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चार कविताएँ

रवि पुरोहित
1. शिल्पी के नाम
सुन रे शिल्पी!
वर्जनाओं का
खार समुद्र
कब रोक पाता है
सीपी के सैलाब
या दरिया की आग को

चटखती कमल नाल तो
मुस्करा कर रहती है।

रे शिल्पी!
तुम बनाते रहो कायदे
और सींचते रहो संस्कार
मन-राग के,
मौन अनहद नाद को
कौन रोक पाया है भला

कोयल भी तो
कौए के घोंसले में रखती है अंडे को

ओ पानीदार शिल्पी!
शिल्प का शिल्प
बदल लें अब,
खडखड पीला पान
कब तक जुडा रहेगा
मरियल लता से?
2. मिल जाऊं शायद कहीं
पंछी लौट आया है
अपने घोंसले में
पर मन उसका
रह गया
किसी मित्र की जेब में,
या फिर
किसी प्रेमी के बिछोह में
जबरन लुढकते
आँखों के पानी में।

चेतना छूट गई शायद
नेह की ऋचाओं में,
संवेदना बह गई
अनजाने ही
अपनत्व के बायरे संग,
मित्रता के त्याग
और आत्मीयता के अनुराग में,
खुद को भूल आया पंछी
अनजाने ही!

प्रीत के वशीकरण प्रवाह में
खो आया उडान
और जीवन का
सम्पूर्ण वितान ही जैसे

मिल जाऊँ अगर कहीं तो,
लौटा देना मेरी साँसें....

ढूँढना
कहीं पडा मिल जाऊं शायद
रेख की अवरेख में
किसी फडफडाते पन्नों वाली
अनुरागी पुस्तक के हर्फ में,
या फिर किसी धडकते दिल की
चेतन-अवचेतन धडकन में.....
तो संभालना पंछी को मित्र।

जीवन कोई खेल नहीं
जानता हूँ
पर स्नेह ही पोषित करता है
इस अबोध को।।

जीवन को जीवन
आखिर कैसे अर्थाए !!

सुन रे शिल्पी!
वर्जनाओं का
खार समुद्र
कब रोक पाता है
सीपी के सैलाब
या दरिया की आग को

चटखती कमल नाल तो
मुस्करा कर रहती है।

रे शिल्पी!
तुम बनाते रहो कायदे
और सींचते रहो संस्कार
मन-राग के,
मौन अनहद नाद को
कौन रोक पाया है भला

कोयल भी तो
कौए के घोंसले में रखती है अंडे को

ओ पानीदार शिल्पी!
शिल्प का शिल्प
बदल लें अब,
खडखड पीला पान
कब तक जुडा रहेगा
मरियल लता से?
पंछी लौट आया है
अपने घोंसले में
पर मन उसका
रह गया
किसी मित्र की जेब में,
या फिर
किसी प्रेमी के बिछोह में
जबरन लुढकते
आँखों के पानी में।

चेतना छूट गई शायद
नेह की ऋचाओं में,
संवेदना बह गई
अनजाने ही
अपनत्व के बायरे संग,
मित्रता के त्याग
और आत्मीयता के अनुराग में,
खुद को भूल आया पंछी
अनजाने ही!

प्रीत के वशीकरण प्रवाह में
खो आया उडान
और जीवन का
सम्पूर्ण वितान ही जैसे

मिल जाऊँ अगर कहीं तो,
लौटा देना मेरी साँसें....

ढूँढना
कहीं पडा मिल जाऊं शायद
रेख की अवरेख में
किसी फडफडाते पन्नों वाली
अनुरागी पुस्तक के हर्फ में,
या फिर किसी धडकते दिल की
चेतन-अवचेतन धडकन में.....
तो संभालना पंछी को मित्र।

जीवन कोई खेल नहीं
जानता हूँ
पर स्नेह ही पोषित करता है
इस अबोध को।।

जीवन को जीवन
आखिर कैसे अर्थाए !!



3. शुक्रिया जिंदगी!

तुम्हारा आना
जैसे छपनिये अकाल से शापित
दहकती धरा को
अचानक से मिल गई हो
सावन की अमृति-फुहार....

गुडकती,
ठिठकती,
हाँफती,
सिसकती,
गिरती-पडती
संभलती-चलती
जियाजूण को
जैसे मिल गया हो तारणहार...

मार्ग भूले पथिक की भाँति
उम्र के पगोथिये चढती वय को
अचानक से मिल गई सही दिस
और सालों की गिनती
जिंदगी बन गई।

शुक्रिया जिंदगी।
यूँ ही बसंत बन
महकते रहना
मेरी जीवन-साँसों में।


4. मुझमें खुद को छोड गया वह

अब तो नींद भी मेरी न रही
आ धमकता है वह शख्स
बिना इजाजत के
और मुस्करा कर
सहला जाता है
मेरी सुप्त-चेतन संवेदनाओं को
परभाती घंटियों की रुनझुन के साथ
सुबह वही पूछता है-
आज ये बगीचे के गुलाब
कुम्हलाए-से क्यूं हैं।

अब कैसे कहूँ
की विदा लेकर भी
मुझमें खुद को छोड गया वह।

**

सम्पर्क : डी-42, विजय विहार,
सोफिया स्कूल के पीछे,
बीकानेर (राज.) 334001
मो. 9414416252