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गाँधी की सामाजिक दृष्टि और श्रम विचार

शंभु जोशी
सत्य और अहिंसा ही महात्मा गाँधी के सम्पूर्ण चिंतन एवं कर्म का केंद्र बिंदु है। ईश्वर सत्य है 1 से सत्य ईश्वर है की उनकी यात्रा दार्शनिक आधार लिए हुए है। लेकिन सत्य की कोई एक निश्चित और एकायामी धारणा स्वीकार नहीं की जा सकती है क्योंकि विभिन्न धर्मों एवं दर्शनों में सत्य को जानने, उसकी प्रक्रिया, अभिव्यक्ति में कई भिन्नताएँ हैं। गाँधीजी इसी विचार को स्पष्ट करते हुए सत्य के अनन्त रूपों को स्वीकार करते हैं और मानते हैं कि निरपेक्ष सत्य को जानना मनुष्य के वश की बात नहीं है। अतः मनुष्य के लिए यह आवश्यक है और यह कर्त्तव्य भी है कि सत्य -जैसा उसे दिखाई दे, उसका अनुगमन करें एवं ऐसा करते हुए अहिंसा को अपनाएँ-
निरपेक्ष सत्य को जानना मनुष्य के वश की बात नहीं है। उसका कर्तव्य है कि सत्य- जैसा उसे दिखाई दे, उसका अनुगमन करे और ऐसा करते समय शुद्धतम साधन अर्थात् अहिंसा को अपनाए।2
अहिंसा के माध्य्म से ही हम सत्य के विभिन्न रूपों के अस्तित्व को स्वीकार कर सकते हैं और विभिन्नताओं के बावजूद जीवन संचालित कर सकते हैं। साध्य एवं साधन के एकत्व के कारण सत्य का आग्रह एक प्रकार से अहिंसा का ही आग्रह हो जाता है। अहिंसा की इस अनुभूति का आधार अस्तित्व मात्र के एकत्व का विचार है। इस अहिंसा दृष्टि का सार मम तथा ममेतर/स्व और पर के बीच प्रेमपूर्ण एवं सृजनात्मक संबंधों में निहित है। इस ममेतर/पर में केवल मनुष्य ही नहीं अपितु सम्पूर्ण सृष्टि शामिल है। इस अहिंसा दृष्टि का व्यावहारिक आधार व्यक्ति द्वारा न केवल अन्य व्यक्ति अपितु सम्पूर्ण सृष्टि के साथ प्रेमपूर्ण संबंध स्थापित करना है। वस्तुतः गाँधीजी के जीवन का सार अहिंसा पर आधारित एक मानवीय सभ्यता का निर्माण करना है। 1931 में लंदन में भारतीय विद्यार्थियों की सभा में गाँधीजी द्वारा कहा गया निम्नलिखित कथन उनके समस्त विचारों को समझने का प्रस्थान बिंदु है-
मुझे अपने देशवासियों की पीडाओं के निवारण से ज्यादा चिंता मानव-प्रकृति के बर्बरीकरण को रोकने की है।3
उपर्युक्त दार्शनिक प्रस्थापनाएँ ही गाँधीजी के समस्त चिंतन का विन्यास करती हैं। उनके लिए सत्य अहिंसा के रूप में अभिव्यक्त होता है । अतः उनके अनुसार एक आदर्श समाज-व्यवस्था और उसके प्रत्येक सदस्य के आचरण की कसौटी अपने सूक्ष्म एवं सकारात्मक अर्थों में अहिंसा हो जाती है। गाँधीजी एक ऐसी समाज व्यवस्था की कल्पना करते हैं जिसमें सत्ता के किसी भी रूप का केंद्रीकरण न हो क्योंकि यह हिंसक मनोवृत्ति है। उनकी समाज व्यवस्था में आदर्श इकाई स्वावलंबी मनुष्यं व आत्मनिर्भर गाँव हैं।4
एक अहिंसक व्यक्ति के निर्माण के लिए वह एकादश व्रतों की धारणा प्रस्तुत करते हैं। इन एकादश व्रतों को निम्नानुसार बताया जा सकता है-
1. सत्य
2. अहिंसा
3. ब्रह्मचर्य
4. अस्तेय
5. अपरिग्रह
6. शरीर-श्रम
7. अस्वाद
8. अभय
9. सर्वधर्म समत्व
10. स्वदेशी
11. स्पर्शभावना
ये व्रत व्यक्तिगत गुण ही नहीं बल्कि सामाजिक गुण भी हैं। इनका जीवन में प्रयोग न केवल व्यक्तिगत रूपान्तरण का अपितु सामाजिक रूपान्तरण का भी माध्यम बन सकता है। स्वयं गाँधीजी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि इनमें से किसी भी एक व्रत का स्वीकार स्वमेव अन्य व्रतों को समाहित करता है। अहिंसा का उनका आग्रह उन्हें न केवल एक अहिंसक व्यक्तित्व बनाता है अपितु अहिंसा को सामाजिक क्षेत्र में लागू करने को भी प्रेरित करता है।
एक स्वावलम्बी व्यक्तित्वऔर स्वतंत्रता एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से आबद्ध हैं। एक अहिंसक व्यक्तित्व का अर्थ ही स्वतंत्र होना है। गाँधीजी के लिए तो स्वतंत्रता जन्म के समान 5 आधारभूत है, मनुष्य को व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित कर किसी प्रकार की समाज रचना नहीं की जा सकती।6 अतः स्वतंत्रता की उपेक्षा नहीं की जा सकती है। परंतु यह स्वतंत्रता अमर्यादित है या उसकी कोई सीमा है? गाँधीजी ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता एवं सामाजिकता को संयोजित करते हुए लिखा कि-
मैं व्यक्तिगत स्वतंत्रता को मूल्यवान समझता हूँ, पर आपको यह नहीं भूलना चाहिए कि मनुष्य बुनियादी तौर पर एक सामाजिक प्राणी है। अपने व्यक्तिवाद को सामाजिक प्रगति की अपेक्षाओं के साथ समायोजित करके ही वह इतनी उन्नति कर सका है। अप्रतिबंधित व्यक्तिवाद तो जंगल के पशु का नियम है । हमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक संयम के बीच एक मध्यमार्ग की खोज करनी होगी। समूचे समाज की भलाई के लिए स्वेच्छापूर्वक सामाजिक संयम को स्वीकार करने से व्यक्ति और समाज, जिसका वह सदस्य है, दोनों की संवृद्धि होती है।7
इस उद्धरण के अनुसार एक अहिंसक समाज हेतु व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिकता के बीच मध्यम मार्ग की खोज की जानी है। यह मध्यम मार्ग व्यक्ति के अहं के विसर्जन और सामाजिकता के स्वीकार से प्राप्त किया जा सकता है। इस मध्यम मार्ग की प्राप्ति यानी व्यक्तिगत अहं विसर्जन एवं सामाजिकता के स्वीकार में श्रम की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हो जाती है।
प्रसिद्ध विचारक ई.एफ. शुमाकर ने बौद्ध अर्थशास्त्र पर विचार करते हुए श्रम के तीन प्रयोजन बताए-
1. मनुष्य को अपनी क्षमताओं का उपयोग करने व
उनको विकसित करने का अवसर मिलना चाहिए।
2. उसे अन्य लोगों के साथ काम करके अपनी अहं
भावना पर काबू पाने में मदद मिले।
3. वह सुंदर जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओं व
सेवाओं को बना सके।
इस उद्धरण से यह स्पष्ट है कि व्यक्ति एवं समाज के बीच एक सुदृढ आधार श्रम को केंद्र में रखकर स्थापित किया जा सकता है। श्रममूलक संस्कृति स्वावलंबी व्यक्ति एवं तदनन्तर एक स्वावलंबी समाज को प्रकट करती है। हम सभी जानते हैं कि श्रम मनुष्य जीवन का सार है। इसी के आधार पर हम अपनी भौतिक एवं आध्यात्मिक (एकत्व की साधना के संदर्भ में) आवश्यकताएँ पूरी करते हैं। ऐसा करते हुए एक सृजनात्मक कर्म हमारे व्यक्तित्व का निर्माण कर हमें उदात्त जीवन-मूल्यों की ओर ले जाता है। मनोविश्लेषकों के अनुसार श्रम एक व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया हो जाती है। आर्थिक प्रक्रिया से आगे बढकर श्रम नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों का निर्धारक बन जाता है। श्रम अपने विकास और इसी विकास के जरिए समाज के नैतिक विकास की भी प्रक्रिया बन जाता है । इस पूरी विकास प्रक्रिया में श्रम मनुष्य तथा अन्यों (प्रकृति) के बीच एकत्व की साधना हो जाता है। अपने स्वार्थ से उठकर लोक कल्याण में रत हो जाता है। यही श्रम की सामाजिक प्रासंगिकता है जिसे गाँधीजी अहिंसक व्यक्तित्व के निर्माण में शरीर-श्रम के जरिए अभिव्यक्त करते हैं।
जैसा कि पूर्व में स्पष्ट किया गया है कि श्रम समाज के निर्माण की आधारशिला है। अतः एक श्रमशील समाज ही मानवीय समाज कहला सकता है। श्रम ने ही समाज के सामाजिक पक्ष को बनाए रखा है। प्रसिद्ध माक्र्सवादी इतिहासकार एरिक हॉब्सबॉम ने श्रम की इसी भूमिका को इंगित करते हुए लिखा कि- परिवार अथवा श्रम का महत्त्व ऐसे ही ऊर्जावान कारक थे जिन्होंने न केवल मानव-समाजों को एकजुट रखा था बल्कि अर्थव्यवस्था को कार्य-सक्षम भी बनाए रखा था।
पुनः शुमाकर का उल्लेख इस संदर्भ में महत्त्वपूर्ण हो जाता है जहाँ वह एक श्रमदर्शन का विकास करने की बात करते हैं और उसे समाज की सच्ची आधारशिला बताते हैं-
आज सर्वाधिक आवश्यकता ऐसे वांछनीय श्रम-दर्शन का विकास करने की है। श्रम ऐसा कुछ अमानवीय कार्य नहीं है जिसे मशीनों से पूरा किया जा सके। श्रम को मनुष्य की देह और आत्मा का कल्याण करने वाले कृत्य के रूप में प्रतिष्ठित किया जाना चाहिए। परिवार के बाद श्रम और उसके द्वारा बने संबंध ही समाज की सच्ची आधारशिला हैं। अगर आधारशिला ही कमजोर हो तो उसके ऊपर सुदृढ समाज का निर्माण कैसे किया जा सकेगा? और अगर समाज रुग्ण हो तो यह कैसे संभव है कि वह शांति के लिए खतरा न बने।
उपर्युक्त दोनों ही उद्धरणों से स्पष्ट हो जाता है कि श्रम सामाजिकता की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण आधारशिला है। न केवल श्रम अपितु उससे बनने वाले संबंध- यानी सामाजिकता का बोध- भी स्वस्थ एवं सुदृढ (जिसमें नैतिक विकास भी शामिल है) सामाजिक विकास के लिए महत्त्वपूर्ण है। गाँधीजी के विचारों में शरीर-श्रम इसी सामाजिकता का पर्याय है। डॉ. राममनोहर लोहिया को पत्र का जवाब देते हुए उन्होंने इसी ओर संकेत करते हुए लिखा कि-
अहिंसा के विषय में अपने प्रयोगों से मुझे पता चला है कि व्यावहारिक अहिंसा का मतलब है सबके साथ मिलकर शारीरिक श्रम करना। रूसी दार्शनिक बोंडारेफ ने इसे जीविकाश्रम का नाम दिया। इसका मतलब है आत्यन्तिक सहयोग।
इस शारीरिक श्रम और आत्यन्तिक सहयोग को व्यावहारिकता से जोडकर, उसे दैनंदिन जीवन से जोडते हुए कहते हैं-
सत्य और अहिंसा के विषय में चौंतीस साल के सतत अनुभव और प्रयोग ने मुझे कायल कर दिया है कि अहिंसा तभी तक निभ सकती है जब तक कि वह सजग शारीरिक श्रम से सम्बद्ध हो और अपने पडोसियों के साथ हमारे रोजाना व्यवहार में व्यस्त हो।12
गाँधीजी ने श्रम के इस महत्त्वपूर्ण पक्ष को ध्यान में रखकर समाज की पुनर्रचना में और एक आदर्श समाज की संकल्पना में शरीर-श्रम को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया जो पहले एक स्वावलंबी व्यक्ति का और तदनन्तर स्वावलंबी एवं स्वस्थ समाज का निर्माण करता है। इस पूरी प्रक्रिया में श्रम द्वारा नैतिक, भौतिक एवं आध्यात्मिक (सामुदायिक भाव) विकास अन्तर्निहित है इसलिए वह शरीर-श्रम को समाज-सेवा का सर्वोत्तम रूप मानते हैं।13
उन्होंने जीवन के विभिन्न आयामों- सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, शिक्षा इत्यादि में कोई अलगाव नहीं देखा। व्यक्ति और समाज की सम्पन्नता एवं सर्वांगीण विकास हेतु मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं का निर्धारण कर उसकी पूर्ति हेतु उत्पादक श्रम की अनिवार्यता का विश्लेषण किया। सभी के लिए बुनियादी जरूरतों की पूर्ति की संकल्पना, शरीर-श्रम, श्रम की पवित्रता, स्वावलंबन एवं परस्पर सहयोग, कृषि एवं कृषि आधारित उद्योगों, हस्तशिल्प एवं कला आधारित अर्थव्यवस्था तथा इन पर आधारित शिक्षा आदि को आधार बनाकर ऐसी समाज व्यवस्था और सामूहिक जीवन पद्धति को प्रस्तुत किया जिसमें व्यक्ति एवं समाज का कल्याण एवं सर्वांगीण विकास हो सके।
प्रो. बी. एन. गाँगुली ने गाँधीज सोशल फिलॉसफी में उनके सामाजिक दर्शन के महत्त्वपूर्ण तत्त्वों को निम्नानुसार बताया है-
1. गाँधी ने एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था के लिए
कार्य किया जो वृहद् उत्पादन (मास
प्रोडक्शन) और वृहद् उपभोग (मास कन्जेम्शन)
पर आधारित समाज में व्यक्ति के दारुणिक
अकेलेपन और निशःक्तता को दूर करने में समर्थ
हो सके।
2. मानव प्रकृति में विद्यमान सृजनात्मक श्रम के
गैर-सर्वहारा रूपों को सामने लाना चाहते थे।
इसका व्यावहारिक रूप विकेन्द्रित उत्पादन और
उपभोग के साथ विकेन्द्रित समुदायों पर आधारित
समाज की पुनर्रचना था।
3. एक व्यक्ति की शक्ति उसके व्यक्तित्व और जीवन
व्यतीत करने के औचित्य के अधिकतम संयोजन
पर निर्भर करती है, अतः इस पर आधारित
आत्मज्ञान ही सामाजिक पुनर्रचना का सार है।
गाँधी के अनुसार आधुनिक सभ्यता द्वारा उत्पन्न
किए गए छद्म-आत्म (स्यूडो-सेल्फ) की बुराई
से लडने का यही साधन है।
4. गाँधी समग्र व्यक्तित्व की स्वतःस्फूर्त और
औचित्यपूर्ण गतिविधियों में विश्वास करते हैं
ताकि तर्क और प्रकृति के बीच द्वंद्व समाप्त
किया जा सके।
5. गाँधी के सामाजिक दर्शन का आधार यह विचार
है कि स्वराज के रूप में सकारात्मक स्वतंत्रता
का अर्थ है व्यक्ति की विशिष्टता को स्वीकार
किया जाना। सभी व्यक्ति अलग परंतु जन्मना
समान हैं।
6. व्यक्ति की सुरक्षा किसी उच्च सत्ता द्वारा प्राप्त
नहीं की जानी चाहिए बल्कि यह स्वतःस्फूर्त
गतिविधि का परिणाम होनी चाहिए, यह स्वतंत्रता
के वर्तमान भ्रम से अलग अपने सच्चे अर्थों में
उसका परिणाम होनी चाहिए। सुरक्षा अपने
समुदायों के सदस्यों के प्रति संलग्नता भाव में
निहित होनी चाहिए।
7. स्वतःस्फूर्त गतिविधि का अर्थ अराजकता नहीं
है। विध्वंस और सत्ता की लालसा व उसके प्रति
समर्पण अकेलेपन और लोगों द्वारा अपनी
अस्मिता प्राप्ति की व्यर्थता का परिणाम है।
8. गाँधी इस बात में विश्वास नहीं करते हैं कि
भौतिक प्रचुरता एक गैर-सत्तावादी समाज (नॉन-
अथॉरिटेरियन सोसायटी) की स्थापना और मनुष्य
का अलगाव समाप्त कर सकती है। गाँधी श्रम,
संपदा और आनंद के ऐसे दर्शन की कल्पना
रखते हैं जिसमें पूर्व और पश्चिम दोनों ही दर्शनों
का सामंजस्य है।
प्रो. गाँगुली गाँधी दर्शन के सामाजिक आयाम को काफी व्यापकता के साथ प्रस्तुत करते हैं। जीवन की अविभाज्यता के कारण इसमें आर्थिक, राजनीतिक आदि आयाम स्वतः ही शामिल हो जाते हैं । इसीलिए गाँधीजी जब स्वराज की परिभाषा करते हैं तो लोकतंत्र में उन वयस्क मतदाताओं को शामिल करने का प्रस्ताव करते हैं जिन्होंने अनिवार्य रूप से शारीरिक श्रम किया हो।15
गाँधीजी ने अपने तात्कालिकसमाज में तीन महत्त्वपूर्ण सामाजिक भेदों को देखा जिसका उन्होंने आजीवन विरोध किया। वे हैं-
1. जाति व्यवस्था
2. मानसिक व शारीरिक श्रम का भेद
3. ग्रामीण-शहरी का भेद
गाँधीजी का उद्देश्य एक अहिंसक समाज का विकास था। अतएव उन्होंने हर उस प्रथा का, विशेषाधिकार, एकाधिकार का विरोध किया जो किसी भी शोषण, दमन, हिंसा, उत्पीडन पर आधारित हो।16 वह जाति प्रथा को तीनों आधारों17 पर चुनौती देते हैं, वे हैं-
1. विवाह
2. खान-पान
3. उच्चावच ऋम
वह इन तीनों में से किसी को भी स्वीकार नहीं करते और इन प्रतिबंधों को समाज के लिए अनावश्यक एवं हानिकर मानते हैं। 1931 में वह लिखते हैं-
अंतर्जातीय विवाहों तथा अंतर्जातीय भोजों को लेकर अनावश्यक और हानिकर प्रतिबंध लगा दिए गए। विभिन्न वर्णों के लोग परस्पर विवाह कर सकते हैं और एक-दूसरे के साथ बैठकर भोजन कर सकते हैं। ये प्रतिबंध शुद्धता और सफाई के हित में आवश्यक हो सकते हैं, पर यदि कोई ब्राह्मण लडका शूद्र लडकी से विवाह करता है या शूद्र लडका ब्राह्मण लडकी से विवाह करता है तो इससे वर्ण के नियम का कोई उल्लंघन नहीं होता।
जहाँ तक उच्चावच क्रम का प्रश्न है वे इस पिरामिडीय व्यवस्था को अस्वीकार करते हैं और एक सागरीय वलय की कल्पना करते हैं जिसमें सभी मनुष्य समान हैं। वह स्पष्ट करते हैं-
छुआछूत हिंदू समाज में आ घुसे ऊँच-नीच के भेद का परिणाम है और इसे नष्ट कर रहा है। इसलिए अस्पृश्यता पर आक्रमण वास्तव में इस ऊँच-नीचवाद पर आक्रमण है। जिस क्षण छुआछूत का उन्मूलन हो जाएगा, सच्चे वर्णधर्म की स्थापना हो जाएगी- समाज के चार भाग जो परस्पर पूरक होंगे जिनमें कोई किसी से श्रेष्ठ अथवा हीन नहीं होगा।19
इस सामाजिक भेद का वह धर्मशास्त्रीय आधारों पर भी विरोध करते हैं। गाँधीजी सत्य और अहिंसा को आधार बनाकर तर्क या नैतिक दृष्टि के प्रतिकूल किसी भी धर्मग्रंथ की व्याख्या को अस्वीकार करने में झिझकते नहीं हैं-
हिंदू धर्मग्रंथों में मेरे विश्वास का तात्पर्य यह नहीं है कि मैं उनके एक-एक शब्द और श्लोक को दैवी प्रेरणा से उद्भूत मानता हूँ। मैं ऐसी किसी भी व्याख्या को मानने से इंकार करता हूँ जो तर्क या नैतिक दृष्टि के प्रतिकूल हो, भले ही यह व्याख्या कितनी ही विद्वत्तापूर्ण क्यों न हो। 20
मैं अक्षरचारी नहीं हूँ। इसीलिए मैं दुनिया के विभिन्न धर्मग्रंथों की भावना को समझने का प्रयास करता हूँ। धर्मग्रंथों की व्याख्या करते समय मैं स्वयं उन्हीं के द्वारा निर्धारित सत्य और अहिंसा की कसौटी को लागू करता हूँ। इस कसौटी पर जो खरे नहीं उतरते, उन्हें अस्वीकार कर देता हूँ और जो खरे उतरते हैं, उनको अपना लेता हूँ। 21
अतः यह स्पष्ट है कि वह धर्मशास्त्रीय आधारों पर भी छुआछूत और जाति व्यवस्था को अस्वीकार करते हैं। एक अन्य तथ्य द्रष्टव्य है कि समाज में दृश्यमान छुआछूत को सफाई पेशा से जोडकर देखा जाता है। गाँधीजी इस निम्न समझे जाने वाले कार्य और इसे करने वाले समाज को सम्मान प्रदान करते हैं। इस सम्मान का उद्देश्य श्रमशील समाज का सम्मान है। वह सभी को इस सफाई कार्य में अनिवार्य रूप से भागीदार बनाकर न केवल इस समाज के प्रति अपितु समस्त श्रमशील समाज के प्रति संवेदनशील बनाना चाहते हैं -
प्रत्येक व्यक्ति को अपनी सफाई का काम खुद ही करना चाहिए। भोजन जितना आवश्यक है उतना ही मलोत्सर्ग भी है, और सर्वोत्तम यही है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी सफाई खुद करे। यदि यह असंभव हो तो प्रत्येक परिवार को तो अपनी सफाई का जिम्मा खुद लेना ही चाहिए। मैंने बरसों से यह महसूस किया है कि समाज के एक खास वर्ग को सफाई का जिम्मा देकर कहीं भारी गलती की गई है। इतिहास में उस आदमी का कोई उल्लेख नहीं मिलता जिसने सबसे पहले इस अनिवार्य सफाई-सेवा को निम्नतम दर्जा दिया । वह जो भी रहा हो, उसने हमारे साथ किसी अर्थ में भलाई नहीं की।
बचपन से ही हमारे मन में यह बात बैठा दी जानी चाहिए कि हम सब सफाईपेशा हैं, और इसका सबसे आसान उपाय यह है कि हम सब रोटी कमाने के लिए सफाई का काम हाथ में लें। इस प्रकार अगर सफाई का काम बुद्धिमानी से हाथ में लिया जाए तो इंसान-इंसान की बराबरी को सच्चे रूप में समझने में बडी मदद मिलेगी।22
अपने सम्पूर्ण जीवन में उन्होंने इस नियम का पालन किया और एक सार्वजनिक आचार-व्यवहार के रूप में लागू करने का प्रयास किया। इसका महत्त्व, चाहे प्रतीकात्मक ही रहा हो, असंदिग्ध है। पुनः यह स्मरणीय है कि वंचित वर्गों का सम्मान एक श्रमशील वर्ग का सम्मान भी है।
यहाँ एक और तर्क यह भी दिया जा सकता है कि अपने समाज दर्शन में गाँधीजी ने समाज को प्रभावित करने वाली प्रेरक प्रेरणा धर्म को भी श्रम विचार से जोडकर प्रस्तुत किया। हिंदू धर्म में इसे यज्ञ की अवधारणा से जोडकर प्रस्तुत किया।23 भगवान बुद्ध, संत तुकाराम, संत ज्ञानदेव इत्यादि के जरिए श्रम विमर्श को आम जनता के बीच प्रस्तुत करते हुए धर्म को श्रमशील समाज की अवधारणा से जोडते हैं।24
इसी के साथ वह शारीरिक एवं मानसिक श्रम के बीच की खाई को भी समाप्तकरने की बात कहते हैं। उन्होंने इस बात को गहराई से देखा और विश्लेषित किया कि समाज लगातार इन दोनों श्रम रूपों में बँटा हुआ है। तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था इस खाई को और चौडा करती जा रही है। बौद्धिक तबके द्वारा बहुसंख्यक श्रमशील जनता का तिरस्कार एक अस्वस्थ समाज की निशानी है। अतः वह हर एक व्यक्ति से यह आशा करते हैं कि वह शरीर-श्रम करे-
महान प्रकृति चाहती है कि मनुष्य अपनी रोटी के लिए पसीना बहाए। इसलिए जो व्यक्ति एक मिनट भी बर्बाद करता है वह अपने पडोसियों पर भार है, और ऐसा करना अहिंसा के प्रथम पाठ का उल्लंघन है।25
अपने आदर्श समाज में वह यह कल्पना करते हैं कि सभी बौद्धिक वर्ग शरीर-श्रम करेंगे और इसके जरिए अपनी आजीविका कमाएँगे-
यदि प्रत्येक व्यक्ति अपनी रोटी के लिए शारीरिक श्रम करे तो इसका अर्थ यह होगा कि कवि, डॉक्टर, वकील आदि अपनी विशेष योग्यताओं का उपयोग मानव सेवा के लिए निःशुल्क करना अपना कर्तव्य समझेंगे।26
यहाँ बौद्धिक वर्ग को श्रमशील बनाकर गाँधीजी समाज में एक सांस्कृतिक क्रांति की बात करते हैं, जहाँ बौद्धिक वर्ग एक ओर अपनी विशेषता (जो कि एक तरह से समाज के योगदान का ही प्रतिफल है) को निःशुल्क जन-कल्याण हेतु उपयोग करते हैं, वहीं श्रमशील होकर श्रमशील जनता की समस्याओं, आकांक्षाओं का परिचय प्राप्त करते हैं। वह आय की समानता का भी उल्लेख करते हैं।
इस पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए गाँधी एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था की प्रस्तावना करते हैं, जिसे नयी तालीम कहा जाता है। इसमें स्थानीय हस्तकला, शिल्प उद्योग के जरिए शिक्षा देने का प्रावधान किया गया था। इसका तात्पर्य था कि शिक्षा में श्रमशील जनता के अनुभव का प्रवेश हो, साथ ही शिक्षार्थी एक अमूर्त समाज के स्थान पर मूर्त समाज की समस्याओं, अनुभवों से शिक्षा प्राप्त कर सके। यह शिक्षा व्यवस्था उसे शिक्षित होने के बाद अपने समाज से न तो काटती है और न ही श्रमशील समाज को हेय दृष्टि से देखना सिखाती है। गाँधीजी के यहाँ नयी तालीम भी श्रम के सहयोग से सामाजिक शोषण एवं अनैतिकता के प्रति सत्याग्रही शिक्षा हो जाती है।
गाँधीजी ने भारतीय समाज के एक और भेद को अपने विचार का विषय बनाया, वह है- ग्रामीण-शहरी का भेद। उनके लिए भारत का अर्थ ही है- सात लाख गाँव।27 वह तात्कालिक समय में विद्यमान गाँवों को वैसा ही नहीं रहना देना चाहते हैं अपितु गाँवों को सामाजिक पुनर्रचना का आधार बनाते हुए उनमें क्रांतिकारी बदलाव चाहते हैं। गाँवों में विद्यमान विभिन्न समस्याओं- अस्वच्छता, छुआछूत, अशिक्षा, बेरोजगारी आदि में व्यापक बदलाव लाना चाहते हैं।28 उनकी इच्छा है कि शहर गाँवों का शोषण करना बंद कर दें-
मैं नगरों की बढवार को एक बुराई मानता हूँ; यह मानव जाति और दुनिया के लिए दुर्भाग्य का विषय है; यह इंग्लैंड, और निश्चित रूप से भारत के लिए भी दुर्भाग्य का विषय है। अंग्रेजों ने शहरों के माध्यम से भारत का शोषण किया है। शहरों ने पलटकर गाँवों का शोषण किया है। शहरों का भवन निर्माण गाँवों के रक्त रूपी सीमेंट से हुआ है। मैं चाहता हूँ कि जो रक्त आज नगरों की धमनियों में बह रहा है, वह फिर एक बार गाँवों की रक्तवाहिकाओं में बहने लगे।28
अतएव यह आवश्यक है कि गाँवों का शोषण बंद हो। इसके लिए गाँधीजी एक विकेंद्रित, स्थानीय स्वदेशी आर्थिक विचार को प्रस्तुत करते हैं जो उत्पादन, वितरण एवं स्वामित्व का विकेंद्रीकरण करता है। साथ ही गाँवों का यह आर्थिक सशक्तीकरण एवं विकेंद्रीकरण उनके राजनीतिक विकेंद्रीकरण का मार्ग प्रशस्तकरेगा। गाँधीजी द्वारा प्रस्तुत व्यवस्था में गाँव केंद्रीभूत इकाई है-
अहिंसा पर आधारित समाज गाँवों में बसे ऐसे व्यक्ति-समूहों के रूप में ही हो सकता है जिनमें स्वैच्छिक सहयोग, गरिमामय और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की शर्त हो।30
यह स्पष्ट है कि गाँधीजी अपने समय के समाज के साथ एक व्यापक सत्याग्रह करते हैं। वह शोषण के विभिन्न रूपों की आलोचना करते हैं। एक स्वावलंबी मनुष्य का निर्माण करने हेतु श्रमाधारित आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक व्यवस्था बनाने का प्रयास करते हैं। वह सात सामाजिक पातकों (सोशल सिन्स) की बात करते हैं 31 -
1. सिद्धांतहीन राजनीति
2. श्रमहीन संपत्ति
3. विवेकहीन सुख
4. चरित्रहीन ज्ञान
5. नीतिहीन व्यापार
6. दयाहीन विज्ञान
7. त्यागहीन पूजा
इसे उनकी सामाजिक आचार संहिता भी कहा जा सकता है। गाँधी विचार के महत्त्वपूर्ण विद्वान प्रो.रामजी सिंह ने इन्हें ईसा मसीह के दस आदेशों के समान बताया है।32
गाँधीजी मानते थे कि सुसंस्कृत मानव परिवार में श्रम का स्थान अद्वितीय है।33 श्रम का व्यक्तिगत एवं सामाजिक आयाम ही उन्हें प्रेरित करता है कि वह एक श्रमाधारित समाज की प्रस्तावना करें। उनके लिए श्रम इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि यह समानता एवं सहयोगमूलक है और एक क्रांतिकारी विचार भी-
रोटी के लिए श्रम करने के नियम का पालन करने से समाज की संरचना में एक मौन क्रांति होगी। तब जीवन के लिए संघर्ष करने के स्थान पर परस्पर सेवा के लिए संघर्ष करने में मानव की विजय मानी जाएगी और पशु के नियम के स्थान पर मानव के नियम की प्रतिष्ठा होगी।34

संदर्भ
१. यंग इंडिया, 23/12/1931, पृ. 427-28
२. हरिजन, 24/11/1933, पृ. 6
३. यंग इंडिया, 29/10/1931, पृ. 325
४. देखें, आचार्य,नंदकिशोर, ‘नयी तालीम : अहिंसक
व्यक्ति व समाज रचना का माध्यम’, बुनियादी
तालीम (सं. अरविंदाक्षन, ए., कुमार, मिथिलेश)
राजकमल प्रकाशन, नई दिल्लीत, 2013, पृ. 122-
123
५. यंग इंडिया, 09/03/1922, पृ. 148
६. हरिजन, 01/02/1942, पृ. 27
७. हरिजन, 27/05/1939, पृ. 144
८. शुमाकर, ई.एफ., ‘स्मॉल इज ब्युटीफुलः एज
इफ पीपुल मेटर्स’ (हिंदी अनुवादः समुचित
तकनीक - बेहतर भी कारगर भी, अर्थशास्त्र का
अध्ययन मानो जनता का भी अस्तित्व हो, अनु.-
भवानीदत्त पांड्या), राधाकृष्ण, 1977, नई दिल्ली,
पृ. 38-39
९. देखें, एरिक हॉब्सबॉम और एंतोनियो पोलितो की
बातचीत, ‘भूमंडलीकरण : अर्थव्य्वस्था, राजनीति
और संस्कृति’, आलोचना- अक्टूबर-दिसंबर,
2012, राजकमल, नई दिल्ली, पृ. 67
१०. शुमाकर, वही, पृ. 27
११. सम्पूंर्ण गाँधी वांङमय, खंड : 71, पृ.153
१२. वही, पृ. 154
१३. हरिजन, 01/06/1935, पृ. 125
१४. गांगुली, बी.एन., गांधीज सोशल फिलासफीः
पर्सपेक्टिव एण्ड रिलेवेंस, नेशनल गांधी
म्युजियम एंड राधा पब्लिकेशंस, नई दिल्ली,
2000, पृ. 12-13
१५. यंग इंडिया, 29/01/1925, पृ. 41
१६. ‘मैं विशेषाधिकार और एकाधिकार से घृणा
करता हूँ जिसमें जनसाधारण सहभागी न हो
सके, वह मेरे लिए त्याज्य है।’ हरिजन, 02/
11/1934, पृ. 303
१७. आचार्य, नंदकिशोर, सभ्यता का विकल्प :
गांधी दृष्टि का पुनराविष्कार, वाग्देवी प्रकाशन,
बीकानेर, 1995, पृ. 91
१८. यंग इंडिया, 04/06/1931, पृ. 129
१९. हरिजन, 11/02/1933, पृ. 03
२०. यंग इंडिया, 06/10/1921, पृ. 317
२१. यंग इंडिया, 27/08/1925, पृ. 293
२२. गाँधी, मो.क, फ्रॉम यर्वदा मंदिर आश्रम
ऑब्जर्वेंसेज (अनु. वी.जी.देसाई), नवजीवन
पब्लिशिंग हाउस, अहमदाबाद, 1957, पृ.
36-37
२३. हरिजन, 29/06/1935, पृ. 156
२४. हरिजन, 02/11/1935, पृ. 298
२५. यंग इंडिया, 11/04/1929, पृ. 114-115
२६. हरिजन, 02/03/1947, पृ. 47
२७. हरिजन, 04/04/1936, पृ. 63
२८. यंग इंडिया, 30/04/1931, पृ. 94
२९. हरिजन, 23/06/1946, पृ. 198
३०. हरिजन, 13/01/1940, पृ. 410-11
३१. सम्पूंर्ण गाँधी वाङ्मय, खंड : 28, पृ. 381
३२. सिंह, प्रो.रामजी, गाँधीजी और मानवता का
भविष्य, कामनवेल्थ पब्लिशर्स, नई दिल्ली,
2000, पृ. 148
३३. हरिजन, 28/07/1946, पृ. 236
३४. हरिजन, 29/06/1935, पृ. 156
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डी-2, टीचर्स क्वार्टर्स, गाँधी हिल्स, पोस्ट हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा- ४४२००१ (महाराष्ट्र)