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साहित्यिक संदर्भों में मीरां का जीवन

अरविन्द सिंह तेजावत
साहित्यिक संदर्भों में बीसवीं सदी के अंतिम दो दशक इसलिए भी याद किए जाएंगे कि इन दशकों में महिला मुक्ति के स्वर प्रखरता से उभरने लगे थे। प्रत्येक आंदोलन प्रेरणा स्रोत के रूप में इतिहास से अपने संदर्भ ग्रहण करता है। भारत का स्त्री-मुक्ति आंदोलन भी इसका अपवाद नहीं है। इन स्त्री आंदोलनों को स्वर देने वाली मीरां तत्कालीन सामंतवादी मूल्यों के विरुद्ध प्रतिरोध एवं संघर्ष की दास्तान है। ऐसी स्थिति में समकालीन स्त्रियों का मीरां से प्रेरणा लेना स्वाभाविक है। अकादमिक संस्थानों में मीरां के जिस जीवन चरित्र का अध्ययन-अध्यापन कराया जाता है वह चित्तौड की युवरानी मीरां, जिसने राणा साही के खिलाफ मोर्चा लिया था, न कि बीसवीं सदी के आरंभिक दशकों के आलोचकों द्वारा गढ ली गई मीरां है, जिस पर विक्टोरियन शुचितावाद का मुलम्मा चढा हुआ है।
हमारे सामने मीरां की तस्वीर एक आदर्श भारतीय नारी के रूप में प्रस्तुत की गई है जिसके जीवन का एकमात्र उद्देश्य कृष्ण के ख्वाबों-खयालों में खोए रहना है। लेकिन कृष्ण भक्ति का सहारा मीरां ने सामंतवादी बेडियों की विस्तृत श्रृंखला को तोडने में किया एवं स्त्री मुक्ति की नई राहें तलाश की। मीरां का जीवन केवल इसलिए अध्ययन योग्य नहीं हो सकता कि उसने कृष्ण से प्रेम किया था वरन् मीरां का व्यक्तित्व इसलिए आकर्षक है कि उसने एक ऐसे वातावरण एवं समाज में स्त्री मुक्ति के स्वरों को आवाज दी थी जो सती प्रथा जैसी कुरीतियों से ग्रस्त था। मीरां ने स्त्री के अधिकारों को सीमित करने वाले सामंती मूल्यों के विरुद्ध आवाज उठाई एवं अपने जीवन को ऐसे रूढिवादी प्रगतिहीन मूल्यों के प्रति विद्रोह का पर्याय बना डाला। निःसंदेह ऐसी महान स्त्री का जीवन सदैव प्रेरणास्पद बना रहेगा।
इसे विडंबना ही कहना चाहिए कि मीरां जैसी महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व के जीवन के संबंध में स्रोत सामग्री का अभाव लगभग पाया जाता है। मध्यकालीन भारतीय साहित्य पर नजर डालें, तो उसमें भक्तमालों का विशिष्ट स्थान है। चूंकि लोक में मीरां की ख्याति कृष्ण भक्त के रूप में थी इसलिए इन भक्तमालों में मीरां का विवरण एक भक्त के रूप में ही मिलता है। नाभादास, प्रियादास, वैष्णवदास व राघौदास जैसे भक्तों द्वारा लिखित भक्तमालों में मीरां का उल्लेख है। नाभादास जी के भक्तमाल का रचनाकाल 17वीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध माना जाता है। इसमें मीरां के संबंध में लिखा गया है कि -
सदृश गोपिका प्रेम प्रगट कलि जुगहिं दिखायो।
निरअंकुश अति निडर, रसिक जस रसना गायो।
दुष्टनि दोष विचारि, मृत्यु को उद्यम कियो।
बार न बांकों भयो, गरल अमृत ज्यों पीयो।
भक्ति निसान बजाय के काहूं ते नाहिंन लजी।
लोकलाज कुल श्रृंखला तजि मीरां गिरिधर भजी।1
इस प्रकार नाभादास की नजर में मीरां निरअंकुश अति निडर थी। मीरां ने लोकलाज कुल श्रृंखला त्याग कर कृष्ण भक्ति का आह्वान किया। प्रियादास की भक्तिरस बोधिनी टीका में मीरां का उल्लेख पाया जाता है। इसका रचना समय संवत् 1769 के आसपास माना जाता है। इस टीका में मीरां के विषपान की घटना, सम्राट् अकबर एवं मीरां के भेंट का प्रसंग एवं द्वारिका में रणछोडजी की मूर्ति में मीरां के विलीनीकरण का जिक्र है । वार्त्ता साहित्य के रचनाकार भक्तमालों के रचनाकारों के समान ही भक्त थे। उनकी चिंता का विषय भी मीरां की भक्ति एवं उसका स्वरूप ही था । इन वार्त्ता साहित्य में चौरासी वैष्णवन की वार्त्ता एक ऐसा ही वार्त्ता ग्रंथ है जिसका संबंध वल्लभ संप्रदाय से है। इस ग्रंथ से ऐसा अनुमान होता है कि वल्लभ संप्रदाय मीरां एवं उसकी भक्ति के स्वरूप को नापसंद करता था। वल्लभ संप्रदाय से ही संबंधित एक अन्य ग्रंथ दो सौ बावन वैष्णवन की वार्त्ता में भी मीरां का उल्लेख पाया जाता है। यह वार्त्ता ग्रंथ अपने पूर्ववर्ती वार्त्ता ग्रंथों की अपेक्षा मीरां के प्रति कम कटु है। ऐसा अनुमान होता है कि इस समय मीरां को लोगों में पर्याप्त स्वीकृति मिल चुकी थी ।
मध्यकालीन राजपूताने में ख्यात ग्रन्थ लिखने की परम्परा विद्यमान थी। ये ख्यात ग्रन्थ राज-परिवारों की प्रशंसा में लिखे गए ग्रंथ थे। मीरां के कुछ अध्येताओं का दावा है कि मुहता नैणसी री ख्यात में मीरां का उल्लेख पाया गया है। यह वर्णन सिसोदियों की ख्यात के अंतर्गत मिलता है। ख्यात ग्रंथों में मीरां के बारे में सीधे-सीधे भले ही कोई विस्तृत जानकारी न मिले परंतु मीरां के परिवार के संबंध में अनेक महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ अवश्य प्राप्त हो जाती हैं। इसके अतिरिक्त नागरीदास के नागर समुच्चय व सुखसारण द्वारा रचित मीरांबाई की परची में भी मीरां का विस्तृत वर्णन दिया गया है। इन दोनों ही रचनाकारों के ग्रंथों में मीरां से संबंधित उन तमाम घटनाओं का उल्लेख मिलता है जो वर्तमान में किंवदन्तियाँ बन चुकी हैं।
लिखित स्रोत सामग्री वस्तुनिष्ठता के कारण संदेह के घेरे में रहती है जबकि पुरातात्विक स्रोत सामग्री अधिक विश्वसनीय एवं प्रामाणिक होती है। दुर्भाग्यवश मीरां के आलोचकों ने पुरातात्विक स्रोत सामग्री का बेहद सीमित उपयोग किया है । वर्तमान समय में मीरां के जीवन से संबंधित जो नए शोध प्रकाश में आ रहे हैं उनमें पुरातात्त्विक और स्रोत सामग्री का भी उपयोग हुआ है जो एक अच्छा लक्षण है। इसी प्रकार देश के विभिन्न भागों में मीरां के नाम पर प्रचलित पदों की पांडुलिपियाँ बिखरी पडी हैं। ये पांडुलिपियाँ मीरां से संबंधित महत्त्वपूर्ण स्रोत सामग्री उपलब्ध कराती हैं, परंतु उनका संग्रहण एवं प्रकाशन चुनौतीपूर्ण है।
मीरां का जन्म मारवाड के मेडता प्रदेश में हुआ था परंतु जन्म स्थान को लेकर विद्वानों में पर्याप्त मतभेद पाया जाता है। नाभादास के प्रसिद्ध ग्रन्थ भक्तमाल पर प्रियादासजी ने उसकी टीका लिखी।2 प्रियादास रचित टीका में मेरता को मीरां की जन्मभूमि बताया गया है।3 दादूपंथ संबंधी चारण ब्रह्मदास ने अपने भक्तमाल में मीरां का संबंध मेडत्या वंश से स्थापित किया है।4 सुखसारण कृत मीरांबाई री परची में भी मीरां के जन्म से संबंधित एक दोहा और एक चौपाई मिलती है। दोहा में मेडता को मीरां की जन्मभूमि बताया गया है जबकि चौपाई में राव रतन सिंह को मीरां का पिता एवं राव दूदा को मीरां का दादा बताने के साथ-साथ अनौपा का उल्लेख मीरां की बहिन के रूप में हुआ है।5 मीरां के पिता रतन सिंह खानवा के युद्ध में मारे गए थे। अनुमान होता है कि मीरां की मां का बचपन में ही देहांत हो गया था इसीलिए उसकी परवरिश उसके दादा राव दूदा के संरक्षण में हुई। राव दूदा के बारे में यह प्रसिद्ध है कि वह विष्णु के एक लोकरूप चारभुजा नाथ के परम भक्त थे। वहीं मीरां कृष्ण की भक्त थी। क्योंकि उनकी भक्ति एवं चरित्र मीरां के विद्रोही मन के लिए अधिक उपयुक्त था। मीरां काव्य के विद्रोही स्वर भी कृष्ण भक्ति के अधिक उपयुक्त हैं।
मीरां के बारे में ऐसे कहा गया है कि वह बचपन से ही कृष्ण को अपना पति समझने लगी थी परंतु ऐसा अनुमान होता है कि मीरां ने बचपन से नहीं वरन् अपने पति भोजराज की मृत्यु के पश्चात् ही कृष्ण को अपना पति स्वीकार किया। मीरां काव्य के अध्ययन एवं मीरां के जीवन से संबंधित घटनाओं का गहन अध्ययन करने के पश्चात् यह पता चलता है कि मीरां बचपन से ही तीक्ष्ण बुद्धि एवं समझ-बूझ वाली बालिका थी जो राव दूदा के साथ स्थानीय राजनीति को नजदीक से देख रही थी। मीरां से प्रभावित होकर एवं राजनीतिक हित को ध्यान में रखकर महाराणा सांगा ने मीरां को अपने ज्येष्ठ पुत्र कुंवर भोज की पत्नी बनाने का निश्चय किया । परंतु भोज की मृत्यु ने मीरां के सामने संकट उत्पन्न कर दिया जिसका मीरां ने पूरे साहस के साथ मुकाबला किया। मीरां ने कृष्ण को अपना पति बताया एवं सती होने से इनकार किया। इस प्रकार मीरां की कृष्ण भक्ति उसके बचपन की श्रद्धा का परिणाम ना होकर परवर्ती समय की जरूरत अधिक थी।
चित्तौड किले के जिन महलों में मीरां रहती थी उनका निर्माण महाराणा कुंभा ने करवाया था। दुर्ग में यह महल कुंभा के महल के नाम से जाना जाता है। यह महल उदयपुर के महाराणा उदयसिंह के जन्म, पन्नाधाय द्वारा उदयसिंह को बचाने के लिए अपने पुत्र का बलिदान, मीरां द्वारा कृष्ण की आराधना, महाराणा विक्रमादित्य द्वारा मीरां को विषपान करवाना आदि घटनाओं के साक्षी रहे हैं। दुर्ग में मीरां का जीवन इसी प्रकार की राजनीतिक घटनाओं, षड्यंत्रों और कुचक्रों के इर्द-गिर्द घूमता रहा होगा । ऐसा प्रतीत होता है कि अनेक प्रताडनाओं के बावजूद चित्तौड दुर्ग में टिके रहना न केवल मीरां वरन् मेडतिया राठौडों की राजनीतिक जरूरत थी। मीरां द्वारा चित्तौड दुर्ग छोड देने का अर्थ था बनवीर एवं महाराणा विक्रमादित्य को दुर्ग के भीतर एवं बाहर पूरी मनमानी करने का अवसर प्रदान करना। राजनीतिक सूझबूझ यही कहती थी कि मीरां चित्तौड न छोडे एवं महाराणा निरंकुश न हो। मेडतिया राठौड भी ऐसा ही चाहते थे ताकि वे मीरां के माध्यम से मेवाड राजमहल में अपनी उपस्थिति एवं हस्तक्षेप सुनिश्चित कर सकें।
सामान्यतः मीरां के जीवन से सम्बन्धित कई किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। एक किंवदंती यह भी है कि महाराणा के आदेश की अवहेलना पर मीरां को तहखाने में कैद कर दिया गया था। यह भी कहा जाता है कि महाराणा के आदेश से मीरां के शयनकक्ष में विषैले जीव जंतुओं को छोड दिया गया था। सच तो यह है कि यह चित्तौड दुर्ग में मीरां का पूरा जीवन झूठी मान्यताओं एवं सामंती मूल्यों के प्रतिरोध में बीता। मीरां द्वारा कुल मर्यादा त्यागकर नाचना व गाना इसी परम्परा व रूढि विरोध का परिणाम था। मीरां की ही कविता से साक्ष्य ग्रहण करें तो मीरां के चित्तौड दुर्ग के जीवन को मीरां के निम्नलिखित पद के माध्यम से समझा जा सकता है-
पग घुंघरू बांधि मीरां नाची ।
मैं तो मेरे नारायण सूं, आपहि हो गई साची।
लोग कहै, मीरां भई बावरी, न्यात कहै कुल-नासी।
विष का प्याला राणा भेज्या, पीवत मीरां हांसी।
मीरां के प्रभु गिरधर नागर, सहज मिले अविनासी।6
मीरां के परंपरा विरोध एवं प्रतिरोधी चरित्र वाले व्यक्तित्व ने मेवाड के महाराणा को उसका विरोधी बना दिया था, परंतु मेडतियों के प्रतिरोध के भय से महाराणा मीरां के प्रति कोई अप्रिय कदम उठाने से डरता था। मेवाड के सत्ता समीकरण में मेडतियों का भय मीरां को कुछ हद तक सुरक्षा प्रदान करता था। दुर्भाग्य से इसी बीच मारवाड के शासक राव मालदेव ने मेडता पर आक्रमण कर दिया एवं मारवाड में मेडता के स्वतंत्र अस्तित्व को समाप्त कर दिया। मालदेव के इस आक्रमण ने मेडतियों की शक्ति को समाप्त कर दिया जिसके परिणामस्वरूप मेवाड की राजनीति में उनका अनावश्यक हस्तक्षेप भी समाप्त हो गया। अब मीरां के लिए चित्तौड दुर्ग में अधिक समय तक रहना सुरक्षित न था। अतः मीरां ने चित्तौड दुर्ग के त्याग का निर्णय लिया। कहा जाता है कि दुर्ग त्यागने के पश्चात् मीरां ने मेडता की तरफ प्रस्थान किया, परन्तु मेडता पर राव मालदेव के आक्रमण एवं मेडता नगर के पतन की सूचना पाकर मीरां ने पुनः लौटने का निश्चय किया। प्रचलित मान्यता के अनुसार यहाँ से लौटकर मीरां वृंदावन गई। मीरां की वृन्दावन यात्रा के अनेक पुष्ट प्रमाण मिलते हंव जहाँ उनकी भेंट जीव गोस्वामी से हुई। मीरां के काव्य से भी मीरां की वृन्दावन यात्रा के पुष्ट प्रमाण मिलते हैं-
आली म्हाँणे लागा बृनदाबण णीकां।
घर-घर तुडसी ठाकर पूजां दरसण गोविंद जी का।
निरमड नीर बह्य जमणा का भोजन दूध दह्यां कां।
रतण सिंघासण आप बिराज्याँ मुगत धरयाँ तुडषी कां।
कुंजण कुंजण फिरयाँ सांवरा सबद सुरणाया मुरडी कां।
मीरां रे प्रभु गिरधर नागर भजण बिणा नर फीकां।7
भक्ति से संबंधित मीरां के उद्देश्य वृन्दावन के वैष्णव भक्तों से भिन्न थे। अतः उसके लिए वृन्दावन का वातावरण भी अरुचिपूर्ण था। सुरक्षा की दृष्टि से भी अधिक समय तक मीरां के लिए वृन्दावन रुके रहना अनुपयुक्त था क्योंकि रणथंभौर दुर्ग वृन्दावन से कुछ ही दूरी पर था जहाँ हाडा चौहानों का प्रभाव अब भी शेष था। ऐसी स्थिति में मीरां के लिए अधिक समय तक यहाँ रुकना संभव नहीं था। मीरां वृंदावन से द्वारका की तरफ बढी। द्वारिका में मीरां ठीक-ठीक कहाँ रुकी इस संबंध में विवाद है। परंतु मीरां के द्वारिका प्रवास को लेकर किसी भी प्रकार का कोई संदेह नहीं है।
मध्यकाल में मेवाड एवं गुजरात की निकटता देखने को मिलती है । यह नैकट्य भाषा, रहन-सहन एवं पहनावे से लेकर संस्कृति के अन्य आयामों तक विस्तृत था । इनके स्थापत्य पर चित्तौडगढ की कला का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। समझा जा सकता है कि द्वारिका ही एक ऐसा स्थान था जहाँ मीरां को वृंदावन की तरह अजनबीयत का एहसास नहीं होता है। अतः मीरां ने शेष जीवन यहीं पर बिताने का निश्चय किया। मेवाड एवं गुजरात के राजनीतिक संबंध कुछ इस प्रकार के थे कि मीरां का गुजरात रुकना एक सुरक्षित विकल्प था तथा इसका एक विशिष्ट राजनीतिक महत्त्व भी था। महाराणा सांगा के समय गुजरात का सुल्तान मेवाड की सेना से परास्त हो चुका था। अतः मेवाड व गुजरात की शत्रुता सर्वविदित थी। मेवाड की सेना के लिए गुजरात में अनधिकार प्रवेश संभव न था। यही वजह थी कि मीरां यहाँ सुरक्षित थी। साथ ही यहाँ रहकर मीरां मेवाड व मेवाड की जनता से जुडी रह सकती थी।
द्वारका में मीरां के प्रसंग में अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। कहा जाता है कि मीरां जब द्वारका में थी तब मेवाड के तत्कालीन महाराणा तथा मीरां के देवर उदयसिंह ने मीरां को पुनः मेवाड लौटने का आग्रह करने के लिए अपने जागीरदारों एवं पुरोहितों को द्वारिका भेजा था। मीरां पुनः मेवाड लौटना नहीं चाहती थी। अतः प्रचलित किंवदन्तियों के अनुसार वह द्वारकाधीश कृष्ण की मूर्ति में लीन हो गयी।8 पुरोहित एवं सामंत मीरां को मेवाड लौट आने के लिए तो नहीं मना सके परंतु मेवाड की लौटती हुई राजपूती सेना को द्वारका क्षेत्र की एक स्थानीय जनजाति के प्रतिरोध का सामना करना पडा। इन लोगों ने मेवाड की लौटती हुई सेना पर हमला बोला जो मीरां के प्रति उनके प्रेम का प्रमाण था। केवल इसी एक घटना से द्वारिका में मीरां की लोकप्रियता का अनुमान लगाया जा सकता है। मेवाड के सामंतों एवं पुरोहितों ने तो मेवाड लौटकर यही बताया कि मीरां द्वारिकाधीश की मूर्ति में विलीन हो गई, परंतु कोई आश्चर्य नहीं होगा यदि मीरां अपने अनुयायियों के सहयोग से किसी अज्ञातवास के लिए प्रस्थान कर गई हो।
द्वारका नगर और गुजरात में प्रचलित एक मान्यता के अनुसार मीरां का द्वारिका वास चार दशकों से भी अधिक समय का था। उक्त मान्यता पर विश्वास करें तो हमें मीरां का जीवनकाल 80 वर्षों से भी अधिक मानना पडेगा । ऐसा होना सम्भव है, यह अविश्वसनीय नहीं है। ऐसी स्थिति में मीरां एवं बादशाह अकबर को समकालीन मानना पडेगा। प्रियदास की भक्तिरस बोधिनी टीका में तानसेन, अकबर एवं मीरां की भेंट का प्रसंग दिया गया है।9 वैष्णव दास प्रणीत भक्तमाल के दृष्टान्त में तानसेन अकबर एवं मीरां की भेंट की बात स्वीकार की गयी है। राघौदास की भक्तमाल पर छत्रदास द्वारा लिखी टीका में भी ऐसी ही अभिव्यक्ति है।10
मध्यकाल में भक्तगण समाज का हिस्सा थे। अतः मीरां की जो छवि तत्कालीन जनमानस में व्याप्त थी, वही छवि भक्तों के मानस पटल पर भी अंकित थी । भक्तों का मीरां से परिचय एक भक्त के रूप में था। चित्तौड दुर्ग एवं महाराणा परिवार के आंतरिक शक्ति संघर्ष से यह भक्त सर्वथा अनभिज्ञ थे। भक्तों ने मीरां को एक भक्त के रूप में स्वीकार किया एवं उसी रूप में इन भक्तों ने अपने द्वारा रचित भक्तमालों में मीरां का विवरण एवं परिचय भी दिया । महाराणा मेवाड परिवार में ही मीरां से पूर्ववर्ती झाली रानी की प्रतिष्ठा भी भक्तों के मध्य एक भक्त के रूप में थी।
भक्त के रूप में मीरां की छवि मीरां को लोकप्रियता एवं जन स्वीकृति प्रदान कर रही थी । भक्ति के माध्यम से ही मीरां सती प्रथा जैसी कुरीतियों के विरुद्ध प्रतिरोधी भूमिका ग्रहण कर सकती थी। भक्तों के मध्य मीरां भक्त थी तो चित्तौड दुर्ग के भीतर मेडतणी के रूप में थी। मेडतणी अर्थात् मेडतिया राठौडों की बेटी। अतः नवयुवक महाराणा मीरां को अपना राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी मानता था क्योंकि महाराणा विक्रमादित्य हाडाओं का भांजा था जो कि राठौडों के प्रतिद्वंद्वी थे। तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखें तो मीरां ने ऐसे अनेक कार्य किए जो परंपरा विरुद्ध थे। यथा मीरां ने न केवल महाराणा परिवार की तमाम परंपराओं को तोडा वरन् उनके खिलाफ खुला विरोध भी किया। मीरां ने महाराणा महल परिधि का अतिक्रमण किया एवं आम जनता से सीधा सम्पर्क स्थापित किया। मीरां द्वारा घुंघरू बांध कर नाचना व गाना जनता के लिए बेहद आश्चर्य का विषय है। अतः लोग मीरां को बावरी मानने लगे। आत्म साक्ष्य के लिए मीरां का पद उद्धृत करें तो मीरां ने कहा भी है -
पग घुंघरू बांधि मीरां नाची ।
मैं तो मेरे नारायण सूं, आपहि हो गई साची।
लोग कहै, मीरां भई बावरी, न्यात कहै कुल-नासी।11
अर्थात् लोग उसे बावरी समझने लगे। वस्तुस्थिति यह थी कि परंपरा के अतिक्रमण ने मीरां को लोक के अधिक निकट, संफ में लाया एवं उसकी लोकप्रियता तेजी से बढने लगी। यही मीरां की शक्ति थी जिस पर मीरां ने भक्ति का सुंदर मुलम्मा भी चढा दिया था। वास्तविकता यह है कि मीरां भक्ति से ज्यादा सामाजिक परिवर्तन के अग्रदूत एवं जननायक थी जिससे मेवाड के सत्ता प्रतिष्ठान को खतरा महसूस होने लगा था। इतिहास दृष्टि का आलंबन करें तो प्रचलित एवं प्रचारित मीरां का जीवन अपूर्ण नजर आता है एवं ऐसा महसूस होता है कि मीरां का वास्तविक जीवन इससे कुछ अधिक था।
वस्तुतः मीरां के जीवन चरित्र को और अधिक समझने के लिए मीरां के संबंध में प्रचलित मेवाड, मारवाड एवं गुजरात क्षेत्र की प्रचलित किंवदंतियों का ज्ञान आवश्यक है। ऐसी मान्यता है कि मीरां की हत्या के उद्देश्य से महाराणा ने विजयवर्गीय बनिये के हाथों विष का प्याला मीरां को पिलाने के लिए भेजा था परंतु मीरां पर उस विष का कोई असर नहीं हुआ। राजपूताने में बनियों की एक शाखा विजयवर्गीय कहलाती है। आज विजयवर्गीय लोग मीरां की उपासना एवं मीरां मंदिर का निर्माण करवाते हैं। मान्यता यह है कि ऐसा मीरां की हत्या के प्रयास के कारण निर्मित श्राप से मुक्ति हेतु किया जाता है। मेवाड के महाराणा ने मीरां को विष पीने के लिए भेजा या नहीं इस बात की पुष्टि आज इतने वर्षों के पश्चात् सप्रमाण करना तो मुश्किल है, परंतु मीरां के मंदिर के निर्माण की परंपरा विजयवर्गीय बनियों में विद्यमान है और वह इस ओर संकेत अवश्य करती है कि ऐसी किसी घटना का अस्तित्व अवश्य रहा होगा।
प्रसंगवश उल्लेखनीय है कि नाथपंथ से लेकर वैष्णव संप्रदाय तक राजपूताने के अनेक धर्म संप्रदाय अपना संबंध मीरां से स्थापित करने का प्रयास करते हैं किंतु विद्वान आज तक इस बात पर एकमत नहीं हैं कि मीरां का संबंध प्रामाणिक तौर से किस पंथ या संप्रदाय से था। अधिक विश्वसनीय यही लगता है कि मीरां भक्ति के मामले में धर्म-पंथनिरपेक्ष थी। भक्ति मीरां के लिए व्यक्तिगत आस्था का मामला था किसी पंथ या संप्रदाय से संबंध के कारण नहीं। एक किंवदन्ती यह भी है कि मीरां एवं कुँवर भोज के शादी के फेरों के समय मीरां ने फेरों के दौरान दोनों के मध्य कृष्ण मूर्ति को रखकर मूलतः कृष्ण से विवाह किया न कि कुंवर से। कभी-कभी झूठी मर्यादा में बंधे हुए मानव के लिए यह स्वीकार्य नहीं होता है कि किसी अन्य पुरुष के साथ संबंध रखे एवं यह कार्य था एक ऐसी स्त्री के संबंध में जिसे व्यापक लोक स्वीकृति प्राप्त है वरन् जनता का विश्वास, प्यार एवं स्नेह भी। अतः सुचिता के अनावश्यक आग्रहों से ग्रसित ऐसी अनेक किंवदंतियों को हमें इसी प्रकार ग्रहण करना चाहिए।
मेवाड की तरफ मालवा एवं गुजरात दो मुस्लिम राज्यों का अस्तित्व था। किंवदंती है कि मीरां की कृष्ण भक्ति की चर्चा सुनकर सारंगपुर के नवाब ने मीरां को देखने एवं उससे मिलने का निश्चय किया। चित्तौड दुर्ग में नवाब भेष बदल कर आया एवं मीरां का भजन एवं नृत्य देखने के पश्चात् जब वह अपने राज्य लौटने लगा तब पता चला कि वह सारंगपुर का नवाब था। एक कहानी अकबर बीरबल के संबंध में भी प्रसिद्ध है। कहानी इस प्रकार है कि वृंदावन प्रवास के दौरान स्वयं अकबर एवं बीरबल भेष बदलकर मीरां से मिलने आए थे। अकबर एवं मीरां के समय एवं काल के व्यापक अंतर को देखते हुए यह कहानी असत्य प्रतीत होती है। मीरां की मृत्यु आज तक रहस्य का सबब बनी हुई है। इस संबंध में विभिन्न आलोचकों द्वारा जो अनुमान लगाए गए हैं जो इस प्रकार हैं - मीरां को महाराणा के प्रतिनिधियों ने मौत के घाट उतार दिया ताकि भविष्य में महाराणा मीरां की चुनौती से मुक्त हो सके, मीरां ने मंदिर के पीछे से समुद्र में कूदकर आत्महत्या कर ली, दक्षिण भारत के मठों एवं मंदिरों में मीरां के नाम पर प्राप्त पदों के आधार पर कुछ आलोचकों का अनुमान है कि वह दक्षिण भारत चली गई, तो शोधों में अनुमान लगाया गया है कि मंदिर से गायब होकर मीरां गुजरात की स्थानीय जनजाति बघेर में विलीन हो गई। वजह चाहे जो भी हो, परंतु इतना तो निश्चित है कि इस घटना के पश्चात् मीरां के जीवन पर किंवदन्तियों के अलावा कोई प्रामाणिक साक्ष्य हमारे पास उपलब्ध नहीं हैं। द्वारका से लौटती हुई मेवाड की सेना पर गुजरात की एक स्थानीय जनजाति बघेर द्वारा आक्रमण करने की किंवदंती अवश्य मिलती है।
प्रथम प्रकाशित जीवन चरित्र से लेकर वर्तमान समय तक मीरां से संबंधित जितनी भी पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं उनमें से अधिकांश पुस्तकों में मीरां के जीवन चरित्र के अंकन का आधार किंवदंतियाँ रही हैं। इस प्रकार प्रामाणिक साक्ष्यों के अभाव में मीरां के आलोचकों को यह खुली छूट मिल गई कि वे जैसा चाहते वैसा ही मीरां का चरित्र निर्माण कर सकते थे। मीरां के चरित्र लेखकों ने मीरां को प्रायः एक कृष्ण भक्त के रूप में कल्पित कर दिया, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार अन्य मध्यकालीन भक्त कवि थे। इस प्रकार वे एक स्त्री के रूप में मीरां के संघर्ष से साक्षात्कार नहीं कर सके एवं उन्होंने मीरां के व्यक्तित्व को अन्य पुरुषों के समानांतर मान लिया। मीरां के जीवन की व्याख्या तब तक अधूरी है जब तक कि चित्तौड दुर्ग से लेकर वृंदावन व द्वारका तक मीरां के संघर्ष की व्याख्या नहीं की जाती। एक अकेली स्त्री द्वारा सामाजिक कुरीतियों से लोहा लेना एवं आम जनता में उसकी व्यापक स्वीकृति कोई कम आश्चर्य की बात नहीं थी। निश्चय ही मीरां का संघर्ष सदैव हमारे लिए प्रेरणास्पद बना रहेगा।
संदर्भ :
1. नाभादास, भक्तमाल, पृ- 227.
2. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास,
पृष्ठ 80
3. मेरतो जन्मभूमि, भूमि हित मैन लगे पगे गिरिधारी
पिता ही के धाम में। राना कै सगाई भई, करी
ब्याह सामा नई, गई मति बूढी, वा रँगीले घनश्याम
में। (प्रियदास,श्री भक्तमाल, पृष्ठ 714)
4. मेडत्यां कुल मुरधरा मझ, अधपत्याँ आधार। मगन
मूरत माँहि निरतन, लई मीरां लार। तौ रिझावर
जी रिझवार, भगवत गावतां रिझवार । (ब्रह्मदास, भगतमाल, पृष्ठ 45)
5. मीरां जनमी मेडतै, भक्ति कारण कूल काल।
(सुखसारण, मीरांबाई री परची, पृष्ठ 16)
6. मम्मी व स्वर्गीय नानी से यह पद सुना था ।
7. पदावली, मीरां स्मृति ग्रन्थ, पृष्ठ 7.
8. मीरां के जाने से मानो भगवान ही रूठ गये हों त्यों मेवाड में अशांति बढती ही चली, लोगों को चैन नहीं था। .... तब राणा उदयसिंह और प्रजाजनों ने मिलकर मीरांबाई को वापिस लौटा लाने का संकल्प किया। .... उन्होंने कुछ जागीरदार तथा पुरोहितादि ब्राह्मणों को मीरांबाई को वापस लौटा लाने के लिये भेज दिये । .... मीरांबाई ने जब उन लोगों का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया तब जागीरदार, राजकर्मचारी, ब्राह्मणादि प्रजाजनों ने सत्याग्रह आरम्भ किया और बहिर धरना देकर बैठ गये। मीरांबाई ने सबको बहुत समझाया परन्तु सब व्यर्थ हुआ। अंत में मीरांबाई ने सब को कहा कि इस परिस्थिति में मेरे कर्तव्य के लिए मैं निज मन्दिर में जाकर श्री द्वारिकाधीश की आज्ञा ले आती हूँ, तब तक आप लोग यहीं भजन करते रहें ।...यह कहकर मीरांबाई निज द्वार के भीतर चली गयी और द्वार बंद कर दिया। ....... ज्यों जल में गिर जाने पर लवण धीरे-धीरे जल के साथ एक रूप हो जाता है त्यों मीरांबाई शनैः शनैः प्रभु में विलीन हो गयी। प्रभु ने उसे अपने सारे अंगों में समा लिया । ... (स्वामी आनन्द स्वरूप, मीरां सुधा सिन्धु, पृष्ठ 66-67)

9. रूप की निकाई भूप अकबर भाई हिये,
लिये संग तानसेन देखिबे कों आयो है ।
निरखि निहाल भयो, छवि गिरिधारीलाल,
पद सुखजाल एक तब ही चढायो है।

10. भूप अकबर रूप सुन्यौ अति तानहिसेन लिये चलि आयौ।
देसि कुस्याल भयो दबि लालहि एक सब्द बनाइ सुनायौ।
11. मम्मी व स्वर्गीय नानी से यह पद सुना था।

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कमरा संख्या 209, ब्लॉक-4,
हरियाणा केन्द्रीय विश्वविद्यालय,
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