fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

ओझल हमलों के बीच संझा

गोपाल जीनगर
अस्मितावादी विमर्शों के दौर में साहित्य परंपरागत सौन्दर्य के दायरे से बाहर निकला है। यही साहित्य की सबसे बडी उपलब्धि भी है। क्योंकि साहित्य समाज का प्रतिबिंब होने के कारण उसका यह भी दायित्व है कि समाज की सच्चाई को उकेरने तथा उसके कारणों की पडताल करने का कार्य करे, जिसके कारण समाज का एक हिस्सा अभी तक उपेक्षित है। आधुनिक साहित्य में सरोकार का स्थान भावुकता ने और चिन्तन का स्थान आक्रामकता ने ले लिया है। अतः अस्मिता की आवाज को बुलन्द करना ही साहित्य-चिन्तकों का प्रथम कर्त्तव्य है। यही कारण है कि अस्मितावादी साहित्य यथा- दलित, स्त्री, आदिवासी, आदि के साथ एक कडी किन्नर विमर्श की भी आ जुडी है। किन्नर विमर्श ने समाज के उन लोगों की तरफ ध्यानाकर्षण करवाया है, जो किसी धर्म, जाति से उपेक्षित न होकर एक सभ्य समाज की संकीर्ण मानसिकता के गुलाम हैं।
समाज की संकीर्ण मानसिकता के कारण किन्नर समुदाय की समस्या बढी है। समाज द्वारा उनका यूज एण्ड थ्रो की संस्कृति (केवल शुभ कामों में शगुन के लिए किन्नरों का उपयोग), अपनों से उपेक्षा के पश्चात् भी किन्नर समुदाय अपनी क्षमताओं का भी परिचय करवाता है। संझा इसी प्रकार की एक कहानी है। संझा जो जन्म से किन्नर है, कहानी की मुख्य पात्र है। संझा का नामकरण उसके पिता (वैद्य) ने किया है जो कि एक वैद्य पद के विपरीत नकारात्मक मानसिकता को दर्शाता है। कहानीकार के शब्दों में संझा इनकी बेटी में दिन और रात का मिलन है। अर्थात् व्यवहार में दिन और रात्रि के मध्य के समय को कहा जाता है।
जिस प्रकार चक्रवात की आक्रामकता एक विशेष भौगोलिक क्षेत्र को तहस-नहस कर देती है, उसी प्रकार सामाजिक अंधविश्वास और परंपराओं की आक्रामकता ने भी एक मानव को, जो कि प्रकृति की देन है, समाज का अंग है, उसे अपनों द्वारा ही छला गया है। संझा के माता-पिता भी उसे स्वयं की तथाकथिक इज्जत को बचाने के कारण संझा की स्वतंत्रता छीन लेते हैं। वैध जी ने पिछवाडे के खेतों को घेरते हुए जेल जितनी ऊँची मिट्टी की चारदीवारी उठा दी।2 संझा के कमरे की ये दीवारें उन सामाजिक रूढियों, परंपराओं की दीवारें हैं जो संझा को उसके मूल अधिकार में बाधा की तरह खडी हैं। वैद्य जी अपनी औषधियों से चौ गाँवों (चार गाँवों) के मरीजों को तो सुधारा है, लेकिन वह अपनी और स्वयं के समझ की संकीर्ण मानसिकता के रोग से निजात न पा सके।
प्रत्येक व्यक्ति समाज का एक अंग है। वह समाज में अपना जीवन-यापन करता है तथा स्वयं की जरूरतों को पूरा करता है। लेकिन संझा का क्या दोष था कि आरम्भ से ही समाज का अंग न बन सकी? उसके पिता अपनी इज्जत-आबरू के कारण उसे एक कोठरी में बंद कर देते हैं। इस कोठरी पर तालेबंदी उसके उन्नत भविष्य पर तालाबंदी है। इसी कारण वह किशोरावस्था तक समाज के क्रियाकलापों से अनभिज्ञ है। जैसे किसी खुंखार अपराधी को कैदखाने में ही उसके दैनिक कार्य से निवृत्त होने की सुविधा होती है, उसी प्रकार का व्यवहार संझा के साथ होता है। यह अभिशाप मात्र उसके किन्नर होने के कारण है। आधुनिक युग में शिक्षा शोषण से निजात पाने का साधन है। इसके द्वारा ही व्यक्ति आस-पास के परिवेश के क्रियाकलापों को समझता है तथा समाज म स्वयं की सत्ता स्थापित करता है। लेकिन संझा को मात्र किन्नर होने के कारण उसे उच्च शिक्षा से दूर रखा गया। उसे प्रारंभिक शिक्षा के नाम पर उसके घर की खिडकियाँ ही खुली। रोटी बनाने के बाद यहाँ से दुनिया देखना बेटी।3 वैद्यजी का यह कथन संझा की परवरिश को दर्शाता है। भारतीय दर्शन का मूल स्वरूप वेद, पुराण आदि धर्मग्रंथ हैं। वहीं से भारत को विश्वगुरु बनाने की सलाह दी जाती है। लेकिन यहीं से ही शोषण का एक रास्ता भी निकलता है, जो तडप, अंधविश्वास, रूढियों की ओर भी ले जाता है। संझा इन सभी धर्मग्रंथों पर प्रश्न चिह्न लगाती है। कथाकार कहती हैं कि संझा के बाऊजी ने तो संझा को यही बताया है कि चरक, सुश्रुत, धन्वंतरि से कुछ भी नहीं छूटा है। जो तकलीफ संझा को है, इनमें कहीं उसकी चर्चा तक नहीं, नाम-निशान कुछ नहीं जबकि बहुत चिनौमी बीमारी के बारे में तक लिखा है।4 वह अशिक्षा के दंश को झेलने के कारण उसने मात्र अनुश्रुति को ही सुना है लेकिन उसके पास शिक्षा होती तो वह स्वयं उसका कारण और समाधान खोज सकती थी।
व्यक्ति मानसिक अवसाद का कारण उसका अकेलापन, अपनों से घृणा, तथा समाज से परित्यक्त होना माना जाता है। यही अकेलापन स्वयं से घृणा का कारण बनता है। उपयुक्त सजाएँ संझा को एक हिजडा होने के कारण समाज, परिवार, यहाँ तक कि अपनी माँ से भी मिलती रही है। यही कारण है कि वह शीशे के सामने खडी रहती है। गिरने-गिरने को होती है तो बैठ जाती है। एक छेद उसके दिल में होता जा रहा है। जिसके कारण वह बंद कोठरी में कपडे पहनना तक भूल गयी है।5 एक व्यक्ति का मुख्य धारा से विलग होना किस प्रकार है, उस अभिव्यक्ति का वर्णन कहानीकार विशेष रूप से करती है। वह किन्नरों की स्वतंत्रता, मुक्ति की चाह, अस्मिता के संघर्ष के साथ उनके पहचान के संकट भी सामने रखती है। मैं बाहर निकलना चाहती हूँ, बहता देखना चाहती हूँ औषधी की पत्तियों को छूना चाहती हूँ। बहता पानी......गीली मिट्टी....... जंगल.......... आसमान देखना चाहती हूँ। मैं दौडना चाहती हूँ........खूब जोर से हँसना चाहती हूँ.......सब के जैसे जीना चाहती हूँ। 6 संझा का यह कथन कहानी की सार्थकता प्रदान करता है। एक मानव रूपी परिंदा स्वतंत्र आकाश चाहता है। एक आजाद व्यक्ति ही समाज में अपना सर्वश्रेष्ठ दे सकता है और नैतिक रूप से एक स्वतंत्र व्यक्ति ही अपने कार्य के प्रति उत्तरदायी होता है।
सत्य किसी व्यक्ति द्वारा अधिक समय तक नहीं छुपाया जा सकता है। वह देर-सवेर अपनी दस्तक दे देता है। लेकिन सत्य की यह दस्तक किन्नरों के लिए नकारात्मक साबित हती है, जिससे समाज उन्हें उपेक्षित, अछूत की दृष्टि से देखता है। संझा का सच हिजडा का रूप सामने आने पर गाँव के ठेकेदारों द्वारा, नदी, समाज को अछूत, दूषित करने का आरोप लगाने के साथ ही उसको शारीरिक यातनाएँ प्रदान की जाती हैं। उसने मेरे देवस्थान को अपवित्र किया है। इसे नग्न करके, इसके बाल मूँड दो। मुँह पर कालिख पोत कर पूरे चौ गाँव में मारते हुए घुमाओ।7 उसकी प्रताडना का ये रूप ठीक वैसे ही दिखाई पडता है जैसे घोडों के शरीर पर चाबुक की नीली रेखा दिखाई पडना या मुगलकालीन शासन व्यवस्था के समय खुले रूप से अपराधी पर कोडे की सजा देना था। इस धरती के वासिंदों ने तुम्हारी जाति के लिए हलाहल नरक की व्यवस्था की है।.... वे लोग कपडे उठाकर नाचते हैं और भीख माँगते हैं। लोग उन्हें गालियाँ देते हैं, थूकत हैं, उनके मुँह पर दरवाजा बंद कर लेते हैं। उन्हें घेरकर मारते हैं। वे जिस इलाके में बसे हों वहाँ कोई भी अपराध हो पर इलजाम तुम्हीं पर लगता है।8 कहानीकार का यह कथन वर्षों से किन्नर समुदाय के साथ समाज का व्यवहार दर्शाता है। किन्नर समाज आज भी आर्थिक रूप से मजबूत न होने के कारण दूसरों के सामने हाथ फैलाने को मजबूर है। क्योंकि समाज उन्हें स्वयं से अलग मानता है। उनके साथ अछूत की तरह व्यवहार करता है, यहाँ तक छोटे बच्चों में भी उनकी नकारात्मक छवि फैला दी जाती है, जिसके कारण बच्चे विभिन्न प्रकार के अपशब्दों, संकेतों का प्रयोग करते हैं। जिसके कारण किन्नर असहज महसूस करते हैं। इन बच्चों का साथ देने में समाज का एक वर्ग वह भी है जो स्वयं को शिक्षित कहता है।
कहानीकार किन्नर समाज के शोषण के इतर उनके चेतनात्मक, प्रतिभाशाली और उनकी क्षमताओं को भी सामने रखकर समाज को सोचने पर मजबूर करती हैं कि किन्नरों की भागीदारी सामाजिक प्रगति में सहयोगपूर्ण है। उनका मात्र शादी-ब्याह, शुभ कार्य में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के अतिरिक्त भी वह समाज में सत्ता स्थापित कर सकती है। कहानी में पिता का एक सहयोगात्मक रूप भी दिखाई पडता है, जिसके कारण तथा अपनी लगन से संझा में प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण की है। बाबूजी आपने मुझे औषधि बनाना सिखाया है....मैंने लाल जिल्द वाली किताब में पढा है...सर्पगंधा की जड से साँप नहीं गोबर की बास आती है। यही वैद्य का रूप गाँव वालों और संझा का एक सहारा बनता है। तुम मुझे मारना तो दूर, अब मुझे छू भी नहीं सकते, क्योंकि मैं एक जरूरत बन गयी हूँ। सारे चौगाँव ही नहीं, आस-पास के शहर-कस्बों में, एक में ही हूँ जो तुम्हारी जिन्दगी बचा सकती हूँ।10 संझा उन सभी कारणों की भी पडताल करना चाहती है जिसके कारण वह उपेक्षित है। साथ ही वह उन सभी मानकों को बदलना चाहती है जो समाज में किन्नरों को उपेक्षित दृष्टि से देखने को मजबूर करते हैं। वह कहती है कि बाबा ने बेदराज की एक कथा सुनाई थी। उसके हाथ में विद्या की रेखा नहीं थी तो उसने अपनी हथेली चीरकर विद्यारेखा बना ली थी। वह भी अपनी किस्मत बदल देगी।11
कहानी का अंत संदेशात्मक है। संझा सभी को मानव बनने का संदेश देती है कि .....न मैं तुम्हारे जैसी मर्द हूँ..... न ही मैं तुम्हारे जैसी औरत हूँ। मैं वो हूँ जिसमें पुरुष का पौरुष है और औरत का औरतपन।12 संझा का यह कथन किन्नरों को अपनी समता का अहसास कराता है। वह संकीर्ण मानसिकता वाले समाज से ऊपर उठकर मानव को मानव के पक्ष का हितैषी बताता है। किन्नरों के प्रति समाज के नकारात्मक दृष्टिकोण समाज को बौद्धिक विकलांगता की श्रेणी के ला खड करता है। भूमंडलीकरण तथा अस्तित्ववादी चर्चाओं के बीच हमें तय करना होगा कि विकास की अँधी दौड में उस समूह को पीछे न छोड दें, जो समाज की संकीर्ण सोच से पिछड गये हैं। समुदाय मात्र शुभ अवसर पर किन्नरों की सम्मानजनक मेहमानी करता है। शेष समय उनकी समस्या का कारण बने समाज को ही किन्नरों को सकारात्मक समानता का अवसर प्रदान करना होगा ताकि किन्नर समुदाय समाज की मुख्यधारा में आ सके।
अतः साहित्य को भी परंपरागत सौन्दर्य शास्त्र के केंद्र में किन्नर को रखना होगा। साहित्य का सकारात्मक सृजन ही किन्नर-समाज को दशा और दिशा प्रदान कर सकता है।

संदर्भ सूची :
सिंह किरण, यीशू की कीलें, पंचकूला प्रकाशन, प्रथम संस्करण 2016, पंचकूला (हरियाणा), पृ. सं. 172
1. वही प. सं. 172
2. वही प. सं. 174
3. वही प. सं. 175
4. वही प. सं. 178
5. वही प. सं. 179
6. वही प. सं. 193
7. वही प. सं. 193
8. वही प. सं. 174
9. वही प. सं. 194
10. वही प. सं. 177
11 वही प. सं. 194

सम्पर्क : बी-15, कमरा संख्या 204,
क्रिश्चन कॉलोनी, पटेल चेस्ट,
नार्थ कैम्पस, दिल्ली विश्वविद्यालय,
दिल्ली-110007
मो. ८२८७३९०५६६