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लेखन-कर्म एक जीवन-व्यापी शोध है

शंभु गुप्त
पानू खोलिया हिन्दी की साठोत्तर कथा-पीढी के महत्त्वपूर्ण कथाकार रहे हैं।
उत्तराखण्ड के अल्मोडा जले के देवली गाँव में सन् 1939 में जन्मे 81 वर्षीय पानू जी का निधन अभी 1 जनवरी 2020 को ईश्वर विहार, मल्ली बामौरी, हल्द्वानी में स्थित अपने निवास पर हुआ। वे लम्बे समय से बीमार चल रहे थे। अपने पीछे वे पत्नी, चार पुत्रियाँ व एक पुत्र छोड गए हैं।
भारतीय साहित्य को समृद्ध करने में पानू खोलिया का अप्रतिम योगदान रहा है।
पानू खोलिया ने जब वे बी.ए. में थे तभी से कहानी लिखना शुरू कर दिया था। उनकी पहली कहानी सीमान्त से आगे अल्मोडा नगर से प्रकाशित साप्ताहिक पत्र समता के स्वाधीनता विशेषांक में 1955 में छपी थी। तब से लेकर मृत्यु पर्यन्त उनका लेखन-कार्य निरन्तर जारी रहा। अपने लेखन-कार्य के प्रति अप्रतिहत और अद्वितीय समर्पण उनमें देखा गया। आत्मश्लाघा और आत्ममुग्धता से उनका दूर-दूर तक कोई नाता नहीं रहा। लेखन-कार्य के प्रति उनमें कितनी ललक और तत्परता थी, इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि राजस्थान की नौकरी (प्राचार्य, राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, सिरोही) से सेवानिवृत्त होने के बाद जब वे अपने गृहराज्य उत्तराखण्ड (हल्द्वानी) में स्थायी तौर पर रहने लगे तो 1996 में उत्तराखण्ड के सर्वप्रमुख विश्वविद्यालय- कुमाऊँ विश्वविद्यालय- के कुलपति पद हतु उनसे आग्रह किया गया था, जिसे उन्होंने यह कहते हुए विनम्रतापूर्वक अस्वीकार दिया था कि उन्हें *यादा से *यादा अपने लेखन पर ध्यान देना है! कुलपति जैसे पद को ठुकरा देना कोई मामूली बात नहीं; जिसके लिए लोग अपना ईमान तक बेचने, नेताओं-मंत्रियों की जी-हुजूरी तक करने से भी नहीं हिचकते! उनकी मृत्यु के पश्चात् हिन्दुस्तान (हल्द्वानी संस्करण) में 2 जनवरी को प्रकाशित अपनी एक खबर में सुमित जोशी ने यह सारा विवरण दिया है।
उनकी डायरी का अवलोकन करने पर पता चला कि उन्होंने एक नाटक की रचना भी की थी। लेकिन फिलहाल यह पता नहीं चल पाया कि इसका शीर्षक क्या था तथा इसका स्वरूप क्या था।
इस सूची से स्पष्ट है कि प्रकाशित से *यादा अप्रकाशित रचनाएँ अभी उनके के पास पडी हुई थीं। पहले सभी अप्रकाशित सामग्री पुस्तकाकार प्रकाशित हो और फिर उनकी समस्त रचनाओं को समेटते हुए उनकी एक ग्रंथावली तैयार की जाए तो निश्चय ही वह पाँच-छः खण्डों में होगी।
पानू खोलिया साठोत्तर पीढी के अतिमहत्त्वपूर्ण कथाकार रहे हैं। उनका अत्यधिक महत्त्व इसी तथ्य से प्रमाणित होता है कि उनके उपन्यास उस समय के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण साप्ताहिक-द्वय ऋमशः धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसे पत्रों में धारावाहिक प्रकाशित होते थे। उनकी कहानियाँ उस समय की महत्त्वपूर्णतम पत्रिकाओं जैसे धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, सारिका, ज्ञानोदय, रविवार, कहानी, माया, कादम्बिनी, नवभारत टाइम्स, योजना, नीहारिका, उत्कर्ष, विकल्प, आजकल, त्रिपथगा, मधुमती, सैनिक आदि में नियमित और महत्त्व के साथ निरन्तर प्रकाशित होती थीं। जैसे उनके उपन्यास धारावाहिक छपते थे, उनकी कहानियाँ भी एक के बाद एक लगातार एक पत्रिका में छपती थीं; नीहारिका पत्रिका ने एक बार वर्ष-भर में बारह कहानियाँ उनकी छापी थीं। उनकी कहानियाँ धर्मयुग जैसी पत्रिका में एक सशक्त कथाकृति की टेगलाइन के साथ छपती थीं।
पानू खोलिया का कथा-साहित्य अपने देश-काल, परिस्थिति का साफ आईना रहा है। कुमाऊँ अंचल से सम्बद्ध होने के कारण पहाडी जीवन-पद्धति, भू-संस्कृति, परम्परा, भाषाभिव्यक्ति इत्यादि की समृद्ध और स्पष्ट झलक उनकी कहानियों में मिलती है। पनचक्की, तुन महाराज, सीसकटी, गुनो लौट गई जैसी कहानियाँ इसकी उदाहरण हैं। पानू खोलिया शेखर जोशी और शैलेश मटियानी की परम्परा को काफी आगे तक विकसित करते हैं। विशेष रूप से पहाडी इलाके की स्त्री का यथार्थ पानू खोलिया की कहानियों में शिद्दत के साथ उभरा है। पहाडी परिक्षेत्र में पितृसत्ता नए-नए रूपों में लगातार पुनर्जीवित होती चलती है, यह यथार्थ पानू खोलिया की कहानियों में गहराई के साथ संरचित हुआ है।
सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि पानू खोलिया यथार्थ को जस्टीफाई नहीं करते, अपितु उसका अतिऋमण कर एक नया यथार्थ, नई जीवन-संभावना अपने लेखन में उकेरते दिखाई देते हैं। वे जीवन और परिदृश्य में व्याप्त धुन्ध का बखूबी चित्रण करते हैं, उसके विभिन्न आयामों को सामने लाते हैं; लेकिन इसी के साथ यह भी करते हैं कि इस धुन्ध के कारणों और सूत्रों पर भी गहरी और पैनी नजर डालते हैं। यह गहरी और पैनी नजर एक नई वैकल्पिक रचना-दृष्टि के बतौर सामने आती है, जो आगे का रास्ता खोलती है। धुन्ध के पार धुन्ध चाहे मौजूद हो, लेकिन पाठक धुन्ध के पार रोशनी का एक कतरा जरूर अनुभव कर लेता है।
कुमाऊँ भू-सांस्कृतिक परिदृश्य के अध्ययन की दृष्टि से पानू खोलिया की कहानियों और उपन्यासों का अपना एक अलग महत्त्व है। सुविधा के लिए हम इसे आंचलिकता नाम दे देते हैं पर वस्तुतः यह अपने समय की विश्व-दृष्टि की ही एक बानगी होती है। अंचल इस अखण्ड और सम्पूर्ण विश्व-दृश्य का ही एक अविभाज्य हिस्सा होता है, जो शेष विश्व के राजनीतिक एवं सामाजिक आर्थिक क्रम में ही, उसका एक अंगीभूत अंश ही होता है, जिसकी हालाँकि अपनी कुछ स्थानीय विशिष्टताएँ होती हैं, लेकिन समग्रतः होता वह एक बडे परिदृश्य का टुकडा ही है, अतः कुलमिलाकर वह यथार्थ को संपूर्णता प्रदान करने का काम करता है। इस दृष्टि से पानू खोलिया का कथा साहित्य एक विश्व-दृष्टि का प्रवाचक माना जा सकता है। यही कारण है कि उनकी कहानियाँ और उपन्यास महाराष्ट* और मध्यप्रदेश जैसे दूरदराज इलाकों के विश्वविद्यालयों के हिन्दी साहित्य के पाठ्यक्रमों के हिस्से बन जाते हैं। महाराष्ट्र के औरंगाबाद विश्वविद्यालय के बी.ए. के पाठ्यऋम में उनका उपन्यास टूटे हुए सूर्यबिम्ब पढाया जाता रहा है।
पानू खोलिया को सत्तर पार के शिखर पर 1979 में राजस्थान साहित्य अकादमी का सर्वोच्च मीरां स्मृति पुरस्कार प्राप्त हुआ था। मार्च 2006 में उत्तराखण्ड संस्कृति, साहित्य एवं कला परिषद्, उत्तरांचल, देहरादून ने उन्हें उनके सारस्वत अवदान के लिए सम्मानित किया था। हिन्दी की प्रसिद्ध साहित्य, कला, संस्कृति की अन्तरराष्ट्रीय मासिक पत्रिका आधारशिला ने सन् 2018 में अंक 172-173 के रूप में पानू खोलिया का कथा संसार नाम से उन पर एकाग्र एक विशेषांक निकाला था, जिसके बारे में दैनिक ट्रिब्यून ने लिखा कि आधारशिला का विशेषांक सातवें दशक के कथाकार पानू खोलिया के रचनाकर्म को समझने की नई दृष्टि देता है। पानू खोलिया की गिनती उन संवेदनशील कथाकारों में होती है, जिनकी धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, सारिका आदि प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित आरंभिक रचनाओं ने ही उन्हें राष्ट्रीय पहचान दिला दी।
भारतीय साहित्य को समृद्ध करने में कथाकार पानू खोलिया का भरपूर योगदान रहा है। समकालीन मध्यवर्गीय व निम्नमध्यवर्गीय यथार्थ का हृदयहारी अंकन करने में उन्हें महारत हासिल थी। पानू खोलिया अपनी पीढी में अपने कथा-शिल्प के लिए अलग से जाने जाते थे। हंस संपादक राजेन्द्र यादव ने उनके उपन्यासों पर प्रतित्रि*या देते हुए लिखा- शिखर और सूर्यबिम्ब खूबसूरती से लिखे उपन्यास। वरिष्ठ कथाकार रमेश चन्द्र शाह ने टूटे हुए सूर्यबिम्ब पर अपनी प्रतिक्रिया में लिखा कि- दुःख की ऐसी पारदर्शी पहचान कम ही देखने को मिलती है। वह भी ऐसी तडप और खुलेपन के साथ। कितने विस्तार को तुमने किस एकाग्र संघटन से समेटा है। वरिष्ठ कथाकार हेतु भारद्वाज ने उनकी कहानियों पर चर्चा करते हुए लिखा कि उनकी कहानी लेखन की यात्रा बडी तीव्र गति से चलती है और 1972 तक उनकी लगभग 26 कहानियाँ देश की सभी अग्रणी पत्रिकाओं में प्रकाशित होती हैं। वे शीघ्र ही हिन्दी के चर्चित कहानीकारों में अपना स्थान बना लेते हैं। राजा खुशगाल ने लिखा कि सातवें दशक में पहाड के जिन कहानीकारों ने कुछ कहानियाँ लिखकर कहानी के क्षेत्र में अपना विशिष्ट स्थान बनाया, उनमें पानू खोलिया मुख्य हैं। वरिष्ठ कथाकार से.रा. यात्री ने उनकी अन्ना कहानी के बारे में कहा कि- हर सही लेखक को ललक होगी कि वह अन्ना जैसी समर्थ रचना लिख ले जाए तो लेखन की सार्थकता प्रमाणित हो। वरिष्ठ महिला कथाकार राजी सेठ ने टूटे हुए सूर्यबिम्ब पर प्रतित्रि*या करते हुए लिखा कि -बैठे हुए आदमी को बेचैन करके खडी कर दे कोई बात- इससे बडी सफलता पुस्तक की और क्या होगी! ...कहूँ असाधारण को साधारण-सामान्य सच बना पाने में सिद्धहस्त हैं आप... तो गलत नहीं होगा। दिवाकर भट्ट ने लिखा कि सातवें दशक के जिन कथाकारों ने अपनी कुछ कहानियों से ही हिन्दी साहित्य जगत् में अपना विशिष्ट स्थान बनाया उनमें पानू खोलिया प्रमुख नाम है। उत्तराखण्ड के ग्रामीण परिवेश से निकलकर राजस्थान को अपनी कर्मभूमि बनाने वाले पानू खोलिया की कहानियाँ धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, ज्ञानोदय, सारिका व हिन्दी साहित्य की दूसरी महत्त्वपूर्ण पत्रिकाओं के माध्यम से देश-दुनिया तक पहुँचीं और उन्होंने कम समय में ही हिन्दी को चर्चित कहानियाँ व उपन्यास देकर एक दृष्टि-सम्पन्न लेखक की हैसियत प्राप्त की। उल्लेखनीय है कि एक समय के अतिमहत्त्वपूर्ण आलोचक डॉ. बच्चन सिंह ने धर्मयुग में एक किरती और की समीक्षा की थी, जिसमें उनकी कहानियों को महकाव्यात्मक संवेदना की रचनाएँ कहकर पहचाना गया था। (सभी उद्धरण आधारशिला (संपादक - दिवाकर भट्ट) के पानू खोलिया विशेषांक से लिए गए हैं।)
पानू खोलिया के कहानी-लेखन की एक बडी उल्लेखनीयता यह है कि स्त्री और दलित अस्मिताएँ वहाँ अपना शानदार मुकाम तलाशती नजर आती हैं। उनकी अधिकांश कहानियों की विषय-वस्तु इन्हीं दो संदर्भों के इर्द-गिर्द बनती-सँवरती है। शीशकटी, गुनो लौट गई, पनचक्की, चौंधा, रौशनी वाला छेद, औकात, तुम्हारे बच्चे जैसी कहानियाँ इसकी मिसाल हैं। ऐसी कहानियाँ वहाँ और भी हैं। इन कहानियों में लेखक पर्याप्त डि-जेंडर और डि-कास्ट हुआ है।
पानू खोलिया का लेखन अन्य अनेक कथाकारों की तरह ही एक गहरे गतिरोध का शिकार हुआ। किन्तु धीरे-धीरे उन्होंने अपने इस गतिरोध पर विजय पाई और फिर से लेखन की दुनिया में सक्रिय हुए। लम्बे अरसे बाद पिछले दशक में एक बार फिर उनका वही लेखकीय तेवर हिन्दी के पाठकों को दिखाई दिया, जो सातवें-आठवें दशक में उनमें दिखाई दिया था। एक के बाद एक कई उपन्यास इधर उनके छपकर आए और कई निकट भविष्य में आने वाले हैं। इनमें वाहन, मुझे मेरे घर जाने दो उपन्यास प्रमुख हैं। कालू कलबंसिया और तौक उपन्यास प्रकाशन की पाइप-लाइन में हैं। इसी तरह प्रतिनिधि कहानियाँ तथा विपरीत धार तथा अन्य कहानियाँ भी शीघ्र प्रकाश्य हैं।
उनकी अप्रकाशित रचनाओं में सबसे महत्त्वपूर्ण है उनकी आत्मकथा; जिसका शीर्षक है- अपनी ही राख से पुनर्जीवित होना। फीनिक्स का यह रूपक पानू खोलिया के जीवन और व्यक्तित्व पर हू-ब-हू लागू होता है कि इतने लम्बे अन्तराल और गतिरोध के बाद; उससे बखूबी उबरकर एक बार फिर वे लेखन की दुनिया में आए और पुनर्प*तिष्ठित हुए। पानू खोलिया में कितनी अदम्य जिजीविषा और सिसृक्षा थी, इससे मैं हालाँकि पहले से सुपरिचित था लेकिन इधर उनकी मृत्यु का समाचार पा जब मैं उनके घर हल्द्वानी गया और दो-तीन दिन रुका और उनके कागज-पत्तरों को खँगाला और उन्हें फौरी तौर पर व्यवस्थित किया, तो पाया कि वे गम्भीर बीमारी की हालत में भी टेबिल पर लगातार बैठते थे। उनकी लिखने की मेज पर अभी भी कोई रचना लिखी जा रही थी, एक उपन्यास पर काम चल रहा था। उनकी पत्नी श्रीमती पद्मा जी ने बताया कि वे लगातार इस बात की रट लगाए थे कि मुझे बचा लो! अभी मुझे कितना काम करना है! उनकी बेटियों ने बताया कि जब तक अस्पताल जाने की नौबत नहीं आ जाती थी, वे टेबिल छोडते नहीं थे! उनकी दो डायरियों में उनकी लेखन-योजनाएँ अंकित मिलीं, जिन्हें वे या तो पूरा कर चुके थे या पूरा करना चाहते थे। उनके लेखन-कार्य का समस्त ब्योरा इन डायरियों से मिल जाता है। उनकी डायरी के दो पृष्ठ पाठकों के अवलोकनार्थ यहाँ देना उपयुक्त होगा। इन दो पृष्ठों में उन्होंने अपनी अधिकांश रचनाओं का लेखा-जोखा दे रखा है। इनमें कहानियाँ तो हैं ही, उपन्यास भी हैं और आत्मकथा का भी उल्लेख है।
उत्तराखण्ड और हिन्दी-प्रदेश के कई विश्वविद्यालयों में पानू खोलिया के कथा-साहित्य पर एम. फिल., पीएच.डी. कार्य हुए हैं। टूटे हुए सूर्यबिम्ब पर अलग से एम.फिल हुआ है।
पानू खोलिया की मृत्यु के उपरान्त उत्तराखण्ड तथा देश-भर के हिन्दी अखबारों में बराबर और बार-बार उनका महत्त्व निरूपित हुआ है। उन्हें व्यापक श्रद्धांजलियाँ दी गईं। उत्तराखण्ड के मुख्यमन्त्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने अपने शोक-सन्देश में कहा कि स्वर्गीय पानू खोलिया ने हिन्दी साहित्य को समृद्ध और जीवन्त बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। हल्द्वानी-नैनीताल से प्रकाशित सभी प्रमुख समाचार-पत्रों; यथा अमर उजाला, हिन्दुस्तान, उत्तर उजाला, दैनिक जागरण आदि ने लगातार उनके विषय में अपने संवाददाताओं के मार्फत रिपोर्ट प्रकाशित कीं। इन खबरों में श्रद्धांजलि देने वालों में प्रसिद्ध वरिष्ठ कथाकार-आलोचक बटरोही, सुदर्शन वसिष्ठ, विज्ञान-लेखक देवेन्द्र मेवाडी, कथाकार दिनेश कर्नाटक, सतीश छिम्पा, आधारशिला के सम्पादक दिवाकर भट्ट, कवि-कथाकार शैलेय, पत्रकार जगमोहन रौतेला, हरीश पन्त, उमेश तिवारी विश्वास, कुमाऊँनी कहानीकार जगदीश जोशी आदि शामिल हैं। बटरोहीजी ने कहा कि वह हमारे दौर के प्रेरक कहानीकार थे। आधारशिला के कार्यालय में 10 जनवरी को एक शोक-सभा/संगोष्ठी भी हुई, जिसमें मैं भी उपस्थित था तथा अध्यक्षता की थी। इस शोक-सभा/संगोष्ठी में राजस्थान/जयपुर से दूरभाष के जरिए कथाकार हेतु भारद्वाज ने अपनी श्रद्धांजलि व्यक्त की। इस शोक-सभा/संगोष्ठी में नैनीताल, हल्द्वानी, रुद्रपुर से बडी संख्या में लेखकों ने भागीदारी की। पानू जी की दो बेटियाँ तथा पुत्र-वधू भी इसमें आईं और अपने उद्गार व्यक्त किए।
इस श्रद्धांजलि/स्मृतिपरक लेख का समापन पानू खोलिया के गत वर्ष सापेक्ष पत्रिका के सम्पादक महावीर अग्रवाल द्वारा कथायन-47 के लिए लिए गए एक साक्षात्कार (पृष्ठ 24-29) के कुछ अंशों को प्रस्तुत कर किया जाना सार्थक और उपयुक्त होगा। यह साक्षात्कार कहानी की एक सदी श्ाृंखला के अन्तर्गत लिया गया था। यह श्ाृंखला लम्बी थी और इसमें हिन्दी के लगभग सभी नामचीन कथाकार शामिल किए गए थे। इस इंटरव्यू में सवाल स्वयं महावीर अग्रवाल के हैं, जिनका विस्तृत उत्तर लेखक ने दिया है। कुछ सवालों के जवाब देखे जा सकते हैं। सवाल इन जवाबों में निहित देखे जा सकते हैं। महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि इन जवाबों में पानू जी के बडे लेखकीय मन्तव्य सन्निहित हैं। मसलन -
(1) लेखन का स्थायी क्रम नौकरी लग जाने के बाद शुरू हुआ, जब मन में गँठ गया कि नियमित रूप से एक साधना के बतौर लिखना है- स्वास्थ्य, नौकरी और दाम्पत्य- सबको लाँघकर लिखना है, इस निश्चय से लेखन के बाद पहली कहानी आगरा की निहारिका में मार्च 64 में एक किरती और नाम से छपी और मेरे लिए कहानी का सिलसिला शुरू हुआ।
(2) शुरू में तो केवल लेखकीय शौक था, बाद में यह मात्र लेखन की अभिरुचि से उठकर जीवन का एक ठोस कर्म बन गया। नौकरी सहकर्म था, लेखन मुख्य कर्म। वह बहुत कुछ एक सहारा बन गया। उसका ध्येय हो गया है, मानव जीवन का अध्ययन, जीवन की अन्तर्गूढ गुत्थियों को समझना, मानव मन की परख करना, अन्तर्बाह्य यथार्थ की पहचान। प्रेमचन्द से अधिक मुझे इसकी प्रेरणा पाश्चात्य कथा साहित्य से मिली है। आज का कथाकार मानव जीवन की अन्तर्गूढ गुत्थियों को खोलता है, पात्रों का सतही चित्रण भर नहीं करता। यह एक जीवन-व्यापी शोध है। चेखव, शोलोखोव, मोपासाँ सब इसमें शामिल हैं।
(3) कथ्य और कलात्मक सन्तुलन कहानी में होना चाहिए। उसके बीच असन्तुलन होना दो बेडौल पहियों की तरह हो जाएगा, जो रचना को सुचारु भाव से चलने नहीं देते। किन्तु वहीं कथ्य की प्राथमिकता को कलात्मकता की कीमत पर टाला भी नहीं जा सकता। वह कथ्य को उपेक्षित कर कलात्मकता को प्रधानता देकर कहानी को साहित्यिक कृति की जगह कुछ और बना देगा- कोई तमाशा, चुटकुला,मजाकियाँ; कुछ और! सन्तुलन का अर्थ कथ्यात्मकता का परित्याग नहीं होता।
(4) कहानी की भाषा सीधी और बोधगम्य होनी चाहिए। बहुत कुछ प्रेमचन्द की पहचान ली हुई, तभी वह समझ में आती है और हृदय को छूती है। कहानी जीवन-यथार्थ का चित्रण करती है, इसलिए भाषा भी कहानी की जीवन के यथार्थ के निकट की होनी चाहिए।
हिन्दी में प्रेमचन्द और कमलेश्वर की भाषा शुद्ध कहानी की भाषा है, सामान्य जन की समझ से पूरे अन्दर की। उसमें किसी तरह का चमत्कार, प्रयोग, कलात्मकता कुछ भी नहीं है। वह सोलहों आने कहानी की भाषा है : सहज, स्वच्छ।
(5) वैचारिक प्रतिबद्धता का आशय है कि लेखक को पता होना चाहिए कि वह क्या लिख रहा है, किसके लिए लिख रहा है, क्यों लिख रहा है- उसके लिखने का मन्तव्य क्या है? उसके लिखने की सीमा क्या है? वह एक वैचारिक लडाई या आन्दोलन को महज शाब्दिक रूप तो नहीं दे रहा- बल्कि उसे कथा, चरित्र, भाषा और शिल्प के सुगठित स्वरूप में ढाल रहा है। मात्र किसी वाकयुद्ध के आधार पर रचना (यानी कथा-रचना) का दृश्य-पट नहीं उठाया जा सकता। प्रतिबद्धता मात्र प्रत्याख्यान खडा करना नहीं है- एक प्राण-प्रतिष्ठा की त्रि*या को अंजाम देना है, एक जीवन को प्रत्यक्ष करना है।
(6) कहानी के साथ-साथ अब उपन्यास लिखना अच्छा लगने लगा है। मूलतः मैं हूँ तो कहानीकार, इसलिए वही मेरी जड है, वहीं मुझे लौटना है।
(7) लेखन द्वारा सामाजिक, वैचारिक और क्रान्तिकारी परिवर्तन कठिन लगता है। हमारा नैतिक चरित्र, राष्ट्रीय भावना, जातिवाद, भाषावाद, अनेक रूढियाँ-रुकावटें हैं जो देश के चरित्र और सोच की मुक्तावस्था को जकडे हुए हैं। यहाँ तक कि हमारे जीवन में साहित्य पढना तक नहीं उतरा है। अब भी या तो हम पौराणिक पाठक हैं या स्थानीय अखबारों की सुर्खियाँ चुन लेते हैं। रूस और फ्रांस में ऋान्ति-पूर्व का जो उन देशों का चरित्र रहा, वह हमारे यहाँ दूर तक कहाँ है? क्रान्ति की चेतना के लिए जो चिनगारी चाहिए, वह हममें कभी जगी नहीं। ऐसे में लेखक का दायित्व है, वह हमारी राष्ट्रीय चेतना को अपने लेखन में सँजो कर रखे, जाग्रत् रखे, सुरक्षित रखे। साहित्य में हमारी रुचि बढाए, हमारे इतिहास को जिलाए रखे।
(8) रचनाकार सामाजिक दायित्व के लिए कलम उठाता है। वह व्यक्ति जिसे सामाजिक जम्मेदारी का बोध ही न हो, वह किस जरूरत के लिए कलम उठाएगा? सही रचनाकार को अपने समाज की स्थितियों का क्षण-क्षण का बोध और चेतना रहनी चाहिए। वह मात्र एक सामाजिक प्राणी नहीं है। साहित्य-सृष्टि से होता हुआ वह सामाजिक चेतना को जगाए रखने तक का कार्य करता है। उसकी साहित्य-सर्जना समाज में अलख उत्प्रेरित करने के लिए होनी चाहिए। वह मात्र एक निष्त्रि*य अक्षर-पाठक नहीं है, लेखन के अलावा वह जो अन्य साहित्यिक आचरण करता है; पत्रिकाएँ निकाल कर समाज को जाग्रत् करना, गोष्ठियाँ आयोजित करना आदि; वह भी सामाजिक दायित्व के निमित्त ही होते हैं। वह अपनी तमाम लेखकीय क्रियाओं से साम्प्रदायिक विषमताओं को शान्त कर समाज में समभाव उत्पन्न करता है, इसलिए जनमानस को बदलने का निरन्तर प्रयास करता हुआ वह साम्प्रदायिक आग को बुझाने में शनैः-शनैः अपनी भूमिका अदा करता है।
(9) कहानी के स्वरूप-विधान पर आलोचना की सत्रि*य भूमिका रहती है। एक छोटी विधा है कहानी, आलोचना उसे तुरन्त प्रभावित कर देती है। कहानी की तोड-मरोड करने में आलोचना का बडा हाथ है, इसलिए उसकी सक्रियता वहाँ बढ जाती है। कुछ पहले तक आलोचक कहानीकार की सहभूमिका में रहता था। आज कहानी का जहाँ विकास हो रहा है, आलोचना वहीं की वहीं स्थिरता को प्राप्त हो गई है, ऐसी हालत में आलोचक के बारे में बात करना अब संकट से खाली नहीं है।
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