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वाचन संस्कृति

सूर्यनारायण रणसुभे
शिक्षित हो या अशिक्षित, स्त्री हो या पुरुष प्रत्येक की रुचि के विषय अलग-अलग होते हैं। इन सब में एक सामान्य-सी प्रवृत्ति सब में होती है- औरों के बारे में जानना। परिवेश, व्यक्ति, परिवार, समाज या ज्ञान का कोई भी क्षेत्र हो उसके प्रति जिज्ञासा होती है। इसी प्रवृत्ति के कारण ज्ञान और संस्कृति का विकास हुआ है। रुचि के इस क्षेत्र को बचपन से ही विकसित करना पडता है। कुछ रुचियाँ जन्मजात होती हैं तो कुछ रुचियाँ प्रयत्नपूर्वक विकसित करनी पडती हैं। औरों के जीवन को, विचारों को जानने का एक सबसे सरल, सीधा-सादा रास्ता है। वाचन करना, अपनी रुचि के विषय से संबंधित पुस्तकों को उपलब्ध कर उन्हें पढना। प्रत्येक विषय पर ढेरों पुस्तकें होती हैं, उन सबको खरीदना तो संभव नहीं। इसके लिए ग्रंथालय, वाचनालय यही सहजता से उपलब्ध जगहें हैं। भारत के संदर्भ में यह कहा जाता है बंगाल, केरल और महाराष्ट्र में ग्रंथालय का प्रचार-प्रसार खूब हुआ है। स्वातंत्र्यपूर्व काल में तो ग्रंथालय खोलने हेतु यहाँ आंदोलन भी चले हैं। वाचन की, पढाई की प्रवृत्ति या रुचि को बचपन से ही विकसित करने की जरूरत है। नवजागरण काल में बंगाल में राजा राममोहन राय ने और महाराष्ट्र में जोतिबा फुले ने शिक्षा के प्रचार-प्रसार हेतु आंदोलन भी चलाए। जोतिबा फुले जी ने तो स्त्रियों और दलितों की शिक्षा के लिए जीवनपर्यन्त कार्य किया। शिक्षा का और वाचन संस्कृति का निकट का नाता है। शिक्षा के प्रचार-प्रसार के साथ वाचन संस्कृति का भी प्रचार-प्रसार होना जरूरी था और है। परंतु इस देश में ऐसा नहीं हो पाया है। 1947 के पूर्व पूरे देश में शिक्षा का प्रतिशत पुरुषों में 10.12 प्रतिशत था और स्त्रियों में मुश्किल से 3.4त्न और शिक्षितों की यह संख्या भी विशिष्ट वर्ण और जाति तक सीमित थी। स्वतंत्रता के बाद केवल सत्तर वर्षों में शिक्षित पुरुषों का प्रतिशत 70.75त्न तक गया तो स्त्रियों में 50.55त्न तक। मतलब इस देश की 120 करोड जनसंख्या में से कम-से-कम 70 करोड स्त्री-पुरुष पढ-लिख सकते हैं। अब प्रश्न है कि इन 70त्न में से कितने प्रतिशत लोग दैनिक समाचारपत्रों अथवा अन्य प्रशासकीय कागज-पत्रों के अलावा अन्य कुछ पढते रहते हैं। करोडों की संख्या में जो छात्र-छात्राएँ हैं। उनमें से कितने पाठ्यपुस्तकों के अलावा अन्य विषयों की पुस्तकें पढते हैं? इन शिक्षितों में साहित्य या अन्य विषयों के वाचन को लेकर कोई सर्वेक्षण तो नहीं हुआ है। परंतु इस संबंध में जो यथार्थ स्थिति है, वह काफी चिंताजनक है।
मुझे पता नहीं हिंदी पट्टी में क्या स्थिति है। परंतु महाराष्ट्र तथा पूरे दक्षिण में प्रत्येक जिले में सरकारी ग्रंथालय हैं। वहाँ विभिन्न विषयों की स्तरीय ऐसी पुस्तकें हैं। इसके अलावा प्रत्येक नगर परिषद्, नगरपालिका की ओर से ग्रंथालय खोले गए हैं। कल्याणकारी राज्य की यह जिम्मेवारी है कि वह अपने नागरिकों के बौद्धिक विकास के लिए अनेक कार्यक्रम क्रियान्वित करे। इन ग्रंथालयों में नाममात्र शुल्क लेकर पुस्तकें पढने के लिए घर पर भी दी जाती हैं। इन सरकारी ग्रंथालयों के अलावा कॉलेजों में, कुछ विद्यालयों में उनके अपने ग्रंथालय हैं। अलावा इसके अनेक स्वयंसेवी संस्थाओं ने ग्रंथालय खडे किए हैं। उन्हें सरकार अनुदान देती है। इतना खर्च सरकार या स्वयंसेवी संस्थाएँ क्यों कर रही हैं? वाचन के फायदों को लेकर अध्येताओं ने, मनोवैज्ञानिकों ने काफी गंभीरता से काम किया है। अपनी रुचि के विषयों की पुस्तकें पढते रहने के कारण संबंधित व्यक्ति की बुद्धि तेज होने लगती है, उसकी जीवनदृष्टि में गुणात्मक परिवर्तन होने लगता है। भावना और वैचारिक दृष्टि से वह समृद्ध होने लगता है। एक लेखक अपने 30-40 वर्षों के जीवनानुभवों को, विचारों को, अनुभूतियों को 200-250 पृष्ठों में व्यक्त करता है। इन 200-250 पृष्ठों को पढने के लिए व्यक्ति को तीन-चार घंटे या तीन-चार दिन लग सकते हैं। उस लेखक को जो अनुभव प्राप्त करने के लिए 30-40 साल लगे, उसे वाचक केवल कुछ दिनों में ग्रहण करता है। अनुभव की दृष्टि से वह इतने कम समय में समृद्ध हो जाता है। वाचन के कारण वाचक अकेलेपन के तनाव से मुक्त हो जाता है। वास्तव में पठन एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति से मौन संभाषण ही होता है। इसके अलावा भाषा की दृष्टि से भी वह संपन्न-समृद्ध होता चला जाता है। साहित्य के वाचन से वह भिन्न-भिन्न प्रवृत्तियों के स्त्री-पुरुषों से परिचित हो जाता है। उसकी निर्णयशक्ति अधिक तेज होने लगती है। किसी समय पढाई करने वाला व्यक्ति मजाक का विषय बन गया था। पुस्तकों का कीडा कहकर उसकी उपेक्षा की जाती थी। इस प्रकार का मजाक या पढाई करने वाले व्यक्ति के प्रति ऐसे उद्गार अशिक्षितों द्वारा अथवा वाचन के प्रति जो गंभीर नहीं थे- ऐसे लोगों की यह करतूत थी। आज स्थितियाँ बदल गई हैं। निरंतर वाचन करने वालों को आज गंभीरता से लिया जाता है, उनके प्रति आदर व्यक्त किया जाता है।
पाठ्क्रमों में निर्धारित पुस्तकों के पढने के अलावा जो अन्य पुस्तकें रुचि से विश्वभर में पढी जाती हैं, वे साहित्य की होती हैं। विशेष रूप से उपन्यास और कहानियाँ। इन पुस्तकों को पढने की आदत बचपन से ही लगानी पडती है। यह जिम्मेवारी अभिभावकों की- माँ-बाप की होती है। अगर वे चाहते हैं कि उनकी संतति के व्यक्तित्व का चतुर्दिक विकास हो- तो वे उन्हें बचपन से ही खेल और अतिरिक्त पढाई की आदत डालें। शरीर और बुद्धि के विकास के लिए इन दोनों की अत्यधिक जरूरत होती है। साहित्य की पढाई के कारण भावनात्मक संतुलन बनाए रखने की आदत-सी लग जाती है। बाल्यावस्था से किशोरावस्था तक उसके हाथों में बालसाहित्य रखना बहुत जरूरी है। बांग्ला और मराठी की तुलना में हिंदी में बालसाहित्य की कमी मुझ जैसे को बहुत खटकती है। विश्व में सर्वाधिक समृद्ध साहित्य रूसी भाषा में है- ऐसा कहा जाता है। उसके अंग्रेजी/हिंदी अनुवाद उपलब्ध हैं। भारत में अनेक रंगों और महँगे कागज पर छपी बाल साहित्य की पुस्तकें महंगी होती हैं। इस तुलना में रूसी बालसाहित्य के हिंदी अनुवाद सस्ते होते हैं। जैसे-जैसे बालक/बालिका बडे होने लगते हैं, उनकी रुचि में भी परिवर्तन होने लगता है। इस कारण पुस्तकों के विषय भी बदलते जाएंगे। बालक-बालिकाओं में वाचन की रुचि का निर्माण हो इसलिए उनकी प्रत्येक वर्षगांठ पर उन्हें बेहतरीन पुस्तकें भेंट करने की आदत माँ-बाप लगा लें तो यह उनके बच्चों के व्यक्तित्व विकास में लाभदायी ही होगा। इस आयु में योग्य संस्कारों की जरूरत होती है। माँ-बाप, शिक्षक-शिक्षिका, पाठ्यपुस्तकें तथा बालसाहित्य- ये संस्कारों के महत्त्वपूर्ण साधन हैं। वर्षगाँठ पर (बर्थ डे) हजारों रुपये खर्च करने वाले उच्च मध्यवर्गीय हो या सैकडों रुपये खर्च करने वाले मध्यवर्गीय हो- क्या वे प्रतिवर्ष 300-400 रुपयों की पुस्तकें अपने बच्चों को भेंट नहीं कर सकते? इन पुस्तकों के अलावा उन्हें वे शब्दकोश भी खरीद कर दें। अंग्रेजी-हिंदी, हिंदी-हिंदी। इससे उनकी भाषा समृद्ध होती जाएगी। आखिर किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व की पहचान उसके द्वारा प्रस्तुत वाक्य रचना, शब्द संपत्ति, से ही तो होती है।
बचपन में एक बार पढने की आदत विकसित हो जाए तो आगे वह बढती ही जाती है। कई अभिभावकों को यह लगता है कि पाठ्यक्रमों के अलावा अगर वह अन्य पुस्तकें पढते रहा कि उसका असर उसके अध्ययन पर, करिअर पर होगा। यह पूर्णतः भ्रांत धारणा है। उलटे इस अवांतर वाचन से उसकी आकलन शक्ति बढ जाती है। उसकी अभिव्यक्ति में निखार आने लगता है।
कहानियाँ, उपन्यास, कविता आदि साहित्य की अनेकानेक विधाओं की पुस्तकें पढने से इन किशोरों या युवाओं का भावना-संसार फलता-फूलता जाता है। उनकी कल्पना शक्ति में इजाफा हो जाता है। उनमें जिज्ञासा और कौतूहल निर्माण हो जाता है। परिणामतः वे अपने स्कूली अध्ययन में भी अधिक रुचि लेने लगते हैं। अमेरिका के एक युवक जॉन वुड को वाचन की इस ताकत का पता चल गया था। एक बहुत बडी कंपनी में वह बहुत बडे पद पर कार्यरत था। छुट्टियों में वह नेपाल गया था। वहाँ के एक स्कूल में जब वह यूँ ही गया तब उन बच्चों में पुस्तकों के प्रति आकर्षण देखकर और वहाँ पुस्तकों का अभाव देखकर उसने यह तय किया कि वह इन गरीब, दूरदराज गाँवों में सरकारी स्कूलों में पढने वाले बच्चों के लिए पुस्तकें उपलब्ध कराएगा। इस लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु वह अपनी नौकरी से त्यागपत्र देता है तथा एक स्वयंसेवी संस्था रूम टू रीड की स्थापना करता है। विश्व के दानी लोगों से सहायता लेकर आज विश्व के अविकसित देशों के गरीब छात्र-छात्राओं को वह उनके ही स्कूल में आकर्षक पुस्तकों से भरा हुआ एक कमरा (रूम) वाचन (टू रीड) के लिए उपलब्ध करा देता है। भारत के कुछ राज्यों में रूम टू रीड संस्था आज कार्यरत है।
इसे हम ध्यान में रखें कि वाचन के फायदे तो अत्यधिक हैं परंतु उसके साथ इसके खतरे भी हैं। खतरे इस अर्थ में कि वाचक किस प्रकार की पुस्तकें वाचन हेतु चुनता है। लिखने वाले विभिन्न विचारों के होते हैं। पूरे विश्वभर में प्राचीन काल से दो परस्पर विरोधी विचार व्यक्त किए जा रहे हैं। एक मनुष्य को केंद्र में रखकर सोचने वाली विचारधारा, दूसरी धर्म, जाति, वंश आदि को केंद्र में रखकर औरों के प्रति नफरत फैलाने वाली विचारधारा, धर्म की विकृत व्याख्या करने वाली विचारधारा। इन दोनों विचारधाराओं से प्रतिबद्ध लेखक होते हैं। ये पुस्तकें भी ग्रंथालयों में होती हैं। प्रश्न है कि वाचक किन पुस्तकों को चुनने वाला है? बचपन में उसके हाथों में जिस प्रकार की पुस्तकें पडी होंगी, जिस प्रकार के संस्कार माँ-पिता द्वारा दिए गए होंगे, उसके अनुसार ही वह पुस्तकों का चयन करेगा। उसके साथ यह भी सच है कि वाचन के कारण धीरे-धीरे उसकी अपनी स्वतंत्र रुचि निर्मित होती जाती है। जीवन की ओर देखने की उसकी अपनी दृष्टि तैयार हो जाती है। उसके अनुसार वह पुस्तकों का चयन करता जाता है।
आयु के अनुसार इस शौक में परिवर्तन हो जाता है। किसी को जासूसी उपन्यास प्रिय होते हैं तो किसी को ऐतिहासिक उपन्यास। कविता की एक यह विशेषताहै कि वह कभी भी आम आदमी के लिए नहीं होती। भले ही कविता निरंतर आम आदमी के संबंध में बोलती होगी। इसलिए कविता में रुचि वे ही लेते हैं, जो बहुत संवेदनशील होते हैं। एक आयु के बाद वैचारिक साहित्य की ओर झुकाव बढने लगता है। बढना भी चाहिए।
पिछले कुछ वर्षों से विश्वभर में मानसिक रुग्णों की संख्या बढती जा रही है। क्योंकि जीवन ही ऐसा बना हुआ है कि तान-तनावों में जीना स्वाभाविक है। इस पर जो भी दवाएँ दी जाती हैं, वे तात्कालिक स्वरूप की होती हैं। इस तान-तनावों से मुक्त होने के लिए वाचन ही सबसे अच्छी दवा है। इस निष्कर्ष तक यूरोप के कुछ डाक्टर जा चुके हैं। व्यक्ति के तान-तनावों के स्वरूप को देखकर डाक्टर उसे किस विषय पर कौन-सी पुस्तकें पढनी चाहिए इसकी सूची देते हैं। इसे अब वहाँ रीडिंग थेरेपी कहा जाता है। तनावों से मुक्त होने हेतु, शराब, या इसी प्रकार के नशीले पदार्थों के सेवन की अपेक्षा वाचन सर्वाधिक सुंदर, सस्ता और आसान रास्ता है।
आज देश में 70-75 प्रतिशत शिक्षित हैं। मतलब 70 करोड की जनसंख्या। इस संख्या की तुलना में पुस्तकों की खपत का प्रतिशत बहुत कम है। मध्यवर्ग और उच्च मध्यवर्ग के बजट में पुस्तक-खरीदी की कोई व्यवस्था नहीं होती। दैनिक पत्रों के लिए थोडा-सा बजट होता है। परंतु पत्रिकाओं और पुस्तकों के लिए नहीं के बराबर। हम अपने शरीर को, चेहरे को चमकदार बनाने के लिए कई प्रसाधनों पर चाहे जितना पैसा खर्च करते हैं परंतु बुद्धि और भावना को चमकाने के लिए, उसे तंदुरुस्त रखने के लिए, तनावमुक्त रखने के लिए किसी भी प्रकार की व्यवस्था करना नहीं चाहते। एक सर्वे में कहा गया है कि केरल, बंगाल और महाराष्ट्र का मध्यवर्ग पुस्तक खरीदने हेतु प्रति वर्ष कुछ-न-कुछ खर्च करता रहता है। जरूरी नहीं है कि प्रत्येक परिवार पुस्तकें खरीदें। जो खरीद नहीं सकते उनके लिए ग्रंथालयों की व्यवस्था है। उसकी सदस्यता लेने में क्या हर्ज है? वहाँ से पुस्तकें लाकर वह पढ सकता है। पढी-लिखी गृहिणियों के पास दोपहर का काफी समय होता है। उस समय का उपयोग वे वाचन के लिए कर सकती हैं।
भारत में कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी, नेता अथवा मीडिया के कुछ लोग यह भ्रम फैला रहे हैं कि तकनीकी विकास के कारण, इंटरनेट के कारण अब पुस्तक प्रकाशन का व्यवसाय खतरे में आने वाला है। भविष्य में ग्रंथालयों की जरूरत नहीं पडेगी। पाठक जिस किसी पुस्तक को पढना चाहेंगे, वह इंटरनेट पर उपलब्ध हो जाएगी। इसके अलावा हजारों पुस्तकें नेट पर उपलब्ध हैं। फिर मुद्रित पुस्तक की जरूरत ही क्या है? यह तर्क बहुत ही हास्यास्पद है और यथार्थ नहीं है। जब भी विज्ञान ने कुछ नया लाया, तब इस प्रकार की अफवाहें फैलायी जाती रही हैं। कालांतर में यह सिद्ध हो जाता है कि ये अफवाहें ही हैं। जैसे भारत में जब पहली बार रेडियो-आकाशवाणी घर-घर में पहुँच गया, तब यह कहा गया कि अब अखबार कौन और क्यों खरीदेगा। खबरें तो रेडियो पर दी जा रही हैं। अखबार के व्यवसाय पर इसका कोई परिणाम नहीं हुआ। जब टीवी सेट घर-घर में बैठ गए तो यह कहा गया कि अब फिल्म देखने थिएटर कौन जाएंगे। जो फिल्म देखनी है वह घर पर ही देखी जाएगी। कॅसेट तो मिल रहे हैं। परंतु आश्चर्य कि थिएटर में जानेवालों की भीड इतनी बढ गई कि वे आज सौ-सौ करोड का व्यवसाय केवल एक सप्ताह में कर रहे हैं। ठीक उसी प्रकार यह कहा गया कि टीवी सीरियल के कारण पुस्तकों के प्रकाशन और बिक्री पर बुरा असर हो जाएगा। यहाँ मैं हिंदी के श्रेष्ठ उपन्यासकार स्मृतिशेष भीष्म सहानी का एक वक्तव्य देना चाहूँगा। जब उनके उपन्यास तमस पर सीरियल शुरू हो गई, उसके एक-दो माह बाद भीष्मजी ने कहा कि तमस उपन्यास का पहला संस्करण एक हजार प्रति को बिकने के लिए सात-आठ साल लगे। और जैसे ही उसका सीरियल शुरु हुआ, पुस्तक की खपत इतनी बढ गई कि संस्करण पर संस्करण निकालने पड रहे हैं। मराठी के प्रकाशकों और विक्रेताओं का भी यही अनुभव है। किसी उपन्यास पर सीरियल प्रसारित होने लगा कि उस उपन्यास की मांग बढने लगती है।
यूरोप के जिन देशों में इंटरनेट का उपयोग करने वाले 70 से 75 प्रतिशत तक हैं वहाँ ऐसे उत्कृष्ट पुस्तकों की खपत लाखों में होती है। इन दिनों विश्वभर में चर्चित जापानी लेखक हारुकी मुराकानी का भी यही अनुभव है। जापान विश्व का अत्यंत विकसित ऐसा देश है। इस लेखक ने अपने एक साक्षात्कार में कहा है कि मेरा हाल ही में प्रकाशित उपन्यास काफ्का ऑन द शोअर (अंग्रेजी अनुवाद) दो खंडों में है। इन दो खंडों की तीन लाख प्रतियाँ (जापानी भाषा में) कुछ सप्ताह में बिक गई। ऐसी ही स्थिति अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रान्स, जर्मनी, इटली में है। अत्यंत स्तरीय पुस्तकों की बिक्री अथवा लोकप्रिय पुस्तकों की बिक्री वहाँ लाखों में होती है। इसका कारण इतना ही कि वहाँ वाचन संस्कृति को ढंग से विकसित किया गया है। किसी भी मीडिया के कारण वाचन संस्कृति खतरे में आ नहीं सकती। मुद्रित माध्यम का अपना महत्त्व होता है। अब तो वैज्ञानिक यह कह रहे हैं कि लगातार कम्प्यूटर या स्मार्ट फोन को देखने से आँखों पर उसका बुरा असर होता है। इसके अलावा अन्य अनेक शारीरिक, मानसिक बीमारियों की संभावना बढ जाती है। पुस्तकें पढते रहने में ऐसे कोई खतरे नहीं हैं। उलटे फायदे ही फायदे हैं।
वाचन संस्कृति तभी विकसित होगी जब बच्चों को बचपन से ही पढने की आदत लगाई जाए। सुंदर-सुंदर पुस्तकें उन्हें दी जाएं। वे जो पढते हैं, उस पर उनसे बहस की जाए। यह जिम्मेवारी माँ-बाप और शिक्षकों की है। ऐसा कहा जाता है कि दुनिया में सबसे सुंदर (नोबल) व्यवसाय शिक्षक-प्राध्यापकों का है। वह इस रूप में कि अपने विषय को लेकर विश्वभर में जो-जो भी स्तरीय, उत्कृष्ट लिखा हुआ है, और जो पुस्तकों के रूप में उपलब्ध है, उसे पढकर छात्रों के सम्मुख प्रस्तुत करना। विज्ञान का शिक्षक वैज्ञानिक सिद्धांत समझाने के पूर्व उस वैज्ञानिक का परिचय विस्तार से, मनोरंजक ढंग से दे सकता है। वैज्ञानिक कहानियाँ बतला सकता है। परंतु जिसका व्यवसाय ही पढना-पढाना है, उसकी पढाई को लेकर इन दिनों कुछ कहना खतरा मोल लेना है। वाचन संस्कृति को विकसित करने का अर्थ है, सभ्य, विवेकसंपन्न समाज को विकसित करना, तनावमुक्त, प्रसन्न ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण करना; उसे अनुभव संपन्न बनाना। आने वाली पीढी में वाचन संस्कृति को विकसित करने की जिम्मेवारी आज के युवक-युवतियों की ही है।

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