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महादेवी वर्मा का स्त्री चिंतन

अवन्तिका शुक्ला
दुनिया भर में महिलाओं की दोयम दर्जे की स्थिति को चिह्नित कर उसे बेहतर करने के प्रयासों में महिला आंदोलनों के कार्यकर्ताओं के साथ-साथ स्त्री मुद्दों पर चिंतन करने वाले विद्वानों का बहुत बडा योगदान रहा है। जब भी हम स्त्री चिंतन पर बात करते हैं, तो हमें पश्चिम की अनेकों विदुषियों के प्रभावपूर्ण लेखन दिखते हैं, जो स्त्री जीवन की जटिलताओं और दोयम दर्जे के प्रमुख कारणों एवं इन स्थितियों को दूर करने के समाधानों पर विस्तार से चर्चा करती आई हैं। इससे महिला मुद्दों की एक व्यापक समझ लोगों में बनी है। इस समझ का प्रभाव पूरे विश्व के साथ भारत में भी पडा। इस समझ को कई बार भारत के संदर्भ में अधूरा माना गया क्योंकि इसमें भारतीय महिलाओं की स्थिति उनके अपने वातावरण के संदर्भ में देखे जाने के उदाहरण नगण्य थे और फिर तलाश हुई स्त्रीवाद को स्थापित करने वाले भारतीय विचारों की, जो कि भारतीय महिलाओं की समस्याओं और उसके समाधानों को भारत के संदर्भ में ही विचार कर प्रस्तुत कर रहे हों। इस प्रकार के विचारों को ढूँढने पर निराशा नहीं हुई क्योंकि छठी शताब्दी ईसा पूर्व से ही हमें थेरीगाथा के माध्यम से महिलाओं की पीडा और उसके प्रतिरोध के उदाहरण मिलते हैं। भक्ति आंदोलन की कवयित्रियाँ भी हमें महिलाओं के संघर्ष को दिखाती हैं। एक अज्ञात हिन्दू औरत, ताराबाई शिंदे, पं रमाबाई जैसी महिलाएँ रहीं जिन्होंने स्त्री के उत्पीडन को उसकी बारीकियों के साथ समझा और अपने लेखन के माध्यम से सामने लाया। इसी श्रं`खला में हिंदी की अग्रणी लेखिका महादेवी वर्मा की रचनाओं की बात आती है। वैसे तो महादेवी ने कविताओं, कहानियों, संस्मरणों के माध्यम से स्त्री जीवन और उसके उत्पीडन के जटिल आयाम को विस्तार से प्रस्तुत किया है। किन्तु उनके निबंधों का संग्रह श्रं`खला की कडियाँ इस सबसे काफी आगे जाकर भारतीय महिलाओं के जीवन, उनकी विवशता, के साथ उनके द्वारा देश के विकास की संभावनाओं पर बहुत ही सारगर्भित चर्चा करता है। महादेवी के ये निबंध स्त्रीवाद की महत्त्वपूर्ण पुस्तक द सेकेंड सेक्स से पहले लिखी गई, जिसे स्त्रीवाद का आधारभूत ग्रंथ माना जाता है। जितनी प्रतिष्ठा इस पुस्तक को मिली उतनी श्रं`खला की कडियाँ को नहीं मिल पायी। लेकिन धीरे-धीरे विद्वानों के विश्लेषण सामने आए और इस पुस्तक का महत्त्व लोगों के सामने आया। भारतीय महिलाओं के हालात समझने के लिए यह पुस्तक आज भी बहुत प्रासंगिक है। प्रस्तुत आलेख में स्त्रीवाद और महादेवी की श्रं`खला की कडियाँ पर बात की जाएगी। इस पुस्तक के माध्यम से हम जानेंगे कि वैश्विक पटल पर स्त्री आंदोलन किस प्रकार सक्रिय था? उस समय भारत में महिलाओं की समस्याओं पर क्या बात की जा रही थी? वैश्विक पटल पर चल रहे स्त्री मुद्दों और भारतीय महिलाओं की समस्याओं में किस प्रकार का साम्य और वैषम्य है? महादेवी वर्मा इस कडी में नारीवाद की किस धारा के ज्यादा करीब हैं? और महादेवी वर्मा स्त्री चिंतन के भारतीय दृष्टिकोण को किस ओर लेकर जाती हैं? इन प्रश्नों के समाधान श्रं`खला की कडियाँ के माध्यम से इस आलेख में तलाशने का प्रयास किया गया है। इस आलेख के प्रथम चरण में स्त्रीवाद एवं उसकी विविध धाराओं का परिचय दिया जाएगा, उसके बाद भारत में स्त्री आंदोलन पर चर्चा की जाएगी। द्वितीय चरण में महादेवी वर्मा की श्रं`खला की कडियाँ में उठाए गए स्त्री मुद्दों और विश्व पटल पर स्त्री आंदोलन के साथ उनके मुद्दों के जुडाव के साथ इस पुस्तक की प्रासंगिकता पर विचार किया जाएगा और अंत में निष्कर्ष प्रस्तुत किया जाएगा।
स्त्रीवाद एवं उसकी प्रमुख धाराएँ
स्त्रीवाद एक महत्त्वपूर्ण विचारधारा है जो कि किसी भी धर्म, नस्ल, जाति, जेंडर, क्षेत्र, यौनिकता के व्यक्ति के एक मनुष्य के रूप में गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार की बात करती है। इससे हम समझ सकते हैं कि स्त्रीवाद का प्रमुख आधार मानवता है। नारीवाद महिला उत्पीडन के विभिन्न पहलुओं को समझने की दिशा में प्रयासरत एक गतिशील और निरंतर परिवर्तित होने वाली विचारधारा है, जिनमें व्यक्तिगत, राजनीतिक और दार्शनिक पहलू भी शामिल हैं (रे, 2001)। नारीवाद स्त्रियों की अधीनता के कारणों की गंभीरता से पडताल करता है और उनकी अधीनता से मुक्ति की स्थिति प्राप्त करने के समाधानों को तलाशता है। कारण नारीवाद की विविध धाराएँ हैं। इसीलिए नारीवादों शब्द का प्रयोग किया जाता है क्योंकि महिलाओं के अधीनता के कारण और उससे मुक्ति के रास्ते अलग अलग विद्वानों ने देशकाल, परिस्थितियों, संस्कृतियों के हिसाब से अलग अलग सुझाए। पर उन सब में एक बात समान थी स्त्री- पुरुष सम्बन्धों में व्याप्त पुरुष वर्चस्व और स्त्री अधीनता की स्थिति को बदलना। स्त्रीवाद सभी महिलाओं को स्वतन्त्रता और समानता देने की हिमायती है, पर उसका स्वरूप क्या होगा, किन संस्थाओं में क्या बदलाव किए जाने हैं? इस पर लोगों की राय अलग अलग रही। ये विविधताएँ ही नारीवाद की विविधताएँ बनीं जो कि नारीवाद की विभिन्न लहरों में हमें देखने को मिल जाती हैं। नारीवाद की मुख्यतः दो लहरें मानी जाती हैं, जिनमें स्त्री अधीनता और स्वतन्त्रता को अलग अलग तरीकों से देखा गया है। पहली लहर 19वीं सदी से गुजरती हुई 20वीं सदी के आरंभिक दशकों तक पहुँचती है। दूसरी लहर 1960 के बाद से अब तक जारी है। नारीवाद की लहरों पर बात करते हुए हमें इस बात को समझना होगा कि ऐसा नहीं है कि 19 वीं शताब्दी से पहले महिलाओं का कोई प्रतिरोध नहीं था। पहले भी था पर उनकी राजनीतिक सक्रियता की किसी लंबी परंपरा की जानकारी नहीं मिलती है क्योंकि इतिहास लेखन में प्रारम्भ से ही पुरुषवादी दृष्टिकोण हावी रहा है। महिलाओं की भूमिका इतिहास से अदृश्य रही (जॉन, 2001)। प्रथम लहर इसलिए भी कहा गया क्योंकि इसी दौर में महिलाओं की व्यवस्थित राजनीतिक सक्रियता के प्रमाण इतिहास में मिले।
नारीवाद की प्रथम लहर
नारीवाद की प्रथम लहर बहुत ही महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसने महिलाओं के अधिकारों पर सार्वजनिक क्षेत्र में बात करने का बिगुल फूँका। महिलाओं की हीन स्थिति और समाज द्वारा उसे बनाए रखने के प्रयासों पर सवाल उठाए। महिला अधिकारों की मांग उस समय सिर्फ पश्चिमी देशों में ही नहीं बल्कि उससे बाहर एशिया में भी उभर रही थी। प्रथम लहर के अंतर्गत महिलाओं ने अपने नागरिक होने की मान्यता अर्थात् वोट देने का अधिकार माँगा। उनका कहना था कि जो स्वतन्त्रता, समानता, बंधुत्व का नारा बुलंद किया जा रहा है, वह नारा सिर्फपुरुषों के लिए है, महिलाओं के लिए नहीं। वोट देने की सुविधा उनके लिए थी जिनके पास संपत्ति थी और महिलाओं के पास संपत्ति के अधिकार नहीं थे। अतः महिला समानता की धारणा से बाहर रखी गई। इसका बडा विरोध महिलाओं द्वारा किया गया किन्तु पुरुषों के समान खुद के लिए भी राजनीतिक समानता और वोट के अधिकार को माँगने पर उन्हें बुरे दमन का सामना करना पडा। ओलंपिया द गूज नाम की महिला को इस माँग के लिए मौत के घाट उतार दिया और भी कई महिलाओं के साथ क्रूर हिंसा की गई, लेकिन संघर्ष चलता रहा। महिलाओं को वोट का अधिकार न देने के पीछे धारणा थी कि वे बहुत कोमल, दब्बू होती हैं और उनका मस्तिष्क अपरिपक्व होता है। अतः वे राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप के लायक नहीं होती। साथ ही अगर वे राजनीतिक मामलों में अपने मस्तिष्क का प्रयोग करेंगी तो इसका प्रभाव बच्चों की परवरिश पर पडेगा (सुब्रह्मण्यम, 2001)। इस बात का विरोध कई महिला विचारकों ने किया जिसमें सबसे महत्त्वपूर्ण नाम मैरी वोल्स्टोनक्राफ्ट का आता है। 1792 में छपी उनकी पुस्तक द विंडीकेशन ऑफ राइट्स ऑफ विमेन बहुत खास रही। उन्होंने इस बात को पुरजोर कहा कि महिलाओं की कमजोर स्थिति उनकी शिक्षा तक पहुँच न हो पाने के कारण बनी है। अगर उन्हें भी तार्किक (Subjection of Women) । मैरी के समान ये दोनों भी मानते थे कि महिलाएँ भी पुरुषों की तरह प्राकृतिक अधिकारों की हकदार होती हैं। उनकी कथित कमजोरियाँ उनकी अतार्किकता, उनमें शिक्षा की कमी, पुरुषों पर निर्भरता और दोषपूर्ण समाजीकरण के कारण होती है। इस प्रकार फ्रांस, इंग्लैंड और अमेरिका में महिलाओं के राजनीतिक अधिकार के लिए महिलाओं का संघर्ष जारी था। ये आंदोलन सडकों पर विरोध प्रदर्शनों के साथ, सम्मेलनों, बैठकों, पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से सक्रिय बनाया गया (जोशी, 2006)। स्त्रियों ने कडे संघर्ष के बाद मताधिकार की सफलता प्राप्त की। संयुक्त राज्य अमेरिका की संसद ने 1919 में महिलाओं को मताधिकार देने के लिए संविधान में संशोधन किया। ब्रिटेन में महिलाओं को मताधिकार 1927 में मिला, जबकि फ्राँस की महिलाओं को इसके लिए 1944 तक इंतजार करना पडा। इस आंदोलन को उदारवादी नारीवाद की श्रेणी में रखा जाता है। पर यह अपने दौर में बहुत ही क्रांतिकारी रहा है।
नारीवाद की द्वितीय लहर
स्त्रीवाद की द्वितीय लहर का विकास 1960-70 के दशक में हुआ। इस दौर में बहुत अलग अलग तरह के मुद्दे स्त्रीवादी आंदोलन द्वारा उठाए गए। इस लहर में बाहर काम करने का अधिकार, समान काम पर समान वेतन का अधिकार, घरेलू श्रम के वेतन के साथ-साथ अपने शरीर पर खुद का अधिकार, नस्लगत भेदभाव का विरोध, समलैंगिक सम्बन्धों को मान्यता, स्वायत्त महिला संगठनों के निर्माण जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दे नारीवाद की दूसरी लहर में शामिल हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के समय जब पुरुष सीमा पर थे तब महिलाओं ने श्रमिक के रूप में शामिल हो कर देश की व्यवस्था के संचालन में अपना योगदान दिया। युद्ध की समाप्ति पर यह अपेक्षा की गई कि अब पुरुष वापस आ गए हैं। अतः स्त्रियों को अपनी घरेलू भूमिका में लौट जाना चाहिए। यह उन महिलाओं के लिए संभव नहीं था, जो कि अपने घर की रोजी रोटी कमाने वाली अकेली सदस्य थीं। बहुत-सी महिलाएँ घरों में वापस लौटीं और कुछ अपने आपको कार्यक्षेत्र से जोडे रखीं। धीरे-धीरे महिलाओं का रोजगार के लिए रुझान बढता गया। पर सम्पन्न तबके की स्त्रियाँ अभी भी इससे दूर रखी जाती थीं। बेट्टी फ्रीडन ने 1963 में अपनी पुस्तक फेमिनिन मिस्टिक में इस बात को बहुत महत्त्व के साथ उठाया कि सिर्फघरों में सीमित रखे जाने पर महिलाएँ अपनी क्षमता का विकास नहीं कर पाती हैं और कुंठित हो जाती हैं। सिर्फ पत्नी, माँ बनकर ही वे संतुष्ट नहीं हो सकतीं और इस अभाव के कारण उपजे अपने असंतोष को समझ भी नहीं पाती हैं। यह असंतोष उनके सार्वजनिक जीवन के विकास न हो पाने के कारण उपजता है। यह दौर महिलाओं के रोजगार की ओर अग्रसर होने के लिए महत्त्वपूर्ण था। बाहर काम करने में गर्भ निरोधकों की खोज का भी बहुत बडा योगदान रहा, जिसके कारण महिलाओं का अपने शरीर पर कुछ हद तक नियंत्रण हो सका। महिलाओं के बाहर काम करने से महिलाओं को अपने काम के घंटे नियंत्रित करने, समान कार्य के लिए समान वेतन मिलने और कार्यस्थलों पर यौन हिंसा से सुरक्षा जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया जाने लगा। माक्र्सवादी नारीवादियों ने महिलाओं के श्रम से सम्बन्धित मुद्दे प्रमुखता से उठाए, जिनकी चर्चा ऊपर की जा चुकी है। इस दौर में नव वामपंथी आंदोलन और छात्र आंदोलनों की धूम मची हुई थी। इनमें महिलाओं ने भी अपनी भागीदारी दी। पर जब उन्होंने देखा कि इन तथाकथित प्रगतिशील आंदोलनों में भी महिलाओं की स्थिति दोयम दर्जे की ही है और उनके मुद्दों को कोई तवज्जोह नहीं दी जा रही है, तो उन्होंने अपने अलग छोटे छोटे स्वायत्त संगठन बनाकर अपने मुद्दों पर चर्चा और संघर्ष किया। यही बात अश्वेत महिलाओं के साथ भी हुई। संयुक्त राज्य अमेरिका में 1950 के दशक में नागरिक अधिकार आंदोलन का उद्भव हुआ था। यह आंदोलन अश्वेतों के खिलाफ भेदभाव, दोयम दर्जे के व्यवहार और अलगाव के लिए किया गया था। इस आंदोलन में अश्वेत महिलाओं द्वारा भी यह आरोप नारीवाद पर लगे कि यह सिर्फ श्वेत महिलाओं के अधिकारों का समर्थन करने वाला आंदोलन है। उसमें अश्वेत महिलाओं के साथ नस्लगत और लिंगगत भेदभाव को कभी मुद्दा नहीं बनाया गया। अतः उन्हें भी अपनी बात कहने के लिए अलग संगठन और अलग मंच की आवश्यकता हुई। नस्ल और जेंडर के मुद्दे को साथ देखने की प्रेरणा भी इन्हीं आंदोलनों से उपजी। इसी दौर में समलैंगिकता को स्वीकार करने की भी माँग काफी उठी। यौनिकता और प्रजनन पर व्यक्ति के खुद के अधिकार को बहुत क्रांतिकारी रूप में देखा गया और इसकी हिमायत करने वाली महिलाओं को उग्रवादी नारीवादी कहा गया। इन महिलाओं का मानना था कि स्त्री पुरुष के बीच समानता के आधार पर कोई संबंध नहीं बन सकता क्योंकि उसकी शारीरिक स्थिति महिलाओं को हमेशा एक असुरक्षा में रखती है। समानता का संबंध केवल समान लिंगों में ही हो सकता है। इसी के साथ-साथ जब दुनिया भर में अलग-अलग जगहों पर गर्भपात पर कानूनी प्रतिबंध था, तब तमाम महिलाओं ने सार्वजनिक रूप से अपना इकरारनामा दिया कि उन्होंने गर्भपात कराया है। इस पर सीमोन द बाउवार ने भी हस्ताक्षर किए थे। इस बडे आंदोलन से महिलाओं के शरीर पर उनके अधिकार का मुद्दा काफी सक्रिय हुआ। यह दौर पूरे विश्व में ही विद्रोही आंदोलनों के लिए जाना जाता है। पूँजीवाद और साम्राज्यवाद का कडा विरोध इस दौर में वामपंथी संगठनों, छात्र संगठनों और महिला संगठनों द्वारा किए गए। यहीं से एक मजबूत राजनीतिक आंदोलन को गति भी मिली और इन आंदोलनों से महिलाओं के मुद्दे गायब होने पर इन विचारधाराओं के भीतर व्याप्त पितृसत्ता से भी महिला संगठनों का सामना हुआ। उग्रवादी नारीवाद के नाम से जानी जा रही यह लहर बहुत कटु आलोचना और मजाक का शिकार हुई। पर स्त्री शरीर पर उसके नियंत्रण जैसा मुद्दा और व्यक्तिगत ही राजनीतिक है का महत्त्वपूर्ण नारा इसी दौर की देन है। वहीं माक्र्सवादी नारीवादियों ने महिला श्रम को पहचानने और उसका सही मूल्य प्रदान करने की चेतना का विस्तार कर महिलाओं को श्रमिक के रूप में समाज में पहचान दिलाई।
भारत में स्त्री प्रश्न
भारत में स्त्री प्रश्न के उभार के उदाहरण तो बौद्ध काल से ही मिलते हैं, पर व्यवस्थित और एक निरंतरता के साथ इसके प्रमाण हमें 19वीं सदी से मिलते हैं। इस दौर में बाल विवाह, विधवा विवाह पर प्रतिबंध, सती प्रथा, अशिक्षा, सीमित सार्वजनिक जीवन जैसी तमाम चुनौतियाँ महिलाओं के सामने थीं। महिलाएँ सिर्फएक संपत्ति के रूप में देखी जाती थीं, न कि नागरिक के रूप में। उनके कोई भी नागरिक अधिकार नहीं थे। औपनिवेशिक शासकों द्वारा महिलाओं की दुर्दशा को भारतीयों की असभ्यता के साथ जोडने के कारण शिक्षित भारतीय तबके में अपने देश की महिलाओं की दशा सुधारने का विचार सक्रिय हुआ। सती प्रथा पर रोक, विधवा पुनर्विवाह, बाल विवाह पर पाबंदी, महिलाओं की शिक्षा, स्वावलंबन जैसे तमाम मुद्दों पर इन सुधारकों ने कार्य किया। इसमें राजाराम मोहन रॉय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, ज्योतिबा फुले, केशव चंद्र सेन अग्रणी हैं। महिलाओं में भी सावित्री बाई फुले, पंडिता रमाबाई, ताराबाई शिंदे, फातिमा शेख के प्रयास महत्त्वपूर्ण है। पुरुषों और महिलाओं के प्रयासों में हमें प्रमुख अंतर दिखाता है कि पुरुष एक निर्धारित सीमा के भीतर ही महिलाओं का उत्थान चाहते हैं, जबकि महिलाएँ उस पूरी पितृसत्तात्मक विचारधारा के प्रभाव को स्त्री के जीवन के विविध चरणों में देखती हैं और उस विचारधारा को नष्ट करने का प्रयास करती हैं। इसी कडी में 20वीं शताब्दी में महात्मा गाँधी द्वारा आजादी के आंदोलन के लिए महिलाओं को सहभागी बनाना एक बडा कार्य था, जिसने उन्हें घर से निकालकर देश की आजादी के साथ एक नागरिक के रूप में जोडा। अपनी नागरिक पहचान के साथ महिलाओं ने देश की आजादी के आंदोलन की लडाई लडी पर साथ में अपने साथ होने वाले दोयम दर्जे की ओर भी लोगों की नजर इंगित की। इसी संघर्ष में सहभागिता के कारण भारत में महिलाओं को वोट देने का अधिकार सहजता के साथ प्राप्त हुआ, जिसके लिए विश्वभर की महिलाओं ने कठोर संघर्ष किया। महिलाओं के इस आंदोलन का उस दौर के चिंतकों पर गहरा प्रभाव पडा, जिसमें महादेवी वर्मा का नाम प्रमुखता से आता है। महादेवी ने अपने लेखन के माध्यम से भारतीय महिलाओं की अधीनता की स्थितियों को स्पष्ट किया, उनके द्वारा समाज को दिये जाने वाले योगदान का महत्त्व सामने लाया और अधीनता की स्थिति में बदलाव हेतु समाधानों को खोजने का प्रयास किया। इस संदर्भ में श्रं`खला की कडियाँ के माध्यम से एक व्यवस्थित भारतीय स्त्रीवादी लेखन हमारे सामने आता है।
श्रृंखला की कडियाँ एवं स्त्री प्रश्न
हिंदी पद्य में पुरुषों के एकाधिकार को चुनौती देने वाली महादेवी वर्मा निराला,पंत व प्रसाद के अतिरिक्त छायावाद की प्रमुख रचनाकार थीं। पुरानी कहावत है कि यदि कोई विद्वान महिला के रूप में जन्म लेता है, तो वह मानवता की एक बडी क्षति है को गलत साबित करती महादेवी ने मानवता को अपने साहित्य के माध्यम से उत्तरोत्तर समृद्ध किया। महादेवी वर्मा उस दौर में अपना लेखन कर रही थीं जबकि महात्मा गाँधी के आंदोलन में महिलाओं का प्रवेश हो चुका था और धीरे-धीरे वे प्रमुखता से आजादी के आंदोलन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगी थीं। महिलाओं के घर की चारदीवारी से निकलकर आजादी के आंदोलन में भाग लेने से उनके एक नागरिक के रूप में स्वीकृति और उनके सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बनने ने उनकी दमित स्थितियों पर खुल कर बात करने की स्थितियाँ पैदा कीं। महादेवी वर्मा पर महात्मा गाँधी का बडा प्रभाव था। उनके कहने पर ही महादेवी ने विदेश जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त करने का विचार त्याग कर भारत में ही रहकर महिलाओं को शिक्षित करने की जम्मेदारी संभाली। गाँधी के स्त्री चिंतन से महादेवी वर्मा काफी प्रभावित थीं। उनके आदर्शों से प्रभावित महादेवी ने स्त्री को त्यागमयी, कोमल, श्रद्धा की पात्र तो माना, लेकिन वे सिर्फ वहीं सीमित नहीं रहीं। महादेवी ने अपने लेखन के माध्यम से स्त्री की एक नई छवि प्रस्तुत की जो कोमल तो है पर कमजोर नहीं। पारंपरिक तो है पर परंपरा को बहती नदी के समान स्वीकारती है, ठहरे पानी की तरह नहीं। महादेवी के स्त्री चिंतन को भारतीय और वैश्विक परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए श्रृंखला की कडियाँ एक अद्भुत पुस्तक है, जो आज भी प्रासंगिक है। श्रं`खला की कडियाँ का प्रकाशन पुस्तक रूप में 1942 में हुआ, जबकि इसमें सम्मिलित विविध आलेख 1931,1933,1934,1935,1936 तथा 1937 में लिखे जा चुके थे और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से चर्चा का विषय बन चुके थे (वेख्या, 2007)। श्रृँखला की कडियाँ में महादेवी ने स्त्री एवं पुरुष के व्यवहार का गंभीर मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया है, जो भारतीय समाज में व्याप्त वर्चस्वशाली सत्ता सम्बन्धों और उसमें महिलाओं की स्थिति को समझने में मदद करता है।
महादेवी वर्मा सर्वप्रथम स्त्री-पुरुष के बीच समानता के अधिकार की बात करती हैं, पर वे इस बात पर पूरा जोर देती हैं कि उनके बीच की जो विविधता है वह भी पूरा स्थान पाये। यह विविधता किसी वर्चस्व से संचालित नहीं है, बल्कि अलग स्वभाव, स्थितियों, जरूरतों पर संचालित है, जिसे आज सकारात्मक विभेद (पॉजटिव डिस्क्रिमिनेशन) भी कहा जाता है। महादेवी वर्मा स्त्री पुरुष के बीच इसी विभाजन की बात करती हैं। महादेवी का मानना है कि जिन स्त्रियोचित गुणों जैसे कि दया, क्षमा, त्याग, कोमलता, मातृत्व, वात्सल्य को हीन माना जाता है, वह एक पुरुषवादी सोच के कारण है। ताकि वह स्त्री की भूमिका को कमतर आँक सके। स्त्री को उसकी ही नजर में हीन बना सके। वह पुरुषोचित व्यवहार जैसे कि शुष्कता, क्रोध, प्रतिशोध, वर्चस्व को श्रेष्ठ समझ उसी का ही अनुकरण करे और ना कर पाने की स्थिति में स्वयं को मूल्यहीन मान ले। पर महादेवी दोनों की इस विविधता और मानसिक वैपरीत्य को ही समाज की अखंडता और सामंजस्य के लिए आवश्यक मानती हैं अन्यथा समाज का दृष्टिकोण एकांगी हो जाएगा (वर्मा, 2004)। इस संदर्भ में महादेवी वर्मा कहती हैं कि कहना नहीं होगा कि इसमें सफलता का अर्थ स्त्री के मधुर व्यक्तित्व को जलाकर उससे पुरुष की रुख मूर्ति गढ लेना है। फलतः आज की विद्रोहिणी नारी व्यावहारिक जीवन में अधिक कठोर है, गृह में अधिक निर्मम और शुष्क, आर्थिक दृष्टि से अधिक स्वाधीन, सामाजिक क्षेत्र में अधिक स्वच्छंद, परंतु अपनी निर्धारित रेखाओं की संकीर्ण सीमा की बंदिनी है (वर्मा, 2004, पृ. 16)। महादेवी का मानना है कि जिस प्रकार दर्पण का उपयोग तभी तक है, जब तक वह किसी दूसरे की आकृति को अपने हृदय में प्रतिबिम्बित करता रहता है, अन्यथा लोग उसे बेकार समझ कर फेंक देते हैं, उसी प्रकार स्त्रियों की भी यही स्थिति है जब तक वह पुरुष की अनुगामिनी बनी रहती है, तभी तक उसकी कुछ उपयोगिता समाज में मानी जाती है अन्यथा नहीं । पर समाज की आधी आबादी ही यदि अपने मनुष्य होने की गरिमा के साथ नहीं रह सकती, तो यह समाज या देश कैसे विकासवान हो सकता है, पूर्ण हो सकता है?
महादेवी वर्मा जिस प्रदेश की रहने वाली थीं, वह पितृसत्तात्मक व्यवस्था का गढ माना जाता है। जहाँ स्त्रियों के लिए आज भी विवाह और मातृत्व उनके अस्तित्व का नियामक है, वहाँ महादेवी तीसरे दशक में विवाह और मातृत्व के लिए स्त्री की अनिच्छा की बात उठाती हैं, उसके स्वावलंबित होने की बात करती हैं। पर्दे में रह रही औरत के लिए इन बातों के माध्यम से हम समझ सकते हैं कि वे अपने समय में कितने बडे और कठिन मुद्दे को उठा रही थीं। महादेवी कहती हैं कि-
हम स्त्रियों के विवाह की चिंता इसलिए नहीं करते कि देश या जाति में सुयोग्य माताओं और पत्नियों का अभाव हो जाएगा वरन् इसलिए कि उनकी आजीविका का कोई सुलभ साधन सोच ही नहीं पाते।... यदि उनके विवाह की चिंता न कर उनके विकास के साधनों की चिंता की जावे, जो उन्हें स्वावलंबी बना सके, तब वे अपनी शक्ति और इच्छा को समझकर यदि जीवन-संगी चुन सकें तो विवाह उनके लिए तीर्थ होगा।
नारीवाद के प्रमुख मुद्दों में स्त्री का अपने शरीर, अपनी पुनरुत्पादन क्षमता के ऊपर अपना नियंत्रण, श्रमिक महिलाओं के संघर्ष और बाहर काम करने के अधिकार की माँग, महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी, संपत्ति में अधिकार आदि की मांग उस दौर में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जोरों से थी। महादेवी इस पुस्तक के माध्यम से स्त्री की विवाह की इच्छा, जरूरत, सही साथी एवं स्वावलंबन, श्रमिक महिलाओं के संघर्ष को सामने लाकर उसका समाधान, महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी के विचार के साथ नारीवाद की प्रखर पैरोकार के रूप में हमारे सामने आती हैं। महादेवी ने कभी नहीं कहा कि वे नारीवादी हैं, पर उनके विचार और लेखन उन्हें इसी ओर लेकर आते हैं।
महादेवी वर्मा प्राचीनकाल में स्त्रियाँ की तथाकथित उन्नत दशा को अस्वीकार करते हुए कहती हैं कि तब स्त्री धार्मिक, सामाजिक दृष्टि से उन्नत होने पर भी आर्थिक दृष्टि से नितांत परतंत्र ही रही। किसी पर आर्थिक निर्भरता को वे स्त्री के लिए सबसे हानिकारक रूप में देखती हैं। उनका मानना है कि किसी भी सामाजिक प्राणी के लिए ऐसी स्थिति अभिशाप है, जिसमें वह स्वावलंबन का भाव भूलने लगे क्योंकि इसके अभाव में वह अपने सामाजिक व्यक्तित्व की रक्षा नहीं कर सकता। स्त्रियों की राजनीतिक भागीदारी के संदर्भ में उनका मानना है कि शासन व्यवस्था में स्त्रियों को स्थान ना मिलने से आधा नागरिक समाज प्रतिनिधिहीन रह जाएगा। स्त्रियों का शासन व्यवस्था में पर्याप्त संख्या में रहकर अपनी अन्य बहनों के लिए हित अनहित विषयक अस्पष्ट विचारों को स्पष्ट करना और उन्हें त्रि*यात्मक रूप देना ही समाज के लिए हितकर सिद्ध होगा।
श्रमजीवी स्त्रियों और उनके कार्य के घंटों की अधिकता और घर के काम की पहचान की बात माक्र्सवादी नारीवाद का प्रमुख मुद्दा रहा है। इस मुद्दे को महादेवी वर्मा ने प्रमुखता के साथ उठाकर अपनी विस्तृत दृष्टि का परिचय दिया है, वे सिर्फ मध्यमवर्गीय स्त्रियों के मुद्दों तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि दोहरे तिहरे शोषण की शिकार श्रमिक स्त्री की दयनीयता और उसके संघर्ष उनके चिंतन का प्रमुख हिस्सा है। वे कृषक और श्रमजीवी स्त्रियों की जागृति के बगैर स्त्रियों की जागृति अपूर्ण मानती हैं। श्रमिक स्त्रियों के हालात पर वे कहती हैं कि
सुबह छह बजे, गोद में छोटे बालक को तथा भोजन के लिए एक मोटी काली रोटी लेकर मजदूरी के लिए निकली हुई सती जब संध्या सात बजे समय पर घर लौटती है तो संसार भर का आहत मातृत्व मानो उसके शुष्क होठों पर कराह उठता है। उसे श्रांत, शिथिल शरीर से फिर घर का आवश्यक कार्य करते और उस पर मद्यप पति के निष्ठुर प्रहारों को सहते देख कर करुणा को भी करुणा आए बिना नहीं रहती। (वर्मा, 2004, पृ.27)
आज के धारावाहिकों को देखकर लोगों के मन में एक बात जरूर कचोटती है कि इसमें दिखाये जाने वाले सम्पन्न तबकों के महिला पात्रों के पास क्या घरेलू षड्यंत्रों और रसोई के अतिरिक्त कोई दूसरा काम नहीं है? महादेवी वर्मा इन महिलाओं की सामाजिक भूमिका को बहुत महत्त्वपूर्ण मानती हैं और कहती हैं कि सम्पन्न महिलाएँ अपने गृह तथा संतान की इतर व्यवस्था के लिए अनेक दास दासियाँ रखकर केवल व्यक्तिगत विनोद और परंपरा-पालन की ओर ध्यान देती हैं। वास्तव में इसी श्रेणी की महिलाओं में से अनेक को स्त्रियों के स्वत्वों के निरीक्षण करने का अवकाश और उस ज्ञान को सब में फैलाने के साधन सुगमता से मिल सकते थे। (वर्मा, 2004 पृष्ठ 25)
इस प्रकार महादेवी वर्मा सम्पन्न परिवारों या कहें कि उच्चवर्गीय स्त्रियों से अपनी बाकी बहनों की बेहतरी के लिए विविध प्रयासों के साथ उचित ज्ञान के प्रसार की अपेक्षा करती हैं। स्त्रीवाद ने एक और महत्त्वपूर्ण मुद्दे को उठाया है। वह है युद्ध एवं सैन्यीकरण का विरोध। खासतौर पर उग्रवादी नारीवाद और पर्यावरणीय नारीवादियों ने युद्ध के विचार को ही पितृसत्तात्मक माना है क्योंकि यह किसी दूसरे पर कब्जे का भाव पैदा करता है। उसकी संपत्ति को अपना बनाता है और न बना पाने की स्थिति में उसे नष्ट कर देता है। युद्ध का सबसे बुरा प्रभाव महिलाओं पर पडता है क्योंकि युद्ध की हिंसा उनके परिवारों और बच्चों को तबाह कर देती है, वहीं बडी संख्या में महिलाएँ युद्धजनित हिंसा, बलात्कार, महिलाओं की लूट का शिकार होती हैं। उनका जीवन तितर-बितर हो जाता है। वे कभी युद्ध नहीं चाहती, जबकि युद्ध हमेशा पुरुषों की मर्जी से संचालित किए जाते हैं। जापान, अफगानिस्तान, इराक, सीरिया ऐसे ही कितने देशों के उदाहरण हमारे सामने हैं। महादेवी वर्मा अपने निबंध युद्ध और नारी में इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करती हैं। वे बताती हैं कि एक स्त्री पुरुष के दृष्टिकोण से युद्ध को नहीं देख सकती। पुरुष के लिए घर का उजड जाना एक सुख के साधन का बिगड जाना है, परंतु स्त्री के लिए यही जीवन का बिगड जाना है। युद्ध महिलाओं के लिए बहुत हिंसक होते हैं। क्यों होते हैं? इस पर महादेवी बताती हैं कि जिस सैनिक के नेत्रों में मृत्यु की छाया नाच रही हो उस सैनिक के निकट स्त्री केवल स्त्री है, उसके त्याग, तपस्या, साधना, प्रेम आदि गुणों का वह क्या करेगा। इन गुणों का विकास तो सहचर्य में ही संभव है। सवेरे तक तलवार के घाट उतरने या उतारने वाला वीर स्त्री की रूप मदिरा का केवल एक घूंट चाह सकता है। वह उसके दिव्य गुणों का मूल्य आँकने का समय कहाँ पावे और यदि पा भी सके तो उन्हें कितने क्षण अपने पास रख सकेगा। (वर्मा, 2004) महादेवी ने इस प्रकार युद्ध का महिलाओं पर प्रभाव और उसका कारण बहुत सरलता से स्पष्ट किया है। जो महिलाएँ युद्ध या हिंसा के समर्थन में होती हैं, उनकी इस मानसिकता का भी विश्लेषण महादेवी ने किया है। वे मानती हैं कि महिलाओं द्वारा युद्ध के विरोध को पुरुषों ने उनकी शारीरिक और मानसिक कमजोरी के रूप में सामने रखा। भावुकता को शक्तिहीनता कहा। अपनी तथाकथित कमजोरी से पीछा छुडाने के लिए महिलाओं ने युद्ध को गर्व के साथ स्वीकार भी किया और पुरुषों को युद्ध की तरफ प्रेरित भी किया। चाहे बाद में यह युद्ध उनके ऊपर कितनी भी हिंसा लेकर क्यों न टूटा हो। (वर्मा, 2004, पृष्ठ 34)
महादेवी घर और बाहर का भी मुद्दा उठाती हैं। उनका मानना है कि औरतों की जितनी जरूरत घर में है उतनी बाहर भी क्योंकि शिक्षित महिला को उसके ज्ञान के उपयोग से वंचित रखने से उसका जीवन कुंठित होता चला जाता है। जैसा कि समकालीन नारीवादी भी मानते हैं, महादेवी का भी कहना है कि घर और बाहर का विभाजन सिर्फ उच्चवर्गीय या मध्यवर्गीय महिलाओं के ही बीच है, श्रमिक वर्ग की महिलाओं के बीच ऐसा कोई विभाजन नहीं है क्योंकि उन्हें दोनों ही क्षेत्र में कार्य संभालना होता है। महादेवी कहती हैं कि यदि विवाह सार्वजनिक जीवन से निर्वासन न बने तो निश्चय ही स्त्री की स्थिति इतनी दयनीय न रह सकेगी। महादेवी वर्मा पुरुषों के समान ही स्त्रियों के लिए एक ऐसा स्पेस चाहती हैं जिसमें वे घरेलू जिम्मेदारियों और संतान के पालन पोषण के अतिरिक्त घर के बाहर भी अपना जीवन विकसित कर सकें, स्वावलम्बी बन सकें। इस प्रत्रि*या में वे यह बिलकुल नहीं मानती कि इससे संतान के विकास में कोई बाधा पहुंचेगी, बल्कि वे मानती हैं कि इससे बच्चे को एक स्वावलम्बी मां का साथ मिलेगा। महादेवी वर्मा शिक्षा, चिकित्सा जैसे क्षेत्रों के साथ कानून जैसे क्षेत्र में भी महिलाओं के प्रवेश करने की हिमायती रही हैं। शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र महिलाओं के लिए एक पारंपरिक सोच लिए कहे जा सकते हैं क्योंकि इन दोनों में ही देखभाल और सेवाभाव होता है पर कानून के क्षेत्र मं। महिलाओं के आने को वे उनके अधिकारों के ज्ञान के साथ जोडती हैं। कानून का क्षेत्र महिलाओं के लिए आज भी बेहतर नहीं माना जाता क्योंकि उसमें बहस, अपनी बात मनवाना, अपराधियों से मिलने, बात करने जैसी स्थितियाँ रहती हैं। कई बार वकालत पढी महिलाएँ बताती भी हैं कि उन्हें विवाह के लिए काफी चुनौतियों का सामना करना पडा। लोग उन्हें अच्छी पत्नी के रूप में नहीं देखते। पर महादेवी इस क्षेत्र में महिलाओं के आने की हिमायत करती हैं ताकि उन्हें अपने अधिकार और स्वत्व का ज्ञान हो सके। इस सबके लिए वे पुरुषों के सहयोग और संवेदनशीलता की अपेक्षा रखती हैं। वे पुरुषों से अपेक्षा करती हैं कि वे अपने वर्चस्व को छोडकर महिलाओं को बाहर आकर काम करने में मदद करें। साथ ही वे इस बात की हिमायत भी करती हैं कि पुरुषों को इस बात से भी भयभीत नहीं होना चाहिए कि उनके साथ कोई अति शिक्षित व्यक्ति बस जाएगा। जब निरक्षर स्त्री भी बडे से बडे डॉक्टर या वकील के साथ विवाह होने पर भयभीत नहीं होती और अपने घर का संचालन बेहतर तरीके से कर लेती है तो पुरुषों को भी शिक्षित स्त्रियों से किसी प्रकार का भय या संकोच नहीं रखना चाहिए। इस भय का कारण भी महादेवी बताती हैं कि पुरुषों को लगता है कि शिक्षित स्त्रियों पर वे अपना वर्चस्व स्थापित नहीं कर पाएँगे। शिक्षित स्त्रियों के प्रति यह सोच उस समय समाज में बहुत ज्यादा व्याप्त थी। महादेवी इसे खारिज करते हुए पुरुषों से कहती हैं कि अगर वे अपने परिवार और देश को बेहतर बनाना चाहते हैं तो महिलाओं को यह सहयोग उन्हें देना ही होगा तथा सार्वजनिक जीवन में महिलाओं के जाने पर उन पर भरोसा भी रखना होगा। इन सबसे ऊपर महादेवी स्त्रियों के नागरिक बनने को देश के विकास का सबसे महत्त्वपूर्ण कदम मानती हैं। स्त्रियों के जीवन लक्ष्य की ओर ध्यान केन्द्रित करते हुए वे कहती हैं कि राष्ट्र की सुयोग्य संतान की माता बनना उनका कर्तव्य हो सकता है, परंतु केवल उसी पर उनके नागरिकता के सारे अधिकारों का निर्भर रहना अन्याय ही कहा जाएगा।
इस प्रकार हम देखते हैं कि उन्नीसवीं शताब्दी में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे स्त्री आंदोलन और उनके मुद्दे सिर्फ पश्चिम में ही सक्रियता से नहीं उठ रहे थे अपितु भारतीय संदर्भों में भी उठाए जा रहे थे। महादेवी वर्मा अपनी इस सारगर्भित पुस्तक में विविध स्त्रीवादी दृष्टिकोणों के साथ बात करती हैं। उन्हें स्त्रीवाद के किसी एक खांचे में नहीं डाला जा सकता। उनके लिए जितना जरूरी स्त्री के अपने शरीर पर अधिकार है, उतना ही जरूरी उसके श्रम का सम्मान भी है। जितना जरूरी वे स्त्रियों के लिए शिक्षा, नागरिक अधिकार और संपत्ति मानती हैं, उतना ही युद्ध का विरोध भी। वे जितनी चिंतित एक विधवा के लिए हैं, उतनी ही एक श्रमिक स्त्री के लिए भी। और वे पुरुषों से सहयोग की अपील भी करती हैं, ताकि देश, परिवार और महिलाओं के विकास में महिलाएं स्वयं सहभागी बन सकें। वे कहती हैं कि हमें न किसी पर जय चाहिए, न किसी से पराजय, न किसी पर प्रभुता चाहिए न किसी का प्रभुत्व। केवल अपना वह स्थान, वे स्वत्व चाहिए जिनका पुरुषों के निकट कोई उपयोग नहीं है, परंतु जिसके बिना हम समाज का उपयोगी अंश नहीं बन सकेंगी। हमारी राष्ट्रीय जागृति इसे प्रमाणित कर चुकी है कि अवसर मिलने पर गृह के कोने की दुर्बल बंदिनी स्वच्छंद वातावरण में बल प्राप्त पुरुष शक्ति से कम नहीं। पृष्ठ 29।

हम कह सकते हैं कि महादेवी वर्मा ने स्त्री मुद्दों को एक साथ लाकर समग्रता में समझने का प्रयास किया है। यही उनके नारीवाद का आधार है। समग्रता। महादेवी की इस पुस्तक की सबसे बडी खासियत है कि यह पुरुषों को महिलाओं के प्रति अपने भेदभाव भरे नजरिए को बदलने के लिए प्रेरित करती है। पुरुषों के जीवन में आने वाले बदलावों और उससे सहर्ष जुडने की प्रेरणा भी देती है। महिलाओं की मुक्ति के लिए उनके साथियों को भी तैयार करने की जरूरत को महादेवी समझती हैं, क्योंकि महिलाओं की मुक्ति में ही पुरुषों की मुक्ति है। उदारवादी नारीवाद, उग्रवादी नारीवाद, समाजवादी नारीवाद माक्र्सवादी नारीवाद, पर्यावरणीय नारीवाद इन सभी से निकले हुए मुद्दे महादेवी के लेखन में आते हैं, जो हमें उनकी समग्र दृष्टि का अहसास कराते हैं। महादेवी वर्मा कुछ मामलों में परंपरागत रवैया अपनाती हैं, पर वे उनके द्वारा उठाए गए प्रगतिशील मुद्दों से कम हैं। हर व्यक्ति और विचार की अपनी देशकाल, परिस्थिति एवं सीमाएँ होती हैं। उस काल के नजरिए से हम देख सकते हैं कि महादेवी वर्मा का चिंतन हिन्दी क्षेत्र में एक क्रान्ति की शुरुआत लेकर आता है। इस पुस्तक ने स्त्री विमर्श को एक नई दिशा भी दी है कि महिलाओं की मुक्ति पुरुषों की मुक्ति के साथ जुडी हुई है। महादेवी ने स्त्री मुद्दों को समग्रता में समझाते हुए इस बात को स्पष्ट किया कि स्त्री की अधीनता का कोई एक कारण नहीं है, बल्कि यह विविध प्रकार के कारणों से जुडकर एक बडी अधीनता का निर्माण करती है। अतः स्त्री अधीनता को भिन्न भिन्न आयामों की समग्रता में समझना होगा। इसी समग्रता की कडी में वर्तमान स्त्री आंदोलन और स्त्री विमर्श में दलित महिलाओं के मुद्दों को पितृसत्ता और जाति व्यवस्था के अंतस्संबंध के साथ समझने का सफल प्रयास किया है। इस अंतस्संबंध की झलक हम महादेवी की इस पुस्तक में देख सकते हैं । कन्या को संपत्ति क्यों नहीं दी जाती थी उसके एक कारण के रूप में वे बताती हैं कि कभी युवतियाँ स्वयंवरा होती थीं, तो कभी बलात् छीनी भी जा सकती थीं। ऐसी दशा में पैतृक संपत्ति में उनके उत्तराधिकारी होने पर अन्य परिवारों के व्यक्तियों का प्रवेश भी वंश परंपरा को अव्यवस्थित कर सकता था। उनकी इस बात से हम जाति, वर्ग और जेंडर के अंतस्संबंधों को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं। स्त्री किसी दूसरे कुल में विवाह कर सकती है, अतः उसे संपत्ति नहीं दी गई, ताकि परिवार की संपत्ति किसी ऐसे व्यक्ति के पास ना चली जाए जिसके पास संपत्ति जाना निषेध हो। स्वयंवरा और बलात् स्त्री को एक श्रेणी में रखा जाना ही बताता है कि मुख्य उद्देश्य स्त्री की यौनिकता पर नियंत्रण के माध्यम से जाति और संपत्ति पर नियंत्रण का है। विवाहित स्त्री की इस संदर्भ में चर्चा नहीं है। ऐसे कई संबंध हैं, जो बताते हैं कि महादेवी समाज को उसकी जटिलता के साथ समझने का दृष्टिकोण हमें देती हैं। स्त्री विमर्श को आगे बढाने की दिशा में हमें समझना होगा कि अब हमें समग्र रूप में संरचनात्मक स्थितियों के असंतुलन पर बात करनी होगी तभी महिला पुरुष के जीवन के असंतुलन को भी संतुलित किया जा सकेगा।

संदर्भ :
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सम्पर्क: द्वारा, अतुल कुमार तिवारी, 202/2, मेजर कलशी क्लासेज, सूर चौराहा, टैगोर टाऊन, इलाहाबाद (उत्तरप्रदेश)