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इश्राकुल इस्लाम माहिर के दोहे

इश्राकुल इस्लाम माहिर
पँछी छेडे साज तो, मंजर गाए गीत
सारे मौसम साथ हैं, है जब तक मनमीत

हर रस्ता गाने लगा, अपना-अपना राग
धूप छतों पर छा गयी, जाग मुसाफिर जाग

दरपन का क्या देखना, अपनी नजरें देख
बाँच सके तो बाँच ले, पग-पग बिखरे लेख

जितनी सँगत बैठिये, उडता उतना रँग
जैसे गीली रेत से, लोहा खाये जंग

अपना कुछ भी हार के, दुनिया को मत जीत
रमता जोगी ध्यान धर, सँग समय के बीत

घर फूँका हम ने मगर, हुए न ऐसे भाग
आधा जलकर बुझ गया, हो गयी ठण्डी आग

मुझ से दुनिया है तिरी, मेरी दुनिया कौन
मैंने पूछा जब कभी, हो जाता है मौन

घर से निकले रास्ता, घर रस्ते का छोर
मेरा घर ही खो गया, मैं जाऊँ किस ओर

उसने अपना कर लिया, दे कर मान सम्मान
वरना मैं इक बावला, मेरी क्या पहचान

सारे रस्ते चल पडे, जाने किस-किस ओर
छूटी मेरे हाथ से, जब से मेरी डोर

सन्नाटा सोता नहीं, बहता है दिन रात
जिसमें जितनी प्यास है, उतना उसके साथ

शीशा देखे जब कभी, मारे खुद पर चोंच
सब का इक सा हाल है, अपने आँसू पोंछ

सागर सहरा हो गया, पर खू-बू ना जाय
पँछी लौटे रेत पर, नैना नीर बहाय

सच है इस सँसार में, सबसे बढ कर झूठ
जीना हो गर शान से, पहले खुद से रूठ

सूख चुके हैं सब कुएँ, चाहे जिसमें झाँक
कुछ बहरों के कान हैं, कुछ अँधों की आँख

साँस - साँस सीना जले, मंजर-मंजर आँख
धुआँ - धुआँ हर आईना, अब तो खुद में झाँक

जाने कैसी रोशनी, उतरी चारों ओर
मैं खुद को दिखता नहीं, तुम कहते हो भोर
दादी जैसी रात का, आँचल है आकाश
पग-पग पर जिसकी कथा, करती है प्रकाश

दुनिया सच्चा झूठ है, और जीवन है अनमोल
मन की आँखें मूँद कर, चाहे जिस से बोल

सूना-सूना रास्ता, है मेरी पहचान
तू तो तुझमें खो गया, मैं मुझ से अनजान

हम तो अपनी टोह में, बैठे कब से यार
मछली आये जाल में, तो हो बेडा पार

झरने की आवाज से, तितली है बेचैन
खुशबू सिसके फूल में, पुरवा करती बैन




सम्पर्क : 22, भारत कॉलोनी,
शिप हाऊस, जोधपुर-342006
मो. ९८२८५९८९९२