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गीत में महाकाव्य रचने का कौशल

हेमंत कुकरेती
आदिकाल को काव्य-प्रवृत्तियों के आधार पर चारणकाल या वीरगाथा काल भी कहा जाता है। आचार्य शुक्ल ने आदिकाल को वीरगाथा काल (संवत् 1050-1375 तक) नाम देते हुए इसका समय 325 वर्ष का माना है।
अपने हिंदी साहित्य का इतिहास में आचार्य शुक्ल बताते हैं कि ऐसा प्रसिद्ध है कि कालिंजर के राजा परमार के यहाँ जगनिक (संवत् 1230) नाम के एक भाट थे, जिन्होंने महोबे के दो प्रसिद्ध वीरों आल्हा और ऊदल (उदयसिंह) के वीरचरित का विस्तृत वर्णन एक वीरगीतात्मक काव्य के रूप में लिखा था, जो इतना सर्वप्रिय हुआ कि उसके वीरगीतों का प्रचार क्रमशः सारे उत्तरी भारत में, विशेषतः उन सब प्रदेशों में, जो कन्नौज साम्राज्य के अंतर्गत थे-हो गया।’ आचार्य शुक्ल की मान्यता है, कि ‘आलहाखंड’ सुचिंतित या परंपरित महाकाव्य नहीं है-जगनिक के काव्य का आज कहीं पता नहीं है, पर उसके आधार पर प्रचलित गीत हिंदी भाषा-भाषी प्रांतों के गाँव-गाँव में सुनाई पडते हैं। ये गीत आल्हा के नाम से प्रसिद्ध हैं और बरसात में गाए जाते हैं। गाँवों में जाकर देखिए तो मेघगर्जन के बीच में किसी अल्हैत के ढोल के गंभीर घोष के साथ यह वीर हुँकार सुनाई देगी-
बारह बरिस लै कूकर जीएँ,
औ तेरह लै जिएँ सियार।
बरिस अठारह छत्री जिएँ,
आगे जीवन को धिक्कार।
इस प्रकार साहित्यिक रूप में न रहने पर भी जनता के कंठ में जगनिक के संगीत की वीरदर्पपूर्ण प्रतिध्वनि अनेक बल खाती हुई अब तक चली आ रही है। इस दीर्घ कालयात्रा में उसका बहुत कुछ कलेवर बदल गया है। देश और काल के अनुसार भाषा में ही परिवर्तन नहीं हुआ है, वस्तु में भी बहुत अधिक परिवर्तन होता आया है। बहुत से नए अस्त्रों, (जैसे बंदूक, किरिच), देशों और जातियों (जैसे फिरंगी) के नाम सम्मिलित हो गए हैं और बराबर हो जाते हैं। यदि यह ग्रंथ साहित्यिक प्रबंध पद्धति पर लिखा गया होता तो कहीं-न-कहीं राजकीय पुस्तकालयों में इसकी कोई प्रति रक्षित मिलती। पर यह गाने के लिए ही रचा गया था। इसमें पंडितों और विद्वानों के हाथ इसकी रक्षा की ओर नहीं बढे, जनता ही के बीच इसकी गूँज बनी रही-पर यह गूँज मात्र है, मूल शब्द नहीं। आल्हा का प्रचार यों तो सारे उत्तर भारत में है, पर बैसवाडा इसका केंद्र माना जाता है, वहाँ इसे गाने वाले बहुत अधिक मिलते हैं। बुंदेलखंड में-विशेषतः महोबा के आसपास भी इसका चलन बहुत है। यह फुटकर गीतों का महाकाव्यात्मक संयोजन है-इन गीतों के समुच्चय को सर्वसाधारण आल्हाखंड कहते हैं, जिसमें अनुमान होता है कि आल्हा संबंधी ये वीरगीत जगनिक के रचे उस बडे काव्य के एक खंड के अंतर्गत थे, जो चंदेलों की वीरता के वर्णन में लिखा गया होगा। आल्हा और ऊदल परमाल के सामंत थे और बनाफर शाखा के क्षत्रिय थे। इन गीतों का एक संग्रह आल्हाखंड के नाम से छपा है। फर्रुखाबाद के तत्कालीन कलेक्टर मि. चार्ल्स इलियट ने पहले-पहल इन गीतों का संग्रह करके छपवाया था।’ अधिकतर कवियों ने वीरकाव्य परंपरा या चारण काव्य परंपरा का निर्वाह करते हुए अपने आश्रयदाताओं का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन किया है लेकिन हर युग में कुछ ऐसे विलक्षण रचनाकार होते हैं जो धारा के विपरीत बहते हैं। आदिकाल का जगनिक कवि इसी श्रेणी में आता है। वह चंदेल नरेश का राज्याश्रित कवि था लेकिन उसने प्रशस्ति गायन उस युग के महान योद्धा आल्हा का किया। उसने इस सिलसिले में जो महाकाव्य लिखा, वह एक प्रकार से वीरता का अंतहीन वर्णन है। जगनिक का यह कविकर्म उसे उस दौर के रचनाकारों के बीच उच्च क्रम पर स्थापित करता है। आल्हा को केंद्र में रखकर जगनिक ने जो लिखा वह आज भी देश के एक बडे भू-भाग में असाधारण रूप से लोकप्रिय है। नगर और कस्बों में ही नहीं, उसकी व्याप्ति गाँवों की झोंपडियों में भी है। उसकी पंक्तियाँ निरक्षर जनों के कंठ में आज भी गूँजती हैं। शौर्य और श्रं`गार के समग्र सौंदर्य को प्रस्तावित करने वाला यह कवि साधारण जनता से लेकर काव्य-मर्मज्ञों के बीच समान रूप से समादृत है।
प्राचीन और आदिकालीन कवि ही नहीं,मध्यकालीन कवियों के जन्मस्थान और रचनाकाल को लेकर साहित्येतिहासकार और आलोचक एक मत नहीं हैं। यह बात जगनिक के संदर्भ में भी लागू होती है। यह समस्या इसलिए विषम होती गई कि आल्हा और जगनिक के नाम से कई रचनाकार और काव्य नायक हो गए हैं। फिर भी परमाल के शासन काल (1115 से 1202 ई) में दरबारी कवि होने के आधार पर जगनिक का रचना काल 1160 ई. से मृत्योपरांत रहा होगा। आल्हा परमाल की पराजय 1182 के कुछ वर्ष बाद लिखा गया होगा। जगनिक के जन्मस्थल को लेकर भी मत-भिन्नता है। कोई उन्हें सकोहा (जगनेर) तहसील हटा (दमोह) से, कोई आगरा जिले की खैरागढ तहसील का मानता है। ज्यादातर विद्वान उन्हें महोबा (बुंदेलखंड) के आसपास के किसी गाँव का निवासी मानते हैं। माना यह भी जाता है कि जगनिक तथा आल्हा ऊदल बाल सखा थे। स्पष्ट है कि महत्त्वपूर्ण रचनाकार होने के कारण इस कवि की ख्याति और स्वीकार्य दूर-दूर तक थी। आदिकाल में बुंदेलखंड की वीर संस्कृति और बुंदेलखंडी भाषा को इस रचनाकार ने साहित्यिक ऊँचाईयाँ दी हैं।
चंदेल नरेश परमदेव खुद एक अच्छे कवि थे और उसके दरबार में अन्य कवियों के अलावा दो प्रमुख कवि जगनिक और गदाधर थे। जो राजा के साथ युद्ध क्षेत्र में भी जाते थे। अधिकांश कवियों के पांडित्य की परीक्षा के लिए आश्रयदाता सामंत काव्य प्रतियोगिता और शास्त्रार्थ कराते थे। इससे कविता और काव्य-समीक्षा आगे बढती थी।
भाषिक दृष्टि से आदिकाल हिंदी का उद्भव काल है। संस्कृत के बाद पालि, प्राकृत,अपभ्रंश की टकराहट या मेल से कई स्थानीय बोलियाँ एवं भाषाएँ अस्तित्व में आ रही थीं। इस युग की तत्काल पूर्ववर्ती, अपभ्रंश भाषा का प्रयोग बेहद कम हो चला था। पश्चिमी हिंदी की एक प्रमुख बोली के रूप में बुंदेली का साहित्यिकस्वरूप परिष्कृत हो रहा था। यह बोली अधिक समर्थ संफ भाषा और साहित्य-भाषा के रूप में खडी हो रही थी। आल्हा खंड जैसे महाकाव्य का सृजन इस तथ्य की पुष्टि करता है।
अधिकतर कवि रासो परंपरा की काव्य रचना कर रहे थे। रासो परंपरा संस्कृत की रास से विकसित हो रही थी। इसमें नृत्य और गीत केंद्रित गीतात्मक रासो के साथ विविध छंदों से संपन्न प्रबंध काव्य की दो धाराएँ समानांतर बह रही थीं। दोनों में चरितनायकों की प्रशस्ति का गायन था। पहली श्रेणी के गीतात्मक रासो-काव्य में वह गाया जाता था और प्रबंध रासो-काव्य एक प्रकार से पठ्य काव्य की पूर्ति कर रहे थे। गेय रासो-काव्य मौखिक काव्य परंपरा में आते थे जिसमें चरित नायकों की कीर्ति को गाया जाता था।
जगनिक का आल्हा या आल्हा खंड गीतात्मक रासो परंपरा का एक वाचिक काव्य है। डॉ. करुणा शंकर दूबे के अनुसार लोक में प्रचलित वह भाव-राशि जो अपनी असाधारणता लोकोत्तरता से जनता-जनार्दन के हृदय पर अधिकार किए रहती है; वास्तव में वाचिक काव्य है। यह लिपिबद्ध होकर अमरता प्राप्त कर लेती है। वाचिक कविता का प्रधान गुण उसकी लोक में व्याप्ति है लेकिन यह तभी संभव होता है जब रचना की अंतर्वस्तु सामान्य जन को अपनी ही बात लगती हो, ऐसी कविता लोक में प्रचार-प्रसार के लिए रची जाती है। रचयिता उसका संकलन-संपादन नहीं करता, मौखिक ही रहने देता है। वह लोक में श्रुति परंपरा से ही जीवित रहती। जब ये अत्यधिक महत्त्वशाली हो जाती है तो किसी प्रबुद्ध व्यक्ति का ध्यान उसकी ओर जाता है और वह उसे संकलित-संपादित करता है। इस स्थिति में वह अमर हो जाती है। विश्लेषण योग्य बन जाती है और आगे की पीढियों के लिए रक्षित हो जाती है। यह पंक्तियाँ आल्हा खंड जैसे रासोग्रथों के संदर्भ में सटीक बैठती हैं।
यह रचना जन कंठों में सुरक्षित रही। पीढी-दर-पीढी उसमें परिष्कार और परिमार्जन होते रहे। कोई प्रामाणिक हस्तलिखित प्रति नहीं मिलने के बावजूद एक प्रबुद्ध काव्य रसिक चार्ल्स इलियट ने अठारह सौ पैसठ में इसके कुछ अंश संकलित संपादित कराए। जगनिक के इस काव्य को विद्वान भिन्न-भिन्न नामों से पुकारते हैं, आचार्य रामचंद्र शुक्ल उसे ‘वीर गीतों का समुच्चय’, जय शंकर प्रसाद ‘संकलनात्मक महाकाव्य’, जार्ज ग्रियर्सन ‘महाकाव्य’, डॉ. नर्मदा प्रसाद गुप्त, डॉ. गोविंद रजनीश, पंडित उदय शंकर दुबे ‘लोक महाकाव्य’; डॉ. शंभु नाथ सिंह, ‘विकसनशील महाकाव्य’ तथा केशवचंद्र मिश्र जगनिक को ‘महाकाव्य के नेता’ की संज्ञा देते हैं। इसकी कथावस्तु पर आधारित उपजीवी काव्य संपदा तथा गद्य साहित्य-उपन्यास, नाटक आदि का भी पर्याप्त सृजन हुआ। इन सभी अभिमतों के अनुशीलन से यह निष्कर्ष निकालना सहज ही है कि आल्हा खंड लोक महाकाव्य की श्रेणी में आता है। इसमें महाकाव्य तथा लोककाव्य दोनों के लक्षण मिलते हैं। अयोध्याप्रसाद गुप्त ‘कुमुद’ का यह कथन इस रचना के महत्त्व को उजागर करता है। इसमें भारतीय काव्य-शास्त्र द्वारा निर्धारित महाकाव्य के लगभग सभी गुण मौजूद हैं । सिवाय इसके कि इसमें उच्च कुल शील धीरोदात्त नायक के बजाय एक उपेक्षित जाति का व्यक्ति नायक है। यानी इसका नायक कोई प्रतापी क्षत्रिय या विद्वान ब्राह्मण नहीं बल्कि जगनिक ने जाति व्यवस्था में उपेक्षित रह गए एक वीर को इसका नायक बनाया है। जो इस तरफ इशारा करता है कि लोकमानस जाति के आधार पर नहीं, गुणों के आधार पर अपने नायक का चुनाव करता है। दूसरा जगनिक ने शिल्प के धरातल पर नवीनता दिखाते हुए केवल एक ही छंद आल्हा या वीरछंद में यह समूचा काव्य लिख दिया है।
जगनिक ने आल्हा को इसलिए नायकत्व दिया कि उसने केवल सोलह वर्ष की उम्र में अपने पिता की हत्या का प्रतिशोध मारौगढ जीत कर लिया था और कुछ ही समय के बाद बावनगढ जीतकर साका (यश) अर्जित किया था। यही कारण है कि उसे धर्मराज युधिष्ठिर का अवतार माना गया है। उसकी शूरवीरता का बखान शत्रु का राजकवि चंद बरदाई अपने पृथ्वीराजरासो में यह कहकर देता है कि चौहान अब तुम सावधान हो जाओ। तुम्हारा सामना एक विलक्षण वीर आल्हा से हो रहा है! श्रेष्ठता या वंशानुक्रम से कोई नायक नहीं बनता बल्कि अपने शौर्य से नायकत्व अर्जित करता है। जगनिक के आल्हा खंड महाकाव्य की कथावस्तु लोकरुचि के अनुसार अत्यंत दिलचस्प है। आल्हा ऐसा नायक है जिसके पराक्रम के ओजस्वी बिंब कवि ने निर्मित किए हैं। दिलचस्प बात यह है कि इस काव्य ग्रंथ का प्रतिनायक पृथ्वीराज चौहान है। यानी दिल्ली सम्राट् पृथ्वीराज की छवि इस रचना में खलनायक की बनती है। असली खलनायक परमाल का साला राजा माहिल परमार है। वह अपने पिता का राज्य महोबा छीन जाने के कारण चंदेल राजवंश और उसकी रक्षा में तत्पर सेनापति आल्हा से नफरत करता है। माहिल परमार के चरित्र को उजागर करते हुए कवि ने लोक में व्याप्त पदावली को मुहावरों का रूप दे दिया है-
ताला बिगारे ते काईन नें,
औ चुगलिन ने बिगारे गाँव
माहिल भूपति की चुगलिन सें,
बाराबाट भये परमाल।
ये पंक्तियाँ दिलचस्प अंदाज में तत्कालीन राजनीति के टकराव और बिखराव के कारणों को स्पष्ट कर देती हैं। काई के जमाव के कारण जिस प्रकार तालाब नष्ट होजाते हैं, उसी प्रकार माहिल जैसे कुटिल लोगों के कारण परमाल और आल्हा जैसे योद्धा अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं। महाकाव्य की कथावस्तु चौहान और चंदेल राजवंशों की लडाईयों के विवरण से युक्त है।
महाकाव्य के प्रारंभिक दो समयों (अध्यायों) में देश के प्रमुख राजवंशों के शौर्य और ऐश्वर्य का बखान किया गया है। फिर आल्हा-ऊदल की वीरता का वर्णन है। इस महाकाव्य के अंत में चौहान और चंदेलवंशों की आपसी लडाइयों का वर्णन है जिसके कारण राष्ट्र की एकता समाप्त हो जाती है। योद्धाओं का अंत होता है और काव्य-उद्देश्य के रूप में कवि यह चेतावनी देता है कि अगर हम आपस में ही लडते रहे तो आखिरकार सभी विनाश को प्राप्त हो जाएँगे।

यह काव्य युद्ध की विनाशक अपसंस्कृति को दिखाता है। रचनाकार ने अत्यंत मनोयोग से वीरता के बिंब रचे हैं। वीरों की सज्जा के साथ-साथ अश्व, गज, शस्त्र और सैन्य सज्जा का आँखों देखा विवरण कविता में दिया गया है। हथियारों का प्रहार कैसे किया जाता है! युद्ध के नियम-कानून क्या होते हैं? युद्धकाल में वीरों की मानसिक अवस्था कैसी होती है-ये सारे विवरण पढते या सुनते समय मस्तिष्क में अंकित हो जाते हैं।
इस महाकाव्य में कवि ने केवल रणक्षेत्र का हाल ही नहीं दर्ज किया बल्कि मानव-मनोविज्ञान और जीवन की विलक्षण सच्चाईयाँ भी उसकी बारीक नजर ने बच नहीं सकी हैं। उसने दिखाया है कि माहिल अपनी ही बहन का अहित करता है। लेकिन उसका पुत्र अभयी अपने नाम के अनुसार अपने स्वामी और देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर देता है। युद्ध कौशल में माहिर अभयी शत्रुओं के प्रलोभन में नहीं आता। माँ के समान आदरणीय महोबा का गौरव बचाने के लिए वह शहीद हो जाता है।
कवि ने स्थानीय प्रकृति के अनेक दृश्य भी रचे हैं। कीर्ति सागर सरोवर और बेतवा नदी के अलावा वर्षा के अद्भुत चित्र अपने महाकाव्य में प्रस्तुत किए हैं-
नदी बेतवा तुमको ध्यावें, निर्मल बहे दूध की धार।
लहर-लहर के तेज ओज पै, बारे कोटि तीर तलवार।
जहाँ समीरन की बीना पै, साजि चंद किरनन के तार।
बन की देवी सुर मेघन तें, बरसाती है राग मल्हार।
वीर अपने स्वभाव और चरित्र के अनुसार अपना स्नेह देश के गौरव को समर्पित करते हैं। एक साखी देखिए-
नारी, विद्या, बेल, नृप जे न गिनै कुल जात
जो इनके नियरे रहें, उनहीं सें लिपटात।
अर्थात् नारी, विद्या देने वाला अर्थात् शिक्षक, बेल या लता और राजा, कुल एवं जाति नहीं देखते हैं। जो उनके समीप रहते हैं, उससे ही लिपट जाते हैं। उसे ही स्वीकार लेते हैं। ऐसे ही जगनिक ने लिखा है कि गधा, मूर्ख, उल्लू और पशु सभी महीनों में सुखी रहते हैं क्योंकि उन्हें केवल अपना पेट भरना है लेकिन विवेकशील होने के कारण, चकवा, चातक और चतुर मनुष्य आठों पहर उदास रहते हैं-
खर, मूरख, घुग्घू, पसु, सदा सुखी सब मास।
चकवा चातक चतुर नर, आठउ पहर उदास।
जगनिक के आल्हा खंड ने समकालीन और बाद के कवियों को काव्य-विषय ही नहीं सुझाए; कविता लिखने का सही तरीका भी सिखाया है। जगनिक ने लोक में प्रचलित बुंदेली भाषा का रचनात्मक उपयोग करना सिखाया है।
आदिकाल को वीरगाथाकाल आल्हा खंड जैसी रचनाओं के आधार पर कहा जाता है। युद्ध के जीवंत दृश्य यहाँ मिलते हैं।
जगनिक ऐसे दृश्य रचते हुए लिखता है कि दिल्ली नरेश की सेना चलने से दिन की रात हो गई और उसने कीर्तिसागर को ऐसे घेर लिया, जैसे बत्तीस दाँतों ने जीभ को घेर लिया हो! पैदल सैनिकों से पैदल भिड गए और हाथियों के दाँत से दाँत अड गए। घोडों के कान से कान मिल गए और चारों ओर युद्ध होने लगा। तेगा खट-खट और तलवार छपक-छपक बोलने लगे।
राजपूतों का रहुकुला चलने लगा और सिरोही का डेढ गुना भाग दबा रहता था। करिया गाजे के भाला की अनी पर मौत बैठी रहती थी, इसलिए जो योद्धा उसे चला देता था, वह (भाला) सूखा उस पार निकल जाता था।
युद्ध हुआ, योद्धा गिर गए और लहू की धारा बह चली। बादल गरजने लगे और पानी बरसने लगा। रणक्षेत्र में इतना जल बरसा कि नालों में बाढ आ गई। आधे नाले में पानी बहता था और आधे में रक्त की धारा। दिल्ली वाले योद्धा फिर लौटे और फिर युद्ध होने लगा। रणक्षेत्र की शोभा का क्या वर्णन करें, जिसे परमवीर ऊदल और लाखन निहार रहे थे। युद्ध का सौंदर्य भीषण होता है। जगनिक की पदावली में उत्साह और ओज रोमांचित करता है। एक तरफ शस्त्र-वर्षा और दूसरी तरफ वर्षा के बरसते तीर-
रुमझुम रुमझुम मेघा बरसें, बदरा मारै बूँद के बान।
बिजुरी चमकै आसमान माँ, रनमाँ चमक रही तरवार।
चारों ओर से घिर-घिर आबैं, बदरा जुरे झुंड के झुंड।
जैसे रनखेतन माँ जुरगे, हाथी अडे सुंड माँ सुंड।
जैसे सावन के घन घोरें, बेसई बीरन कै हुंकार।
जैसे बिजुरी गिरै धरन माँ, बैसई चलै कुहुँकना बान।
डंका बाजै रनखेतन माँ, मानहुँ मघा नखत घहराय।
मेघ रिमझिम-रिमझिम बरसते थे और बादल बूँदों के बाण मारते थे। आसमान में बिजली ऐसे चमकती थी, जैसे रण में तलवार। चारों ओर से घिर-घिरकर आनेवाले बादलों के झुंड ऐसे लगते थे, जैसे रणक्षेत्र मं इकट्ठे हाथी सूँड से सूँड अडाए हों। सावन के बादल ऐसे गरजते थे, जैसे वीरों की हुँकार। बिजली धरती पर ऐसे गिरती थी, जैसे कुहुकना बाण चले। रणक्षेत्र में डंका ऐसे बजता था, जैसे मघा नक्षत्र घहराया हो।
जगनिक वीर एवं श्रं`गार-रस का विलक्षण संश्लेषण हुए करता है-
आँख घूमकै तब लाखन कै सर कीरत पै देखो जाय।
हिलमिल सखियाँ झूला झूलें, सावन गावैं मंगलाचार।
रतनजडाऊ साडी पहिनें, जिन माँ मणियन सौ उजयार।
हार के हीरा ऐसे दमकें, मानो उदय चंद्रमा क्यार।
चढी मिचकियाँ झूला झूलैं, जिनमाँ तिरियन के श्रं`गार।
झूला के संग गहने दौरे, मानो बिजुरी को उजयार।
गोरो गात बैस की बारीं, कामिन काम लजावन हार।
सावन गाबैं रंग मचाबैं, मानो करें अपसरा गान।
धन्न बेंदुला के चढबइया, सावन धन्न महोबे क्यार।
ऐसो सावन मैं देखो ना, जैसो तैंने दओ दिखाय।
लाखन ने कीर्तिसागर पर देखा कि सखियाँ हिलमिल कर झूला झूल रही थीं और सावन एवं मंगलगीत गा रही थीं। वे रत्नजडित साडियाँ पहने थीं, जिनसे मणियों की तरह प्रकाश हो रहा था। हार के हीरे ऐस दमकते थे, मानो चंद्रमा उदित हुए हों। पेंग बढाकर झूला झूलनेवाली स्त्रियाँ स्वाभाविक श्रं`गार किए हुए थीं। झूले के साथ आभूषण भी दौडते थे, जैसे बिजली का उजाला हो। कम उम्र की गौरांग युवतियाँ काम को लज्जित कर रही थीं। सावन-गीत गाती और क्रीडारत वे गायन करती हुईं अप्सराएँ लग रही थीं। लाखन ने कहा कि ऊदल, तुम धन्य हो और महोबे का सावन धन्य है। ऐसा सावन मैंने नहीं देखा जैसे तुमने दिखा दिया है। जगनिक सामंती समाज से जुडा दरबारी कवि था। सामंतों के जीवन के दो ही लक्ष्य थे-ऐश्वर्य-भोग और युद्ध करना। भोग-सामग्री जुटाने और अपना साम्राज्य बढाने के लिए भी वे आपस में लडते थे। सुंदर स्त्रियों को प्राप्त करने और उन्हें केवल उपभोग की वस्तु मानने वाली सामंती दृष्टि से राजा और उनसे जुडे कवि भी मुक्त नहीं थे। जगनिक की स्त्री-छवि या रूप-सौंदर्य के चित्रण में इसे देख सकते हैं। बरइन के रूप का वर्णन करते हुए जगनिक कहता है-
रूप कै अगरी बा बरइन ती, जीखाँ रूप दीन्ह भगवान।
जितनी जाँगा माँ बरइन न्याँगै, धरती रूप सें जाय अघाय।।
ना बहु गोरी न बहु कारी, गौहुवाँ बरन दुलारी क्यार।
पातर पिंडरी पेट मुलायम, डोलै नागिन सी लहराय।
मधुर कपोल नासिका न्यारी, तिल ठोडी में परै दिखाय।
झौं का लागै पुरबइया को, कमर तीन-तीन बल खाय।
पतरी-पतरी बा डोरा सी, बरइन कनयर कैसी डार।
कोकिलबैनी औ मृगनैनी, पैनी मानो धार कटार।
कदली खंभ रांग बरइन कै, नैना हिरनी के उँनवार।
मारे कँधेला चलर आरत ती, बरइन गोरी की अनुहार।
बा बहुअर या आय सुआसिन, बाको हुलिया लेउ मिलाय।
रूपवती बरइन को भगवान ने रूप दिया था। जितनी जगह में वह चलती थी, धरती रूप से तृप्त हो जाती थी। न ज्यादा गोरी और न ज्यादा काली, उसका रंग गेहुँआ था। पतली पिंडरी, मुलायम पेट नागिन-सी लहराकर चलती थी। मधुर कपोल, न्यारी नासिका, ठुड्डी में तिल दिखाई पडता था। पुरवाई का झोंका लगते ही कटि तीन-तीन बल खाती थी। वह पतले धोगे जैसी लगती थी अथवा कनैर की डाल जैसी थी। कोकिलबयनी, मृगनयनी और कटार की तरह पैनी थी। उसकी जंघाएँ कदली के खंभों के समान और नयन हिरनी की तरह थे। कंधेला घाले गोरी की तरह चली आती थी। वह बहू है या गाँव की कन्या, उसकी आकृति से पहचान लो।
आल्हा में जगनिक ने महिलाओं का वीरोचित चरित्र-चित्रण भी किया है। मल्हना का उदात्त क्षत्राणी चरित्र, बेला का पति की आज्ञा पर भाई ताहर का वध तथा कुसमा द्वारा लाखन को महोबा भेजकर वीरोचित कर्त्तव्य निभाने की प्रेरणा देने जैसे प्रसंगों में स्त्री-चरित्रों का वीरांगना-भाव उभरकर आता है-
लडियों ऐसैं समरभूम में, जुग-जुग साकौ चलै तम्हार।
पाँव पिछारूँ ना धरियो तुम, नहिं छत्रीपन जाइ नसाय।
जो सुन पैहों भगे कनौजी, तो मैं पेट फारि मर जावँ।
समुहै रन में जो तुम जूझिहौ, लैके संग सती हुइ जावँ।
समरभूमि में इस तरह लडें कि तुम्हारा यश युग-युग तक चले। पीछे पैर न रखना, नहीं तो क्षत्रियत्व नष्ट हो जाएगा। यदि मैं तुहारा भागना सुनूँगी, तो पेट फाडकर मर जाऊँगी। रण में सामने यदि तुम जूझोगे, तो मैं तुम्हें लेकर सती हो जाऊँगी।
कुसुमा ने लाखन के भुजदंडों का पूजन किया और माथे पर मंगल टीका लगाया। जलधार और अश्रुधार एक होकर चरणों पर अर्घ्य के रूप में चढ गई-
भुजबल पूजे तब कुसमा नें, मंगल टीका दीन लगाय।
धार नैनवा इकमिल हुइगे, चरनन पै दओ अरघ चढाय।
प्राचीन और मध्यकालीन सोच आल्हा की विषयवस्तु में देखी जा सकती है। रूढियों तथा जन-आस्थाओं के प्रसंग में प्रदर्शित होती है। अयोध्याप्रसाद गुप्त कुमुद के अनुसार लोक में साधु तथा योगियों के समान तथा राजमहल के अंदर महिलाओं तक निर्बाध प्रवेश को ध्यान में रखते हुए अनेक प्रसंगों में योगी वेष धारण करने की संयोजना की गई है। जनआस्था के उपयोग का यह महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। देवी-देवताओं के वरदान, स्वप्न में उनका दर्शन, पूर्वजों तथा देवी की आभा का बोलना तथा उनके संदेश के साथ सिद्धनाथों के प्रभाव, जंत्र-मंत्र, जादू टोने का भरपूर उपयोग हुआ है। एक जादूगरनी का जादुई पुडिया तथा मंत्रों से अभिमंत्रित करना, दूसरी जादूगरनी द्वारा उसका खंडन, एक द्वारा जादू से पुरुष को तोता या मेढा बनाना, नट बेडनियों के चमत्कार आदि लोकरुचि के ऐसे ही विषय हैं, जिनसे काव्य का साधारणीकरण हो कर श्रोता का मन रमता है। जादू के प्रयोग से पलंग सहित किसी को उडा ले जाना, इंद्र प्रदत्त उस अमर ढोल का प्रयोग जिसकी आवाज सुनकर मृतक भी जिंदा हो उठते हैं (नैनागढ की लडाई) तथा वह अगिनिवा घोडा जिसकी पूँछ घुमाने से उस ओर आग लग जाती थी (पथरीगढ की लडाई), शैल सनीचर, काठ का घोडा, अजीता-बाण आदि ऐसे प्रयोग हैं जिनसे यद्यपि काव्य में अविश्वसनीयता आ जाती है किंतु ग्रामीण जनता वाह-वाह करके आनंदित होती है।’ दूरारूढ काल्पनिक प्रसंग तत्कालीन समय और समाज के मनोविज्ञान को व्यक्त करते हैं।
प्रेम-संदेश, मिलन का हो या विरह का, उसे तोता, कबूतर आदि द्वारा भेजने की परंपरा पुरानी है। जगनिक के आल्हा में भी सुनवाँ तथा चंद्रावलि द्वारा हीरामन तोते से संदेश भेजना पाठकों और श्रोताओं को रुचिकर लगता है।
सामंती वातावरण में रहने के बावजूद जगनिक के पात्र चारित्रिक दृष्टि से आदर्शवादी हैं। माडौगढ की लडाई में जब ऊदल बिजमा के कक्ष में पहुँच जाते हैं तब वह ऊदल के साथ संबंध बनाने के लिए तत्पर होती है लेकिन ऊदल वीरों का आदर्श प्रस्तुत करते हुए कहते हैं-
क्वांरी कन्या की सिजिया पै, कभऊं न धरै बनाफर पाँव।
मुहै दुहाई है ईसुर की, तोरे संग रचौहों बिआव।
वीर योद्धा के अपने मूल्य होते हैं। आल्हा का इतिवृत्तात्मक पक्ष तो महत्त्वपूर्ण है ही, उसका नीतिपक्ष भी रचनात्मक है। पटवर्ती मध्यकालीन नीतिकाव्य के लिए इसने सुदृढ आधार का काम किया है।
भाषा शिल्प के धरातल पर आल्हा उत्कृष्ट रचना है। इसकी मूलभाषा बुंदेली की बनाफरी उपबोली है, जिस पर पश्चिमी हिंदी का प्रभाव था। हिंदी के स्वरूप विकास में इन मध्यदेशीय बोलियों का बहुत महत्त्व है। आदिकाल की अपभ्रंश या डिंगल से अलग रास्ते पर चल रही थी। केशव चंद्र मिश्र के अनुसार-यह काल प्रदेशीय भाषाओं के विकास का युग था। आठवीं और नवीं सदी के आते-आते प्राकृत भाषाएँ बोलचाल की भाषाएँ नहीं रह गई थीं। तत्सम शब्दों को ग्रहण करके हिंदी का युग चल पडा। पश्चिमी हिंदी से बुंदेलखंडी भाषा का रूप निखरा। चंदेल साम्राज्य में बुंदेलखंड की भाषा अपनी अनेक स्थानीय बोलियों के साथ बारहवीं सदी तक पूर्ण विकास पर पहुँच गई। आल्हा-ऊदल के शौर्य और लोकोत्तर वीरता से प्रभावित होकर ही इस जनकवि ने उस चरित को विशद रूप से बुंदेलखंडी-काव्य में प्रस्तुत किया। ये पंक्तियाँ जगनिक के काव्य की भाषा समझने में बडी मदद करती हैं। डॉ. अयोध्याप्रसाद गुप्त कुमुद के शब्दों में-उस समय बुंदेलखंड के पूर्व में बघेली तथा पश्चिम में ब्रज लोकभाषाओं का प्रचलन था। महोबा, जो आल्हा काव्य की जन्मभूमि है, में बुंदेली की बनाफरी उपबोली का प्रचलन था, इससे इस तथ्य से सहमत होना सहज ही है कि आल्हा की भाषा बुंदेली-बनाफरी है जिस पर समीपवर्ती बघेली, ब्रज आदि अन्य लोकभाषाओं का प्रभाव है। यही भाषा कवि की मूलभाषा रही होगी। कालांतर में वाचिक परंपरा में प्रवाहित होकर यह काव्य उत्तर भारत की सभी भाषाओं में मिश्रित होकर पंचमेली खिचडी हो गया। यह काव्य भाषाई सीमाएँ लाँघकर सार्वदेशिक हो गया। अतः आज उसका रूप काफी परिवर्तित हो गया है।’ डॉ. नर्मदा प्रसाद गुप्त के अनुसार आल्हा लोक गाथाओं की लोकभाषा पुरानी बनाफरी थी, जिसमें बुंदेली और ब्रजी के शब्दों के साथ अरबी-फारसी के शब्द-रूपों में बुंदेली विभक्तियों और प्रत्ययों के बंधान से एक मिश्रित बुंदेली प्रयुक्त होती थी। विदेशी शब्द विदेशी न रहकर बुंदेली के हो गए थे। उस समय भाषाई संकट के कारण बनाफरी बुंदेली की पाचनशक्ति बहुत अधिक थी।
सच्चे अर्थों में इसकी भाषा युग के प्रवाह में जनभाषा बन गई है। इसकी ध्वनि संरचना विशेष महत्त्वपूर्ण है तथा प्रस्तुत काव्य की भाषा का आनंद उसकी ध्वन्यात्मकता में है। इसमें इसकी अनुप्रासिकता का विशेष योगदान है। विभिन्न प्रकार की आवृत्तियों से भाषा सरस, सुबोध तथा प्रभावी हो गई है। उसमें उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा तथा अतिशयोक्ति अलंकारों की भरमार है। अनेक शब्दों के लाक्षणिक प्रयोगों से भाषा प्राणवान हो गई है। भरभादो’ शब्द ऐसा ही है जिसमें भादों के माह की भरपूर वर्षा तथा दुर्दिनता स्वतः व्यक्त होती है। साखी तथा सुमरिनी में सुर का अंतर रखते हुए कथा को आगे बढाते हैं। डॉ. कुमुद ठीक पहचानते हैं कि भाषा यत्र-तत्र-सर्वत्र सहज रूप में आलंकारिक बन गई है यथा-
लडे महावत सब आपस माँ, अंकुस आपन रहे चलाय।
जैसे बदरिया माँ बिजुरी घूमै, अइसे घूम रही तरवार।
जैसे पसीना कढे देह सें, ऐसें बहै रकत की धार।
जगनिक की भाषा में तीनों गुणों तथा तीनों शब्द-शक्तियों की अवतरणा है। सामान्य प्रसंगों में प्रसाद, ललित-श्रं`गार प्रसंगों में माधुर्य तथा वीरत्व-प्रसंगों में ओज गुण स्वाभाविक रूप से प्रसंगानुरूप आ गए हैं। इसी प्रकार विषयानुकूल सभी शब्द-शक्तियों के दर्शन होते हैं। असल में आल्हाखंड के कथ्यापद का विधान ऐसा है कि वह निरंतर परिवर्तित होता रहा है। जगनिक की कविता की भाषा भी विकासशील है-आल्हा की भाषा युगानुरूप परिवर्तनों को स्वीकार करती हुई, सजती, सँवरती तथा सामान्य-जन के अनुकूल होती चली गई। वह निरक्षर, अनपढ ग्रामीणों से लेकर बौद्धिक वर्ग तक सबकी समझ में आनेवाली दैनिक प्रयोग की भाषा बन गई। आल्हा की इस दिन-प्रतिदिन बोली जानेवाली जनभाषा ने इस लोककाव्य के लोकप्रियकरण में विशेष योगदान दिया। सूत्र रूप में यह कहा जा सकता है कि इस काव्य को सहज प्रेषणीय तथा प्रभावशाली बनाने का श्रेय इसकी सरल भाषा को ही है।
आल्हा में अनेक छंदों के बजाय एक ही छंद आल्हा छंद (वीर छंद) का प्रयोग है। यह महाकाव्यत्व के प्रतिकूल नहीं है, वह एक छंद ही सभी छंदों पर भारी पड गया है। एक ही लय तथा धुन में निबद्ध यह छंद ऐसा लोकप्रिय हुआ कि उसकी लयात्मकता के कारण वह वाचिक परंपरा में आठ सौ वर्षों से अधिक अवधि तक इस कृति को लोकप्रियता प्रदान किए है। यह छंद का परवर्ती काव्य-परंपरा में भी लोकप्रिय रहा है। जगनिक के छंद-विधान के संबंध में सर्वाधिक उल्लेखनीय बात यह है कि उसने अपने महाकाव्य के चरित नायक के नाम पर छंद का प्रवर्तन करके साहित्य में एक विशिष्ट परंपरा का सूत्रपात किया था। ऐसी परंपरा किसी भी भारतीय भाषा, संस्कृत अथवा हिंदी में न भूतो, न भविष्यति वाली सिद्ध हुई। किसी भी भाषा के महाकाव्य के नायक के नाम पर चाहे राम, कृष्ण, देवी या अन्य हों, यह प्रयोग देखने में नहीं मिलता है। यह जगनिक का अनूठापन है। इस छंद का परवर्ती कवियों ने भी प्रयोग किया, यहाँ तक कि अनेक श्रोता कुछ घंटे तक आल्हा सुनकर उसी लय-छंद में कुछ वाक्य जोडकर, आशुकवि बनने का गौरव प्राप्त कर लेते हैं। इस कथ्यशैली ने वीररस के कई कवि बनाए तथा अनेक नीति कवियों को दीक्षित किया है। आज की मंचीय कविता को भी यह स्तरीयता प्रदान कर सकती है। क्योंकि वाचिक काव्य की विशिष्टता यह होती है कि वह कान से सुनकर सीधे हृदय में उतर जाए, उसे कान से मस्तिष्क के रास्ते होकर हृदय तक न जाना पडे। कविता हृदय में पहुँचते ही उस पर तुरंत प्रतिक्रिया होती है, हृदय के भावों से तादात्म्य स्थापित हो जाता है तथा शरीर में रोमांच होने लगता है। इस काव्य का छंद-विधान, भाषा की सहजता तथा ध्वन्यात्मकता ऐसी ही प्रभावोत्पादक एवं रोमांचकारी है, जिसकी तुलना अन्यत्र कठिन है। अत्यंत रोमांचकारी काव्य के लिए जगनिक की तुलना जगनिक से ही की जा सकती है। जगनिक के आल्हाखंड का महत्त्व इस रूप में भी है कि कई कवियों ने आल्ह खंड रचा और जगनिक ने अनेक जगनिक निर्मित किए हैं। जगनिक ने परवर्ती कवियों को अपने आसपास से काव्य-विषय चुनने और लोक में प्रचलित जनभाषा को साहित्यिक संदर्भ देने का रास्ता दिखाया है।
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