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पाँच कविताएँ

प्रयाग शुक्ल
चीजें जिन्हें हम छू सकते हैं

चीजें बहुत-सी हैं जिन्हें हम छू सकते हैं

वृक्ष फल फूल जल लताएँ
घास चीजों बहुत-सी हैं आस-पास
छू सकते हैं जिन्हें।

बर्तन भांडे कटोरी गिलास।
कुर्सियाँ मेजें अल्मारियाँ।
कुर्ता कमीज।

धूल काठ पत्थर।
कुछ जीव जंतु।
फसलों के अन्न कई सब्जियाँ।
कोई प्रिय देह बाँहें अंगुलियाँ,
छू सकते हैं परस्पर दो।

छू नहीं सकते हैं प्रेम को।
पर, चीजों को छू कर प्रेम से,
मधुर स्पर्श से,
जान ले सकते हैं,
कुछ तो हम प्रेम को!!

तिलतियाँ उडती हैं

उडती हैं तितलियाँ
फूलों पर
हवा में
कभी-कभी पानी के
ऊपर भी!
बनाती नन्हीं नामालूम
परछाइयाँ।
भीतर भी।
पत्तों पर
हो रहतीं पत्तों की
तितलियाँ उडती हैं,
उडते हैं रंग!
होने न देती उन्हें थिर।
फिर,
फिर!

शब्द

वे चले आते हैं वर्षा में,
धूप में, प्रकाश में, अँधेरे में,
किसी पगडंडी, खिडकी, सीढी, छत पर।
हौले से। हडबडाये। सकुचाये।
धीमे। तेज।
किसी कविता के पंक्ति-से।
भर देते किसी सुख, किसी वेग,
किसी चपल, मंद गति से।
कर देते मौन। मुखर।
कितने ही रूपों में।
(हाँ) वे ही रहते हैं साथ,
सचमुच, हर हाल,
हर प्रसंग, घटना में।
मिलने-बिछुडने-जुडने में।

दीखे न दीखे उनकी शक्ल,
सुनाई पडे न पडे उनकी आवाज!

शब्द!!
एक दृश्य

कुछ पत्ते अटके हैं पेड पर,
जो है गिरा चुका ज्यादातर पत्ते।
ऊपर उजास है भोर का।
डालियाँ टहनियाँ हैं पर्णहीन,
उभरी रेखाओं-सी,
मिलकर जो करती हैं
रेखांकन पेड का सुंदर,
सम्पूर्ण!
(आसपास हैं कुछ अन्य वृक्ष पत्तों के साथ)

कुछ चिडियाँ उडती हुईं-
कभी इधर
कभी उधर।
स्मृतियाँ
खिडकियाँ
खुलनी कुछ
शुरू ही हुई हैं!

जीवन की कठिन
मधुर वातास बहती है
दृश्य में!
सुनयना फिर यह न कहना

सुनयना, फिर यह न कहना कि
कहा नहीं (था) मैंने-
जीवन यह बीत रहा।
पर, ‘यह भी भला कुछ कहना है-’
यही पढा आँखों में तुम्हारी सुनयना जब
उन्हें फेर हल्का-सा मेरी ओर
देखा भर तुमने!

पर, कहना तो है
जानते हुए भी कि जीवन यह जारी है,
रीता नहीं है-
कहना तो है,
लेते हुए भेद तुम्हारी आँखों का
और अपने कहने का-

सुनयना!

(डब्ल्यू बी.येट्स से प्रेरित)

सम्पर्क : एच-416, पार्श्वनाथ प्रेस्टीज,
सेक्टर 93ए, नोएडा-201304
मो. ९८१०९७३५९०