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संवेदनात्मक सत्याग्रह है कविता

नन्दकिशोर आचार्य
इस पुरस्कार को ग्रहण करते हुए सर्वप्रथम मैं साहित्य अकादमी और पुरस्कार की निर्णायक समिति का धन्यवाद करना चाहूँगा, जिन्होंने मेरी काव्य-कृति को इस योग्य समझा। इसके साथ ऐसे अवसर पर अपने नगर बीकानेर के तत्कालीन अत्यन्त सत्रि*य और प्रेरक साहित्यिक वातावरण का स्मरण हो आना स्वाभाविक है, जिसने लेखन-कर्म की सार्थकता के प्रति मेरी आस्था को निरन्तर पुष्ट किया। इस वातावरण में डॉ. छगन मोहता, हरीश भादानी, डॉ. महावीर दाधीच, प्रकाश परिमल, डॉ. पूनम दइया और डॉ. राजानन्द भटनागर जैसे लेखकों-विचारकों की मेरे लेखन में रुचि और उनकी आलोचनात्मक टिप्पणियों ने भी मुझे अत्यधिक प्रोत्साहित किया। अपने लेखन के प्रारंभिक दौर में एक नये लेखक के लिये ऐसा वातावरण मिलना बहुत पोषक होता है तथा उसे अपने रचनात्मक कर्म की सार्थकता का अहसास करवाता है।
इस अवसर पर मैं विशेष रूप से हिन्दी के कालजयी रचनाकार अज्ञेय का कृतज्ञतापूर्वक स्मरण करना चाहूँगा जिनके दीर्घकालीन स्नेहपूर्ण सानिध्य में रहने तथा उनके साथ काम करने का सौभाग्य अनायास ही मुझे प्राप्त हुआ तथा इस दौरान उनके साथ हुए विचार-विमर्श से लेखन-कर्म और लेखक की स्वतंत्रता में अपनी आस्था को बल मिलने के साथ मैं यह भी जान पाया कि किसी रचनाकार और वह भी एक कवि की दृष्टि किस प्रकार अपनी प्रक्रिया में विशिष्ट तथा किसी वैज्ञानिक, दार्शनिक, समाज-विज्ञानी अथवा ज्ञानानुसन्धान की अन्य किसी भी शाखा में सक्रिय दृष्टि और प्रक्रिया से भिन्न होती है। प्रत्येक प्रकार का ज्ञानान्वेषण भी एक सर्जनात्मक कर्म तो होता ही है, लेकिन उसकी दृष्टि और प्रक्रिया कला अथवा कविता की दृष्टि और प्रक्रिया से भिन्न होती है।
ज्ञान की अन्य प्रक्रियाओं में जहाँ तथ्यात्मक और विश्लेषणात्मक विधियों की प्रधानता रहती है, वहाँ साहित्य- बल्कि कला मात्र- संवेदनात्मक और अनुभूत्यात्मक अन्वेषण की प्रक्रिया है। भाषा तो, सामान्यतः, सभी ज्ञानानुशासनों के सम्प्रेषण का माध्यम होती है, लेकिन कविता में वह अभिव्यक्ति या सम्प्रेषण का माध्यम भर होकर नहीं रह जाती। उससे पहले वह जानने का या अनुभूति का माध्यम होती है। शब्द से कवि का रिश्ता केवल सम्प्रेषणपरक उपयोग का नहीं रहता, जो उसकी अनुभूति को अन्य तक पहुँचाता है - अर्थ को नहीं अनुभूति को। इसीलिए वह अपने ग्रहीता में भी अर्थ नहीं, अनुभूति को जगाता है। कवि के लिए कोई अनुभूति अशब्द नहीं होती- जैसे एक चित्रकार, मूर्तिकार या संगीतकार के लिए हो सकती है। जिस प्रकार उनकी अनुभूति उनके कला-माध्यम की रचनात्मक अनुभूति होती है, इसी तरह कवि के लिए शब्दानुभूति की प्रक्रिया होती है। शब्द केवल माध्यम नहीं बल्कि स्वयं अनुभूति का स्रोत हो जाता है। जिसे हम समय, परिवेश आदि कहते है, वह कविता के लिए शब्द हो जाता है। इस का अर्थ यह नहीं लिया जाना चाहिए कि उसका जीवन के यथार्थ या समाज, परिवेश आदि से कोई सम्बन्ध नहीं होता- केवल यही कि वे भी उसके सम्मुख संवेदनात्मक शब्द के रूप में ही उद्घाटित होने पर कविता हो पाते हैं। मैं यहाँ ओक्तोवियो पॉज की इस बात से सहमति दर्ज करना चाहूँगा कि कविता और इतिहास के सम्बन्धों में कविता इतिहास की चेरी की तरह प्रस्तुत नहीं होती बल्कि इतिहास ही कविता के लाभ के लिए प्रस्तुत होता है। समय, इसीलिए, कविता में किसी रपट की तरह नहीं बल्कि संवेदनात्मक रिश्तों में प्रकट होता है और ऐसी संकेतात्मक या प्रतीकात्मकता का रूप ले लेता है जो मानव चेतना को गहरे संवेदनात्मक अनुभवों से गुजारता है। कविता में अभिधा भी इसलिए तभी सार्थक होती है, जब वह अपने प्रभाव में लाक्षणिक अथवा व्यंजनात्मक असर पैदा करती है।
इसलिए साहित्य और विशेषतः कविता का सम्बन्ध समय या परिवेश से विश्लेषणात्मक नहीं बल्कि संवेदनात्मक रिश्ते के अनुभूत्यात्मक अन्वेषण का है। इस रिश्ते के नये और बदलते आयामों का उद्घाटन ही कविता का धर्म है और यह अन्वेषण ही हमारी शब्द-चेतना के नये आयामों का सृजन सम्भव करता है - जो प्रकारान्तर से मानव-चेतना के नये आयामों का सृजन है। इसी अर्थ में कविता आत्मसृजन है, अपने रचयिता के लिए ही नहीं, किसी भी रूप में अपने ग्रहीता के लिए भी। किसी भी श्रेष्ठ कविता से गुजरना प्रकारान्तर से आत्मसृजन की प्रक्रिया से गुजरना है।
आत्मसृजन की इस प्रक्रिया के रास्ते में इतिहास या समय कुछ ऐसी बाधाएँ पैदा कर देती है, जिनका प्रतिरोध भी एक रचनात्मक आवश्यकता बन जाता है- जैसे विभिन्न कारणों और तरीकों से भाषा का अविश्वसनीय, अप्रामाणिक अथवा अर्थहीन होते चले जाना। आत्मसृजन की यह प्रक्रिया ऐसे में भाषा में उसकी प्रामाणिकता और संवेदनात्मक सामर्थ्य के पुनःसंस्थापित होने की प्रक्रिया हो जाती है। शब्द को अप्रामाणिक तथा असत्य और संवेदनहीनता का माध्यम बनाये जाने के विरुद्ध कविता तब एक संवेदनात्मक प्रतिरोध अथवा, महात्मा गाँधी के मूल्यगर्भ पद का उपयोग करें तो, संवेदनात्मक सत्याग्रह हो जाती है। आज विभिन्न प्रकार की सत्ता-संरचनाओं और संचार-प्रसार साधनों के माध्यम से शब्द को जिस तरह संवेदनात्मक अप्रामाणिकता और असत्य का माध्यम बना कर उसका अर्थक्षय किया जा रहा है, उसमें कविता के लिए अपने को बचाने के लिए सत्याग्रह के निषेधात्मक और रचनात्मक दोनों पहलुओं में संवेदनात्मक सत्याग्रह का रास्ता अपनाना ही उसका धर्म है। अपने को बचाने के माध्यम से ही वह मनुष्यत्व को बचा सकती है।
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सुथारों की बडी गुवाड
बीकानेर - 334005
मो. 9413381045
** साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्ति के अवसर पर आयोजित लेखक सम्मिलन में दिया गया वक्तव्य।