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आँचलिकता का लालित्य

राजेश कुमार व्यास
फ्राँस के ख्यातनाम लेखक, विचारक रोलां बार्थ ने कभी कहा था कि साहित्यिक रचना की स्पष्ट और वस्तुगत व्याख्या नहीं की जा सकती है। यह सही भी है। साहित्य को विधाओं में बाँट कर देखने से कई बार हम उस रचना विशेष के मूल अभिप्राय से भटक जाते हैं। बहुत बार विधा वर्गीकरण में रचना एक बँधे-बँधाए ढाँचे में सिमट जाती है और फिर उसी में हम उससे जुडे अभिप्राय की तलाश करने लगते हैं।
रामबक्ष जाट की मेरी चिताणी ऐसी ही है। भले इसे संस्मरण या आत्मकथा कहा जाए परन्तु यह पुस्तक यही भर नहीं है। मूलतः यह वह सृजन है जिसमें अपने तईं विगत को सहेजते जीवन मूल्यों, साहित्य, समाज और संस्कृति में हो रहे बदलावों का लेखक साक्षी भर नहीं रहकर उसकी अपने समय संदर्भों, गाँव की यादों में निरंतर परख करता है। यह सही है, इस परख में आत्मकथात्मक बहुत सारा है, संस्मरणात्मक भी है, पर आँचलिक मिठास में इसमें रिपोर्ताज, ललित निबन्ध के लालित्य, किस्सागोई के माधुर्य, आलोचना की दीठ में समय संवेदना के अनूठे चितराम भी पाठक पाता है। इसीलिए विधागत बँधे-बँधाए ढर्रे में नहीं देखकर पाठक इस पुस्तक को पढेंगे, तो अर्थ अभिप्रायों की सीमा से बाहर झाँकते बहुत कुछ नया भी पा सकते हैं।
रामबक्ष जाट के लिखे की बडी विशेषता यह भी है कि वह अनावश्यक शब्दाडंबर नहीं रचते। सहज, भाव संवेदनाओं से भरे उनके आकाश में लोक राग घुला है। जीवनानुभूतियों, विचारों में अतीत को अपने समय में रूपान्तरित करने की अनूठी शब्द दीठ उनके पास है। इस दीठ में कब उनका निज समाज, साहित्य और संस्कृति बन जाता है, पता ही नहीं चलता। मुझे यह भी लगता है, रामबक्ष जाट का लिखा साहित्य का वह कला-रूप है जिसमें किस्सागोई में लेखक ने अपने गाँव को गहरे से जिया है। गाँव की उनकी बतकही में एक विधा के अंदर दूसरी, तीसरी, चौथी और ऐसे ही बहुत-सारी साहित्यिक विधाओं का मेल है। बकौल रामबक्ष जाट अन्तर्कथा का निवास कथा में ही होता है। अभिधा को उत्तम काव्य बताते वह मेरी चिताणी में व्यंजना को इसीलिए जादूगरनी की संज्ञा देते हैं और एक स्थान पर लिखते हैं, बात यह है कि अभिधा को झूठ बोलने की कला नहीं आती। यह कला तो जादूगरनी व्यंजना को खूब आती है। पलटी मारने की तो वह विशेषज्ञ है। और लक्षणा? वह तो जन्म की चुगलखोर है। उसकी क्या बात करें? इसलिए हम भी मानते हैं कि अभिधा उत्तम काव्य है।
रामबक्ष पुस्तक का आरम्भ जातिवाद की अपनी सूक्ष्म दीठ से करते हैं। उनके इस लिखे को पढते जेहन में बारम्बार इतिहासकार और राजनीतिज्ञ कावलम माधव पणिक्कर का लिखा स्मृति में कौंधता है, जातिवाद किसी जाति या उपजाति की वो ईमानदारी है जो कि राजनीति में अनूदित हो चुकी है। रामबक्ष जाट मेरी चिताणी में के.एम.पणिक्कर के लिखे को जैसे अपने तईं गहरे से व्याख्यायित करते हैं। उनके आत्म प्रसंगों में जातिवाद की बयानी देखें, जब मैंने इस दुनिया में आँखें खोली अर्थात् गाँव चिताणी, जिला नागौर, राजस्थान तब वहाँ सब मेरी ही जाति के लोग थे। उन्हीं से लडते-भिडते प्रेम-प्यार करते हुए बडा हुआ। उस समय लगता था कि इस पवित्र भारत भूमि में सिर्फ जाट ही जाट रहते हैं। शेष जातिवाले तो थोडे बहुत हैं। जो हैं, वे भी चाचा, ताऊ, बुआ, मौसी वगैरह हैं। इसीलिए मुझे मेरी जाति का कभी अहसास नहीं हुआ। अनुभूति के इस आलोक में जातिवाद का उनका बाद का वैयक्तिक मूल्यांकन देखें, गाँव में जातिवाद बहुत कम होता है, दूसरी ची*ों ज्यादा होती हैं। आमतौर से उनके मन में 30 प्रतिशत स्वार्थ, 30 प्रतिशत नाते-रिश्तेदारी, 30 प्रतिशत न्याय व धार्मिक भावना और 10 प्रतिशत दया-मानवता होती है। आधुनिक शिक्षित बुद्धिजीवी में 30 प्रतिशत जातिवाद, 30 प्रतिशत प्रान्तवाद, 30 प्रतिशत अध्ययन, विचारधारा, प्रगतिशीलता और 10 प्रतिशत वैयक्तिक स्वार्थ। इसमें कभी कुछ कम, कुछ ज्यादा मात्रा हो जाती है।
मेरी चिताणी लेखक के अपने गाँव के सच में समाजगत है। पढता हुआ पाठक मन भी अंतर्मन की तरह व्याख्यायित होता चलता है। महत्त्वपूर्ण यह भी है कि गूढ-गंभीर ऐसे विषयों को भी रामबक्ष जाट ने गाँव के जीवन, पात्रों की स्मृतियों में अंवेरा है। रामचन्द्र शुक्ल से लेकर नामवर सिंह, अज्ञेय, मनोहर श्याम जोशी आदि के साथ ही कुमार साहनी को याद करते अपने छोटे से गाँव के बसने, वहाँ की परम्पराओं, लोगों और जीवन को बयां करते कहन कला की उनकी साहित्यिकी लुभाती है। अन्तर्कथा में कथा के उनके कोलाज अनूठा लालित्य लिए है। स्मृतियों के झरोखे में जातीयता, प्रांतवाद की नीति-अनीति में यहाँ साहित्य, शिक्षा और तमाम दूसरे विषयों से जुडे वैयक्तिक सरोकारों का सार्वजनीन है।
गाँव में प्लेग से होने वाली मृत्यु के मार्मिक वर्णन में, खेती-किसानी की जिन्दगी को बयां करते और खेत-खलिहान, बरसाती नदी, नालों, तालाब, पोखर आदि के बारे में लिखे में उनकी चर्चा में राजस्थान के आँचलिक शब्दों का भी अपनापा होता है। इस अपनापे में ही प्लेग को मरी कहे जाने की मार्मिक कथा है, तो किसानों के शब्दातीत प्रेम की भी अनूठी व्यंजना भी है। गाँव से जुडे किस्से-कहानियों में लेखक की यादें दृश्य में जैसे रूपान्तरित होती हममें बसती हैं। कहन की उनकी भाषा देखें, ...मुझे उस समय की दो तस्वीरें याद हैं। हमारे बाडे में एक कमरा बना हुआ था। उसके दरवाजे के बीच में मेरी बडी बहन कबू बैठी हुई है। चुप और उदास है। मैं पास में खडा हूँ।...एक तस्वीर में मैं जोधपुर में हूँ। फूस का एक झोंपडा है। चूल्हा जल रहा है।... और हाँ, कहन की अपनी इस भाषा के साथ ही पाठकों से संवाद भी वह करते चलते हैं। उनके लिखे को बाँचते बार-बार बात में हुंकारो, फौज में नगारो की राजस्थान की समृद्ध कहन परम्परा जैसे पुनर्नवा होती है। आपने पढा होगा। न पढा हो तो अब पढ लो। जैसे संवादों में वह लोक मान्यताओं, विश्वासों के लूंठे-अलूंठे प्रसंगों से पाठकों का नाता जोडते चलते हैं। इन्हीं में एक स्कूल के दिनों के सैनणी गाँव के बुजुर्ग ब्राह्मण नैनजी महाराज के हवाले अपने पिताजी के जन्म पोथी पन्ने देखकर बतायी उनकी मृत्यु के दिन वैशाख पूर्णिमा का भी है। वह लिखते हैं, इस दिन मृत्यु को शुभ माना गया है। पर इसकी पुष्टि वह स्वयं नहीं करके पाठकों से करवाना चाहते हैं। प्रश्ननुमा उनके लिखे की इस मासूमियत ऐसा है क्या? को पढकर पाठक अभिभूत हुए बिना नहीं रहता।
गाँव के बहाने मेरी चिताणी में राजस्थान में अकाल की विभीषिका के साथ ही जीवटता का भी सांगोपांग चितराम है। कहावतों में इस जीवटता को लेखक ने पाठकों के साथ जिया है तो गाँव, कस्बों से नौकरी के लिए महानगरों में बसने और विस्थापन की पीडा का भी मार्मिक बयान है। जडों से दूर होने के बाद फिर कभी वहाँ के न हो सकने के दंश की भी उनकी व्यथा-कथा को पढते विस्थापन और विभेद की मनुष्य की त्रासद स्थिति से भी बहुत से स्तरों पर हम रू-ब-रू होते हैं। अमेरिका में रहने वाले भारतीय लेखक सुकेतु मेहता ने कुछ समय पूर्व अवर लैण्ड : एन इनिग्रेंटस मेनिफेस्टो पुस्तक लिखी है। इसमें प्रवासी नागरिकों के अशांत जीवन और उनके साथ होने वाले दुर्व्यवहार का लेखा-जोखा है। आत्म कथ्य, निजी स्मृतियों में उनकी पुस्तक सामाजिक विवेचना और इतिहास की विडम्बनाओं में निर्धन देशों से आए तमाम आप्रवासी नागरिकों के विरुद्ध अमेरिका के लोगों की नफरत की राजनीति को उकेरा गया है। हालांकि सुकेतु की पुस्तक मनुष्यता के बुनियादी सरोकारों और प्रवासी लोगों की गरिमा व उनके हक के व्यापक सवाल लिए है परन्तु एक देश में ही गाँव, कस्बों से शहरों, महानगरों में बसने वाले लोगों की समस्याएँ भी बहुत कुछ वैसी ही होती हैं। रामबक्ष जाट हालाँकि मनोविनोद में प्रवासी होने और उनके साथ गाँव में वहाँ के लोगों के व्यवहार का आत्म साक्षात्कार कराते हैं, परन्तु मुझे लगता है, इस बहाने उन्होंने नौकरी और दूसरी मजबूरियों के चलते अपना गाँव छोड कहीं और बसने वाले लोगों के जीवन की विडम्बनाओं को गहरे से मेरी चिताणी में व्याख्यायित किया है।
मेरी चिताणी एक दृष्टि से मरुप्रदेश राजस्थान की संस्कृति का लेखा-जोखा है। पानी के अभाव में जल संग्रहण की परम्पराओं के ईजाद किए जाने की कहानी इसमें है, तो अकाल में भी यहाँ के लोगों की अनूठी जीवटता का भी सांगोपांग चितराम लेखक ने अपने गाँव के हवाले से किया है। कैसे अभाव में आविष्कारों का भव बनता है, इसकी रोचक दास्ताँ भी इसमें पाठक बाँचते हैं। रामबक्ष लिखते हैं, सिंचाई साधनों के अभाव में कभी राजस्थान में साल में आठ महीना कोई फसल नहीं होती थी। तब सब्जी किसकी बनाएँ? हरी सब्जियाँ सिर्फ चार महीने मिलती थी। ऐसे समय में किसानों ने खाने के अनाज को सब्जी में बदल दिया। मूँग और मोठ की दालों से बडियाँ बना ली। सूखाकर साल भर खाने के लिए। ज्वार के आटे को छाछ में उबाल राबडी, बरसात में खेत में होने वाली काचरी और टिडें को सुखाकर साल भर के लिए तैयार करने, खेजडी के पेड पर उगने वाली सांगरी, बबूल की फलियों की सब्जी बनने की कहानी के साथ ही संस्कृति से जुडी जीवन्तता यहाँ है। यही नहीं गाँव के जीवन के साथ मण्डी के वर्चस्व में अनपढ किसानों के विश्व अर्थव्यवस्था से जुडने के बावजूद इसकी जटिलता से अज्ञात रहने और इसी कारण बेचैन रहने, खुश नहीं रहने को भी लेखक की सूक्ष्म लेखकीय सूझ से उनके आत्म कहन में समझा जा सकता है।
बहरहाल, रामबक्ष अपने आत्म की अनुभूतियों में मनुष्य के अंतर्मन को इस तरह पढते हैं कि ऐसे में उनके अनुभव कब पाठक के स्वयं के अनुभव हो जाते हैं, पता ही नहीं चलता। सहकर्मी सोहनदान चारण के बहाने वह जैसे हरेक व्यक्ति के मन को पढा देते हैं। लिखते हैं, हमारे रिश्ते वैसे ही रहे जैसे सहकर्मियों के होते हैं, जिनमे पर्याप्त मात्रा में ईर्ष्या, गुप्त विरोध भाव, सामने मिलने पर अच्छी अच्छी बातें, संकट के समय एक-दूसरे की मदद, साथ-साथ संघर्ष, जरूरत पडने पर रुपये उधार देने से लेकर अस्पताल में सहायता सब चलता रहता है, एक चौराहे पर खडा रिश्ता, जिसमें भारी नुकसान और भरपूर मदद सब संभव हो। असल में मेरी चिताणी शिक्षा से वंचित समाज के साथ ही दलित, उपेक्षित कहे जाने वाले वर्ग के उस बडे सच से भी एक तरह से साक्षात् है जिसमें शिक्षा-वंचित समाज ने लोक साहित्य, लोक वृत्तान्त और सामूहिक बैठकों द्वारा पूरा एक लोक शास्त्र निर्मित कर रखा है। यह ऐसा है जिसमें करणीय और अकरणीय सबका विवेचन है। लेखक के बचपन की स्मृतियों में यह सच निरंतर पाठकों को जीवंत घटित जैसे दिखता चलता है। इस घटे में यह भी है कि आज भले उपेक्षित कहे जाने वाले वर्ग की पीडाओं की बडी बडी पोथियाँ लिखी जा रही हैं, परन्तु यह पूरा सच नहीं है। कहीं कोई गाँव बसता तो उपेक्षित कहे जाने वाले वर्ग को भी विशेष रूप से बसाए जाने की कवायद होती। समाज उनका पूरा सम्मान करता। बडा कहा जाने वाला वर्ग काम करने वालों के नखरे भी उठाता था। ऐसे ही स्त्री जीवन से जुडी उनकी मौलिक स्थापनाएँ भी मेरी चिताणी है। आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के मध्य हुए शास्त्रार्थ में निर्णायक भूमिका निभाने वाली उनकी विदुषी पत्नी, पंडिता की उपाधि पाने वाली पहली महिला रमाबाई के जीवन संघर्ष, सावित्री फूले आदि के कृत्य के स्मृति आलोक में लेखक की यह स्थापना भी मन को मथती है कि स्त्रियों ने देश का इतिहास बदलने में महती भूमिका निभाई है।
रामबक्ष गाँव के अतीत संग वर्तमान को लिए चलते हैं और इसी में वह पूँजीवाद द्वारा देखे पानी के व्यापार, शिक्षण में हो रही गिरावट और हर क्षेत्र में होने वाली राजनीति को भी अपनी जीवनानुभूतियों के बजरिए बताते हैं तो लोक के उस उजास से भी साक्षात् कराते हैं जिसमें पति-पत्नी के रोमांस, हँसी-दिल्लगी के साथ ही लोक गीतों के सौंदर्य को गहरे से जिया गया है। गाँव के शहर बनते चले जाने और चित्ताणी से नई दिल्ली, न्यूयार्क तक की यात्रा की अपनी बतकही में रामबक्ष ने मेरी चिताणी में अपने गाँव के बहाने विश्वविद्यालयों में शिक्षण, परीक्षा पद्धति आदि के साथ ही साहित्य, समाज और जीवन को जैसे गहरे से अपने तईं गुना और बुना है। परिशिष्ट में उन्होंने अपने गुरु मैनेजर पाण्डेय और नामवर सिंह से जुडी स्मृतियों को भी शिद्दत से अंवेरा है।
यह सही है, मेरी चिताणी रामबक्ष का आत्म है और इसके बहाने पाठक औचक बहुतेरी स्थापनाओं से भी रू-ब-रू होते हैं। अपने गाँव और वहाँ से जुडी यादों की छोटी-मोटी घटनाओं के जरिए रामबक्ष ने बहुत से स्तरों पर पुस्तक में सामाजिक संरचना को अपने नजरिए से एक परिप्रेक्ष्य दिया है, परन्तु उनकी बहुतेरी स्थापनाओं के अपने आग्रह और पूर्वग्रह भी यहाँ हैं। मसलन जातीयता की उनके नजरिए में वर्ग विशेष से जुडी व्यंजना या फिर अनासक्त अज्ञेय द्वारा अपने चाहने वालों का ध्यान रख चौथा सप्तक निकाले जाने का उनका कथन और इसमें यह भी कि साहित्य की दुनिया में नामवरसिंह से किसी प्रकार के पक्षपात की उम्मीद नहीं की जा सकती और ऐसे ही बहुतेरे और व्यक्ति विशेष के स्मृति प्रसंग।
बहरहाल, इस समय जो गद्य लिखा जा रहा है, उसमें मेरी चिताणी इस मायने में विरल है कि आत्म कथात्मक और संस्मरण के बहाने लेखक ने अपने गाँव के बहाने जीवन को व्यापक परिप्रेक्ष्य में गुनते अनुभवों की आलोचकीय दीठ से साक्षात् कराया है। कहन के सहज, आँचलिक पर दार्शनिक बोध में लिखे का लालित्य पाठकवृन्द को लुभाने वाला है।

पुस्तक - मेरी चिताणी
लेखक - रामबक्ष जाट
प्रकाशक - अनन्य प्रकाशन, दिल्ली
संस्करण - 2019
मूल्य - 350 रुपये मात्र
पृष्ठ - 152

सम्पर्क : शंकर विहार-ई, 28-ए,
एयरपोर्ट टर्मिनल 2 के पास,
जयपुर - 302017 (राजस्थान)
मो. ९८२९१०२८६२