरह के प्रश्न उनके मन में शुरू हो जाते हैं। जिनको उसने सागर में नहाते देखा है, उन के मुख स्फूर्ति से भरे हुए हैं और वे कविता में कवि के मुझे को देख तमतमा उठते हैं। यहीं पर कवि के मन में कई तरह के सवाल पैदा होते हैं कि ये लहरें कहाँ से आयी हैं इनका उद्गम और इतिहास क्या है? सामने नजर आते काले समुद्र की व्याख्या और भाष्य क्या है? और यहीं समुद्र में से कुछ कठोर मुख आकृतियाँ और भयावने चेहरे चिलक उठते हैं। ये चेहरे गुस्से में आकर अपनी भौहें चढाने लगते हैं। ये चेहरे पहचाने से लगते हैं किन्तु पूरी तरह पहचान में नहीं आते। ऐसा प्रतीत होता है कि ये दूसरे महाद्वीपों में रहने वाली मानव आकृतियाँ हैं, जो लहरों में मुस्कराती हुई उभरती रहती हैं किन्तु इनका प्रभाव थरथराने वाला होता है। कवि लिखता है-
खयाल यह आता है -
शायद है,
सागर की थाहों में महाद्वीप डूबे हों
रहती हैं उनमें वे मनुष्य-आकृतियाँ
मुस्करा, लहरों में उभरती रहती हैं।
थरथरा उठता हूँ।
सियाह वीरानी में लहराता आर-पार
सागर यह कौन है?
कहने की जरूरत नहीं कि यहाँ कवि केवल अपने देश के बाहरी यथार्थ को नहीं देख रहा है वरन उसके अवचेतन में जो पूरी दुनिया समाई है, जिसने कभी औपनिवेशिक शासन तंत्र के शोषण-उत्पीडन से, तो कभी अपने वर्चस्वकारी पूँजीगत संबंधों के कारण अपने देश के लोगों के मुँह पर मुस्कान बिखेरी हैं, वहीं अपने अधीनस्थों और दूरस्थ दुर्बलों को दबाते हुए थरथराया है। यहीं सवाल उठता है कि वह सागर कौन है, जो सियाह वीरानी में आर-पार लहराता रहता है? वीरानी में सागर का आर-पार लहराना एक अलग तरह का ऐसा प्रतीकात्मक बिम्ब है, जो दुनिया के आपसी रिश्तों के यथार्थ को एक विराट रूपक में बाँधकर दिखलाता है। यहाँ सागर के वीरान सियाह होने का खास मतलब है और उन चेहरों के मुस्कराने तथा कठोर आकृतियाँ होने का भी एक खास मकसद है। यह कोई रहस्यवाद नहीं है वरन उस कठोर और क्रूर यथार्थ का नंगा सच है, जो बाहर की आँखों से नजर नहीं आता। इस कविता के तीसरे बंध में कांपने-सिहरने, भयभीत होने और अपवित्रता की हद खोजने से लगाकर अपार्थिव पक्षिनियों से अनहद गान सुनाने तक कवि एक ऐतिहासिक सिलसिला पाठक के सामने पेश करता है। कोई भ्रम न रहे, इसीलिए वह पक्षिनियों के अपार्थिव होने के तर्क को भी बीच में प्रस्तुत कर देता है। इतिहास से सिद्ध है कि आज जो बातें हमको अपार्थिव प्रतीत होती हैं, वे ही भविष्य में पार्थिव हो जाती है और ठीक इसके उलटे जो आज पार्थिव नजर आता है वह अपार्थिव जैसा प्रतीत होने लगता है। आज हम अपने ही देश को लें तो इस में महात्मा बुद्ध, महात्मा गाँधी, शहीद भगत सिंह जैसे लोग हमको अपार्थिव जैसे दिखाई देते हैं। पार्थिव से अपार्थिव और अपार्थिव से पार्थिव होने का यह इतिहास--चक्र निरंतर चलता रहता है। यही कारण है कि आज अनहद नाद जैसा गान सुनाने वाली पक्षिनियाँ अपार्थिव नजर आती हैं। एक और बात कि वे गाती ही नहीं, चीखती भी है तथा जमाने-जमाने की गहरी शिकायतें करती हैं और खूंरजी किस्सों से निकले नतीजो को भी सुनाती रहती हैं। दरअसल ये अपार्थिव लगती हैं, वास्तव में हैं नहीं। क्या यह सच नहीं है कि आज कोई भी व्यक्ति, जो सत्य की बात उठायगा, अपार्थिव जैसा ही लगेगा। इस समय दुनिया में झूठ का ऐसा बोलबाला है कि सत्य की बात करना तक अपार्थिव लगता है। सत्य आज इस दुनिया की बात नहीं रह गया है। दुनिया पूँजी के एक ऐसे दुष्चक्रमें उलझा दी गयी है, जिसमें सत्य की खोज करना तक अपराध जैसा बनाया जा रहा है। ऐसा मुक्तिबोध अपने ही समय में होता महसूस कर रहे थे। आज जब पूँजी की विश्व पर तानाशही जैसी हो गयी है, तब हम समझ सकते हैं कि मुक्तिबोध अपने समय में कितने गहरे उतरकर चीजों को समझ रहे थे। जिन लोगों ने इस तरह की कविताओं में रहस्यवाद देखा था, प्रश्न है कि क्या वे इस भयावह यथार्थ को देख पा रहे थे, या फिर एक पूर्व-निश्चित यथार्थ की बनी बनायी धारणा से बाहर नहीं निकल पा रहे थे। सच तो यह है कि वे मानव स्वभाव की विचित्रताओं को समझ नहीं पा रहे थे। जबकि मुक्तिबोध उनको अपनी तीसरी आँख से देख पा रहे थे। यह है वर्तमान के भीतर से भविष्य को देख लेना। निस्संदेह, इस मामले में मुक्तिबोध भविष्य-दृष्टा कवि हैं। उनकी मनस्विता इसी बात में है कि वे अतीत, वर्तमान और भविष्य को एक निश्चित सम्बन्ध-क्रम में देखने की सतत् कोशिश करते हैं साथ ही पूरी दुनिया के रिश्ते को समझते हुए। यहाँ महाद्वीप और सागर के जितने रूपक हैं, वे व्यक्ति-मन के भीतर चल रहे उस आन्दोलन का परिणाम हैं, जो चीजों को मानवीय रिश्तों की कसौटी पर कसकर देखता है।
मुक्तिबोध की काव्य-संरचना में कई तरह के रूपक आते हैं, जिनमें उजाले से ज्यादा अँधेरे वातावरण का प्रयोग अपेक्षाकृत ज्यादा आता है। एक बात और है कि वे काव्य-संरचना में अतीतपरक दृश्यावलियों और उन ऐतिहासिक रूपकों का प्रयोग भी करते चलते हैं, जो एक जमाने में सत्य के ज्यादा नजदीक पहुँचे थे। इनमें ज्ञानात्मक संवेदना से सम्पन्न संत-काव्य परम्परा का उनके लिए खास महत्त्व रहा है। यही कारण है कि वे कबीर के द्वारा प्रयोग में लाये गए प्रतीक-रूपकों को अपनी आधुनिक संरचना में खास जगह देते हैं। यह आकस्मिक नहीं है कि भारतीय हिंदी काव्य-परम्परा में से वे उस परम्परा का चुनाव करते हैं, जो मध्यकाल में मानवीय सत्य के सबसे ज्यादा पास पहुँच चुकी थी। इस रूप में वे परम्परा से अपना सम्बन्ध कायम करते हैं, उनकी आधुनिकता वैसी विच्छिन्न आधुनिकता नहीं है, जो परम्परा से अपना कोई नाता नहीं रखती। निस्संदेह, मुक्तिबोध परम्परा में से चुनाव करते हैं और एक यथार्थ बोधक परम्परा से अपना नाता कायम करते हैं। इस परम्परा से वे उस शब्दावली तक को ग्रहण करने में कोई संकोच नहीं बरतते, जो कुछ विद्वानों को रहस्यवाद की द्योतक लगी है, इनमें डॉ. रामविलास शर्मा का नाम खासतौर से आता है। डा.शर्मा ने मुक्तिबोध की कविताओं में संत काव्य परम्परा के कुछ अवधारणापरक पदों को प्रयुक्त देखकर यह मान लिया कि मुक्तिबोध रहस्यवादी चेतना से मुक्त नहीं हैं। दरअसल, यह मुक्तिबोध का अवचेतन है, जहाँ आधुनिक बोध को जातीय परम्परा से न केवल वस्तुगत ताकत मिलती है वरण वह शब्द-विन्यास भी, जो एक ओर परम्परा को आधुनिक अर्थ देता है तथा दूसरी ओर उसको एक विकसित होते हुए प्रवाह में स्थापित करता है। इस मामले में मुक्तिबोध उस नयी कविता आन्दोलन से अलग हैं, जो कविता को परम्परा से काटकर सर्वथा नवीन को प्रश्रय देती है। हम देखते हैं कि उनकी कविताओं की भाषा पर मध्यकालीन रूपकों की छाया का एक विलक्षण प्रभाव मिलता है। जैसे कि आत्मा मुक्तिबोध का अतिप्रिय शब्द है और इसका प्रयोग वे आज की मूल्य व्यवस्था के तहत अनेक बार करते हैं। कहना न होगा कि इसके बावजूद उनके यहाँ कविता की समग्र प्रस्तुति में आत्मा जैसा रहस्यवादी पद एक आधुनिक मूल्यचेतना परक अर्थ धारण कर लेता है। सच तो यह है कि कोई भी भाषा कभी पूरी तरह नयी नहीं होती, वह विकसित होती है- पुराने और नए का जोड मिलाती हुई। मुक्तिबोध की काव्य भाषा की विलक्षणता का एक राज यह भी है कि वह पुरातनता की अनदेखी नहीं करती। वह कवि के मानस को भावनात्मक प्रश्रय देती है। कविता में खयाल आना, स्वप्न देखना, ठहर कर सोचना, बहस करना, जद्दोजहद आदि की तकनीकों से मुक्तिबोध की कविता न केवल जिन्दगी के छोड दिए और उलझा दिए गए सूत्रों को सुलझाने की कोशिश करती है बल्कि इन्ही सूत्रों का विकास करती हुई वह अपने समय की आकांक्षाओं को इसी में पिरो देती हैं। उनके यहाँ इतिहास की गति शायद ही कभी आँखों से ओझल होती हो। यह इतिहास का दबाव ही है, जो उनकी कविताओं को दीर्घाकार प्रदान करता है। केवल वर्तमान को देखने और उसी में जीने वाले कवि ऐसा नहीं कर पाते। वर्तमान का विशुद्ध एकायामी पक्ष कविता को सिकुडी हुई प्रगीत संरचना से आगे नहीं जाने देता। हिन्दुस्तान का कवि ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि उसके पीछे पाँच हजार वर्षों का इतिहास है, उसकी एक समृद्ध परम्परा है। इसे वे-एक स्वप्नकथा-कविता में इस तरह दिखाते हैं-

रह- रहकर यह खयाल आता है -
ज्ञानी एक पूर्वज ने
किसी रात, नदी का पानी काट,
मन्त्र पढते हुए,
गहन जल धारा में
गोता लगाया था कि
अन्धकार-जल-तल का स्पर्श कर
इधर ढूंढ, उधर खोज
एक स्निग्ध गोल गोल
मनोहर तेजस्वी शिलाखंड,
तमोमय जल में से सहज निकाला था,
देव बना, पूजा की।
कहना न होगा कि आज दुनिया जिस मुकाम पर आ पहुँची है, वह सब एक दिन में नहीं हुआ। हम जानते हैं कि एक विकास प्रक्रिया से होकर मानवता यहाँ तक पहुँची है। मुक्तिबोध उस इतिहास के यथार्थ को पाठक की आँखों में लाना चाहते हैं, जिससे वह जान सके कि चीजें बदलती हैं, तो उनके रिश्ते भी बदलते हैं। चीजें स्थिर नहीं है वे लगातार अपना स्वरुप परिवर्तन कर रही हैं। इसमें अँधेरे--उजाले का संघर्ष लगातार जारी है। इतिहास की इस प्रक्रिया को समझे बिना हम सही निष्कर्षों तक नहीं पहुँच सकते। कहना न होगा कि मुक्तिबोध अपनी हर लम्बी कविता में इतिहास से गुजरते हैं। इतिहास और संस्कृति उनका प्रिय विषय ही नहीं रहे हैं वरन इनके बिना उनकी कवितायेँ अधूरी रहती हैं, यह उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है। एक बात और कि इतिहास उनके यहाँ बोझ और किसी अभिप्राय या रूढ प्रयोग की तरह नहीं आता है, वह वर्तमान को गति देने वाला है और भविष्य की रूपरेखा प्रस्तुत करने वाला। ऐसा बहुत कम कवियों के यहाँ होता है। उनके समकालीन और विशेष चर्चित कवि अज्ञेय इतिहास का सामना नहीं करते वे उससे बचते रहे हैं, इसलिए उनके यहाँ जीवन-संबंधों को विश्लेषित करती हुई कविताओं के रूपक ज्यादा नहीं मिलते। वे क्षण की अनुभूति को ही कविता के लिए श्रेयस्कर मानते हैं जबकि मुक्तिबोध इतिहास को वर्तमान की तराजू पर रखकर लगातार तोलते हैं और वर्तमान के लिए इतिहासकी शक्ति को ग्रहण करते हैं । यह आकस्मिक नहीं है कि उनकी-भारत -इतिहास और संस्कृति पुस्तक पर मध्य प्रदेश की तत्कालीन सरकार ने प्रतिबन्ध लगादिया था। उनकी यह प्रखर यथार्थवादी इतिहास चेतना और उसका विवेक ही था, जो उसके अँधेरे और उजाले को अलग- अलग करके देख रहा था। कहना न होगा कि वे अपनी कविताओं में भी इसी तरह अँधेरे और उजाले को देखते हैं। ऊपर दिए गए काव्य उद्धरण में स्पष्ट देखा जा सकता है कि यहाँ तमोमय जल में मनोहर तेजस्वी शिलाखंड निकला है। जो इतिहास में हुआ है, उसका उल्लेख यहाँ है। इसके बाद इतिहास की नदी की जगह आज के सियाह समंदर ने ले ली है। पुराने समय का इतिहास विभिन्न देशों में अलग अलग नदी की तरह था। विज्ञान की नयी नयी तकनीकों और संचार--परिवहन के नए नए साधनों के आ जाने से आज नदी सागर में बदल गयी है। आज दुनिया एक महासागर की तरह है। वैश्वीकरण एक प्रक्रिया है, किन्तु देखने की बात यह है कि इसका नया रूप कितना मानवीय, समग्र और सम्बन्ध-भावना का विस्तार करने वाला है। इस रूप में देखने पर वह कवि को सियाह नजर आता है। तभी तो नदी के बाद सियाह समंदर का रूपक आता है - नदी के बाद उनका रूपक बदल जाता है। पहले जो शिलाखंड मिला था, वह नदी से निकला था। इसी से वे नयी संभावना व्यक्त करते हैं कि अब वह समुद्र में खोजा जा सकता है। समुद्र का मतलब है पूरी दुनिया। यह तथ्य है कि पूँजी का विस्तार पिछली तीन शताब्दियों से चूंकि पूरी दुनिया के स्तर पर हुआ है, इसलिए समस्याएँ, चुनौतियाँ और संकट भी ग्लोबल हो गए हैं। आपसी संबंधों के निर्धारण में वैश्विक भूमिका बढ गयी हैं। हमारे देश को ही लें, तो संकट आज का नहीं है, यह पिछले दो-तीन सौ सालों से तभी से है, जब देश ब्रिटिश शासकों की कालोनी बना। तभी से देश की संपदा को ब्रिटिश शासक लूट लूट कर ब्रिटेन ले गए। तब से आज तक वही प्रक्रिया किसी न किसी रूप में जारी है। यही है वह सियाह समन्दर, जिसका जिक्र मुक्तिबोध अपनी कविता में एक रूपक की तरह प्रायः करते हैं। यह उसका बाहरी स्तर है, इसके भीतर व्यक्ति का मन क्या-क्या और कैसा कैसा अनुभव करता है, इसे मुक्तिबोध कविता में फेंटेसी के माध्यम से रचते हैं। चूंकि वह मन की आतंरिक बात है, इसलिए इसकी प्रक्रिया में रहस्याभास जैसा लग सकता है। फेंटेसी का एक प्रयोजन होता है मानव मन की परीक्षा और उसका वस्तुगत आकलन। यही कारण है कि मुक्तिबोध कहीं उसकी स्वप्नकथा कहते हैं तो कही उसकी अंतर्कथा लिखते हैं। उनकी अंतःकरण का आयतन जैसी कविताएँ भी इसी ओर इशारा करती हैं। मुझे पुकारती हुई पुकार में भी हम इसे देख सकते हैं। दिमागी गुहांधकार का ओरांगउटांग और एक अरूप शून्य के प्रति जैसी कविताएँ भी अपने पाठक को व्यक्ति के अंतःकरण की सैर बडी शिद्दत से कराती हैं। कहना न होगा कि ऊपरी तौर पर इस दुनिया में बहुत कुछ बदला हुआ नजर आता है यह सत्य है। किन्तु मनुष्य की आन्तरिकता उस तरह नहीं बदलती, उसक भीतर की प्रलोभनकारी आकांक्षाएँ और प्रभुत्त्व कामना वैसे नहीं बदलती। इसी वजह से इक्कीसवीं सदी में भी पिछली अनेक सदियाँ बनी रहती हैं। जो कवि जीवनानुभवों की बहुत ऊपरी साथ पर रहते हैं और इतिहास से जिनका गहरा संफ नहीं होता वे कालों की दीर्घ सूत्रता को नहीं देख पाते। यह इतिहास और उससे प्राप्त दृष्टि-विवेक ही है जो रिश्तों के भीतर छिपे हुए वस्तुगत को जान सकता है और उसके ऊपर पडे आवरणों को भेद सकता है। यह दृष्टि जिसने अर्जित नहीं की है वह कविता तो अवश्य लिख लेता है किन्तु उसके भीतर वह सजीवता नहीं आ पाती, जो कविता को निराला-मुक्तिबोध की कविताओं की तरह कालजयी बनाती है। यहाँ पर यह कहना गलत नहीं होगा कि इस काम के लिए फिर निराला-मुक्तिबोध जैसा जीवन वरण करना पडता है।
इस एक स्वप्नकथा कविता का सियाह समन्दर ऊपर से कितना ही स्याह क्यों न नजर आता हो, इसी के भीतर अतल-तलपर पडा हुआ है एक किरनीला दीप्त प्रस्तर, जो अपनी आभा में युगों से काले सागर के विरुद्ध रहा है और आज भी उस आभा का प्रतिनिधित्त्व कर रहा है। यह पूरी संभावना है कि वह किसी एक व्यक्ति की संभावना न होकर पूरे ब्रह्माण्ड की केंद्र त्रिज्याओं का तेजस्वी अंश है। कहने का तात्पर्य यह है कि उसे खोजने, देखने व समझने की जरूरत है। मुक्तिबोध इसी तरह अपनी कविताओं में मन के उस स्तर की खोज करते चलते हैं जो उसके भीतर घटित होता है। व्यक्ति-मन के भीतर की यही खोज उनकी कविताओं को जहाँ अपने समय की चिंताओं के प्रति गंभीर बनाती हैं, वही सामान्य पाठक के लिए ऐसे कवियों की कवितायेँ दुर्बोध भी हो जाती हैं जिनको समझने के लिए विशेष प्रयास और काव्याभ्यास की जरूरत होती है। सच तो यह है कि उनकी दुर्बोधता का कारण मानव मन का वह इतिहास है, जो सभ्यता-विकास की प्रत्रिज्या में लगातार दुर्बोध से दुर्बोधतर होता चला गया है। कहना न होगा कि इस यात्रा में आधुनिक मानव मन सबसे ज्यादा दुर्बोध हुआ है। जितना छल आज का व्यक्ति करता है उतना पहले के युगों की परिस्थितियों में संभव नहीं था। कृषि सम्बन्ध वैसे भी अपेक्षाकृत सरल होते हैं। औद्योगीकृत रिश्तों में छिपाव बढ जाता है। चीजें उस कदर पारदर्शी नहीं रह जाती, जैसे पहले के युगों में हुआ करती थी। मन की इस गहराई में उतरने वाले मनस्वी कवि मुक्तिबोध इस मामले में अपने समय के सबसे अलग और आसानी से समझ में न आने वाले कवि हैं। कहा जा सकता है कि ऐसे कवि और कविता का हम क्या करें? अलबत्ता, ऐसा ही पिछले कुछ समय तक अनेक विद्वानों ने निराला ही नहीं कबीर के लिए भी कहा था। सामान्यतया, लीक पर चलने वाले कवियों के लिए ऐसा नहीं कहा जाता। वे तुरंत-फुरत समझ में भी आ जाते हैं और स्वीकृत भी हो जाते हैं किन्तु जीवन के बुनियादी सवालों, भावों और धारणाओं की खोज कर उनकी रचना करने वाले कवि हर युग में कोई इक्का-दुक्का ही हुआ करते हैं। दरअसल, मुक्तिबोध भी इसी श्रेणी के कवियों में हैं, जो देरी से समझ में आते हैं और जिनको समझने के लिए प्रयास भी करना पडता है। वे प्रसाद-निराला की तरह व्यक्ति के दार्शनिक मन के कवि हैं। मुक्तिबोध की एक बात यह भी है, जो उनकी कविता को दुर्बोध बनाती है वह है कि वे एक देश के कवि होते हुए भी आज की एक अंतरराष्ट्रीय दुनिया में दूसरे देशों में क्या हुआ, कैसे हुआ, क्यों हुआ, जैसे सवालों के जवाब खोजने की कोशिश करते हैं-
संभव है
सभी कुछ दिखता हो उसमें से,
दूर दूर देशों में क्या हुआ,
क्यों हुआ, किस तरह, कहाँ हुआ।
ये ही सवाल हैं जो उनकी कविता को आकार में लम्बी बनाते हैं और पारंपरिक कविता की तरह सुबोध भी नहीं रहने देते जबकि ज्यादातर कवि इस तरह के सवालों के फेर में पडने से बचते हैं। वे अपने समय की विसंगतियों और विडंबनाओं पर ज्यादा ध्यान देते रहे हैं क्योंकि उन पर लिखना आसान भी होता है और वह आसानी से समझ में भी आ जाता है। विसंगतियाँ भी हमेशा अमूर्त ढंग से गिना दी जाती हैं, जिनका एक अमूर्त रिश्ता व्यक्त होता है।

सम्पर्क : 1/14, अरावली विहार,
अलवर-३०१००२