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कला पढने की नहीं, देखने की विधि हैं

ब्रजरतन जोशी
जीवन एक निरन्तर विकासमान प्रक्रिया है। यही कारण है कि हम जीवन को किसी बने-बनाये साँचे या किसी एक विचार से आबद्ध या परिभाषित नहीं कर सकते। साहित्य और कलाओं की अनूठी विशिष्टता यह है कि ये जीवन से उत्पन्न होकर जीवन की आलोचना करती हैं। यानी जीवन के साथ साहित्य और कलाओं का रिश्ता अत्यन्त अहम है। एक विशेष तथ्य यह भी है कि जीवन अपनी संरचना में कुछ इस तरह से है कि आप इसके बारे में इसे जिये बिना कुछ भी नहीं कह सकते।
साहित्य और कलाएँ अस्तित्व और जीवन की खोज में लगी अनवरत प्रक्रियाएँ हैं। इन प्रक्रियाओं के चलते ही हम अपने इर्द-गिर्द पसरे जीवन से नित-नूतन अद्वितीय अनुभव करते रहते हैं। यह जो नित नूतन खोज का सिलसिला है या अपूर्व को पाने का सुख है, वह कलाओं से हमें बेहतर रूप में इसलिए मिलता है, क्योंकि कलाकार हमेशा अपने अधूरेपन को पूरा करने की जिद से लबरेज रहता है। पूर्णता उसकी गहरी और उद्दाम आकांक्षा है। इसलिए वह जीवन के अधूरेपन से पूर्णता की ओर बढने की निरन्तर कोशिश करता रहता है। जबकि वह यह जानता है कि जीवन एक समाप्त होने वाली प्रक्रिया है, पूर्ण होने वाली प्रक्रिया नहीं। पर अपनी जिद के चलते वह अपनी खोज की यात्रा में आगे बढता है और कुछ-न-कुछ अपूर्व हासिल करता है।
साहित्य या कलाएँ हमारे समय में जितनी तेजी से पढी जा रही हैं उतनी इतिहास के किसी अन्य कालखण्ड में नहीं पढी गईं। अब इस नयी अवस्था में हम सब कुछ पढने को आतुर हैं। इस पढने की आतुरता के चलते हमसे कलाओं के साथ सहज रिश्ता बनाने की कला छिटकती जा रही है। यह भी है कि जीवन आपाधापी, अन्तर्द्वन्द्वों, असंख्य सफलताओं-विफलताओं के अनवरत क्रम में आगे बढते हुए साहित्य और कलाओं के साथ अपना अपनापा खोता जा रहा है। प्रश्न उठता है कि इस अपनत्व-क्षरण के मूल कारण क्या हैं? स्थूल दृष्टि से देखेंगे तो हम कहेंगे कि जीवन में यंत्रों की भरमार, सामाजिक पर्यावरण का असंतुलित होना और समरसता का अभाव इसके बडे कारण हैं। इसके चलते हमारा जीवन इस रूप में अपरिपक्व और अप्रशिक्षित ही रह जाता है कि हम साहित्य और कलाओं के साथ उत्तरोत्तर विकासशील सम्बन्ध विकसित करें। मगर सूक्ष्म दृष्टि से देखेंगे तो मुझे लगता है कि इसके मूल में कलाशिक्षा की भूमिका प्रमुख है। हमारी शिक्षा पद्धति की संरचना कुछ इस तरह से विन्यस्त है कि वह विषय को पढने, रटने और उसका एक बना-बनाया उत्तर देने पर जोर देती है, जानने और अनुभव करने पर नहीं। इस कारण हम किसी विशिष्ट साहित्यिक रचना और कला-रूप से रागात्मक संबंध बनाने की ओर प्रेरित नहीं होते। कारण साफ है कि प्रारंभ से ही हम एक ऐसे परिवेश में प्रशिक्षित होते हैं, जहाँ हमें हर विषय को पढकर कुछ खास तरह से समझने-विचारने की पद्धति में ही प्रशिक्षित किया जाता है। परिणामस्वरूप रचनात्मक अनुभव से गुजरना या उस तरह के अनुभव को अनुभूत करना हमारे लिए किंचित् कठिन हो जाता है। और तो और पढने की भी हमने अपनी तरह की कई विशिष्ट शैलियाँ विकसित कर रखी हैं। उसके चलते बहुत से कलानुभव तो हमारे अनुभव जगत से अछूते ही रह जाते हैं। क्योंकि वे अनुभव हमारे द्वारा विकसित की गयी शैलियों या साँचों में नहीं अँटते हैं। कलाओं के साथ हमारा सहज संबंध धीरे-धीरे क्षीण होता जाता है, और अंततः रागात्मक रिश्ता तो रहा दूर, हम उस तरफ भली प्रकार से सोच-विचार तक नहीं कर पाते।
कोई भी कलानुभव अपनी समग्रता में हमें गहरे आनन्द या कहें केन्द्रस्थ करने की कोशिश में तभी सफल होता है जब हम हमारे आत्म के इर्द-गिर्द बिखरे रीति, नियमों, शास्त्रों, विचारों, पूर्वग्रहों और अन्तर्द्वन्द्वों से मुक्त होकर शुद्ध कलात्मक आनन्द का अनुभव करें। विश्व साहित्य की ही नहीं वरन् किसी भी भाषा और साहित्य की कालजयी कृतियों और कृतिकारों में यही विशिष्टता पाई जाती है।
किसी भी कलानुभव की सार्थक परिणति तब होती है जब वह कलानुभव हमें स्वयं आगे बढकर अपनाए। और यह तभी संभव होता है जब कलाओं के इर्द-गिर्द जीवन का विकास हो। यह तो हम जानते ही हैं कि कला-रचना में व्याप्त अनुभव ही वह स्रोत है जो हमें या तो कला के एकदम करीब ले जाता है और या उससे दूर। दर्शन की भाषा में इस प्रक्रिया को दर्शन, दर्शक और दृश्य के त्रिकोण से समझा जा सकता है।
प्रत्येक कलाकार अपने आस-पास के परिवेश, तत्कालिक या प्रचलित कला-विधानों और आत्मसृजन करने वाले अनुभवों के भव से घिरा होता है। अब चयन उसका है कि वह अपनी अभिव्यक्ति के लिए ऊपर बताएँ मार्गों में से किसी एक का या अन्य का चयन अपनी अनुभव यात्रा हेतु करे।
हमारी शिक्षा प्रणाली ने हमें कुछ इस तरह से शिक्षित और दीक्षित किया है कि हम आस-पास के स्थूल उपादानों के प्रति अधिक आकृष्ट रहते हैं। परिणामस्वरूप हम अपने आत्म में कुछ नया जोडने वाले अमूर्त विधानों के भूगोल में प्रवेश करने से वंचित रह जाते हैं। हम अपने आस-पास के जाने-पहचाने संसार की पुनर्व्याख्या करने की बजाय उपलब्ध व्याख्या को अंगीकार करना श्रेष्ठ समझते हैं, क्योंकि सूक्ष्म रास्ते तो हमें प्रायः दुर्बोध जान पडते हैं, पर वे दुर्गम होते नहीं हैं। क्योंकि जानने और होने में फर्क होता है। लेकिन हमारा अपरिपक्व बोध हमें इसकी अनुमति नहीं देता और प्रायः ऐसी परिस्थिति में हम स्वयं को असुरक्षित या असहज महसूस करते हैं जो हमारी पूर्ण सहज होने की राह में एक बडी बाधा के रूप में उभर कर आता है।
ऊपर हमने जिस आत्म सृजन के अनुभव का उल्लेख किया उसके अभाव के कारण ही हम प्रायः कला और साहित्य को देखते हुए भी समग्र रूप से नहीं देख पाते। क्योंकि अंग और इन्द्रिय के रूप में आँख के देखने की विधि में भेद होता है। इसे जानना हमारे लिए आवश्यक है। जब-जब भी हम केवल आँख से देखते हैं तो वह देखना केवल देखना भर होता है, समग्र देखना नहीं। लेकिन जब उसी आँख के साथ हमारा मन, बुद्धि और चित्त भी जुड जाये तो आँख इन्द्रिय में परिवर्तित हो जाती है। यानी अब आँख देखने का एक यंत्र भर नहीं है। यानी ये हमारे अनुभव पर निर्भर करता है कि हम आँख का इस्तेमाल यंत्र की तरह करते हैं या इन्द्रिय की तरह। यानी अनुभव मूल है। देखने की प्रक्रिया इस तरह से आनुभविक और गैर आनुभविक दोनों ही तरह से सम्पन्न होती है। इसलिए एक श्रेष्ठ रचनाकार में सजगता, सक्रियता और सहजता का रसायन कुछ इस तरह से घुला-मिला होता है कि उसे केवल दिखायी नहीं दे रहा होता, वरन् वह वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिवेश आदि-आदि को भली-भाँति देख रहा होता है। अनुभव हमें यह भी सिखाता है कि ची*ांे जैसी दिखती हैं और देखनी चाहिए उसमें भेद है। अच्छा कलाकार इस भेद को समझकर अस्तित्व और जीवन को और अधिक क्रियाशील बनाकर हमारे सम्मुख अपनी कृति या सृजनात्मक अनुभव के माध्यम से रखता है।
सामान्यतः देखा यह भी जाता रहा है कि प्रायः लोग कला संसार के अनुभवों को यथार्थ से दूर पलायनवादी दृष्टि से सम्पन्न अनुभव के रूप में देखते हैं। जबकि कलाएँ तो तलाश की अनंतिम प्रक्रिया हैं। अगर गौर से देखें, तो हम पाएँगे कि एक सामान्य मनुष्य की तुलना में एक कलाकार का जीवन अधिक श्रमसिंचित होता है। क्योंकि एक सामान्य मनुष्य तो अपनी दैनन्दिन जरूरतें पूरी करने में ही अपना जीवन लगा देता है, पर कलाकार इसके अतिरिक्त कुछ रचता है और हमारे अनुभव संसार में कुछ नया भी जोडता है। क्योंकि वह यह मानता है कि हमारी दैनिक आवश्यकताएँ ही केवल जीवन नहीं हैं। उसकी यह श्रम संस्कारित चेतना ही उसे सामान्य मनुष्य से अलग करती है। इसके अतिरिक्त एक सच्चा साहित्यकार या कलाकार जीवन के अन्तर्लोक और बहिर्लोक दोनों में ही अपनी सक्रिय उपस्थिति देता है।
अतः आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने सामाजिक परिवेश के साथ शिक्षा प्रणाली और छात्रों व शिक्षकों के प्रशिक्षण में कला प्रबंध और शिक्षा को पर्याप्त महत्त्व दें और इस तथ्य को भली-भाँति समझने का यत्न करें कि कला पढने की नहीं जानने की, देखने की विधि है।
मधुमती निरन्तर इस कोशिश में है कि आफ साथ हमारे समय के मूर्धन्यों के साथ युवा रचनाकारों की रचनाशीलता को भी साझा करे। इस कोशिश में हम आफ सहयोग और मार्गदर्शन से ही आगे बढ रहे हैं। हमारी पूरी कोशिश है कि सभी विषयों, विधाओं और भाषाओं की रचनाशीलता के साथ हमारे पाठकवृंद का सर्जनात्मक संवाद बना रहे। इस अंक में भी कुल ग्यारह लेख, दो कहानियाँ, छह कवियों की कविताओं के साथ चार समीक्षाएँ और नियमित कॉलम आपकी सेवा में प्रस्तुत हैं। होली पर्व की शुभकामनाओं के साथ-