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जीवन-राग का कवि : भवानी प्रसाद मिश्र

कमल कुमार
तारों से भरा आसमान ऊपर,
हृदय से हरा आदमी भू पर।
होता रहता हूँ रोमांचित
वह देखकर यह छूकर।
बीसवीं सदी की आधुनिक हिन्दी कविता में अपनी अलग भाषा दृष्टि और नये काव्य प्रतीकों के साथ-साथ स्वदेशी चेतना और प्रतिरोध के स्वर के साथ अपनी अलग पहचान बनाते हुए भवानी प्रसाद मिश्र का उदय होता है। मिश्र की काव्य रचना का प्रस्थान बिन्दु 1930 ई. के आसपास से शुरू होता है, लेकिन व्यवस्थित रूप से उनकी रचनाएँ पहली बार अज्ञेय द्वारा संपादित दूसरा सप्तक (1951 ई.) के माध्यम से प्रकाश में आती हैं। 1953 में उनका पहला संग्रह गीतफरोश प्रकाशित होता है। भवानी प्रसाद मिश्र की रचना यात्रा भारतीय समाज और परिस्थितियों के कई दौर से गुजरती है। प्रारंभिक दौर में जहाँ एक ओर राष्ट्रीय चेतना, स्वतंत्रता का संघर्ष चल रहा था, जो गाँधी की अगुवाई में हिंसा के बरक्स अहिंसा, नफरत की जगह प्यार और नैतिक आदर्शों को आंदोलन का केन्द्रीय तत्त्व बनाने का आग्रह था, वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग अपने स्वार्थ के लिए तत्कालीन जरूरतों को नजरअंदाज करके झूठ, हिंसा, नफरत के हर कृत्य को करने के लिए तत्पर थे। भवानी भाई के भीतर का रचनाकार इन विपरीत स्थितियों से न केवन क्षुब्ध होता है बल्कि रचना और व्यावहारिक दोनों धरातलों पर लडता भी है।
स्वतंत्रता के बाद की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति दिन-पर-दिन और जटिल होती जा रही थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय लिए गए सभी संकल्प टूट रहे थे। इस विपरीत परिस्थिति के बीच कवि भवानी प्रसाद अपनी विचारधारा को यूँ कहते हैं- कि टूटना निरखना कुछ नहीं है/ झमेले में पडो/जीवन संघर्ष है!/लडो!! और यही कह कर चुप भी नहीं हो रहे वहाँ इस संघर्ष से गुजरने के लिए एक उम्मीद भी पैदा करते हैं। वे अपने भीतर के छिपे पहाड और नदी को खोलने की बात करते हैं- होने को/ हमारे भीतर भी है/ निरन्तरता/ मगर हम उसे/ बेशक नहीं जानते/ अचल है कुछ / हमारे भीतर भी/ पहाड की तरह/ तरल है कुछ/ नदी की तरह। समकालीन कविता के परिदृश्य में भवानी भाई अकेले ऐसे कवि हैं जिन्होंने सहज भाषा में, सच्ची सृजन क्षमता लिए, व्यापक अनुभूतियों को जनसामान्य तक पहुँचाया है।
अपनी कविता में लय हो गये व्यक्तित्व वाले इस कवि की विशेषता यह है कि वह किसी बौद्धिक तर्क के सहारे कविता नहीं रचते, बल्कि कविता ही उनको रचती है। वे इस तथ्य को स्वीकार करते हुए स्वयं कहते हैं- मैं जानता हूँ कि कैसे मेरी हर साँस मेरे समूचे जीवन का अंश है, आकर और चली जाकर वह मुझे कुछ ऐसा दे जाती है जिसके कारण जीवन चलता जा रहा है, वैसे ही मेरी हर कविता मेरे जीवन का अंश है। कविता मेरे जीवन का विस्तार या संकोच नहीं है। दैन्य या पलायन नहीं है। वह मेरा अस्तित्व है। इस वक्तव्य के आलोक में आप भवानी प्रसाद मिश्र के समूचे रचनाकर्म को समझ सकते हैं। यह कवि न तो किसी काव्य आंदोलन से जुडे न ही किसी विचारधारा से विशेष प्रभावित होते हैं। उनके काव्य में सरलता और निष्कपटता स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। वे सहज जीवनानुभव के ऐसे समर्थ कवि हैं, जो देखने में जितने ही साधारण लगते हैं उतने ही असाधारण हैं। उनका काव्य अपनी जिजीविषा, सामाजिकता, उदात्तता एवं युगबोध के कारण जहाँ नेताओं, शिक्षकों, समाज सुधारकों एवं अन्य मानवता प्रेमियों के बीच चर्चा का विषय रहा है, वहीं अपनी प्रखर अनुभूति, बेलाग ईमानदारी, अभिव्यक्ति की सहजता के कारण सामान्य जन का भी मन बांधने में सफल रहे हैं। इसका सबसे प्रमुख कारण है कि भवानी प्रसाद किसी वाद के कवि नहीं हैं, वे जीवन के कवि हैं।
भवानी प्रसाद मिश्र की कविताएँ इनके जीवन अनुभवों का निष्कर्ष भी है, इस कविता में रस्सी के रेशे में बँट जाने के खतरों के बारे में बताते हुए कहते हैं-
बुनी हुई रस्सी को घुमाएँ उलटा
तो वह खुल जाती है
और अलग-अलग देखे जा सकते हैं
उसके रेशे।
मगर कविता को कोई
खोले ऐसा उलटा
तो साफ नहीं होंगे हमारे अनुभव
कविता को
बिखरा कर देखने से
सिवा रेशों के क्या दिखता है,
लिखने वाला तो
हर बिखरे अनुभव को
समेटकर लिखता है। - (बुनी हुई रस्सी)
भावनाओं की मार्मिकता और अभिव्यक्ति के निखार में यह कविता अपनी अलग छवि के साथ प्रस्तुत हो रही है।
भवानी प्रसाद आज की कविता को काल सापेक्ष युग सत्यों की अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में देखना चाहते हैं। वे मानते हैं पहले से भिन्न आज कविता की जिम्मेदारी और भी बढ गई है। उनकी कविताओं में यह विचार स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। कविता की रचना के लिए मिश्र ने अनुभव को आधार माना है, कवि अपने आस-पास बिखरे अनुभवों को समेटता है। कविता का एक-एक शब्द इन्हीं अनुभवों से निकल कर आता है। इसीलिए अपनी एक कविता में लिखते हैं-
इसीलिए नहीं लिख पाता मैं
छोटी-छोटी बातें
जितना छू जाता है
उतना कह देता हूँ।
(मुझमें और उनमें : बुनी हुई रस्सी)
भवानी प्रसाद मिश्र कविता के लिए अनुभवों को वरीयता देते हैं, जो कवि को लिखने के लिए बाध्य करें। अनुभवों के बाद बात आती है अभिव्यक्ति की। इस अभिव्यक्ति की भाषा सहज हो, स्वाभाविक पर इतनी सशक्त और गंभीर कि कवि भी उसका माध्यम बन जाय और अपने को समर्पित कर दे। उनकी इस कविता से उनकी विचारधारा को समझें-
कलम अपनी साध
और मन की बात बिल्कुल ठीक कह एकाध।
यह कि तेरी-भर न हो तो कह,
और बहते बने सादे ढंग से तो बह।
जिस तरह हम बोलते हैं, उस तरह तू लिख,
और इसके बाद भी हमसे बडा तू दिख ।
(कवि- गीतफरोश)
उनकी इस सहजता को देखकर कवि नागार्जुन ने कहा था- यहाँ न तो शब्द चिमटे से उठा-उठाकर जडे गये हैं और न ही अभिव्यक्ति का ढंग ही आयास साध्य है। स्वाभाविक बोलचाल की भाषा अपनी लयात्मकता में स्वयं छंदोबद्ध हो उठी है। यह सब उनकी शब्द साधना का ही परिणाम है, वे शब्दों की क्षमता एवं संभावनाओं से वाकिफ थे। इसीलिए उन्होंने एक जगह लिखा भी है- मैं एक शब्द लेता हूँ शब्द पर शब्द जमने लगते हैं और प्रवाह अर्थ का, नये अर्थ का और नये-नये अर्थों का होने लगता है। कविता लिखते समय भवानी भाई स्थूल व्यक्ति न रहकर, केवल सूक्ष्म अनुभव रह जाते हैं। यह एक ऐसा क्षण होता है जिसमें कवि अपने समूचे अस्तित्व को खो देता है। भवानी भाई के सामने दो तरह की चुनौतियाँ थी, एक किनारे पर जीवन यथार्थ की भयानक चुनौतियाँ थी और एक सजग नागरिक का दायित्वबोध । दूसरे पर कविता की पुकार। भवानी प्रसाद बडी खूबसूरती से दोनों राग गाते थे।
भवानी प्रसाद मिश्र जी का जीवन दर्शन है कि जिंदगी एक ठोस चीज है। छोटी-छोटी बातों में ही जीवन के तत्त्व समाहित हैं। कवि की जागरूकता और संवेदनशीलता इस बात में है कि वह परिवेश को समझे, समसामयिकता के प्रति सतर्कता बरते, सामान्य व्यक्ति के दुःख-सुख में डूबे और जीवन-मूल्यों को उजागर करे। वे कल्पना के स्वप्न से कोसों दूर हैं और जीवन के संघर्षों से ही निकलकर आने वाले अनुभवों को प्राथमिकता देते हैं। जन सामान्य के प्रति असीम अनुराग, प्रेम, निष्ठा को लेकर आगे बढे हैं। इतिहास उसी कवि को याद रखता है, जो बीहड बंजरों में अपने अर्थों के गुलाब की महक दे, भीतर और बाहर को एक रूप दे-
बडा हिसाबी है काल
वह तभी लिखेगा
अपनी बही के किसी
कोने में तुम्हें
जब तुम
भीतर और बाहर हो
कर लोगे परस्पर एक। (व्यक्तिगत)
मिश्र बाहर और भीतर समग्रतः भारतीय हैं। अपने देश के प्रति अगाध प्रेम उनकी अनेक कविताओं में मिलता है। इनकी कविताओं में अद्वैत दर्शन, गाँधीवाद के साथ सरल कविता, सरल मानव, सरल जीवन, सरल मूल्यों का अंकन अनेक जगह विद्यमान है। भवानी प्रसाद समन्वयवादी दृष्टि के कवि हैं और इनकी कविता जीवन आस्था की। उनके इन्हीं गुणों को देखकर प्रसिद्ध कवि आलोचक प्रभाकर माचवे ने एक जगह लिखा है-भवानी प्रसाद मिश्र का सबसे बडा गुण है उनकी प्रसन्न, ओजवती बोलचाल के मुहावरों से पंडित, सलीस, प्रसाद गुणमयी, सहसोत्स्फूर्त, सादा भाषा। कविता की ऐसी भाषा उर्दू के कवियों की भी शायद ही रही हो- पर हिन्दी में तो उनकी अपनी, अकेले, व्यक्तित्व की छाप वाली है।
समकालीन कवियों में वह भाषा के प्रति सर्वाधिक सचेत दिखाई देते हैं। इनकी कविताओं के शिल्प नवीन और सार्थक हैं। कविता के शिल्प में आडम्बर और कृत्रिमता से छुटकारा पाने में उनकी कविताएँ सफल रही हैं। यही कारण है कि भवानी प्रसाद मिश्र की कविता भाषा में लिखी गई कविता नहीं है वह बोलचाल की बोली में लिखी गई है। वे अपनी कविता को बोलना ही मानते थे। वे कविता में शब्द संयम और शब्दों के सही प्रयोग पर जोर देते हैं-
शब्दों का सही उपयोग
योग है
और कल्याणकारी है
योग की तरह
उसका मनमाना उपयोग
भोग है
और विनाशकारी है भोग की तरह!
(भवानी भाई-सं.प्रेमशंकर रघुवंशी, भूमिका से, पृ.20)
भाषा के साथ-साथ बिम्बों और प्रतीकों के चयन में भी कवि हृदय नवीनता का प्रयोग करता है। सादगी में ताजगी का एहसास और समाज के यथार्थ और जीवनबोध को अपनी कविताओं में बारीकी के साथ प्रस्तुत किया है। इस बिम्ब को देखिए-
उस दिन
आँखें मिलते ही
आसमान नीला हो गया था
और धरती फूलवती।
भवानी प्रसाद मिश्र ने अपने काव्य के ऊपर कालिदास, वर्ड्सवर्थ, शैली, ब्राऊनिंग और रवीन्द्रनाथ टैगोर का प्रभाव स्वीकार किया है। ये सभी कवि सौंदर्य चेतना के कवि हैं। इन सबके चेतना का प्रेम और प्रकृति के प्रभाव का सही सामंजस्य मिश्र में दिखाई देता है। इनकी प्रेम संबंधी कविताएँ शालीनता के साथ अपनी अभिव्यक्ति को प्रकट करती हैं।
तुमसे मिलकर
ऐसा लगा जैसे
कोई पुरानी और प्रिय किताब
एकाएक फिर हाथ लग गई
या फिर पहुँच गया हूँ मैं
किसी पुराने ग्रंथागार में
समय की खुशबू
प्राणों में भर गई।
मिश्र का काव्य संसार कई वादों और काल का साक्षी रहा है लेकिन वे विभिन्न वादों में उसी तरह रहे हैं, जैसे एक किरायेदार मकान बदलता है। न कोई अधिकार, न कोई आग्रह, न मोह, न पश्चात्ताप। युग और परिवेश के प्रति सचेतन होने के लिए वे हर वाद संवाद करते हैं, पर हैं वे जीवन राग के विरागी कवि। विजय बहादुर सिंह ने लिखा है- हिन्दी भाषा और उसकी प्रकृति को अपनी कविता में संजोता और नये ढंग से रचता यह कवि न केवल घर, ऑफिस या बाजार बल्कि समूची परम्परा में रची-पची और बसी अन्तर्ध्वनियों को जिस तरकीब से जुटाता और उन्हें नयी अनुगूँजों से भरता है, वे अनुगूँजें सिर्फ कामकाजी आबादी की अनुगूँजें नहीं हैं, उस समूची आबादी की भी हैं जिसमें सूरज, चाँद, आकाश-हवा, नदी- पहाड, पेड-पौधे और तमाम चर-अचर जीव-जगत् आता है। कविता में मनुष्य और लोक प्रकृति और लोक जीवन की यह संयुक्त भागीदारी का जुगलबंदी का दृश्य रचते हैं।
सूरज डूबा तारे निकले,
एक के बदले सौ सहारे निकले।
जिस तरफ उठाई आँखें हमने,
कहीं कोई गैर नहीं
सब हमारे निकले।
यह सच है कि हर दिन व्यक्ति बिखरता है, टूटता है, कभी शरीर से, कभी मन से पर इस टूटने-बिखरने से क्या होता है, जीने की लालसा व्यक्ति में सर्वाधिक प्रबल है। इसी संघर्ष की शक्ति के गायक हैं भवानी भाई। मिश्र करुण प्रसंगों को बडे ही मार्मिक तथ्यों के साथ उनकी पूरी करुणा और संवेदना, ग्रामीण जीवन के कटु यथार्थ और विपन्नता के साथ लोक जीवन का पूरा बिम्ब पेश करते हैं। कविता गाँव (गीतफरोश) में शोषण का मार्मिक चित्र इसमें मूर्तिमान हो रहा है-
गाँव, इसमें झोपडी है, घर नहीं है,
झोपडी के फटकियाँ हैं, दर नहीं है;
धूल उडती है, धुएँ से दम घुटा है,
मानवों के हाथ से मानव लुटा है।
रो रहे हैं शिशु कि माँ चक्की लिये है,
पेट पापी के लिए पक्की किये है
फट रही छाती।
(गाँव, दिसम्बर-1937 में प्रकाशित)
कवि की व्यंजना समाज के पूँजीपतियों, सामंतों और शासकों द्वारा कितने अलक्षित और अज्ञात जीवन कैसे नष्ट हो रहे हैं, जीवन की भयावह विषमताओं के चित्र हमें समाज की कटु सच्चाईयों से रू-ब-रू भी कराती है। समाज में आधुनिकता की अंधी दौड और कृत्रिम जीवन की दिखावट, फैशन और आधुनिकता के नाम पर सुरा-सुंदरी में डूबा समाज, आतंकवाद, धार्मिक राजनीति और भ्रष्टाचार के गर्त में आकंठ डूबा यह देश कवि भवानी प्रसाद मिश्र की प्रखर दृष्टि से ओझल नहीं हुआ है। यह है हमारा आज का परिवेश-
आज हवाएँ चल रही हैं
जैसे किसी से जल रही हैं
पत्ते उसे छूकर
खुश नहीं लगते
यह कैसा सवेरा हो रहा है आज
कि पंछी
किरन और हवा के जगाए नहीं जगते।
(बुनी हुई रस्सी)
समय के अनुरूप ढलना ठीक है, किन्तु अपने को समय के हाथों बेच देना ठीक नहीं, वक्त न अच्छा है न बुरा, न कोमल न कठोर। उसे अपनी जीवन दृष्टि से अपने अनुकूल बदला जा सकता है।
कि टूटना निरखना कुछ नहीं है
झमेले में पडो
जीवन संघर्ष है!
लडो !!
इस कवि की कविताओं में प्रकृति का भी चित्रण मिलता है। प्रकृति से भी इन्हें बेहद प्यार था। नर्मदा की लहरों और सतपुडा के जंगलों को वे कभी नहीं भूले। प्रकृति की हर वस्तु उनकी आत्मीय है। प्रकृति उन्हें वैचारिक भूमि प्रदान करती है। उनका प्राकृतिक दृश्यों का चित्रांकन रमणीक, अनुभूतिपरक और सूक्ष्म है। प्रकृति की आशावादी चेतना उन्हें प्रेरणा, नई आकांक्षा, नये सपने और नये संगीत को जन्म देती है। यह चित्रांकन रमणीक, अनुभूतिपरक और सूक्ष्म है। प्रकृति की अनंत राशि, मधुमास की यौवन वेला, चाँद की किरणें, सरसों के खेत जैसे प्रकृति का हर स्पन्दन कवि की चेतना बन गया है। वे मनुष्य को जगाने वाले गायक हैं। वे उसे बेखबर नहीं रहने देना चाहते हैं। प्रकृति की सारी शक्तियाँ उसमें संचित कर देना चाहते हैं-
भई, सूरज
जरा इस आदमी को जगाओ
भई, पवन
जरा इस आदमी को जगाओ
यह आदमी जो सोया पडा है
जो सच से बेखबर
सपनों में सोया पडा है
भई, पंछी
इसके कानों पर चिल्लाओ।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि कवि भवानी प्रसाद मिश्र का काव्य-संसार बहुत व्यापक और गहन है। जीवन के प्रत्येक फलक को उन्होंने अपनी काव्य वस्तु के लिए गृहीत किया है। इसीलिए उन्हें किसी विशेष का कवि न कहकर सर्वविज्ञ कवि कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। उनके काव्य में इन सब फलकों की अभिव्यक्ति उनके प्रगाढ चिंतन की देन है। जो जिया है, सो उन्होंने लिखा है, जिस तरह सोचा है वैसे लिखा है। वे स्थितियों को भाव और विचार के स्तर पर खूब जीकर लिखने वाले कवि हैं। यही कारण है कि उनकी काव्य चेतना में जीवन राग का स्वर गहन और व्यापक है। मिश्र जी ने आधुनिक हिन्दी कविता को नया प्रवाह और नयी दिशा प्रदान की। उन्होंने सामान्य जन के विषम संघर्ष के भीतर से कवि को पहचाना और रोमानियत की जमीन से हटकर लोक जीवन के निकट उस कविता को ला खडा किया। वे पराजित युग के कवि होकर आदिम सुगंधों के गायक ऐसे कालजयी कवि बन गए।
मेरा और तुम्हारा
सारा फर्क
इतने में है
कि तुम लिखते हो
मैं बोलता हूँ
और कितना फर्क हो जाता इससे
तुम ढाँकते हो मैं खोलता हूँ।
संदर्भ ग्रंथ-

1. प्रतिनिधि कविताएँ : भवानी प्रसाद मिश्र,
राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला सं.-2014
2. समकालीन सृजन : भवानी प्रसाद मिश्र के
आयाम, संपादक- लक्ष्मण केडिया, अंक-16, 1995
3. भवानी भाई : सं. प्रेमशंकर रघुवंशी, प्रतिश्रुति
प्रकाशन, कोलकाता, प्रथम सं.-2014
4. कालजयी कवि : भवानी प्रसाद मिश्र-डॉ
हरिमोहन, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम सं.-
1986
5. पदार्पण : भवानी प्रसाद मिश्र विशेषांक :
सं. डॉ. इन्दु सिंह, अंक -7, दिसम्बर-2013
6. बुनी हुई रस्सी : भवानी प्रसाद मिश्र-सरला
प्रकाशन, दिल्ली 2008
7. भवानी प्रसाद मिश्र और उनका काव्य-संसार :
डॉ.अनुपम मिश्र, विश्वविद्यालय प्रकाशन,
वाराणसी, 2003


सम्फ : सहायक प्रोफेसर, हिंदी विभागाध्यक्ष
उमेशचंद्र कॉलेज
13,सूर्य सेन स्ट्रीट, कोलकाता-700012
मोबाइल-09450181718