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तीन कविताएँ

नवीन दवे मानावत
1. आत्महत्या....
कितनी खतरनाक वेला होगी
जब पहली बार
गढी होगी
आत्महत्या की परिभाषा !
उस समय
कितनी रोई होगी
ख्वाहिशें
और..
टूटकर बिखरे होंगे
अधुरे सपने

जब पहली बार दिया होगा
अंजाम
किसी के द्वारा
तब कंपन हुई होगी धरती
चिल्लाया होगा आकाश
फूट-फूटकर रोया होगा समुद्र
रुक गया होगा लहरों का उत्साह
और अलग हो गई थी
उसकी बूंद
जो कुछ क्षण मौन हो
थिरक कर समा गई होगी
पाताल में
परिवेश के बंधन
जकडन अक्सर
मजबूर कर देते हैं
लाद देते हैं अनसुलझे असीम प्रश्न
जिनका जवाब
दे सकती केवल आत्महत्या
या अनिर्णीत आत्मकथा

रोज की तरह
गुहार है, तडप है
कडवे कटाक्ष करती बातें हैं
घूटन है,
पर समर्पण नहीं

तभी सहमी सी
आत्महत्या
अचंभित हो बोली-
मुझे कोई सरोकार नहीं आदमी से
पर उसकी तडप बोल रही थी
सहानुभूति चाहिए!
संवेदना चाहिए!
स्नेह की मधुर झिडकी चाहिए!
समन्वय चाहिए!
अंत में बोली कि ...
नहीं चाहिए संवेदनहीन मानव
नहीं चाहिए अलगाव
नहीं चाहिए टूटन
नहीं चाहिए अनसुलझे
परिवेश के बंधन

मेरा प्रश्न एक ही है
कि आत्महत्या सम्मान नहीं करती
किसी का
गले नहीं लगाती
वह स्वयं हंसती है
आदमी की कायरता और
अधूरे सपनों पर
जो निश्चित पूरे करने योग्य थे

**
2. शब्द अक्सर तोड देते हैं ....
कविता नहीं होती
शब्दों का खेल
क्योंकि थोपे गये अनसुलझे
शब्द अक्सर तोड देते हैं
उसके मर्म को

अगर तुमने शब्द गढे
उसकी पीडा, खुशी, श्रं`गार,
या विरचित भाव के अनुसार
तो नहीं पनपेगी अंतर्मन की दूब

शब्द हैं कि ठोकते ताल
निर्दोष, निर्बोध समय पर
और.....
आडंबर का पहन कर बाना
चिल्लाते हैं
कि हम शब्द हैं
अनुसरण करो हमारा

जबरदस्ती की मिसाल
और व्यवस्थिता का बाना
नहीं पहना सकते कविता को
जो फेंकी और पढी जाए
केवल प्रतिष्ठा और
भव्य तथाकथित हस्ताक्षरों के मध्य

कविता
शब्दों से केवल
आलोडित होती है
और
तत्पर रहती है शिल्प गढने को
जानना चाहती है मर्म को
तोडना चाहती है
आदमी को विध्वंस करने की युक्तियाँ

कविता है भूख और
रोटी की तलाश
राह भटकते इंसान की राह
टूटे प्रेमी की आह!
कविता रात नहीं
रात के अनसुलझे असीम सपने है
कविता मन की पीडा है
कविता जुडाव है
आदमी का
ब्रह्मांड का अहसास है
कविता......

**

3. उसका सामना
मैं जब निकलता था घर से
वही किसी शुभ कार्य करने हेतु
हमेशा उसी बच्ची का सामना होता
जो मेरे शुभ कार्य की साक्षी रही है
मैं उसे देख प्रसन्न होता
जैसे देवत्व की प्रतिमूर्ति
उसके हाथ में थमा देता
कुछ मुद्रा
जो मेरी मुख मुद्रा की औकाद रखती हो
उसका सामना
मेरे लिये शकुन का प्रतीक बन गया
वो मेरे हर शुभ कार्य का प्रतीक बन गई
और यह सत्य है
और क्या?
मैं कह रहा हूँ बिल्कुल सत्य
समय की गति
परिणय बंधन की खुशमय घडी
उस अबोध बच्ची या बालिका
कुछ दिनों का सुख साम्राज्य छोड
अचानक दुर्भाग्य की वेला आई
एक दिन वह विधवा हो गई
भाग्य अज्ञात मोड लेकर अज्ञात लोक में
चला गया!
वही ऋम
उसका एक दिन मेरे से आमना-सामना
मैं अनमना-सा हो गया
उसके प्रति घृणा के अंकुर फूट रहे थे
और बोला
अपशकुन?

वह अचंभित-सी हो गिर पडी धरती पर
कि आज का सामना
इतना भयानक आभास क्यों दे गया
महाशय की वह खुशी
मुद्रा और मुखमुद्रा की औकात!!

एकाएक
मैं मुड गया पुनः घर की ओर
और प्रणाम किया
आले में स्थापित पाषाण देवी की मूरत को
कुछ पुष्प अर्पित कर
करने लगा शकुन की तलाश

उसके लिये अंतिम छोर
क्षीण हो गया
और सोचने लगी कि
अपशकुन मैं कैसे हुई ?
अपशकुन
वही खुशियों का सामना
या स्वार्थ!
या अबोध समय
या पूर्वग्रसित मानव ?
या आज का तथाकथित प्राज्ञ पुरुष
अब मेरा सामना किसी व्यक्ति से नहीं
होगा बस क्षणिक भाग्य से
सम्पर्क : द्वारा घासीलाल दवे मानावत,
कैलाश नगर, सांचोर - ३४३०४१
मो. ९६४९६१५२०४