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क्रश

संगीता माथुर
बाथरूम से पानी और रसोई से आती खटर-पटर की सम्मिलित ध्वनि से नेहा की नींद स्वतः ही खुल गई। इस घर में बतौर पेइंगगेस्ट यह उसका पाँचवाँ दिन था। इतने दिनों में उसे पूरी तरह समझ आ गया था कि यहाँ अलार्म लगाने की आवश्यकता नहीं है। यहाँ हर काम वक्त पर और सुव्यवस्थित तरीके से होता है। ज्यादा सोचने का वक्त नहीं था। तैयार होकर नेहा लॉबी में आई तो उसका दूध और टिफिन डाइनिंग टेबल पर तैयार रखा था। आंटी का टिफिन नदारद था। इसका मतलब वे पहले ही निकल चुकी हैं। नेहा ने चुपचाप दूध खत्म किया, टिफिन उठाया और खिसक ली।
टूव्हीलर पर ताजी हवा का झोंका आया तो नेहा ने ठंडी आह भरी। कहाँ फँस गई मैं? यहाँ तो आसमाँ से गिरे, खजूर में अटके वाली हालत है। इससे तो घर ही क्या बुरा था? नेहा की आँखों में अपने घर और इस घर के तुलनात्मक चित्र गड्डमड्ड होने लगे। बचपन से लेकर आज तक नेहा ने अपने डॉक्टर पिता को हमेशा मरीजों में उलझे ही देखा है। घर उनके लिए होटल की तरह था। जहाँ वे नहाने, धोने, खाने-पीने और सोने आते थे। माँ सामान्य गृहिणी होते हुए भी पापा से भी ज्यादा व्यस्त रहती थीं या रहने का दिखावा करती थीं। शहर की अधिकांश सभा सोसायटी की वे सक्रिय सदस्या थीं। नेहा को हमेशा ऐसा लगता था पापा मम्मी में एक मूक प्रतिस्पर्धा चलती रहती है- घर से ज्यादा से ज्यादा समय बाहर रहने की। बडी होती नेहा अक्सर सोचने लग जाती कि इसके पीछे क्या वजह हो सकती है? उससे और रमन भैया से दूर भागना तो वजह नहीं हो सकती क्योंकि दोनों ही अपने बच्चों से बहुत प्यार करते हैं। विशेषकर एक दूसरे की अनुपस्थिति में तो यह प्यार छलका पडता है। घर की जिम्मेदारियों से भागना भी वजह नहीं हो सकती क्योंकि अधिकांश कामकाज नौकरों के भरोसे चलता है जिन पर मम्मी की एकछत्र हुकूमत है। घर में किस अवसर पर किसे बुलाना है, क्या बनाना है, क्या मंगवाना है, किसे क्या देना है सब मम्मी ही निश्चित करती थी। पापा मूकदर्शक बने सहमति में गर्दन हिलाते रहते थे। इतने सब सोच-विचार के बाद नेहा को एक ही वजह समझ आती थी- दोनों का एक दूसरे से भागना। शादी न होने तक रमन भैया सब कुछ देखते सहते रहे। पर भाभी के आ जाने के बाद घर में पापा का दबा हुआ अस्तित्व उन्हें शर्मिंदगी का अहसास कराने लगा। उन्होंने सुदूर शहर में अपनी पोस्टिंग ले ली और भाभी को लेकर वहीं चले गए। भैया भाभी के चले जाने के बाद नेहा के लिए घर का वातावरण और भी दमघोंटू हो गया था। इसलिए जब उसे इस सुदूर शहर में नौकरी का प्रस्ताव मिला तो उसने सहर्ष स्वीकार कर लिया। मामूली दौडधूप के बाद ही उसे ऑफिस से कुछ दूरी पर बतौर पेइंग गेस्ट यह घर भी मिल गया। अंकल सेवानिवृत्त प्रिंसीपल थे और आंटी की अध्यापिका की नौकरी अभी बाकी थी। सवेरे अंकल ही दूध लाते, चाय बनाते, आंटी और उसका टिफिन तैयार करते, पौधों में पानी देते, बाई से काम करवाते, राशन का हिसाब किताब रखते। आंटी को तो इन पाँच दिनों में उसने हमेशा सजे संवरे मोबाइल पर बात करते ही देखा था। आंटी के ढेर सामाजिक संफ भी थे। घर में आने वाले अधिकांश फोन, डाक और आगंतुक उनके लिए ही होते थे। सीधे-सादे अंकल में नेहा को अपने पिता का अक्स नजर आने लगा था। पर मन उनके प्रति सहानुभूति नहीं खीज से भर उठता। कौन कहता है भारत में पितृसत्तात्मक समाज है और कि नारी अबला है? नेहा को स्वयं पर आश्चर्य होता नारी होते हुए भी उसका दिल इन सबसे दूर भागने को क्यों करता है?
ऑफिस पहुँचकर नेहा के मन में घुमडता विचारों का ज्वार तो थम गया पर मन अशांत ही बना रहा। ऑफिस का वातावरण भी उसे ज्यादा कुछ रास नहीं आ रहा था। महिला सहकर्मियों में एक बस प्रिया से ही उसकी दोस्ती हो पाई थी। बाकी तो काम के नाम पर गॉसिप या ऑफिस के फोन से अपने व्यक्तिगत काम निबटाने में लगी रहती थी। पुरुष सहकर्मियों की नजरों में वे उपहास का पात्र बन रही हैं इसकी भी उन्हें परवाह नहीं थी। पाँच दिन के कार्यकारी सप्ताह का आज आखिरी दिन था। अगले दो दिन तो चैन से गुजरेंगे, यह सोचकर नेहा उस रोज घर पर देर रात तक नेट पर लगी रही और सुबह आराम से उठने का ख्वाब संजोते सो गई।
पर सुबह फिर रसोई की खटपट और बाथरूम शॉवर की सम्मिलित उठा-पटक ने उसे जल्दी उठने पर मजबूर कर दिया। बाहर आने पर पता लगा आंटी के स्कूल की आज छुट्टी नहीं थी। वे जा चुकी थीं। उसका दूध टेबल पर रखा था और अंकल नाश्ता तैयार कर रहे थे। नेहा के माथे पर यह सोचकर ही बल पड गए कि उसे पूरा दिन घर पर अंकल के साथ गुजारना होगा। अंकल बडे उत्साह से दो प्लेट में नाश्ता सजाकर ले आए थे।
मैं यह अपने कमरे में ले जा सकती हूँ? नेहा झटके से उठ खडी हुई थी।
जैसा तुम ठीक समझो नेहा की बेरुखी अंकल की समझ से परे थी। नेहा प्लेट उठाकर कमरे में जाने लगी तो अंकल को कुछ खयाल आया, तुम लंच में क्या लोगी?
नेहा एक पल ठिठकी पर फिर तुरंत बोल पडी, मैं बाजार जा रही हूँ, वहीं कुछ खा लूंगी।
अरे वाह, मैं भी तो बाजार ही जा रहा हूँ। तुम चाहो तो मेरे साथ चल सकती हो’ अंकल का इशारा अपनी कार की ओर था।
नहीं नहीं, मेरी एक सहेली मुझे लेने आ रही है।
अब तक अपने प्रति नेहा की नापसंदगी अंकल कुछ कुछ भांप चुके थे इसलिए उन्होंने कुछ न बोलकर बात को वहीं विराम दे दिया।
कमरे में पहुँचकर नेहा ने फटाफट प्रिया को फोन कर साथ चलने के लिए तैयार किया। उसके हाँ करने पर वह इत्मीनान से तैयार होने लगी।
अंकल ने गाडी निकाली ही थी कि एक लडकी को अपना घर ढूँढते देख रुक गए। हो न हो यही नेहा की दोस्त होगी।
अंकल सोच ही रहे थे कि वह लडकी उनके पास आकर रुक गई।
अजीत सर आप?
अंकल के चेहरे पर न पहचानने के भाव देख वह आगे बोल पडी। मैं प्रिया! आर्या कॉलेज में सैकंड इयर में आपने मुझे मैथ्स पढाई थी।
ओह हाँ। हो सकता है। अब तो रिटायर्ड हो गया हूँ। शायद आप नेहा से मिलने आई हैं?
हाँ, आपको कैसे पता चला?
वो मेरी ही किराएदार है।
नेहा अब तक बाहर आ चुकी थी और सारा वार्त्तालाप भी सुन चुकी थी। अंकल और प्रिया की वार्त्ता आगे और किसी मोड तक पहुँचे इससे पूर्व ही वह प्रिया के पीछे जा बैठी। जल्दी चल, वैसे ही बहुत देर कर दी तूने।
प्रिया को मजबूरन वार्त्तालाप पर विराम लगाकर गाडी आगे बढानी पडी। अंकल ने भी निःश्वास छोडते हुए गाडी आगे बढा दी।
सर अभी भी कितने हैंडसम लगते हैं न? कॉलेज की सारी लडकियां क्रश रखती थीं सर पर।
तू भी? नेहा ने छेडा। पर प्रिया अप्रभावित बनी रही। मैं तो सबसे ज्यादा। सर थे ही इतने डेशिंग और स्मार्ट! आज भी देखो चालीस से एक साल ऊपर नहीं लगते। उनसे हुई मुलाकात के बारे में सोचकर मेरे तो अभी तक बदन में झुरझुरी हो रही है। जब वे पढाते थे तो हम लडकियाँ तो बस उनका चेहरा ही ताकती रहती थी। प्रिया की सोच की सुई अभी तक अजीत सर पर ही अटकी हुई थी। नेहा को मन ही मन स्वीकारना पडा कि सर का बाहरी व्यक्तित्व वाकई बेहद आकर्षक था। खुद वह भी पहली मुलाकात में उनसे खासी प्रभावित हुई थी। और यह जानकर आश्चर्यचकित भी रह गई थी कि वे एक रिटायर्ड शख्स हैं। लेकिन केवल बाहरी व्यक्तित्व आकर्षक होने से क्या होता है? आंतरिक व्यक्तित्व भी तो कोई चीज होती है। ऐसे दब्बू से व्यक्तित्व वाला इंसान, जो हर वक्त घर की साज संभाल में ही जुटा रहता है, बीवी के आगे चूं भी नहीं करता।.... ऐसा दबकर रहने वाला इंसान कैसे किसी के लिए आदर्श हो सकता है?
अच्छा, उनकी पत्नी कैसी हैं? बहुत सुंदर होगी न? प्रिया ने उत्सुकता से पूछा।
हाँ। एक स्कूल में टीचर है।
हाय, कितनी लकी हैं वो! प्रिया ने ठंडी आह भरी।
हाँ लकी तो हैं ही। तेरे अजीत सर हर वक्त उनकी हाजिरी में खडे जो रहते हैं। पता है, आंटी और मेरा सुबह का टिफिन वे ही तैयार करते हैं। नेहा ने हिकारत से कहा पर प्रिया ने इसे कॉम्प्लीमेंट के तौर पर लिया।
हाय हाय! काश मुझे भी ऐसा पति मिल जाए। यार पता कर न, सर के कोई उनके जैसा बेटा भी है क्या?
अब तू पिटेगी मुझसे। नेहा ने पीछे से धौल जमाई। अपना यह सर पुराण बंद कर और सामने देखकर गाडी चला।
प्रिया ने खिलखिलाते हुए स्कूटी की गति बढा दी थी।
नेहा जानबूझकर शाम देर से घर लौटी थी ताकि तब तक आंटी घर लौट आएँ। कल संडे है। अब कम से कम कल तो आराम से देर तक सो पाऊँगी- सोचते हुए दिन भर की थकी मांदी वह शीघ्र ही नींद के आगोश में समा गई थी।
पर सुबह फिर वही बाथरूम के पानी और रसोई की खटपट की आवाजों ने उसे उठा दिया था। उफ! इन बूढे-बूढी को छुट्टी के दिन भी चैन नहीं है। झल्लाती नेहा बाहर आने की सोच ही रही थी कि आंटी के स्वर ने उसे चौंका दिया। आंटी बडे प्यार से अंकल से कह रही थीं, हल्की ठंड शुरू हो गई है। अब आप यह सवेरे-सवेरे जॉगिंग पर जाना, लौटते ही नहाना, फिर पौधों को पानी देना बंद कर दीजिए, वरना बीमार पड जाएँगे। अब जवानी वाला कसरती बदन नहीं रहा है आपका।’
ओह, इसका मतलब आज रसोई में आंटी हैं और बाथरूम में अंकल थे। शिफ्ट चेंज हो गई?
लीजिए, सर की कॉफी तैयार है। अभी कुछ ही देर में आपका मनपसंद सूजी का हलवा आपकी खिदमत में पेश हो रहा है। फिर लंच में आपकी पसंद के कोफ्ते बनेंगे। तब तक आप आराम से टीवी देखिए। आंटी का उत्साहित मस्ती में डूबा स्वर था।
टीवी की आवाज में रसोई की खटर-पटर दबने लगी तब तक नेहा फ्रेश होकर बाहर आ गई।
अरे तुम आज छुट्टी के दिन भी जल्दी उठ गई? अच्छा चाय लोगी या सीधे दूध ही? हलवा भी लगभग तैयार है। दूसरी गैस पर कोफ्ते के आलू उबलने रख देती ह।
आज बाई नहीं आ रही क्या? नेहा पूछ बैठी।
आएगी। वो तो छुट्टी के दिन मुझे ही तुम्हारे अंकल की पसंद का कुछ-न-कुछ बनाना अच्छा लगता है इसलिए यह सब....
नेहा अपना दूध तैयार करने लगी। तब तक आंटी 3 तश्तरियों में हलवा सजाकर बाहर ले आईं। तीनों टीवी देखते हलवा खाने लगे। टीवी पर नजरें गडाए अंकल यकायक खुशी से चिल्ला उठे, अरे वाह अंगूर आ रही है। नन्दा, तुम्हारे फेवरेट संजीव कुमार की मूवी आ रही है। अब तुम कोफ्ते-वोफ्ते छोडो। यहीं मेरे पास बैठकर मूवी देखो।
पर मैंने आलू उबाल दिए हैं।
कोई बात नहीं। चंदा बाई को बोलो लंच में उनके परांठे सेक दे। दही अचार के साथ खा लेंगे। नेहा, तुम भी खा लोगी न?
अंकल ने अचानक पूछा तो नेहा अचकचा गई। हं...हाँ अंकल बिल्कुल! आंटी मुझे जरा काम है, मैं अपने कमरे में जाती हूँ।
अरे तुम भी देखो न मूवी? आंटी ने रोकना चाहा।
हाँ बहुत मनोरंजक है देखो, अंकल ने कहा।
मैंने देख रखी है। फिर बहुत काम पेंडिंग रखा है। कहते हुए नेहा अपने कमरे में खिसक ली। आज उसे घर की बहुत याद आ रही थी। पापा मम्मी तो छुट्टी के दिन भी इस तरह साथ-साथ प्यार से नहीं रहते। पापा जानबूझकर लेपटॉप पर उलझे रहते हैं तो मम्मी टीवी चलाकर मोबाइल पर बतियाती रहती हैं। दोनों का एक दूसरे के प्रति उदासीन रवैया घर का वातावरण कितना बोझिल बना देता था।
बैठक से आते मिलेजुले हँसी के स्वर बता रहे थे कि मूवी आरंभ हो चुकी है और दोनों उसका पूरा रस ले रहे हैं। शाम को दोनों अपने दोस्तों रिश्तेदारों से मिलने निकल गए थे। और तभी प्रिया उससे मिलने आ पहुँची थी। इधर-उधर तांक झांक करने के बाद आखिर उसने पूछ ही लिया था, अजीत सर घर पर नहीं दिखते हैं?
बाहर गए हुए हैं। तो तू अपने क्रश से मिलने आई है? मौका देखकर नेहा ने चौका जड दिया।
क्या बात कर रही है तू? मैं तो तुझसे मिलने आई हूँ। प्रिया झेंप गई थी।
या उनके बेटे के बारे में पता करने आई है? नेहा टांग खिंचाई से बाज नहीं आ रही थी।
क्या यार, मजाक नहीं समझती क्या? प्रिया रोआंसी होने लगी।
अरे पगली, मैं भी तो मजाक ही कर रही थी। अच्छा सच सच बता क्या वाकई तू चाहती है कि तेरा पति तुझसे दबने वाला, तेरे आगे-पीछे घूमने वाला हो?
हाँ, तो इसमें गलत क्या है? हमेशा से ही मैंने घर में दादा की, पापा की और अब तो भैया की भी सत्ता चलते देख रही हूँ।
तो बेसिकली तू उन सब की खुन्नस अपने होने वाले पति पर निकालना चाहती है?
ऊँ नहीं.... अच्छा मेरी छोड, तू अपनी बता। तू कैसा पति चाहती है?
मैं चाहती हूँ वो दबंग हो, पत्नी से दबे नहीं, नजरें न चुराए... नेहा बोलते-बोलते रुक गई। वह भी तो वही कर रही है जिसके लिए उसने अभी अभी प्रिया को टोका था। तो क्या वे दोनों ही गलत हैं या दोनों ही सही हैं?
प्रिया के चले जाने के बाद देर रात तक भी यही प्रश्न नेहा के दिमाग में घूमता रहा। अगले दिन आंटी को फिर रसोई में लगा देख नेहा चौंक उठी।
अजीत को वायरल हो गया है इसलिए मैंने 2-3 दिन की छुट्टी ले ली है। तुम्हारे लिए परांठे सेक दिए हैं, पैक कर लेना। मैं अजीत को दूध दलिया खिलाने जा रही हूँ।
रवाना होते वक्त नेहा बेडरूम तक कहने गई तो देखा अंकल अखबार पढ रहे थे और आंटी चम्मच भर-भरकर उन्हें दूध दलिया खिला रही थी।
यहाँ तो रोज ही सीन बदल जाता है। दुविधा की सी स्थिति में नेहा ऑफिस चली गई। अगले दिन सुबह भी यही सीन था। पर शाम को नेहा लौटी तो सीन थोडा बदल गया था।
अंकल चाय बना रहे थे तो आंटी मशीन में कपडे धो रही थीं। अंकल की तबियत ठीक हो गई लगती है। अपने कमरे में जाते नेहा बोल पडी।
हाँ, पर मैं कोई खतरा मोल लेना नहीं चाहती। इसलिए सारे कपडे आज ही धोकर सुखाने डाल रही ह। ताकि मेरी गैर मौजूदगी में ये ठंडे पानी में हाथ न डालें।
नेहा अपने कमरे में चली गई थी पर अंकल-आंटी में चल रहे वार्त्तालाप के स्वर अब भी मंद आवाज में उसके कानों में पहुँच रहे थे। कल से सवेरे की जॉगिंग और पौधों में पानी देना भी बंद। अरे आप मान क्यों नहीं लेते कि हम अब बूढे होने लगे हैं।
यदि मन जवां है, तो तन हमेशा जवां ही रहता है। वो तो तुम्हारे साथ अच्छा वक्त बिताए काफी समय हो गया था इसलिए मैंने कहा चलो थोडा बीमार हो जाते हैं।
आगे से साथ वक्त बिताने का मन हो तो साफ ही बोल देना। मैं ऐसे ही छुट्टी लेकर घर रह लूँगी। पर प्लीज, बीमार मत होना। मुझसे तुम्हारी वैसी हालत देखी नहीं जाती। नेहा को लगा आंटी शायद भावुक हो उठी हैं। फिर नेहा को अंकल की रसोई से बाहर आती पदचाप सुनाई दी। हल्की सिसकियाँ और समझाइश के धीमे-धीमे स्वरों से नेहा ने बाहर के दृश्य की सहज ही कल्पना कर ली। उसके होठों की मुस्कराहट गहरी हो गई। अपने और प्रिया के पूर्वग्रहग्रस्त मन में समाई भावी पति की सोच पर उसे हँसी आ गई। कितनी बेवकूफ थीं हम दोनों! पति पत्नी के सहज दोस्ती भरे रिश्ते को भी सत्ता और अहं के तराजू में तौल रही थीं। इतना भी नहीं समझ पाई कि इस प्यारे से रिश्ते में न कोई छोटा होता है और न कोई बडा। गहन प्यार और आत्मीयता के वशीभूत इस रिश्ते में इंसान छोटा कहलाने में भी संकोच महसूस नहीं करता। और अपने इस प्रयास में वह सामने वाले की नजर में और भी बडा बन जाता है।
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सम्पर्क : बी-11, स्टाफ कॉलोनी,
राजस्थान तकनीकी विश्वविद्यालय
कोटा (राजस्थान)
मोबाइल- 9461515760