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यादों में बसे हैं यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र

बुलाकी शर्मा
मैं स्वयं को बहुत सौभाग्यशाली मानता हूँ कि मैंने शीर्षस्थ कथाकार यादवेंद्र शर्मा चन्द्र का तीन दशक से भी ज्यादा समय तक असीम स्नेह और अपनत्व पाया। किशोर वय में ही उनके प्रति मेरा आकर्षण हो गया था। स्कूल पुस्तकालय में जब भी कोई पत्र-पत्रिका पढता, प्रायः उनमें उनकी कहानियाँ होती। कहानी समाप्ति पश्चात् उनका पता होता- साले की होली, बीकानेर। मैं रोमांचित कि हमारे शहर के लेखक की राष्ट्रीय स्तर पर कितनी प्रतिष्ठा है। उनसे मिलने की ललक मन में उठती किंतु हिम्मत नहीं होती। पता नहीं कैसा स्वभाव है। लेखक वैसे ही मूडी होते हैं और चंद्र जी की तो पूरे देश में प्रसिद्धि है। स्कूल -कॉलेजों के पाठ्यक्रमों में उनकी कहानियाँ शामिल हैं। यदि मैं मिलने गया और उन्होंने मिलने से मना कर दिया, तो क्या करूँगा! मैं ऊहापोह में। मिलूँ भी तो कैसे।
साइकिल का हैंडल हाथ में थामे उन्हें मैं शहर के मुख्य द्वार कोट गेट के पास हसरत से देखता किंतु संकोची स्वभाव होने से मिलने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। बात होगी सन् 1976- 77 की। एक ही शहर में रहते हुए मैंने उन्हें पत्र लिखा और आश्चर्य कि उसी सप्ताह उनका स्नेह से परिपूर्ण पोस्टकार्ड मिला- घर आओ, मिलो। लेकिन जल्दी से मिल नहीं पाया। कई दिन हमारे बीच पत्रों का आदान-प्रदान होता रहा और जब पहली बार उनसे मिला तो यह एहसास ही नहीं हुआ कि किसी दिग्गज कथाकार से मिल रहा हूँ। ऐसा लगा जैसे बडे भाई से मिल रहा हूँ। अकूत स्नेह। सरल-सहज । दंभमुक्त । एकदम अनौपचारिक । नए से नए लेखक को स्नेह और अपनत्व देने वाले। सच में वे स्नेह, अपनत्व और आत्मीयता के सागर थे। जो उनसे एक बार मिल लेता उनसे बार-बार मिलने को लालायित हो जाता। इसकी खास वजह यह थी वे एक अच्छे लेखक के साथ-साथ अच्छे इन्सान थे। वे खुली किताब थे। आडम्बर और आभिजात्य भाव से मुक्त। लोग एक चेहरे पर न जाने कितने मुखौटे लगाए रहते हैं किंतु वे जैसे दिखते थे, वैसे ही थे। हर किसी के सामने खुलकर बातें करते। उनका खुला-खुला निर्द्वन्द्व-निश्छल सम्मोहक व्यक्तित्व दूसरों को भी उनके सामने सहज ही खुलने के लिए विवश कर देता। घर-परिवार की निजी बातें साझा करने में भी झिझक नहीं होती। सबको उन पर पूरा विश्वास था कि वे बातें उन तक ही रहेंगी। इसलिए उनसे मिलने वाला अपने मन को खोल कर रख देता था। उनकी खूबी थी कि वे हरेक को अपना भायला यानी दोस्त मानते। चाहे वह उनके बच्चों की उम्र का ही हो। उनके भायलों की सूची में तीन पीढियाँ शामिल रहतीं। दादा भी उनका दोस्त, बेटा और पौत्र भी। उनकी सहजता और सरलता किसी-किसी को मुगालते में भी डाल देती कि वह चंद्र जी से भी ज्यादा समझदार है । उनको कभी-कभी अपनी किसी कहानी से संन्तुष्टि नहीं होती, तब वे दो-तीन लेखक-मित्रों को यह कहते हुए पढने के लिए देते-यह कहानी छप तो कहीं भी जाएगी। संपादक माँग रहे हैं किंतु मुझे तसल्ली नहीं है। लगता है कहानी में कुछ कमी है इसलिए तुम एक पाठक के रूप में पढकर बताओ कि इसमें कहाँ क्या छूट रहा है । सौभाग्य से उनके ऐसे पाठकों में मैं भी शामिल रहा । वे पाठकों की राय पर विचार करते और जरूरत समझते तो कहानी को पुनः संशोधित करते और यह बताने में भी गुरेज नहीं करते कि किसका सुझाव उन्हें ज्यादा सही लगा। उनके देहावसान के काफी समय पश्चात् एक ऐसे युवा लेखक को, जिसकी पुस्तकें उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित कराई थी, दम्भ से अन्य साथियों से यह कहते सुना कि वह उनकी कहानियाँ एडिट करता था, तब मुझे उसकी सोच और समझ पर बहुत अफसोस हुआ। लगा कि कई वर्षों तक उनके सान्निध्य में रहकर भी वह चन्द्रजी के सहज-सरल व्यक्तित्व से कुछ भी हासिल नहीं कर पाया।
उनके सान्निध्य में व्यतीत पल-पल मेरे लिए अमूल्य धरोहर है। अनेकानेक स्मृतियाँ मेरे पास सुरक्षित हैं। वे मेरे साहित्यिक अभिभावक थे। अमाप स्नेह मिला उनका। उनके लिए साहित्यिक समाज ही परिवार था। वे सबसे बहुत ही आत्मीय संबंध रखते थे। जब कोई साहित्यकार-मित्र बीमार हो जाता तो वे चिंतित हो जाते। उससे मिलने जरूर जाते। मुझे स्मरण आ रहा है कवि -कथाकार योगेंद्र किसलय को पार्किंसन (कंपन) की बीमारी ने उन्हें घर में सिमटा दिया था और नगर के लेखकों ने जैसे उनको विस्मृत ही कर दिया था। चंद्रजी जैसे दो-तीन साहित्यकार ही थे जो उनकी कुशलक्षेम पूछने जाया करते थे। चालीस के लगभग पुस्तकों के लेखक तथा राजस्थान साहित्य अकादमी से विशिष्ट साहित्यकार के रूप में सम्मानित सुमेरसिंह दैया की जीवन के अंतिम कुछ वर्षों में आँखों की ज्योति चली गई थी। उनसे मिलने शायद ही कोई जाता था। एक दिन मैं उनके पास बैठा था। अचानक वे दैयाजी को याद करने लगे- उनसे मिले काफी दिन हो गए। मिलने जाना चाहिए। पता नहीं अँधेरी दुनिया से वे कितनी पीडा भोग रहे होंगे। कितना असहाय महसूस कर रहे होंगे। हम वहाँ पहुँचे। काफी देर तक दोनों अतीत की स्मृतियों को ताजा करते रहे। वे ऐसे रचनाकार थे जो देश के किसी भी कोने के रचनाकार की हारी-बीमारी का पता चलने पर व्यथित-विचलित हो जाते थे। पोस्टकार्ड या फोन से कुशलक्षेम की जानकारी लेते । मुझे याद आता है वह दिन जब गीतकार रमानाथ अवस्थी के निधन की छोटी-सी खबर समाचार पत्रों में छपी। वह खबर शायद अन्य लोगों की नजर से ओझल हो गई होगी किंतु वे तीन-चार दिन तक गमगीन रहे। उनके गीतों को गुनगुनाते रहे और कहने लगे- तुम नहीं जानते कि वे जितने अच्छे गीतकार थे उतने ही अच्छे इंसान थे। फिर मीडिया पर गुस्सा होने लगे- इतने महान गीतकार के निधन की इतनी छोटी-सी खबर और जब कोई भ्रष्ट राजनेता मरता है तो उसकी फ्रंट पेज पर खबर आती है। मीडिया और अखबार वालों के लिए साहित्यकार क्या इतना महत्त्वहीन हो गया है?
उनके सम्बन्धों का दायरा बहुत विस्तृत था। यायावर थे वे। जहाँ भी जाते, साहित्यकारों से मिलते। उनके सबसे ही आत्मीय सम्बन्ध थे। उनका व्यक्तित्व ही ऐसा था कि जब भी कोई साहित्यकार बीकानेर आता तो उनसे मिले बिना नहीं जाता। चाहे वे बाबा नागार्जुन हों अथवा विष्णु प्रभाकर, कमलेश्वर हो या राजेंद्र यादव, ख्वाजा अहमद अब्बास हो या मोहन सहगल, मोहनदास नैमिशराय हो या कथादेश के संपादक हरिनारायण। मेरा सौभाग्य रहा कि इन साहित्यिक विभूतियों से पहली बार मैं चंद्रजी के आवास पर ही मिला। जब भी कोई प्रतिष्ठित साहित्यकार हमारे शहर में आते तो वे उनसे जरूर मिलते क्योंकि यह अतिशयोक्ति नहीं सच्चाई है कि वे राजस्थान के ऐसे अकेले यशस्वी कथाकार थे जिन्होंने डॉ. रांगेय राघव के बाद सर्वाधिक और प्रभावी सृजन से राजस्थान को राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाई। उनके संबंध में कमलेश्वर ने सही कहा है, मैं मानता रहा हूँ कि राजस्थान ही नहीं राजस्थान के बहाने चंद्र ने भारतीय यथार्थ को रूपाकृति दी है। कई ऐसे राजस्थानी लिप्यांतरकार भी हैं जो राजस्थान की बोध-परक परंपरा को आधुनिक रूप देकर अपने नाम पर भुना रहे हैं। पर वे बहुत दूर तक साथ नहीं दे पाएँगे, क्योंकि उनके पास अंगरखा तो है, पर भारत के इस प्रदेश की आधुनिक पहचान नहीं। चंद्र ने लगातार जीवंत राजस्थान को उत्कीर्ण किया, इसीलिए उनकी रचनाएँ अपनी राजस्थानी पहचान के बावजूद आधुनिक भारत की रचनाएँ हैं।
मुझे स्मरण आता है उपन्यासकार पंकज बिष्ट के बीकानेर आगमन पर आयोजित साहित्यिक संगोष्ठी का। उसमें चन्द्रजी को न देख कर उन्होंने आयोजकों से प्रश्न किया- चन्द्रजी नहीं दिख रहे। वे कैसे नहीं आये।
आयोजकों को प्रश्न हजम नहीं हुआ। बेरुखी से बोले- उन्हें निमंत्रण तो भिजवाया था। पता नहीं कैसे नहीं आए।
पंकज बिष्ट बोले- मैंने लिखना शुरू नहीं किया था, उससे पहले से उन्हें पढता रहा हूँ। उनके शहर में आकर उनसे मिले बिना कैसे जा सकता हूँ। और वे उनसे मिलने उनके घर गए थे। चंद्रजी के देहावसान पर पंकज बिष्ट ने समयांतर पत्रिका, दिल्ली के अप्रैल 2009 अंक में उनके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए लिखा था- यादवेंद्र शर्मा चंद्र के साथ हिंदी लेखकों की वह पीढी लगभग समाप्त हो गई है जिन्होंने साहित्य लेखन को अपनी आजीविका बनाया था और जीवनयापन के इस कठिन रास्ते पर चलते हुए साहित्य की रचना की.. वे अत्यंत जिंदादिल आदमी थे, जिन्होंने कभी भी अपने संघर्ष और संकट का प्रचार कर संवेदना बटोरने की कोशिश नहीं की।
इसी तरह जब साहित्य मनीषी जैनेंद्र कुमार बीकानेर आये तब भी उस कार्यऋम में उन्हें नहीं देख कर उन्होंने आयोजकों से पूछा किंतु वे जवाब नहीं दे पाए। आखिर जैनेंद्रजी ने आयोजकों को अल्टीमेटम दे दिया कि उनके लिए बीकानेर का तात्पर्य चंद्र है उनसे मिले बिना यहाँ आने की सार्थकता क्या रहेगी। अंततः आयोजक चन्द्र जी के घर गए और आग्रह करके उन्हें जैनेन्द्रजी से मिलाने लाये ।
उन जैसे ऐसे ईमानदार रचनाकार हमें कम मिलेंगे जो साफगोई से कहें कि उन्होंने उन सब पत्र-पत्रिकाओं में लिखा जो मानदेय देती हैं क्योंकि वे फ्रीलांसर हैं । पत्रिका चाहे साहित्यिक हो अथवा फिल्मी, उनके कोई फर्क नहीं पडता। इससे इमेज को ठेस लगेगी कि नहीं इसकी कभी उन्होंने परवाह नहीं की और यूं देखा जाए तो सब तरह की पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहने से ही उन्हें विभिन्न वर्गों का वृहत् पाठक समाज मिला। अनेक भाषाओं में उनकी कृतियों के अनुवाद हुए। जितने पाठक उनके थे और हैं, उतने अन्य लेखकों को कम ही मिल पाते हैं। लेकिन उन्होंने सदैव अपनी शर्तों पर लिखा, चाहे किसी भी पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिखा हो।
वे फ्रीलांसर थे। लेखन ही उनका जीवन था। उन्होंने कभी कोई नौकरी नहीं की। बचपन से ही उन्होंने लेखक बनने का सोच लिया था। सामंती संस्कारों के शहर बीकानेर के भीतरी हिस्से में सेठ -साहूकारों के बीच रहकर भी उनके बालमन में वैभव-संपन्न बनने की नहीं, लेखक बनने की चाहत थी। धन से प्राप्त संपन्नता से उनका बाल्यकाल में ही मोहभंग हो गया था। कभी उनका परिवार आर्थिक रूप से बहुत समृद्ध-संपन्न था। परदेस में अच्छा कारोबार था किंतु वक्त ने ऐसी चपत लगाई कि संपन्नता अक्समात् समाप्त हो गई और परिवार आर्थिक संकट से गुजरने लगा। बचपन में ही उन्हें लक्ष्मी की चंचलता का एहसास हो गया था। उन्हें लगने लगा था कि साहित्य सृजन ही स्थाई है, धन-वैभव क्षणभंगुर है। लिखा- अजर अमर है। विशिष्ट पहचान उसी की बनी रह सकती है। बालमन में लेखन के बीज ऐसे अंकुरित हुए कि धीरे-धीरे वे कथा साहित्य का वटवृक्ष बन गये। स्कूल के चाँदरतन बिस्सा, घर के गुनिया और हिंदी कथा साहित्य के चंद्र जब सातवीं-आठवीं में पढते थे, उम्र होगी तेरह-चौदह वर्ष की, तब लेखकीय प्रतिभा का परिचय देते हुए उन्होंने हस्तलिखित पत्रिका निकाली थी और उसमें तत्कालीन पूँजीवादी व्यवस्था के कुत्सित रूप को उजागर करते हुए कहानी लिखी थी-मैं वही हूँ। सार्वजनिक रूप से प्रकाश में आने वाली उनकी यह पहली रचना थी। सृजन का शुभारंभ करने के बाद वे अनथक-अनवरत सृजनरत रहे। उनकी अर्द्धांगिनी शांति भट्टाचार्य उनका सम्बल बनी रहीं। उन्होंने 200 से अधिक पुस्तकों का सृजन किया, जिनमें 98 उपन्यास, 36 कहानी संग्रह, आठ नाटक संग्रह, तीन एकांकी संग्रह, दो कविता संग्रह, 50 बाल साहित्य की पुस्तकें और इनके साथ ही अन्यान्य पुस्तकें शामिल हैं। वे अपने परिचय में सौ से अधिक पुस्तकों का लेखन बताते रहे किन्तु जब वे हमें छोड गए तब मैंने उनके सुपुत्र कृष्ण कुमार के सहयोग से उनकी उन प्रकाशित पुस्तकों की सूची तैयार की जो उनकी निजी लाइब्रेरी में उपलब्ध थी। तब पता चला कि उनकी उपलब्ध कुल प्रकाशित पुस्तकों की संख्या 210 है, जिनमें हिंदी की 204 और राजस्थानी की 6 पुस्तकें शामिल हैं। उनकी पुस्तकों की पूरी जानकारी मेरे सम्पादन में प्रकाशित पुस्तक कथापुरुष यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र में देखी जा सकती है।
उन्होंने लेखन की शुरुआत की, तब का बीकानेर अलग ही था। सामंतों, सेठ-साहूकारों का विशेष ही मान-सम्मान था। राजशाही की समाप्ति पश्चात् आजाद भारत में रहते हुए भी यहाँ के लोगों में सामंती संस्कार वर्षों बदस्तूर कायम रहे। सामंतों को खम्मा अन्नदाता कहते हुए उन्हें गर्व का एहसास होता था। उस दौर में सामंतशाही का डटकर विरोध करने वाले संभवतः राजस्थान के वे पहले कथाकार थे। वे शुरू से ही दलित, शोषित, दमित के पैरोकार रहे । उनसे उनका गहरा लगाव था। ये दूसरों के लिए सामान्य जन थे किंतु उनके लिए विशिष्ट थे। वे क्षण आज भी मेरी स्मृतियों में हैं, जब उन्होंने नया शहर मोहल्ले में अपना मकान बनवाया-आशा लक्ष्मी। पहले वे अपने पुश्तैनी मकान साले की होली में रहते थे। आशा लक्ष्मी भवन तैयार होने के पश्चात् गृह प्रवेश के अवसर पर उन्होंने कारीगरों और मजदूरों को उसी तरह निमंत्रित किया जिस तरह से हम अपनों को करते हैं। वे सब इस तरह से तैयार होकर आए जैसे कि किसी बारात में आए हों। उन मजदूरों के चेहरे खुशी से दिपदिपा रहे थे। एक व्यक्ति ने आश्चर्य से उनसे पूछा- इन मजदूरों को निमंत्रण देने की क्या जरूरत थी। तब उन्होंने जो जवाब दिया वह अभी तक मेरे कानों में गूंज रहा है-इनकी मेहनत से ही यह मकान बना है। इनके परिश्रम का सम्मान करना हमारा फर्ज है।
एक वाकया और याद आ रहा है। वे बीमार चल रहे थे। सुनने में परेशानी हो रही थी। मधुमेह और रक्तचाप के कारण बाएँ हाथ-पैर की हरकत कम हो गई थी। डॉक्टरों ने उन्हें ऐम्स दिल्ली में इलाज की सलाह दी। 27 जनवरी 2009 को सपरिवार दिल्ली रवाना होना तय हुआ। उस समय अपनी बीमारी से ज्यादा अपने घर काम करने वाली बाई के पति की बीमारी की चिंता थी। कल को कोई अनहोनी हो जाएगी तो वह क्या करेगी। आर्थिक स्थिति उनकी कमजोर है। बंदोबस्त करके जाना चाहिए। उन्होंने दिल्ली रवानगी से पहले उसे रुपए दिए और हिम्मत बँधाते बोले-जो होनी है वह टलेगी नहीं किंतु अडी वक्त रुपये ही काम आते हैं। अजब दुर्योग कि जब वे एम्स में भर्ती थे तब बीकानेर में उस काम करने वाली बाई के पति का स्वर्गवास हो गया। यदि वे बंदोबस्त करके नहीं जाते तो उसके परिवार को कितनी परेशानियों का सामना करना पडता।
ऐसे अनेक दृष्टांत हैं जो उन्हें बडा इंसान सिद्ध करते हैं। एक बार एक अनुवादक ने उनके एक हिंदी उपन्यास का गुजराती में अनुवाद कर दिया और वह मासिक पत्रिका में धारावाहिक प्रकाशित होने लगा। उनके कितने ही उपन्यासों के गुजराती, मराठी, उर्दू, तेलुगु, मलयालम आदि भाषाओं में अनुवाद हो रखे थे जिससे पूरे देश में उनके पाठक थे। गुजराती पत्रिका में उनके उपन्यास का अंश पढकर एक पाठक ने उन्हें पत्र लिखकर प्रशंसा की, तब उन्हें इस अनुवाद का पता चला। अनुवादक ने उनसे अनुमति लिए बिना ही अनुवाद करके पत्रिका को प्रकाशित करने के लिए दे दिया था। उन्हें बहुत गुस्सा आया और उन्होंने अनुवादक को पत्र लिखते हुए रॉयल्टी भेजने की हिदायत दी अन्यथा कानूनी कार्रवाई करने की धमकी दी। लेकिन उसका जवाब नहीं आया। गुजरात की यात्रा के समय वे अनुवादक के घर पहुँच गए। अनुवादक की पत्नी ने अपनी आर्थिक परेशानियाँ बताते हुए कहा कि उनके पति अनुवाद कार्य के जरिए ही जैसे- तैसे परिवार चला रहे हैं। वे इतने विचलित हो गए कि बिना अनुमति अनुवाद किये उपन्यास की राशि माँगना भूल गए और उसकी माली हालत से द्रवित होकर अपने एक दूसरे उपन्यास के गुजराती अनुवाद की अनुमति भी दे दी।
उन्होंने फ्रीलांसर रहते हुए अनेक कष्ट सहे किंतु जिए पूरे स्वाभिमान के साथ। किसी सेठ-उद्योगपति का अभिनंदन ग्रंथ संपादित नहीं किया, किसी का स्मृति ग्रंथ नहीं निकाला। अपने समय के प्रतिष्ठित साप्ताहिक पत्र धर्मयुग में वे नियमित प्रकाशित होते थे। उस समय सबसे ज्यादा मानदेय भी वही दिया करता था। किंतु शहर के एक लेखक के साथ संपादक डॉ. धर्मवीर भारती के उदासीन व्यवहार से इतने रुष्ट हो गए कि उन्होंने डॉ.भारती के विरोध में आलेख लिखा। धर्मयुग और डॉ. धर्मवीर भारती की नाराजगी के मायने हर एक लेखक समझता है किंतु अपने एक साहित्यिक मित्र के स्वाभिमान की रक्षा की खातिर डॉ.भारती के विरुद्ध लिखने से नहीं घबराए। उसके बाद उन्हें धर्मयुग में लिखना बंद करना पडा, लेकिन इसका कभी कोई अफसोस नहीं हुआ।
उन्होंने कितने ही लेखकों की किताबें प्रकाशकों से छपवाई। मेरी मौजूदगी में एक लेखक ने हताश-निराश स्वर में उनसे कहा कि वे लिखना बंद कर देंगे क्योंकि कोई प्रकाशक उनकी किताब प्रकाशित करने में रुचि नहीं ले रहा है। दिल्ली जाते हुए वे उन लेखक की पाँडुलिपि साथ लेकर गए। थोडे दिनों में ही उनकी किताब प्रकाशित होकर आ गई और साथ में रॉयल्टी का चैक भी। सन् 1978-79 में उन्होंने मेरा बाल उपन्यास दिल्ली से बाल पॉकेट बुक्स से प्रकाशित कराया। मैं साहित्य की दुनिया में नया नया था लेकिन उनके इससे कोई फर्क नहीं पडा। ऐसे लेखक जब इस बात का जिक्र नहीं करते थे तब मुझे बुरा लगता। मैं शिकायत करता तब हँसते हुए कहते- उनकी प्रतिभा उनके पास रहेगी। प्रकाशक मेरा कहना मानते हैं। मेरे सहयोग से किसी की किताब छप जाए तो मेरा क्या लगता है। यदि उसमें प्रतिभा होगी तो आगे भी प्रकाशक छापते रहेंगे। मेरा जिक्र करने से शायद उनकी प्रेस्टीज आडे आती है। जिक्र यदि कर भी देंगे तो मेरे क्या फर्क पडेगा, ब्राओ।
वे यथासम्भव सबका सहयोग करते। सामने वाला बताए या नहीं, इसकी कभी अपेक्षा नहीं की। ऐसा वही कर सकता है जो कुंठा-रहित होता है। मेरे विचार से कुंठा-रहित वही रह सकता है जिसमें गजब का आत्मविश्वास हो, जो दृढ निश्चयी हो, जो छल-छद्म से मुक्त हो, जो अपनी प्रतिभा के सम्मुख अन्य प्रतिभा की उपेक्षा ना कर उसे प्रोत्साहित करता हो। चंद्रजी ऐसे ही थे एकदम कुंठा-मुक्त। सबके साथ समभाव रखने वाले।
एक और दृश्य आँखों के सामने घूम रहा है। शायद दिसंबर 2008 या जनवरी 2009 की बात है। शाम के समय वे स्टडी रूम की जगह अंदर के कमरे में बैठे थे। सुनने में उनके दिक्कत आ रही थी कान के इंफेक्शन की वजह से। कथाकार साथी श्रीलाल जोशी समवेत किसी कार्यक्रम के लिए उनसे मशविरा लेने आये थे। उन्होंने श्रीलाल को टोका- समारोह होते रहेंगे। आये दिन कार्यक्रम होते रहते हैं। पहले यह बताओ कि इन दिनों तुम क्या लिख रहे हो?
वे मुझे भी डाँटते रहते थे कि सभा-गोष्ठियों के लिए तो तुम्हारे पास फुर्सत है क्योंकि इससे सुबह-सुबह अखबार में नाम छपा दिखता है लेकिन लिखने के नाम पर बहानेबाजी करते रहते हो कि समय नहीं है। भाई श्रीलाल जोशी ने एक उपन्यास शुरू कर रखा था, यह मुझे मालूम था। मैंने तेज स्वर में उन्हें यह जानकारी दी। वे मुस्कराये और बोले- पूरा कब करेगा उपन्यास, यह बता। केवल शुरू करने से क्या होता है।
उन्होंने श्रीलाल के सामने कागज और पेन रख दिए। श्रीलाल ने लिखा- 31 मार्च 2009।
पढकर वे खुश हो गए। बोले- ठीक है, अप्रैल 2009 में तुम्हारा नया उपन्यास पढेंगे। बुलाकी, तुम याद रखना।
मुझे उनकी कही बात याद है लेकिन उन्होंने अप्रैल की प्रतीक्षा ही नहीं की और उससे पहले ही 4 मार्च 2009 को हम सबसे विदा ले ली। मेरा साथी श्रीलाल जोशी भी नहीं रहा।
उनकी स्मृति को नमन।
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सम्फ : सीताराम द्वार के सामने,
जस्सूसर गेट के बाहर,
बीकानेर-334004
मो. ९४१३९३९९००