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विद्रूप के विरुद्ध विद्रोह की कथा

प्रकाश दान चारण
का फंकन बाबू! अरे सदियों आफ पुरखे केतना गरीब गरुआ के डायरेक्ट कपार पर मूते पर कोई उफ्फ नहीं किया। हम साला पिछवाडे के दीवाल पर मूत दिए तऽ विरासत ढहने लगा आपका? गजबे करते हैं आप मालिका!
विद्रूपता की विरासत को ढहाती यह पंक्तियाँ नीलोत्पल मृणाल के उपन्यास औघड की हैं जो इस वर्ष (2019) प्रकाशित हुआ है। नीलोत्पल मृणाल का यह दूसरा उपन्यास है। औघड एक तरह से अवधूत लेखक का बेलाग भाषा में लिखा जिंदगीनामा है। औघड विध्वंस की राख में से निकली जीवन की सचाई है जिसे उपन्यासकार ने एक नया मिजाज देकर पाठक तक पहुँचाया है। औघड किसी कल्पना का शब्दचित्र न होकर अप्रिय सचाई का नग्र चित्र है, जिसमें सब कुछ साफ होता है भले ही सामने वाले को काट खाने वाला ही क्यों न लगे। नीलोत्पल ने औघड को लिखने से पहले औघड को जीया है। औघड भीतर से निकली वह आवाज है जो लेखक को लिखने के लिए मजबूर करती है। एक तरह से भीतर का बाहर आना ही औघड का सृजनात्मक बिंदु है जहाँ उपन्यासकार विद्रूपताओं में डूब कर भी पाठक के लिए अमृत की बूँदें खोज लाता है। अमृत की ये बूँदें सहज में ही प्राप्त नहीं हुई हैं इसके लिए लेखक ने खुद को दाँव पर लगाया है। उसी दाँव से निकला है बिरंची, जिसका परिचय इस प्रकार है- सरकारी नौकरी की चाहत में कई सरकारी फार्म डाल चुका था बिरंची, पर झूठे केस और कलम न उठा पाने के सदमे में पहले तो एक मनोरोगी की तरह घर के एक कमरे में बंद रहा और जब साल भर बाद बाहर निकला तो जैसे वो बिरंची था ही नहीं। कलम छूटी और उसकी जगह चिलम आ गई। बायें हाथ से चिलम उठाकर उसे दाहिने हाथ का सहारा दे सारा अर्जित ज्ञान को धुएँ में उडाने लगा। अब बिरंची, बिरंची नहीं रहा यानी संघर्ष का शंखनाद हो गया। अर्जित ज्ञान धुएँ में उडकर मलखानपुर के मलेच्छों का मुँह काला करने लगा। अब वह जातीय श्रेष्ठता की विरासती दीवार गिराने लगा- देखो लखन, पेशाब में नमक होता है। समझे नमक होता है। अगर रोज किसी की दीवाल पर मूतो तो धीरे-धीरे उसमें खोल कर उसे गिरा देता है।
उपन्यासकार संघर्ष में आस्था रखता है। उसका विश्वास है कि जब कोई मनुष्य औघड बन संघर्ष का शंखनाद करता है तो वह मर कर भी अपने संघर्ष को अमर कर जाता है। उसकी चिता की राख से राजतिलक करने वाले फूँकनसिंह जैसे उसके संघर्ष के जज्बे से भीतर तक काँप जाते हैं । अब फूँकनसिंह को लगने लगता है कि वह हर रात जिन्दा होकर आता है और उनकी विरासत की दीवार पर मूत कर चला जाता है। वह कहीं और से नहीं उनके भीतर से निकल कर आता है, जिसको वे न रोक सकते, न ही उसका सामना कर सकते। एक बार फिर बिरंची, बिरंची नहीं रहा- अजी बिरंचिया। बिरंचिया को देखे हैं हम । वहाँ है । वहाँ खडा है। यही उपन्यास का सृजनात्मक सौन्दर्य है जहाँ बिरंची मर कर भी मारने वालों के भीतर जिन्दा हो जाता है, पहले से भी ज्यादा खतरनाक। अब वह बाहर पिछवाडे की दीवार पर मूत कर भाग नहीं रहा है। अब वह मूत कर आराम से जा रहा है, उसका जाना भी ऐसा है मानो जा नहीं रहा है फिर मूतने के लिए आ रहा है। फूँकनसिंह लाचार है।
मूत्रकाण्ड से मौतकाण्ड तक के सफरनामे को नीलोत्पल औघड बन कर ही तय करते हैं। उपन्यास यथार्थ को ही नहीं, अपितु यथार्थ के भीतर के अप्रकाशित को भी सामने लाता है। समाज में हर स्तर की विद्रूपता लेखक के निशाने पर रही है। जाति-पाँति से आगे दलित चेतना के अंतर्विरोधों को भी उपन्यासकार बेबाकी से सामने लाता है। दलित चेतना के नाम पर स्वार्थ की फसल काटने वाले अपबित्तरों की अपवित्रता की खाल उधेडकर नग्न यथार्थ तक भी वह पाठक को ले जाता है-कमजोर और दलित की लडाई चिता पे जल रही थी,कमजोर का नेता मजबूत होकर निकला था। यही तो थी सामाजिक न्याय की लडाई। पहले अगुआ आगे जाएगा, समाज भारी, विशाल चीज है, धीरे धीरे बढेगा। ठीक वैसे ही जैसे आजादी के इन सत्तर सालों में बढ रहा था।
औघड किसी विचार दृष्टि से संचालित होकर लिखा गया उपन्यास नहीं है। यह तो जिन्दा रहने की जिद का जंगी एलान है। सामाजिक दुश्चक्र की काली रात में उजाले की तलाश का नाम है औघड। सभ्यता की सभ्यता और समझदारों की समझदारी की पोल खोलने का नाम है औघड। उस समाज में कई कामता बाबू थे जिन्होंने जीवन को इस दर्शन से जिया कि किसी बात पर न अडो, किसी पचडे में न पडो, किसी के लिए ना लडो। ऐसे लोग हमेशा से सभ्य कहलाए।
नीलोत्पल ने उपन्यास के आमुख में कही बात किसी को नहीं छोडने के साथ पूरा न्याय किया है। तभी वह अपने मौतनामे के भीतर से पाठक के लिए जिंदगीनामा निकाल कर ला सका है। सृजनात्मक स्तर पर यह उपन्यास, उपन्यास विधा का औघड रूप है जो न कहीं से शुरू होता है और न कहीं खत्म। न लेखक दुविधा में है और न ही वह पाठक को दुविधा में रहने देता है।
घटना के स्तर पर वह संभावित को विश्वसनीय बनाये रखने में सफल होता है। परानुभूत को सर्वानुभूत की भावदशा तक पहुँचाकर ही वह अपनी अनुभूति का विस्तार करता है। इस विस्तार में वह कॉमेडी कल्चर के मजबूत दिखने वाले विचारधारात्मक किले में प्रवेश करके उसकी धज्जियाँ उडा देता है। लगता है कॉमरेडी कल्चर पर लिखते समय लेखक ने काशीनाथ सिंह के उपन्यास काशी का अस्सी की इन पंक्तियों से अपनी लेखनी के सूत्र पिरोये हैं- चाहे कोई बात करो, ये कम्युनिस्टवे भोंसडी के अपनी फिलासफी पेलने से बाज नहीं आते! (पृष्ठ 101) साहित्यिक लेखनी में शायद ही पहले ऐसा हमला कॉमेडी कल्चर पर हुआ हो जो उनकी मजबूती के आधार किताब और कॉटेसन के फोर्मूले को धाराशायी कर देता है। उपन्यासकार कॉमरेडों के किताब, कॉटेसन और क्रांति जैसे शब्दों पर जिस अंदाज में हमला करता है उससे लगता है कि कभी वह वामपंथ के दिल्ली स्थित गढ में गहराई से पैठ कर ही अपनी कलम में पैनी धार लाया है। वामपंथ के विचलन को जिस अंदाज में बयां किया गया है वह अतिशयोक्तिपूर्ण जरूर है, परन्तु अविश्वसनीय नहीं। यही साहित्य का स्वभाव है जिसे उपन्यासकार ने विध्वंस की शैली में भी हाथ से छूटने नहीं दिया।
नए-नए कॉमरेड बेटे का जोश कामता बाबू पिता के आगे धाराशायी हो जाता है। किताबी क्रांति पीछे छूट जाती है। विचारधारा का रेड ईंधन बिना क्रांति किये ही सभ्यों की समझदारी वाला खोल ओढ धुआँ-धुआँ हो आता है। क्रांति करने की दूर-दृष्टि फसलों के बोझ तले दबने को तैयार हो जाती है। अब उपन्यासकार यथार्थ में नग* यथार्थ की जमीन पर खडा हो जाता है। संभावनाओं की सृजनात्मक तलाशी के स्थान पर विद्रूप के विध्वंस पर ही अपना फोकस कर देता है, जिससे उपन्यास का साहित्यिक पक्ष कमजोर पडने लगता है । अनुभूत पर विचार प्रभावी हो जाता है। पाठक फिर उसी स्थिति में पहुँच जाता है जहाँ उपन्यास के आरम्भ में था- जरा किताब और कोटेशन से बाहर निकलो और दुनिया का सच भी पढो। फूंकन सिंह जैसा लोग ही रोज विधायक-सांसद बन दुनिया चलाता है और तुम्हारे जैसा एमे-पीएच.डी विद्वान मोटा चश्मा पहिन उसके पीछे फाइल ढोता है।
उपन्यासकार समकालीन मुद्दों पर अपनी राय रखते समय विद्रूप को केंद्र में रखता है। सत्ता और तन्त्र की साँठ-गाँठ, मीडिया की व्यावसायिक प्रवृत्ति, दलित आन्दोलन, वामपंथी चेतना जैसे विषयों पर बात करते समय उपन्यासकार सभी संभावनाओं को खारिज करता हुआ विद्रूप के विरुद्ध औघड रूप धारण कर लेता है। अब वह सृजनात्मक संघर्ष में विद्रूप विनाशक की भूमिका में उतर जाता है। उसका भीतर का विद्रोही किसी को नहीं छोडने के ध्येय के साथ हमलावर हो जाता है -पत्रकारिता तो अब पक्षपात के दौर से आगे जा गर्भपात और बज्रपात दौर में प्रवेश कर चुकी थी। कौनसा सच कब गिरा दिया जाये और कौनसा झूठ किसके सर गिरा दिया जाये, कोई भरोसा नहीं था इस दौर की पत्रकारिता का।
नीलोत्पल मृणाल का यह औघड हिन्दी उपन्यास के क्षेत्र में विद्रूप के विरुद्ध विद्रोह को एक नया मिजाज प्रदान करता है। अंतर्विरोधों के बीच विध्वंसात्मक सृजन की नयी लेखनी का नमूना बनता है। यह लिखने भर के लिए लिखा उपन्यास न होकर पढने की ललक पैदा करने वाला उपन्यास है। कथ्य के स्तर पर औघड मन्नू भंडारी के महाभोज का सृजनात्मक विस्तार जैसा लगता है। सृजनात्मक विस्तार इसलिए कि महाभोज का बिसू और औघड का बिरंची दोनों ही दलित चेतना का प्रतिनिधित्व करते हैं परन्तु बिसू की मौत दलित आंदोलन की आरम्भिक अवस्था है जबकि बिरंची की मौत दलित चेतना की प्रौढ अवस्था। बिसू दा साहब रूपी राजनीतिक व्यवस्था का शिकार होता है जबकि बिरंची, पबित्तर रूपी दलित चेतना के अंतर्विरोधों का शिकार। मन्नू भंडारी ने दलित चेतना के बाहरी खतरों को उपन्यास के केंद्र में रखा जबकि नीलोत्पल ने चेतना के नाम पर दलित और व्यवस्था के गठजोड के भीतरी खतरों को केन्द्र में रख कर ही औघड लिखा। एक तरह से महाभोज जहाँ खत्म होता है औघड वहाँ से शुरू हो जाता है। बिसू का औघड रूप ही बिरंची है। बिसू अधिकारों की लडाई लडता मारा जाता है और बिरंची सत्ता की लडाई लडता। दोनों ही उपन्यास इस यथार्थ पर आकर एक हो जाते हैं कि न असली दलितों को वास्तविक अधिकार मिले और न ही सत्ता में भागीदारी। कमजोर, कमजोर ही रह गए। कभी नेता सफल हुए, कभी कमजोरों के नेता। विद्रूप के विरुद्ध विद्रोह के औघड रूप में लिखी गई यह औपन्यासिक कृति हिन्दी उपन्यास की नयी संभावनाओं और भाषा के नए मिजाज की नंगी पहचान है।

पुस्तक - औघड (उपन्यास)
लेखक - नीलोत्पल मृणाल
प्रकाशक - हिंद युग्म, मयूर विहार, दिल्ली
संस्करण - 2019
मूल्य - 200/ रुपये
पृष्ठ - 384
सम्पर्क : द्वारा कुसुम लता चारण
क्वार्टर नं. 03/1. काजरी आवास
काजरी, जोधपुर - 342003
मो. 919829818922
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