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विस्मयकारी अनुभव यात्रा

गोपाल माथुर
यूँ तो हम बहुत-सी किताबें पढते हैं, पर कुछ किताबें ऐसी होती हैं, जो पढने के बाद भी छूटती नहीं, ताउम्र साथ बनी रहती हैं। अनिरुद्ध उमट का सद्य प्रकाशित उपन्यास नींद नहीं जाग नहीं को पढना ठीक ऐसा ही विस्मयकारी अनुभव महसूस हो रहा है। एक ऐसे प्रेम को जीती नायिका के एकान्त, त्रासदायक व्यथा क्षणों की कथा जो अपना प्रेम खो चुकी है। कहीं पढा था कि प्रेम के बिना जीना कोई बडी बात नहीं, पर ऐसे प्रेम में जीना अवश्य बडी बात है जो मर चुका हो। अनिरुद्ध उमट का यह उपन्यास उसी व्यथा को अपनी पूरी शिद्दत के साथ महसूस कराने में सक्षम है।
किताब का मुख्य पृष्ठ विख्यात चित्रकार और संवेदनशील लेखक रामकुमार की अमूर्त पेंटिंग से सुसज्जित है। यह अद्भुत पेंटिंग ही एक अमूर्त उपन्यास का पता देने के लिए पर्याप्त है। अमूर्त इसलिए क्योंकि यह उपन्यास, उपन्यास की मान्य अवधारणाओं का अतिक्रमण कर पूर्णतः एक नयी विधा में लिखा गया है। ऐसा शिल्प और ट्रीटमेन्ट कम से कम अब तक मेरी निगाहों से तो नहीं गुजरा। उपन्यास होने के बावजूद भी यह किसी भी प्रकार के कथानक से मुक्त है। यही नहीं पूरे उपन्यास में हम एक भी पात्र का नाम तक नहीं जान पाते हैं। पारंपरिक उपन्यासों में पाए जाने वाले और क्लास में पढाए जाने वाले उपन्यास के सारे गुण-धर्म सिरे से अनुपस्थित हैं।
कहना चाहूँगा कि यह उपन्यास हमसे आगे के समय का उपन्यास है, जो केवल अनुभूतियों के संसार के सहारे खडा हुआ है। मन में चल रही उथल-पुथल जहाँ कथानक बनी हुई है वहीं संगीत, दृश्य, मूर्तियाँ, सूना पडा रेल्वे स्टेशन आदि जीवित पात्रों की तरह उपस्थित हुए हैं। अनिरुद्ध उमट इन्हें सहज रूप में प्रस्तुत करने में सफल सिद्ध भी हुए हैं। पाठकों को झकझोरने वाला यह पाठ वर्तमान में विद्यमान सभी प्रचलित मुहावरों का अतिक्रमण कर एक नितांत नया संसार रचने में सक्षम हुआ है।
यह छोटा-सा उपन्यास एक बडी कृति को पढने का आस्वाद देता है। मात्र 100 पृष्ठ होने के बावजूद भी यह 45 खण्डों में विभक्त है, जिसमें से कुछ खण्ड तो मात्र एक-एक पंक्ति के हैं। उन्हें आप एक पंक्ति की कविता भी कह सकते हैं और पूरा खण्ड भी। खास बात यह है कि आकार में वे लघु भले ही हों, किन्तु अपनी बात कह सकने में पूरी तरह सक्षम हैं।
उदाहरण के लिए कुछ खण्ड इस प्रकार हैं -

खण्ड-12

अभी वह दाल में से कंकड चुन रही है।
अभी उसके डाले दाने पक्षी चुग रहे हैं।
अभी उसके सूखने डाले कपडे तनी पर झूल रहे हैं।
अभी सिगडी का बुरादा उसके फूँक मारने से पिघले सोने-सा चमका है।
अभी नयी मटकी में भरे पानी में वह एक इलायची डाल रही है।
अभी आँगन पर वह पौंछा फेर रही है।
अभी उसने बन्द घडी में सेल लगाया है।
अभी-अभी उसके दाँत में से कई दिन से फँसा अजवाइन का दाना निकला है।

खण्ड-24

रात की अँधेरी छत पर पक्षियों के लिए रखे पालसीए के जल में अभी वह छपाक उतरेगी।

कण्ठ भीगेगा।

खण्ड-26

पलँग पर लेटी वह देख रही है छत पर कोई बादल उसे देख रहा है।
अनिरुद्ध उमट संवेदनाओं का एक ऐसा संसार रचते हैं, जो रहस्यमय होने के साथ-साथ आध्यात्मिक अनुभूतियों का अनुभव भी कराता है -
किसके कपडे पहने हूँ, कौन है जो मेरे कपडे पहनता है? कौन है जो इन कपडों में खुद को जीवित महसूस करता है? कौन है जिसका भीतर इन कपडों में बाहर आता है? कौन है जो मेरे कपडों में खुद को खुद-सा महसूस करता है? क्या है उसकी देह में जो मेरे कपडों में उतर तृप्ति पाती है? कौन है जो अपनी देह की भाप और तरलता और नमी और तपन मेरे कपडों में सौंप जाता है? कौन है जिसका उद्दाम आवेग सन्नाटे में ये कपडे ग्रहण कर लेने देता है?
ये किसके कपडे पहने हूँ?
इन कपडों में किसने मुझे पहन लिया है?’
यह उपन्यास अनिरुद्ध उमट के पिछले दोनों उपन्यासों से बिल्कुल अलग प्रकार की कृति है। इसकी भाषा में एक तरह की छटपटाहट महसूस होती है, जो अन्ततः नायिका की असह्य वेदना का पर्याय बन जाती है। जैसे अक्का महादेवी ने राजा के कहने पर कपडे छोड दिए थे, उसी प्रकार नायिका ने भी नायक के चले जाने के बाद जीना छोड दिया था। नायिका के एकान्त के बावजूद भी उसमें कोई रहने लगता है, जिसस सीधे संवाद भले ही न हो, पर वह अभिव्यक्ति का माध्यम अवश्य बन जाता है। उमट एक रहस्यमयी दुनिया रचते चलते हैं, जहाँ नायिका अपने अकेलेपन के साथ स्थाई निवास करती है।
उपन्यास की शुरुआत नायिका के आने से होती है और अन्त जाने से। सारी कथा वह आ रही है से वह जा रही है के बीच पसरा वृत्तांत है। प्रतीक्षारत नायिका अपना संताप अकेले भुगत रही है। उसके लिए समय मानो ठहर-सा गया है। नायिका के अनुभव पाठक के हृदय को भी खरोंचते चलते हैं। लगता है, जैसे सारा उपन्यास नायिका के 103 डिग्री ताप में किया गया प्रलाप हो, जिसके बीच में किशोरी मोनकर का सहेला हो या यशोधरा की आकुल तडप, स्मृति हो या दूर तक फैला रेगिस्तान, सब अपनी-अपनी भूमिका निभाने आ खडे होते हैं।
यह कथानक की अनुपस्थिति का अद्भुत आख्यान है। इसने कलात्मक सौंदर्य की नई ऊँचाईयों को छूआ है। कितना कुछ है, जो अव्यक्त होते हुए भी पाठक के मन में लगातार व्यक्त होता रहता है। गद्य चलते-चलते कब भावप्रवण कविता में बदल जाता है, कुछ पता ही नहीं चलता।
इस उपन्यास के विषय में ऐसा सोचने वाला एकमात्र व्यक्ति मैं ही नहीं हूँ। प्रख्यात कवि और विचारक अशोक वाजपेयी ने भी पुस्तक के ब्लर्ब में लिखा है कि यह उपन्यास कई विधाओं का अतिऋमण कर रची गई है। उसमें कथा और कविता दोनों एक-दूसरे में घुले-मिले हैं। ऐसे निर्भीक प्रयोग कथा और कविता दोनों की रूढियाँ ध्वस्त कर नया स्वाद, नयी सार्थकता अर्जित करते हैं।

विख्यात चित्रकार अखिलेश ने भी इसे लम्बी कहानी या कविता या विरक्ति का बयान की तरह स्वीकार किया है। उनके अनुसार पढने का जो हासिल है वह गहरी उदासी, प्रेम के बाद का खाली संसार, संसार के निस्सार हो जाने का अनुभव है।
इस समय मुझे ज्योत्स्ना मिलन के उपन्यास अ अस्तु का के अतिरिक्त कोई अन्य उपन्यास याद नहीं आ रहा है। यह उपन्यास उसके बाद की कडी है। यह हमें एक ऐसे लोक में ले जाता है, जहाँ सतही भावुकता के लिए कोई स्थान नहीं होता। जहाँ पीडा उस एकान्त से जन्म लेती है, जो उसे सजा की तरह मिला होता है। ऐसी स्थिति में कोई नींद नहीं, कोई सपना नहीं, कोई जाग नहीं।

अँधेरे कमरे में कोई कोयल पंख फडफडा रही है।

नींद की चौखट तक।
सपने की करवट तक।
जाग की चुप्पी तक।

पार्श्व कवर पृष्ठ पर प्रख्यात लेखिका ममता कालिया की टिप्पणी उपन्यास को समझने में बेहद मदद करती है।

पुस्तक- नींद नहीं जाग नहीं (उपन्यास)
लेखक-अनिरुद्ध उमट
प्रकाशक- वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली
संस्करण-2020
मूल्य-175 रुपये


सम्पर्क : जी-111, जी- ब्लॉक
माकड वाली रोड,
अजमेर 305001
मो. ९८२९१८२३२०