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सात कविताएँ

चंचला पाठक
एक
नींद भरी आँखों की
आकुलता का
रहस्य
किसी औघड की
औपचारिकता के
अघट विन्यास में
जैसे
कायाप्रवेश है
तुम्हें
रचते हुए
कितना छिन्न-भिन्न
होती हूँ मैं
कि
मृत्यु की स्वीकृति
सहज नहीं होती

आभार
तंत्रबलि-सा
उत्कट
शब्द है
जब
सम्बन्धों के
दो पाटों के
बीच
कस दिया गया हो
मुस्कुराहटों की
कसी पर

मुझमें
अशेष का
गरुडपुराण
बाँचते हुए
लाँघ जाते हो
अक्षरों के
ब्रह्मचर्य तक
तुम
तब प्रेम
एक प्रेतबाधा
बनकर
उतरता हो जैसे
मेरे बिखरे
विन्यास में....

दो
अँखुआए हुए
वो सारे शब्द
झर रहे हैं
मेरी आँखों से
निःशब्द
इस वृत्तांत में
तुम
मेरा
अनवरत सत्य हो
माटी भी हो
इन बीजों की
जाने किन किन
नम बातों को
सोख
अँखुआ उठे हैं जो

किसी महकते
समय में
तुम
इन बीजों की
वसुंधरा थे न?

समय नहीं
मुझे
इसमें पसरे
अवकाश से
प्रश्न है ।

तीन
प्रेम में
मुझे विरह की चाहना थी
कि
फूटती रहे
रोम-रोम से
उत्तप्त सुगंध
झरती रहे
अन्तरात्मा की शीतलता
आकाश भर का विस्तार लिए
अखंडित गान सिरजती रहें
आँखें
तुम्हारी प्रतीक्षा का
रंचमात्र केसर
बस स्मृतियाँ हों तेरी
लौटना मत तुम
गहरे बादलों में
उद्दाम कभी तडप उठती हो बिजली
बस इतनी भर कहीं
कौंध जाया करे
तुम्हारे आने की
जिज्ञासा

तुम्हारे जाने के
अनहद से कई गान विस्तार पाते हैं मुझमें
मिलन के स्वरभंग में
कहाँ तो एकनिष्ठ होता विग्रह

अँखुआए हुए
वो सारे शब्द
झर रहे हैं
मेरी आँखों से
निःशब्द
इस वृत्तांत में
तुम
मेरा
अनवरत सत्य हो
माटी भी हो
इन बीजों की
जाने किन किन
नम बातों को
सोख
अँखुआ उठे हैं जो

किसी महकते
समय में
तुम
इन बीजों की
वसुंधरा थे न?

समय नहीं
मुझे
इसमें पसरे
अवकाश से
प्रश्न है ।

प्रेम में
मुझे विरह की चाहना थी
कि
फूटती रहे
रोम-रोम से
उत्तप्त सुगंध
झरती रहे
अन्तरात्मा की शीतलता
आकाश भर का विस्तार लिए
अखंडित गान सिरजती रहें
आँखें
तुम्हारी प्रतीक्षा का
रंचमात्र केसर
बस स्मृतियाँ हों तेरी
लौटना मत तुम
गहरे बादलों में
उद्दाम कभी तडप उठती हो बिजली
बस इतनी भर कहीं
कौंध जाया करे
तुम्हारे आने की
जिज्ञासा

तुम्हारे जाने के
अनहद से कई गान विस्तार पाते हैं मुझमें
मिलन के स्वरभंग में
कहाँ तो एकनिष्ठ होता विग्रह

चार

तर्पण में
बुदबुदाए गए मंत्र
नेत्र से जाग्रत् होने थे
उद्बुध नहीं हुईं
प्रेतशिलाएँ

मातृकाएँ सहज नहीं
प्रवेश करती तुम्हारे रोमकूपों में

कहाँ हुआ भला लोमहर्ष

सूर्य के आलोक में
जरता है एक पथ
लौट रहे हो तुम और
मँड रही पगडंडी


पाँच

काठ हो जाती हूँ
मैं
जब चीखती हूँ
नितांत नीरव साध
रोम-रोम से
तेरे पदचाप से
रिक्त परिसर में
क्षत-विक्षत कर बैठती हूँ
इस सर्पित
एकांत को
सूख जाती हूँ
ठंठ
हलक तक
भर जाता है
छह

महाभारत जैसे युद्ध की विभीषिका से भी
प्रसूत हुई गीता

तुम मत सोचना अधिक

रचने की प्रगाढ चेतना पर
यात्राओं की अंतःयात्रा
व्रात्य होती हैं
करती हैं जिधर भी गमन
रचती हैं
दिशा
ऋतु
भाव
भूगोल आदि
अनादि की
अंतहीन
ऋचाएँ

मुझमें तो
मृत्यु भी प्राणपूत है


सात

स्पन्दन
प्रथम कलाप है
सृष्टि का
तुम
विस्तृत हुए
जाने कितने
वलयों में
रूप
रस
गंध
स्पर्श
मैंने
आकाश भर
समेटा तुझे
हमारी छटा बिखरी है जो
गतांक से आगे

सम्पर्क : ए-39, गाँधी कॉलोनी, पवनपुरी,
बीकानेर-334001
मो. ९८२८३६९८२९