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पंत काव्य और अरविन्द दर्शन

श्रीलाल मोहता
पंत की सृजन यात्रा एक अन्वेषी की सृजन यात्रा है। छायावादी कवियों में अग्रणी पंत के सामने कालिदास मानो साक्षात खडे हैं। यह देखना दिलचस्प इसलिए भी है कि कैसे व किस तरह एक रचनाकार परम्परा से ग्रहण कर उसमें कुछ जोडता है। क्या हम यह नहीं देख पा रहे हैं कि शब्द की अर्थवत्ता की माँग कालिदासीय चेतना की ही माँग है। हमारी परम्परा में पंत इसलिए भी महत्त्वपूर्ण कवि हैं, क्योंकि उनकी काव्य रचना प्रक्रिया में भाव, कल्पना और प्रकृति का बीज वैदिक परम्परा से जुडा है। इसलिए उनके काव्य में हिमालय और गंगा के पावन प्रवाह का कल-कल निनाद सुनाई पडता है। ऐसा नहीं कि उन्होंने अपने काव्य संस्कार केवल पौर्वात्य चिंतन से ही ग्रहण किए बल्कि उन्होंने वर्डसवर्थ, कॉलरिज से भी अपने कौशल को प्रखर किया है।

प्रश्न उठता है कि जब पंत के दार्शनिक आधार का बीज वैदिक परम्परा तक जाता है, तो पंत फिर अरविंद दर्शन से क्यों जुडे? या अरविन्द दर्शन में ऐसा क्या था, जो उनके विवेक की व्यस्तता को परिपक्व कर रहा था? एक तो यह ध्यान देने वाली बात है कि पंत की रहस्य चेतना मध्ययुगीन रहस्य चेतना से भिन्न थी, क्योंकि इस रहस्य चेतना पर विज्ञान एवं मनोविज्ञान दोनों का ही प्रभाव था। अरविन्द दर्शन में आए अतिमानव, अतिमानस और अतिचेतना भी इसलिए उस दर्शन का आधार बनें, क्योंकि पंत की चेतना अतिचेतना से जुडी थी जिसमें तर्क सर्वोपरि था, श्रद्धा नहीं। यानी एक तरह से बुद्धि समर्थित समन्वित अतिचेतनवाद। इसका मूल भी वैदिक परम्परा में ही था।

अरविन्द का साहित्य उनकी साधना का प्रतिफलन है इनमें दिव्य जीवन (Life Divine) सावित्री, मानस चक्र (Human Cycle) वेद रहस्य भारतीय संस्कृति के आधार, योग समन्वय आदि के नाम उल्लेखनीय है। उनके साहित्य और व्यक्तित्व ने भारतीय मानस को न केवल उद्वेलित किया, अपितु उन्हें प्रभावित कर कर्मण्य बनाया। उन्होंने भारत के स्वतंत्र होने की घोषणा बहुत पहले ही कर दी थी और यह सुखद संयोग रहा कि उनके जन्मदिन 15 अगस्त को भारत परतंत्रता की बेडियों से मुक्त हुआ।

पंत का रचनाकाल सन् 1928 से प्रारम्भ होता है। वीणा और ग्रन्थि 1920 तक प्रकाशित हो चुकी थी। 1921 में उच्छवास और आँसु कविताएँ लिखी गई। पल्ल्व का प्रकाशन 1926 में होता है। 1919 से लेकर 1932 तक की रचनाएँ गुंजन में संगृहीत होती है। युगान्त कवि की नई दिशा का सूचक है जिसमें 1934 से 1936 तक की कविताएँ संगृहीत है। इसके पश्चात 1939 तक की कविताएँ युगवाणी में संग्रहीत हैं। ग्राम्या में 1940 तक की रचनाएँ हैं। पन्त प्रकृति के सुन्दर चितेरे हैं इन्होंने अपनी रचनाओं में अप्रस्तुत रूपों का मूर्तविधान करने वाली लाक्षणिक शैली का प्रयोग किया है। ग्रन्थि में कवि का उल्लास प्रेम की सघन वेदना में परिवर्तित हो जाता है दृश्य जगत वे विविध रूपों का सुन्दर चित्रण पल्लव में हुआ है। बादल नक्षत्र मौन निमंत्रण आदि कल्पना की श्रेष्ठ रचनाएँ हैं। कविवर पन्त अपनी कविताओं का और स्वयं अपने कविमन और व्यक्तित्व में भी निरन्तर परिवर्तन और विकास करते गए। उन्होंने स्वयं एक कविता में लिखा है पावस एक की पर्वत प्रदेश प्रदेश पल-पल परिवर्तित प्रकृति वेश। बदलना प्रकृति का नियम है इसलिए वे कहते हैं जो जीवन्त है वह बदलता है जो जड है वह, कहीं नहीं जाता और इसी चिन्तन के क्रम में परिवर्तन का प्रकाशन होता है। इस कविता पर अध्यात्मिक दर्शन विशेष रूप से उपनिषदों का प्रभाव देखा जा सकता है। गुंजन तक आते-आते वे आत्म चिन्तन और लोककल्याण में लग जाते हैं।

फिर इनकी कविता के स्वर बदलते हैं युगान्त, युगवाणी और ग्राम्या में जहाँ शोषित व्यक्तियों के प्रति इनके मन में बौद्धिक सहानुभूति पैदा होती है। इसलिए 1938 से 1945 तक की इनकी कविताओं को हम प्रगतिवादी धारा के रूप संस्कारों की कविता कह सकते हैं। इस युग के पश्चात् उनके काव्य संकलन स्वर्ण, स्वर्ण धूलि, उतरा, अतिमा तथा लोकायन में पंत ने अरविन्द दर्शन से विशेष प्रेरणा ग्रहण की। इस आधार पर हम यह कह सकते है कि पंत छायावाद के भावोच्छवास से लेकर प्रकृति, मनुष्य, शोषण, रहस्यवाद, आध्यात्मिकता से होकर लोकायतन में गाँधीवाद और अरविन्द दर्शन तक आकर विश्रांति पाते हैं।

विषय में प्रवेश करते हुए सबसे पहले हमें यह देखना होगा कि महर्षि अरविन्द के दर्शन की मूल प्रतिज्ञाएँ क्या हैं? उनके दर्शन की पहली विशेषता यह है कि वो ब्रह्म को पूर्ण मानते हैं। दूसरे, जगत ब्रह्म के आनन्द की सृष्टि है। तीसरे, अरविन्द विश्व को माया या मिथ्या नहीं मानते। चौथे वे यह कहते हैं कि माया के माध्यम से ही ब्रह्म अपने को नाना रूपतामक जगत में व्यक्त करता है। पाँचवे वे माया के दो भेद मानते हैं विद्या और अविद्या। इसे उच्च और निम्न माया भी कह सकते हैं। अविद्या के द्वारा ब्रह्म जड तक तथा विद्या के द्वारा जड तत्व ब्रह्म तक अवरोहण-आरोहण की क्रिया में गतिशील रहता है। अरविन्द चेतन सत्ता को ब्रह्म के अंश के रूप में मानते हैं। अतः जीव और जगत उसी सत्ता की अभिव्यक्ति है। उनकी अगली मान्यता है कि अविद्या में द्वैत भावना विधमान रहती है जबकि विद्या में जीव, जगत और ब्रह््म में अद्वैत होता है। इसलिए वे जड और चेतन दोन को महत्वपूर्ण मानते हैं। वे यह भी मानते हैं कि जगत अचानक उत्पन्न नहीं हो गया। ब्रह्म कई सोपानों को पार कर जड तक पहुँचता है और पुनः अनेक सोपानों को पारकर उत्कृष्ट चेतन तक पहुँचता है।

अरविन्द का विचार है कि सृष्टि का विकास अति मानवत्व की ओर हो रहा है। इस परिवर्तन के फलस्वरूप मानव प्राणी दिव्य प्राणियों में रूपांतरित हो जाएँगे। उस समय मानवता आध्यात्मिक ज्ञान सम्पन्न प्राणियों को जाति का रूप ले लेगी। उस समय मानव में आन्तरिक आनन्द स्वाभाविक गुण हो जाएगा। महर्षि अरविन्द की इस अवधारणा में विश्व मानवता की समुज्ज्वल भविष्य की कामना अन्तर्निहित है।

पंत की कविताओं और विशेष रूप से उनके महाकाव्य लोकायतन पर अरविन्द के उपर्युक्त दर्शन के प्रत्ययों का काफी प्रभाव पडा था। श्री अरविन्द ब्रह्म को सत्, चित् और आनन्द दतरूप मानते हैं ब्रह्म के ये तीनों पक्ष एक दूसरे में समाविष्ट होते हुए भी नितान्त अलग-अलग भी हैं। उनका ब्रह्म अचिंत्य व अगम्य हैं उसे हम किसी विशेषण में बांध नहीं सकते। सभी चराचर, जड, चेतन उस ब्रह्म में गर्भस्थ है। दूसरे शब्दों में ब्रह्म यह सब कुछ है और यह सब पर ब्रह्म है। पंत इसी प्रत्यय को इस रूप में अपने काव्य में अभिव्यक्त करते हैं -

पावन थी भू, पावन जीवन

चिर पावन मानव का तन, मन

सर्वत्र ब्रह्म जग में व्यापक

वह सचराचरमय, जड, चेतन।

यही ब्रह्म जब चित शक्ति के रूप में मनुष्य के अंतःकरण में केन्द्रित रहता है तब वह ब्रह्म शांत और एक रस रहता है, लेकिन यही शक्ति जब अपने केन्द्र से च्युत हो जाती है, तो यही शांत ब्रह्म सत्रि*य सर्जक के रूप में अभिव्यक्त होता है। पंत कहते हैं -

इंद्रिय मन प्राणों के वैभव से वंचित

चिति विगत कलप में रही मात्र आत्मस्थित।

अब जन जीवन में बहिरंतर संयोजित

उसको समग्रता में निज होना विकसित।

आनन्द अखण्ड सृजन गति लय में शब्दित

रचना मंगल से उन्मेषित नित सत् चित।

अरविन्द द लाईफ डिवायन में ब्रह्म के बारे में कहते है, The Braham alone is, and because of it all are for all are the Braham. This reality is the reality of everything that we see on self and maitre. इसी प्रकार के सिन्थेसिस ऑफ योगा में कहते है The one the universal and supreme. the eternal and the infinite. इन्हीं विचारों से प्रभावित होकर पंतजी ने लिखा है -

वह जीवन का जीवन, आनन्द अमृत धन

सत्यों का सत्य, अकारण जग का कारण

उस परम सत्य के पलने में पालित जग

वह अमृत प्रसव, उद्भव विकास गर्भित गग।

कुछ भी न विश्व में जो न ईष से भास्वर।

जड भी रहस्य कहते उसका छः अंतर।

ब्रह्म की इस पूर्ण रूपेण पूर्णता को जो कि ईश, उपनिषद में भी कथित है। पंत उसे इस रूप में प्रकट करते हैं वह पूर्ण, पूर्ण यह, पूर्ण-पूर्ण से लेकर अवशेष पूर्ण ही पूर्ण पूर्ण आकर। ईश्वर अखण्ड, दीपों का दीपक भास्कर जग में जो कुछ सब में व्यापक है ईश्वर स्थित।

श्री अरविन्द जीव को चेतन सत्ता के रूप में स्वीकार करते हैं। पंत भी स्थान-स्थान पर इन उपपत्तियों का निरूपण करते हैं एक स्थान पर वे कहते हैं

सत्य ही की रे सत्ता एक

वह चर-अचरों का संस्थान

मनुष्य निश्चय ईश्वर का अंश

अरविन्द की तरह पंत ने भी आत्मा के निम्नलिखित लक्षण माने हैं -

अस्पर्श, अशब्द, अरूप, अरस, अन्यय नित

आपंत रहित आत्मा, अजरामर निश्चित।

अरविन्द की तरह पंत को भी विश्वास है कि आत्मा अपने विकास क्रम की चरम स्थिति में अपने को दिव्य ज्योति में रूपान्तरित कर देगी। उन्होंने आत्मा के विकास क्रम को स्वीकार करते हुए लिखा है -

लघु व्यक्ति-चेतना-कोष बद्ध भू-मानव

अपने को लाँघ करे विकास क्रम संभव

हो विश्व मनस से व्यक्ति मनस संचालित

आत्मा से जीवन, जीवन से मन शासित।।

कविवर पंत पर अरविन्द दर्शन का इतना गहरा प्रभाव था कि वे भी जगत को मिथ्या नहीं सत्य मानते थे। वे जब यह कहते हैं कि मिथ्या न जगत, वह ईश्वर का घर आँगन, वे जगत को मिथ्या मानने वालो को आक्रोशमयी मुद्रा में कहते हैं -

यदि ब्रह्म सत्य तो जग भी सत्य असंशय,

मिथ्या से मिल सकता न सत्य का परिचय

भव प्रगतिषील चित् सत्य अंष ही का स्तर

प्रभु का मुख निश्चित देखेगा जग कर नर।

इसीलिए वे कहते हैं -

जग को मिथ्या मान स्वंय भी

कैसे रह सकते जन जीवित।

श्री अरविन्द की तरह पंत भी जड और चेतन में कोई तात्विक अंतर नहीं मानते। जैसे प्रसाद ने भी कहा है एक तत्त्व की ही प्रधानता कहो उसे जड या चेतन। जड चेतन का ही एक रूप है पंत लोकायतन में कहते हैं।

चेतन ही जड, जड ही चेतन, जीवन

बूझ न पाती सूक्ष्म तत्व तार्किक मति

मन नही बाहर स्थिति, स्थिति ही भीतर मन

ह्यास विकासमयी गुण की गति, परिणति

और यह परिणति जड और चेतन के आरोहण, अवरोहण में होती है। अरविन्द ब्रह्म को सुपर माईन्ड या उत्कृष्ट चेतन कहते हैं। उत्कृष्ट चेतन से उन्नतर चेतन, इससे अन्तः प्रज्ञ चेतन, इससे आध्यात्मिक चेतन, इससे उच्च चेतन, इससे मनस फिर आत्मा, प्राण तथा जड तक ब्रह्म का अवरोहण होता है ठीक इसके विपरीत उसका आरोहण भी हो सकता है। यह चक्र निरन्तर चलता रहता है। पंत आरोहण अवरोहण चक्र के बारे में कहते हैं -

दृप्त शिखर में होता भव विकसित

......... विकास प्रगति के कल्प-चरण

पूर्ण-पूर्ण को लाँघ पूर्ण बनता

नत्स गुणों में गूँथ लोक-जीवन।

महर्षि अरविन्द माया के दो रूप मानते हैं - अविद्या और विद्या माया। पंत भी ने उन्हें इसी रूप में स्वीकार करते हैं-

विद्या अविद्या बहु एक युक्त प्रभु में कर

अमरत्व प्राप्त जन करे मृत्यु सागर तर।

जब तक हम अविद्या माया के प्रवाह में होते हैं तब तक हम सुपर माइन्ड की ओर अग्रसर नहीं हो सकते। इसीलिए वे कहते हैं दूर न हो उर निषा, अविद्या तक। यह अविद्यात्म ब्रह्म के प्रसारण में सहायक है।

इसी क्रम में पंत अरविन्द के महामानव की कल्पना को स्वीकारते हुए कहते हैं कि मानव का लक्ष्य अतिमानव या सुपरमैन की स्थिति को प्राप्त करना है। वे मानते हैं कि शीघ्र ही अतिमानव का अवतरण होगा। इसी को ध्यान में रखते हुए वे कहते हैं कि

नव मनुष्यत्व अवतरित हो रहा भास्वर।

गत युग की जैविक सीमाएँ कर विस्तृत। यही अतिमानव इस धरा की स्वर्ग रश्मि से दीप्त करेगा।

अरविन्द दर्शन के अनुरूप पंत भी यही मानते हैं कि हमारा लक्ष्य केवल अपना मोक्ष पाना नहीं है, अपितु सम्पूर्ण जीवन का दिव्यीकरण है। दिव्य जीवन में सभी दुख द्वन्द्व समाप्त हो जाएँगे।

आ रहा सत युग स्वर्ण प्रभात

मनुष्य जीवन जब धर नव रूप

दैन्य अक्ष, जग के भय दुख द्वन्द्व

नहीं रह जायेगे अनिवार्य।।

सारतः हम कह सकते हैं कि पंत की काव्य यात्रा की शुरुआत प्रकृति और प्रेम से हुई थी, वहीं उसकी समाप्ति अरविन्द के दिव्य दर्शन में होती है। इस तथ्य को स्वयं पंत भी स्वीकार करते हैं कि उन पर अरविन्द दर्शन का प्रभाव पडा है। उत्तरा की प्रस्तावना में वे कहते हैं कि अपनी नवीन अनुभूतियों के लिए जिन्हें मैं अपनी सृजन चेतना का स्वप्न संचरण या काल्पनिक आरोपण समझता था, मुझे किसी प्रकार के बौद्धिक तथा आध्यात्मिक अवलम्बन की आवश्यकता थी। इन्हीं दिनों मेरा परिचय श्री अरविन्द के भागवत जीवन से हो गया उसके प्रथम खण्ड को पढते समय मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे अस्पष्ट चिन्तन को अत्यन्त सुस्पष्ट, सुगन्धित एवं पूर्ण दर्शन के रूप में रख दिया है।

अस्तु, युग प्रवर्तक पंत के काव्य का बीज शब्द सुंदर है। इसी भावभूमि से वे समग्र जीवन का अवलोकन करते हैं। उनकी दार्शनिकता का प्रभाव यह हुआ कि वे आवेश के क्षणों में भी अपने विवेक पर समय का सौन्दर्य बढाते रहे, बिखरे नहीं और न ही मानत्व की समग्रता को खण्डित होने दिया, क्योंकि उनका लक्ष्य परिपूर्ण मानव का निर्माण करना था खण्डित मानव का नहीं।

कहा जा सकता है कि गत शताब्दी के मनुष्य मन की उठापटक को समझने के लिए पंत काव्य का एक विश्वस्त एवं बेहतर जरीया है। जहाँ हम एकसाथ आत्मशुद्धि, परिष्कार और सांस्कृतिक सम्पूर्णता को पा सकते हैं।

सम्पर्क :

ईशावास्य,

नत्थूसर बास,

बीकानेर- ३३४००४,

मो. ९४१३०१३००३