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गोमती

अखिलेश आर्येन्दु
रेल की पटरियों के बीच वह गिट्टी हटा ही रही थी कि राजधानी एक्सप्रेस ने जोर से सीटी दी। वह हडबडाकर बगल वाली पटरी पर गिर गई। गोमती ने उसे सँभाल लिया। कई बार गोमती माँ को ऐसी हडबडी में संभालती रहती है। मां के साथ काम करते वक्त वह बहुत सचेत रहती है, लेकिन उसकी माँ चमेली काम में इतनी तल्लीन हो जाती है कि रेल की सीटी भी कभी-कभी वह सुनने में चूक जाती है। आज भी यही हुआ था। थोडी-सी चूक से जीवन लीला कैसे खत्म हो जाती है, चमेली ने कई बार बहुत नजदीक से देखा है ।
दिनभर काम करते -करते कमर टूट जाती है, लेकिन ठेकेदार का मुँह तब भी चाँद की तरह टेढा का टेढा ही रहता है। ठेकेदार को बस अपने काम से मतलब है। दिनभर वह मजदूरों को जानवरों की तरह लगाए रखता है लेकिन दिहाडी देने में हीला हवाली करने की उसकी आदत पुरानी है। कभी-कभी तो बहाने पर बहाने करके एक-एक महीने तक दिहाडी नहीं देता। उसे पता है, ये मजदूर तभी तक उसके कब्जे में हैं, जब तक उनका बकाया, उसके पास है। आठ घंटे का नियम भी उसे बेकार लगता है। मजदूरों के आने का समय तो उसकी घडी बताती है लेकिन जाने का समय, सूरज के डूबने से तय करता है। जाडे में तो गनीमत, गर्मी के दिनों में तो वह बारह घंटे के पहले छोडता ही नहीं और यदि चले गए तो गैरहाजिर। इस बात को लेकर गोमती से उसकी कई बार कहा-सुनी भी हो चुकी है।
मौजीलाल को एक हफ्ते से जोरों का बुखार है। दिन किसी तरह करवट बदलते तो बीत जाता है लेकिन रात बिताना मुश्किल होता है। दुख के दिन दो-चार हों तो किसी तरह कट भी जाएँ, लेकिन यदि सारी जिंदगी दुख के नाम हो जाए तो काटना कितना दुरूह होता है, भुक्तभोगी ही जान सकता है। मौजीलाल अपने पिता के वक्त से ही दुख में पला-बढा है। शादी होने के बाद भी मुसीबत पर मुसीबत आती रही। पत्नी चमेली, कामकाजी मिली वरना गृहस्थी कैसे चलती, उसे भी नहीं पता।
आज महीने का अंतिम दिन है। चमेली और गोमती के कई बार कहने पर भी ठेकेदार महीने भर की दिहाडी देने में बहाने पर बहाना बनाता रहा। अंत में थक-हार कर दोनों ने अपनी खोली की ओर रुख किया। चमेली को पता नहीं, आज उसका दिल क्यों धडक रहा है। उसे किसी अनहोनी का अहसास हो रहा है। सोचने लगी, कहीं गोमती के बापू को कुछ हो तो नहीं गया! बुखार इतना तो नहीं बढ गया कि अचेत हो गए हों। पता नहीं, दाल-भात खाए होंगे कि नहीं। लेकिन डॉगटर ने तो भात खाने से मना किया था। फिर दाल पीकर रह गए होंगे। बच्चे भी तो हैं। दो लोगों का खाना चार लोग मिलकर खाए होंगे। अरे हाँ, पानी भी तो नहीं था। पानी की कितनी किल्लत है। जैसा मध्यप्रदेश वैसी दिल्ली। पता नहीं कितने विचार आए और गए।
गरीबी इंसान को समझौते पर समझौता करने के लिए मजबूर करती है। आम आदमी करे भी तो क्या। लेकिन, जो अपनी शक्ति और योग्यता पर भरोसा है, वह दरिद्रता में भी धैर्य नहीं खोता, अपनी शक्ति और योग्यता पर भरोसा करते हुए अपने उद्देश्य को पाने के लिए अपनी पूरी शक्ति लगा देता है। सत्साहसी और आलसी व्यक्तियों में यही अंतर होता है। मौजीलाल को अपनी शक्ति पर भरोसा तो था लेकिन उसे योग्यता पर कोई भरोसा नहीं। उसे इतना पता है कि बिना अच्छी पढाई के अच्छे दिन नहीं आते। भाग्य तभी साथ देता है, जब उसे संकल्प और शक्ति की मजबूत ईंटों से निर्मित किया जाए। एक हफ्ते से करवट बदलते हुए मौजीलाल बार-बार अपने पढे-लिखे न होने के कारण स्वयं को कोसता रहता है। अतीत को कोसने और भविष्य की चिंता में डूबे हुए व्यक्ति को वर्तमान से भी भरोसा धीरे-धीरे उठ जाता है।
कुछ दूर ही दोनों गई होंगी कि ठेकेदार ने गोमती को आवाज दी। ओ गोमती....गोमती...जल्दी सुन। पाँच सौ की नोट लहराते हुए ठेकेदार बोला।
गोमती ने मुडकर देखा, ठेकेदार खींस निपोरते हुए हाथ हिला रहा था। पहले तो गोमती ने हँसी-मजाक समझकर टाल दिया, लेकिन जब ठेकेदार ने तेज आवाज में बार-बार दिहाडी देने की बात दुहराई तो गोमती को लौटना ही पडा।
माँ को रुकने के लिए कहकर गोमती ठेकेदार के पास आ पहुँची।
हाँ ठेकेदार बोलो, का कहत हव आपन। गोमती बोली।
ठेकेदार उसकी बाँह पकड सिर पर हाथ फेरते हुए बोला,- अरे मेरी गोमती! तुम मेरे रहते कैसे छूछे हाथ जा सकती हो। यै लो पाँच सौ रुपइया, दिहाडी बाद में देहूं। ठेकेदार की अवाज में फुसलाहट का भाव साफ सुनाई दे रहा था।
ई पाँच सौ रुपइया का बात का? गोमती गुस्से में बोली।
बस, अइसन मन भवा, सोचा तुम्हारे पास पैसे की तंगी है। कुछ फूल-फल लेकर खा लेना। शरीर बनी रहेगी तो....?
गोमती, भले ही प्राइमरी तक पढी है लेकिन वह सोहदों की बदतमीजी को बखूबी समझती है। उसने बात को घुमाते हुए कहा-
नहीं ठेकेदार, हमका हराम का पैसा नाहिं चाहीये। हमका आपन मेहनत का पैसा चाहीये। गोमती की आवाज में तल्खी थी।
अरे, नाराज क्यों होती हो मेरी गोमता। हम तुमसे दूर थोडे हैं। पइसा केका काटत हव? अपनी अम्मा से मत बताना-हम दोनऊ की आपस की बात है। ठेकेदार गोमती की कमर में अंगुलियां डाल गुदगुदाते हुए बोला।
ऐसी हरामजद्दी की गोमती को कल्पना भी नहीं थी। उसने पाँच सौ रुपये का नोट फेंका और अपनी माँ की ओर दौड पडी।
का कहत रहव ठेकेदार?
बस अइसन। बे बात का बात। ओहे इतना पता नाहीं कि गोमती पढी-लिखी भल नाहीं, लेकिन इतना तो समझु सकत हव कि ....। बात को दबाते हुए गोमती बोली।
का कछु गलत बोला का?
ओहे का इतना हिम्मत, नाहीं अम्मा। पागल मनई का बस पगलई न सूझे तव ज्ञानु सूझे? गोमती आगा-पीछा सोचकर बोली।
कुछ बात तो जरूर होगी, नहीं तो गोमती इस तरह न कहती। लेकिन वह सच-सच बता भी तो नहीं रही है। इन ठेकेदारों का क्या। ये तो आवारा ऐसे कुत्ते हैं जो किसी को भी देख लार टपकाते फिरते हैं। चमेली के मन में अनेक प्रश्न घुमडने लगे थे।
सुख-सुविधा मजदूरों की जिंदगी में रेल की पटरियों की तरह है। जो सब की यात्रा सुखद बनाती हैं लेकिन पूर्ण समर्पण के बाद भी उन्हें सुख कभी नसीब नहीं होता। चाहे माल गाडी आये या यात्री गाडी अथवा राजधानी। मौजीलाल रेल दिहाडी मजदूरी करने को अपनी नियति मान बैठा था। यह सोचकर कि समय से पहले और भाग्य से ज्यादा किसी को कुछ भी नसीब नहीं होता।
चमेली के बच्चों ने दीदी और माँ को देखा तो दौड पडे। जैसे किसी परदेशी को देखकर बच्चे दौड पडते हैं। चमेली ने सबसे पहले मौजीलाल का हालचाल पूछा, फिर दूसरी बातों के बारे में। वह अब एक पल भी मौजीलाल से दूर नहीं रहना चाहती थी। देखा मौजीलाल बेसुध खटिया पर पडा है। दो कुत्ते लार टपकाते हुए खटिया के नीचे हांफ रहे हैं।
कछु दाल वाल पियेब रहेव गोमती के बापू? चमेली ने करुणा भरी आवाज में पूछा।
हाँ, बचा-खुचा पी लीयेन रहेन। मौजीलाल ने धीरे से कहा।
चमेली ने इधर-उधर निगाह दौडाई। कहीं उसे पानी मिल जाए और गला तर कर ले। दिनभर में दो-चार बार ही पानी पी पाती है। ठेकेदार के काम का इतने दबाव की वजह से पानी पीने की भी छुट्टी नहीं मिलती। भूख भी तो लगी है। इस सूनसान में सब्जी, दूध कभी मुयस्सर नहीं होता। दाल का भाव तो आसमान छू रहा है। ऐसे में रेल के गंदे पाइप वाले पानी का ही एकमात्र सहारा रहता है। अरे, केवल पानी पीकर कहीं जिंदगी चलती है। वह भी दिनभर पसीना बहाने वाले काम में।
अरे हां, दो टमाटर दसना के नीचे पडे हुए थे। ढूँढने से दो-चार प्याज भी मिल गए। पाँच लोगों में दो टमाटर और दो-चार प्याज से न तो सब्जी बन सकती है और न तो चटनी ही- जिससे पेट भरा जा सके। एक किलो आटा रखा हुआ था। और अदहन जैसा गगरी में पडा पानी। इसके अलावा कुछ नहीं। गोमती दौडकर बगल वाले बैजू काका के यहाँ से आग ले आई और दो टमाटर भी साथ में। जल्दी-जल्दी प्याज और टमाटर काटकर डेकची में रख दिये। चमेली नहाने चली गई।
अभी सब्जी पकना शुरू ही हुई थी कि अचानक अपने बापू की कराह सुनकर गोमती दौड पडी। बिना बताए मौजीलाल शौच को चला गया था। कहीं नजदीक बैठने की जगह न मिली तो दूर रेल लाईन पकडकर जाना पडा। शौच से लौटते हुए कुत्तों के झुंड ने उसे घेर लिया । स्वयं को बचाने के लिए पटरियों पर पडी गिट्टी उठाकर कुत्तों पर मारी। इससे कुत्ते और खूंखार हो गए।
गोमती ने बापू को कुत्तों से घिरा देख उसने उन्हें बचाने के लिए गिट्टियाँ उठाकर मारा लेकिन कुत्ते हटने के बजाए और भी खूंखार होते जा रहे थे।
मौजीलाल के कुत्तों के काटने वाली जगह से जगह-जगह खून टपक रहा था। चमेली देखकर घबरा गई।
जब तक चमेली कुछ सोचती गोमती दौडकर एक पुराने गट्ठर से एक नया कपडा निकाल कर ले आई।
ई नवका फटन ले आऊँ?
नवका फट ऐसन में बांधा जाइत है। नहीं तो गडबड होइ सकत है मावा? गोमती ने समझाते हुए चमेली से कहा।
प्याज आनन-फानन में पीसा और उस कपडे की मदद से बहते घाव पर बाध दिया। रातभर मां-बेटी मौजीलाल की बिगडती हालत देखती रहीं। सुबह होने में एक-एक पल भारी पड रहा था। उधर मौजीलाल की हालत दिनोंदिन बिगडती जा रही थी।
दुख की इंतजार की घडियाँ पहाड बन जाती हैं। अब सुबह हो तब सुबह हो। कब सुबह होगी, इसी में दोनों का धैर्य भी जवाब दे रहा था। सुबह तो हुई। सुबह होने से दुख तो कम नहीं हो जाता लेकिन दुख को कम करने के लिए आसरा जरूर ढूँढने में मदद मिल जाती है। गोमती ने मां को बुलाया और बगल वाले बैजू काका को साथ ले दो किलोमीटर दूर अस्पताल पहुँची।
जिस तरह अनजाना रास्ता कभी लक्ष्य तक नहीं पहुँचाता उसी तरह मन में उठने वाले नकारात्मक सवाल भी किसी सवाल का हल नहीं कर सकते। मौजीलाल के परिवार के साथ कुछ ऐसा ही था। गाँव के दबंगों के जिस अत्याचार और शोषण से बचने के लिए वह दिल्ली आया था मन में सुखी होने का स्वप्न पाले, उस स्वप्न में पंख कभी नहीं लगे। लगते भी कैसे। जब स्वप्न केवल स्वप्न बनकर रह जाता है तो उसमें पंख नहीं जमते। कहीं सूखे अनाज में अंकुरण आता है। घुन जरूर लग जाता है और अनाज अपना अस्तित्व खत्म कर देता है।
गाँव से शहर में रोजगार मिलने की आशा लिए हजारों मजदूर, किसान शहरों की तरफ रुख करते हैं, लेकिन शहरों में उन्हें जिन त्रासदियों और परेशानियों का सामना करना पडता है उससे उनकी आशा कुछ ही दिनों में छू-मंतर हो जाती है। मौजीलाल के बुखार का यही कारण था। सोचते-सोचते वह कुछ ही महीनों में बूढा हो गया था। जो भी रोजगार दिलाने वाला मिला, सभी ने उसे धोखा ही दिया था। आज फाँका मारने की हालात में उसे अपने ऊपर से रहा सहा विश्वास भी उठ गया था कि उसमें अभी कुछ करने की शक्ति भी है।
जिंदगी की भूलभुलैया में खोकर कितने मेहनतकश असमय में ही सदा-सदा के लिए इस दुनिया से प्रस्थान कर जाते हैं। मौजीलाल ने अनेक दिहाडी मजदूरों को शोषण और जुल्म के कारण जवानी में ही बूढे होते और फिर घुट-घुटकर मरते देखा था। आज सारे दृश्य उसके सामने नाच रहे थे। कहीं उसका भी जाने का नम्बर तो नहीं! भगवान को यही मंजूर है तो वह कर भी क्या सकता है। उसके पिता रामबरन भी तो उसी तरह जवानी में बूढे हो असमय में उसका साथ छोड गए थे। उसे महज तेरह साल में अपने कंधों को गृहस्थी संभालने के लिए लगाना पडा था। दो-चार तक की ही पढाई कर पाया था कि उसकी कच्ची उम्र में शादी कर दी गई, जब उसे शादी के बारे में कुछ पता ही नहीं था।
गोमती उसकी पहली संतान है। देखने में सुंदर और बात करने में चतुर। वह अच्छा-बुरा सब कुछ जानती है। पर शहर की जिंदगी के बारे में उसे क्या पता। गाँव की भाषा-बोली में पढी-लिखी चहकती एक बाला के मन में कैसे-कैसे स्वप्न पलते हैं कुछ ऐसे ही स्वप्न उसके मन में पल रहे थे कि उसे मजदूरी करने के लिए विवश होना पडा।
संकल्प कमजोर, अपनी शक्ति पर अविश्वास और अयोग्य मानने की प्रवृत्ति इंसान को कितना असहाय और असहज बना देती है, यह मौजीलाल के जीवन को देखकर समझा जा सकता था। शोषण और जुल्म करने वाले हिंसक भेडियों के लिए सबसे अच्छा अवसर होता है। ठेकेदार को यह पता हो गया था कि मौजीलाल जिस हालात में है, वह किसी भी स्तर पर नीचे गिरकर समझौता कर सकता है। गोमती के प्रति उसकी ललचाई नजर अब अधिक हिंसक होती जा रही थी। वह उसे अपनी हवस का शिकार बनाने के लिए घायल सर्प की तरह छटपटा रहा था।
गोमती के लिए यह उसके चरित्र और साहस की सबसे कडी परीक्षा की घडी है। उसमें कुछ ऐसे सद्गुण थे जिससे वह चरित्र की रक्षा कर सकती है। उसमें धैर्य रखने और दृढता से अपने कार्य करने की क्षमता है।
मौजीलाल को अस्पताल पहुँचाना जरूरी था। चमेली ने बगल वाले बैजू काका को बुलाया, गोमती को साथ लिया, बच्चों को टेंट में ही रहने की हिदायत दे, वह दो किलोमीटर पर स्थित सरकारी अस्पताल पहुँच गई।
डाक्टर साहेब, इनका कुकुर काट लिहिन रहा। चमेली डॉक्टर से भावुक होकर बोली।
क्या कहा, समझ में नहीं आया। डाक्टर ने डांटते हुए पूछा।
तब तक गोमती बोल उठी-कुत्ते ने काट खाया। इनकी हालत बहुत खराब है। एक हफ्ते से बुखार भी हो रहा है।
रात में ही क्यों नहीं आ गई? गुस्से में डॉक्टर ने पूछा।
साहेब, आने का कोई साधन नहीं था।
क्या करते हो तुम लोग?
मजदूरी साहेब।
कहाँ?
रेलवे में दिहाडी मजदूर हैं साहेब।
समझ गया। डाक्टर ने सिर हिलाया।
मौजीलाल का हाथ पकडा। नाडी बहुत धीरे-धीरे चल रही थी। शरीर ठंठा होता जा रहा था।
इसकी हालात तो बहुत नाजुक है। पहले क्यों नहीं लाई?
साहेब, दवाई के पैसे नहीं थे। प्राइवेट में तो बहुत खर्चा लगता है। उस लिए वहाँ नाही जा सकी।
जल्दी जाओ इसकी पर्ची बना लाओ। उधर इमरजेंसी वार्ड है। लेकिन हाँ, पहले इसे कुत्ते काटने वाली सुई लगेगी। डॉक्टर ऊपरी दया भाव दिखाते हुए बोला।
समय से कोई भी कार्य न होने पर उसका महत्त्व जैसे खत्म हो जाता है कुछ इसी तरह उपचार साथ में जरूरी है।
आखिर मजदूरों का भी कोई जीवन होता है। उनकी अहमियत यदि होती तो हर साल लाखों मजदूर असमय में बिना उचित उपचार के क्यों जान गंवाते। सब सरकार के माथे पर ठीकरा फोडते हैं, लेकिन यह समाज भी तो ऐसे ऐसे गाढे वक्त में मदद करने में हिचकिचाता है।
दवाई का पैसा भी नहीं था। टेक्सी-टेम्पो के किराए के लिए भी नहीं। ऐसे में आस-पास के प्राइवेट अस्पतालों में दवाई के लिए जाना संभव नहीं था।
बैजू काका को साथ ले गोमती मौजीलाल को भर्ती कराने की पर्जी बनवा लाई। जबरदस्त भीड देख चमेली का सिर चकरा गया।
उसे समझ में नहीं आ रहा था, कैसे आनन-फानन में अपने पति को इस विपत्ति से बचाए। लेकिन गोमती अब भी धैर्य के साथ पिता के इलाज के लिए जद्दोजहद में लगी हुई है।
मौजीलाल को सरकारी सर्वोदय अस्पताल में भर्ती करा दिया गया। चमेली, गोमती और बैजू काका के लिए मौजीलाल को बचाने का सबसे बडा सहारा अपने परमेसर से अब है। डॉक्टर बाबू, कोई भगवान थोडे हैं। वह तो बता दिहें हैं, आने में बहुत देर कर दिया। फिर भी अपनी पूरी ताकत लगाएँगे ही। गोमती ने अपनी समझ को तराशा।
इमरजेंसी वार्ड पूछने के दौरान सेना के जवान ने गोमती की मदद की। गोमती की आँखों में उसके प्रति कृतज्ञता के आंसू छलक आए थे।
काहे रोइ रहेव हो बिटिया। परमेसर चहिही तउ तोहार बापू ठीक होइ जईहीं। चमेली भावुक होते हुए गोमती को दिलासा दिलाने लगी।
कुछ नाही अम्मा। रोवत नहीं हव। वोह वरदी वाले भाई ने हमारी जो मदद की उसे सोचकर आंखन में आंसू ढुरक आएँ, बस।
हाँ बिटिया! भगवान अइसन बखत में केउ न केउ का मदद केउ लिए भेज देत हयन।
कुछ घटों में मौजीलाल की हालात में सुधार होना शुरू तो हो गया था, लेकिन पौष्टिक आहार न मिल पाने के कारण वह कमजोरी से उठ नहीं पा रहा था। पति की हालत में सुधार आता देख चमेली फिर काम पर जाने लगी। बैजू के भरोसे दोनों बच्चों को छोडकर आना एक-दो दिन के लिए तो ठीक था लेकिन लम्बे समय तक नहीं छोडा जा सकता था।
अस्पताल में मौजीलाल की चिकित्सा के दौरान जिस सेना के जवान ने गोमती की हरसंभव मदद की थी, वह आगे भी मदद का भरोसा दिला दो दिन बाद ही चला गया था। अपरिचित और अनजान व्यक्ति की मदद करना आज के जमाने में देवयोग ही कहिए। वह एक हफ्ते बाद फिर आया और जो मदद बन सकती थी किया। गोमती और उस नौजवान, जिसका नाम देवयोगी था, का एक अनजाना रिश्ता- भाई-बहन का बन गया।
व्यक्ति अपने चरित्र से ही पहचाना जाता है। चरित्र ऐसी अनमोल पूँजी है जो कठिन से कठिन दौर में व्यक्ति को आत्मशक्ति से लबालब रखती है। देवयोगी में आत्मशक्ति का भंडार था। चरित्र का एकदम पक्का। वह सच कहने में डरता नहीं था और झूठे लोगों को बख्शता नहीं था। गोमती को एक ऐसा धर्मभाई मिल गया था जिस पर वह विश्वास कर सकती थी।
दो दिनों तक काम पर आया न देखकर ठेकेदार गोमती के बारे में पूछताछ करने लगा। चमेली से वह सब कुछ जान लेना चाहता था। लेकिन चमेली थी, उसके किसी भी प्रश्न का ठीक जवाब देने से बचती थी। मर्द की आँखों और हावभाव से महिलाएँ उसकी मंशा भाप लिया करती हैं। चमेली भले ही अनपढ थी, लेकिन गँवार नहीं थी। वह ठेकेदार की मंशा अच्छी तरह से समझती थी।
ठेकेदार ने दूसरे मजदूरों से गोमती के ठिकाने का पता लगा लिया। वह उस अवसर की तलाश करने लगा, जब गोमती को लालच की हड्डी फेंककर उसे फंसाया जा सके और अपनी वासना शांत कर सके।
चमेली ने ठेकेदार को मौजीलाल के कुत्ता काटने की बात तो बताई लेकिन वह किस अस्पताल में है उसने नहीं बताया। ठेकेदार को जब मौजीलाल को सर्वोदय अस्पताल में भर्ती होने का पता चला, वह मौजीलाल की मदद के बहाने गोमती से मिलने का अवसर तलाशने लगा। दो दिन तक तो वह गोमती से मिल नहीं सका। लेकिन एक दिन वह सुबह ही अस्पताल पहुँच गया।
अरे गोमती! तुम सब कितने दिन से ईहां आय रहो बताया तक नहीं? ठेकेदार ऊपरी सहानुभूति जताते हुए बोला।
क्या बताती ठेकेदार भाई, जब तुम दिहाडी देने में इतनी आनाकानी करते हो, तो मदद करोगे, भला कैसे जानती।
अरे, मदद...मदद..मदद। हम तव हर वक्त मदद देने को तैयार हैं, लेकिन तुम सब मदद लेने को जानो तो। ठेकेदार खींसें निपोरते हुए बोला।
गोमती ने ठेकेदार के इस दो अर्थ वाले प्रश्न का जवाब देना ठीक नहीं समझा। वह कमरे से बाहर चली गई।
ठेकेदार भी कमरे से निकल कर बाहर गोमती को ढूँढने लगा। उसके लिए यह सबसे बढिया अवसर था गोमती को लालच दे अपना शिकार बनाने का। लेकिन गोमती उससे अब बात भी करना नहीं चाहती थी।
चमेली ने जब सुना कि ठेकेदार अस्पताल भी गया था और गोमती से बात बेबात की बात बतियाने के लिए परेशान था, तब से चमेली गोमती को लेकर और सतर्क हो गई थी।
एक महीने के इलाज के बाद मौजीलाल की तबियत ठीक हो गई। उसे अस्पताल से छुट्टी मिल गई। वह जल्द से जल्द अपने परिवार के साथ रहना चाहता था। लेकिन डॉक्टर की हिदायत का पालन करना भी जरूरी था, परिवार से एकांत में रहने का। मौजीलाल को छूत की बीमारी होने का डर था।
रक्षाबँधन का दिन था। चमेली सुबह ही नहा-धोकर तैयार हो गई थी। उसका यहाँ कोई अपना सगा भाई तो नहीं था, लेकिन गाँव के एक मुँहबोले भाई को ही कई सालों से राखी बाँधते आ रही है। आज भी उसी भाई का उसे इंतजार है। इसी बहाने उसे भाई का प्यार मिल जाता है और भाई को बहन का आशीर्वाद।
मानवीय रिश्तों की गहराई की समझ उन्हें होती है जो उन रिश्तों की पवित्रता को बखूबी समझते हैं। देवयोगी ने गोमती को बहन बनाकर उसकी गहराई को समझा था।
सुबह के ग्यारह बजे होंगे कि पता लगाते-लगाते देवयोगी गोमती की खोली तक आ पहुँचा। गोमती खाना बना रही थी। उसने देवयोगी को अचानक आया देख, उसे अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हुआ। उसने देवयोगी का सच्चे हृदय से स्वागत किया और अपने छोटे भाइयों से परिचय कराया।
गोमती ने देवयोगी के स्वागत में गगरी का पानी और गाँव का गुड लाकर रख दिया और गुड खाकर पानी पीने के लिए कहा।
पानी के साथ ई गुड किस लिए? देवयोगी ने पूछा।
हमारे ओर खाली पानी केहू का नाहीं दिया जाता। खाली पानी देना बडा बुरा माना जाता है। गोमती ने अपनी संस्कृति से देवयोगी को परिचय दिया।
हाँ, बहुत अच्छा लगा। गुड बहुत स्वादिष्ट है।
तुम्हारा नाम भूल गया बहन!
भइया, मेरा नाम गोमती है।
अब लाओ रक्षा बाधो। देवयोगी ने हाथ बढाते हुए कहा।
क्यों नहीं भइया। आज रक्षाबंधन का दिन हव। छोटे भाइन का रक्षा बंधन बाध चुकी हव। अब बडे भाई का बांध देत हई। गोमती ने सहजता से अपनी बोली में देवयोगी के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की।
रक्षासूत्र बंधवाने के बाद देवयोगी जैसे ही वापस घर चलने को हुआ चमेली ने भोजन करके ही जाने का आग्रह किया। पहले तो देवयोगी समयाभाव का बहाना बनाकर जाने के लिए कहता रहा लेकिन जब माँ बेटी और मौजीलाल रोकने की हठ करने लगे, तो वह रुक गया।
गोमती ने बैजू काका के यहाँ से सब्जी का इंतजाम कर लिया था। बाजार से मिठाई चमेली ले आई थी। भोजन करने के बाद गोमती ने देवयोगी को खाने को दी।
इसकी क्या जरूरत थी बहन। गुड में जो मजा है वह मिठाई में कहाँ है। बाजार की बनी चीज से अच्छा घर का बना गुड होता है। देवयोगी ने मिठाई के दो टुकडे लिए और सकुचाते हुए मुँह में डाल लिया। कहीं गोमती, उसकी माँ और मौजीलाल को यह न लगे कि उसका गोमती से रिश्ता कोई दिखावे का है। वह तो सच्चे मायने में गोमती को अपनी धर्म-बहन समझता है।
देवयोगी जैसे ही चलने को हुआ चमेली का मुँहबोला भाई सामने दिखाई पडा। चमेली ने अपने मुँहबोले भाई से देवयोगी का परिचय कराया और यह बताया कि किस तरह उसकी मुसीबत में उसकी बिना स्वार्थ के मदद की थी, और गोमती को अपनी बहन बनाया। आज उसकी तरह ही भाई के रूप में रक्षाबंधन बधाने आया है।
चमेली के परिवार के बारे में सही जानकारी होते ही देवयोगी कहीं खो गया। किस तरह मजदूरों का जीवन होता है। आदमी परिस्थितियों के आगे किस तरह पीछे हाथ बाँधकर खडे होने के लिए मजबूर होता है। पढे-लिखे न होने के कारण शोषण-जुल्म के शिकार ऐसे न जाने कितने लोग होंगे? ऐसे न जाने कितने विचार उसके अंदर डूबते-उतराते रहे।
तभी गोमती ने टोका। भइया, अच्छा नहीं लग रहा है क्या बहन के यहाँ आकर?

नहीं गोमती बहन, अच्छा लग रहा है। सोच रहा हूँ,....
क्या सोच रहे हो भइया?
यही कि गरीब परिवारों के लिए आज के जमाने में कितनी समस्याएँ होती हैं, जीवन बसर करने में।
अभी दोनों बातें कर ही रहे थे कि सामने से ठेकेदार आता दिखाई दिया। देवयोगी को जैसे ही गोमती से बात करते देखा, वह जलभुन गया। यह कौन हो सकता है कहीं गोमती का संबंध......?
खोली में घुसने से पहले ठेकेदार ने मौजीलाल को पुकारा। मौजीलाल कुछ बोल पाता उसके पहले ही चमेली बोल पडी...
हाँ ठेकेदार आज रक्षाबंधन का दिन हिया कहाँ चल दिएउ रहेव?
बस अइसे आंटी, आजु छुट्टी रहन ना सोचा मौजीलाल को दूख आउँ। वइसे तो छुट्टी-उट्टी मिलेत नाहीं। ठेकेदार की आवाज में फितरत झलक रही थी।
अच्छा ई बताउ ठेकेदार एक महीना होई गयेन तुम्हार हीला-हवाली। का हम सबु माटी खाय के जियेब?
नहिं....जल्दी देइ देब तुम सबन का दिहाडी। परेशान मत होउ। ठेकेदार बात को संभालते हुए बोला।
ई के हेन? देवयोगी की ओर अंगुली से इशारा करते हुए ठेकेदार ने पूछा।
किसी ने कोई जवाब नहीं दिया। तब तक देवयोगी स्वयं बोल पडा।
क्या मेरा गाँव जानना चाहते हो या....।
हाँ बस आप को नया आदमी जानके सोचा कि.....।
मेरा नाम देवयोगी है। मैं राजस्थान का रहने वाला हूँ। और कुछ ?
इधर कैसे आना हुआ?
बस, रक्षाबंधन का दिन था, इस लिए बहन के यहाँ चला आया।
हूँ समझ गया।
कहीं दाल में कुछ काला तो नहीं। आखिर इतना हट्टा-कट्टा जवान, इन मजदूरों के यहाँ इसका क्या काम हो सकता है। जो खाय बिना मर रहा हो, उसके यहाँ तो..। ठेकेदार के मन में गोमती को लेकर अनेक तरह के गंदे विचार डूबने-उतराने लगे थे।
थोडी देर ठेकेदार चुपचाप इधर-उधर देखता रहा। चमेली से गोमती के बारे में पूछना चाहा, लेकिन कुछ सोचकर रुक गया। दूषित विचार और दुष्प्रवृत्तियों वाले लोगों में साहस की हमेशा कमी होती है। ठेकेदार जिस मंशा से आया था, देवयोगी को देखकर उसके ऊपर वज्रपात जैसा हुआ। वह अंदर से कमजोर होता जा रहा था।
गोमती इस दौरान दूसरी खोली में चली गई थी। ठेकेदार से दूर रहना ही उसके और परिवार के हित में था।
हूं आंटी, गोमती नाहीं देखत बाटे। कहीं दूर ऊर चली गई का?
ठेकेदार के सवाल का न तो चमेली ने कोई जवाब दिया और न तो मौजीलाल ने ही।
आप ने मेरा परिचय तो पूछ लिया लेकिन अपना परिचय तो नहीं दिया। देवयोगी ने मुस्कराते हुए कहा।
मेरा नाम विश्वास मिश्रा है। रेलवे में ठेकेदारी करता हूँ। यहाँ से दस किलोमीटर दूर उधर फरीदाबाद की तरफ रहता हूँ।
इतनी दूर आज रक्षाबँधन के दिन इधर कैसे आना हुआ?
खाली बैठा था सोचा चलूं घूम आऊं। ये लोग मेरे यहाँ दिहाडी मजदूरी करते हैं। पुरानी जान पहचान है। ठेकेदार की बातों में खिसियाहट साफ सुनाई पड रही थी।
देवयोगी और विश्वास मिश्रा अभी बातें कर ही रहे थे कि चमेली दौडती हुई मौजीलाल के पास पहुँची। मौजीलाल उल्टियाँ करने लगा था। जी घबरा रहा था। वह चमेली से हाथ जोडता तो कभी देवयोगी से। अब म....ऽ..ऽ नाहीं बचंगा...नहीं...जिव ओइडारे बा...लागत बा...सांसा निकलि जाये।’’
देवयोगी ने मौजीलाल को सँभाला और तुरंत उठाकर आटो..आटो चिल्लाता हुआ भागने लगा। जैसे मौजीलाल गोमती का नहीं उसका भी पिता है, जिसके प्रति उसका पुत्र जैसा लगाव कुछ ही दिन में हो गया था।
विश्वास मिश्रा ने भी मौजीलाल को संभालने में हाथ लगा दिया। लेकिन उसका मन तो गोमती से बतियाने में लगा हुआ था। देवयोगी और चमेली मौजीलाल को लेकर अस्पताल की ओर भागे। इधर विश्वास गोमती को ढूँढने लगा था।
कुछ ही देर में गोमती जब अपनी खोली में लौटी तो उसे यह सुनकर बहुत दुख हुआ कि उसके बाप की हालत बहुत खराब हो गई है जिसे लेकर मां और देवयोगी अस्पताल गए हैं।
ठेकेदार विश्वास मिश्रा खोली में चारपाई पर बैठा गोमती के भाइयों से उधर-उधर की बातों में लगा रहा। वह देवयोगी के बारे में सब कुछ जान लेना चाहता था। लेकिन बच्चों ने जब कुछ भी नहीं बताया तो वह उदास मन चारपाई पर लेट गया।
गोमती दोनों भाइयों को लेकर अस्पताल जाना चाहती है, लेकिन उसे अभी यह पता नहीं कि उसके बापू को कहाँ ले जाया गया है। उसने बगल वाले बैजू काका से पूछा तो पता चला उसी अस्पताल में गए हैं जहाँ कुत्ता काटने पर ले जाया गया था। उसने भाइयों को साथ लिया और अस्पताल की ओर चल पडी।
अरे गोमती, इतनी परेशान क्यों है? मैं हूं न, मेरे पास मोटर साइकिल है। चलो मेरे साथ बहुत जल्दी पहुँच जाएंगे।
नहीं ठेकेदार भइया। मैं चली जाऊंगी। तुम जाओ अपने घर। देवयोगी भाई हैं न। अब कोई चिंता करने की क्या पडी है।
ठेकेदार ने जैसे ही देवयोगी की मदद के बारे में सुना वह तुंरत गुस्सा हो गया। उसने गोमती से व्यंग्यात्मक लहजे में कहा-
गोमती, तुम हमपे विश्वास नहीं करती। अरे दो दिन से उस फौजी से मुलाकात क्या हो गई कि उसे अपना दिल ही दे बैठी।
ठेकेदार, तुमका इतनऊ पता नाहीं कि फौजी हमारा भाई है। तुम भले ही कुछ सोचते हो लेकिन हम सब का रिश्ता भाई-बहन का ही है। तुम अपने बारे में सोचो...हम अपना सोच लेंगे।
गोमती दोनों भाइयों को ले अस्पताल चली गई। ठेकेदार मिश्रा कुछ देर इधर-उधर सोचता रहा फिर बाइक उठायी और अस्पताल की ओर चल दिया। गोमती उसका शिकार है। वह अपने शिकार को किसी हालत में नहीं छोड सकता। उसकी मंशा में पल रहा दुर्विचार लगातार बढता ही जा रहा था।
काम का अंधा व्यक्ति कितना नीचे गिर सकता है उसकी कोई सीमा नहीं हो सकती। कमांध को अच्छा-बुरा भी दिखाई नहीं देता है। वह खून के रिश्तों को भी कलंकित करने में संकोच नहीं करता। अच्छा यह हो कि काम को जागने ही न दिया जाए।
ठेकेदार कामवासना की तृप्ति सालों से ऐसी ही न जाने कितनी गोमतियों को अपना हवस का शिकार बनाकर करता आ रहा था। उसे बस इतना ही पता है कि मजदूरों की लडकियों को केवल पैसा और अच्छे कपडे पहनने के लालच से उनके साथ कैसा भी बर्ताव किया जा सकता है। गरीब की जोरू गाँव भर की भौजाई, की कहावत से वह अनगिनत बार रूबरू हो चुका है।
गोमती अभी अस्पताल पहुँची नहीं होगी कि ठेकेदार बाइक लेकर अस्पताल पहुँच गया। आकस्मिक चिकित्सा कक्ष में पहुँचा और मौजीलाल के बारे में पता लगाने लगा। चमेली को गोमती कमरे के दरवाजे पर ही मिल गई। चमेली गोमती को देखकर रोने लगी। गोमती ने मां को ढांढस बंधाया और छोटे भाइयों को बापू के साथ रहने के लिए कहकर देवयोगी से बातें करने लगी। ठेकेदार अंदर ही अंदर सुलगने लगा। वह देवयोगी की तरफ अंगुलियों का इशारा करते हुए बोला-
फौजी भाई। आप नाहक में क्यों परेशान हैं। मैं हूँ न, जो भी मदद होगी करूँगा। यह तो अपने गैंग का मामला है।
ठेकेदार जी! मैं परेशान नहीं हूँ। मेरा यह परिवार है। परिवार की मदद करना कोई परेशानी की बात कैसे हो सकती है। आप अपने घर जाइए। मैं अपने कर्तव्य के बारे में जानता हूँ।
फौजी भाई! आप का रिश्ता कुछ महीने का है मेरा तो सालों से है। जब भी कोई समस्या आती है, मैं ही इनकी मदद करता हूँ। हमारा काम ही है, अपने गैंग की मदद करना।
अभी फौजी से अपनी बडाई में लगा ही था कि गोमती बोल उठी- ठेकेदार भाई, आप कितना मदद करते हैं और कैसे करते हैं, इसे न बताइए तभी अच्छा है। तुम ठहरे पैसे वाले और हम लोग हैं दिहाडी मजदूर। आज तक जरूरत पडने पर कभी एक पैसे की मदद तो की नहीं, यहाँ अपनी शेखी बघार रहे हो।
गोमती की स्पष्टवादिता ने ठेकेदार के दिल में आग लगा दी। वह गोमती की ओर इशारा करते हुए बोला-गोमती, तू ज्यादा मत बोलाकर। अपनी औकात तू जानत है। काम न देई तो खाय बिना मर जाओ, चली हो बडी-बडी बातें करने।
गोमती ने कहा, ठेकेदार भाई। ई समय, फालतू का बहस का नहीं है। बापू की हालत खराब है। तुम ईहा क्यों आय गयो हमन का सब मालूम है।
देवयोगी ने ठेकेदार की ओर मुखातिब होते हुए कहा, ठेकेदार भाई! आप जाओ। गोमती बहन को जो मदद होगी हम करेंगे। यहाँ बहस करने से कोई काम नहीं हल होगा।
ठेकेदार को गुस्सा आ गया। उसने देवयोगी को वहाँ से तुंरत चले जाने को कहा। देवयोगी ने ठेकेदार को फिर वहाँ से जाने को कहा। तब तक चमेली आ गई। उसने ठेकेदार से कहा, ठेकेदार! जाओ, तुम्हारे बाल-बच्चे तुम्हारा इंतजार कर रहे होंगे। कोई चिंता करने की बात नहीं है।
लेकिन ठेकेदार तो जैसे आज कुछ तय करके आया हो। गोमती से दूर रहना उसे बर्दास्त नहीं। उसकी जगह पर कोई और गोमती से हंसी-मजाक करे, वह तो एकदम बर्दास्त के बाहर।
जो आँख से अंधा होता है उसे वस्तुएँ दिखाई नहीं देती, लेकिन कामवासना के अंधे व्यक्ति को कुछ भी नहीं दिखता। ठेकेदार विश्वास मिश्रा की हालत कुछ ऐसी हो गई थी। चमेली के कई बार कहने पर भी जब ठेकेदार मिश्रा ने उसकी बात नहीं मानी तो गोमती ने एक बार फिर अस्पताल से जाने के लिए कहा।
गोमती, मैं तुम्हारे बापू की मदद करने आया हूँ। मेरी बात सुनो, फिर जैसा कहोगी वैसा करूँगा।
क्या बात करना है ठेकेदार भाई। जो कहना हो यहीं कहो। ऐसी कौन सी बात है जो ईहा कहने में दिक्कत है?
गोमती, कभी-कभी छोटी बातें भी सब के सामने नहीं कहते बनती। एक मिनट सुनो, ...मुझे भी टाइम नहीं है।
गोमती ठेकेदार के कहने पर उसकी बात सुनने बगल गलियारे में चली गई। पीछे-पीछे चमेली भी हो ली।
गोमती को गलियारे के एक खंभे की आड में ले जाकर ठेकेदार ने दवा के लिए पैसे उसके हाथ में रखना चाहा। गोमती ने उसे धन्यवाद करते हुए लौटा दिया। अब ठेकेदार विश्वास के मन में कामवासना की अविश्वास की तरंगें बहुत तीक्ष्ण हो चुकी थीं। वह गोमती के गदराए उरोज और पुट्ठों को जल्द ही हाथों से सहला देना चाहता था। उसने वैसा ही किया। गोमती चिल्लाई। चमेली भी आ गई। देवयोगी भी आ गया। लेकिन गोमती ने किसी से कुछ नहीं कहा। वह वहाँ से चुपचाप चली आई।
ठेकेदार घायल सर्प की तरह फुफकारने लगा था। वह जल्द से जल्द अपना विषैला दंत गोमती के शरीर में प्रवेश करना चाह रहा था। तब तक गोमती सँभल चुकी थी। वह विषैले सर्प के दाँत हमेशा के लिए तोड देना चाहती थी। आज जो दांत गोमती के शरीर में धँसने से रह गए थे, पता नहीं कब और किस गोमती के कोमल और विवश देह में चुभ जाएँ। उसने अस्पताल में रखी कैंची को उठाया और ठेकेदार के पेट में घोंप दिया।
ठेकेदार छटपटाता हुआ घायल सर्प की तरह जमीन पर लोटने लगा। पुलिस आ चुकी थी। देवयोगी तो साथ था ही। गोमती ने अपना करतूत सच-सच बयां कर दिया। मौजीलाल ने जब यह घटना सुनी तो उसके होश उड गए। अब उसके परिवार क कौन इस नये संकट से उबारेगा। वह चेतनाशून्य होने लगा।
डॉक्टर मौजीलाल को बचाने की जगह ठेकेदार को बचाने में लग गए थे।
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