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एक गधे की उदासी

प्रभाशंकर उपाध्याय
डॉ. अजय अनुरागी के व्यंग्य संकलन- एक गधे की उदासी की पहली रचना भी यही है। गधा उदास है और उसकी उदासी को देख पाठक उदास न हों इसलिए इस चुटीली बात से अपनी बात प्रारंभ करता हूँ- जंगल में एक गधे और घोडे में ठन गयी। गधा अडा हुआ था कि घास नीले रंग की होती है। जबकि घोडे का कथन था कि वह हरे रंग की है। दोनों जंगल के राजा शेर के पास न्याय कराने पहुँचे। शेर ने गधे की बात को तरजीह देकर पुष्ट कर दिया कि घास नीले रंग की ही होती है। गधा उल्लसित होकर ढेचूं-ढेचूं करता हुआ लौटा तथा जंगल में उस फैसले का प्रसार करने लगा।
घोडे ने उदास होकर कहा कि हुजूर घास तो हरे रंग की होती है। शेर बोला, हाँ हरी ही होती हैं, लेकिन आपने तो उसे नीली क्यों कहा? घोडे ने तनिक आश्चर्य से पूछा।
यह तुम्हारे लिए एक सबक है कि तुमने घोडा होते हुए एक गधे से निरर्थक बहस की और निर्णय के लिए मेरे पास चले आए। लेकिन इस संकलन का तो गधा ही उदास है। डॉ. अनुरागी उसकी उदासी पर उदास होकर लिखते हैं- इन दिनों एक गधा बहुत उदास है। उसकी उदासी मुझसे देखी नहीं जा रही है। मैं उसकी उदासी से उदास हूँ। गधे को इस तरह उदास नहीं रहना चाहिए।
दरअस्ल, वह एक राजनीतिक पार्टी से खरीदा हुआ गधा था। जो एक घोडे के बदले लिया गया था। जब लेखक उसकी उदासी से परेशान होकर, उसे लेकर पार्टी कार्यालय लौटाने जाता है, तो पार्टी कार्यालय गधे का मूल्य लौटाने से यह कहकर मना कर देती है कि तुमने इसे कमजोर कर दिया है। उनका तर्क है कि यह गधा बोझ ढोने के लिए नहीं है सिर्फ घास चरने के लिए ही है। तुमने इससे बोझा ढोया है इसलिए पेनल्टी भी लगेगी।
पूँछ के पीछे-पीछे इस संकलन का दूसरा व्यंग्य है। अजय अनुरागी अपने विशिष्ट अंदाज में लक्षणा और व्यंजना शक्ति का प्रयोग करते हुए पश्चिमी संस्कृति के अंधानुकरण पर चोट करते हुए लिखते हैं- एक देशी कुत्ते ने विदेशी स्टाइल में पूँछ लहराई तो देशी कुत्ते नाराज हो गए। उसने कमरे में बंद होकर पूँछ को देशी स्टाइल में हिलाना चाहा तो वह स्वयं पूरा हिल गया मगर पूँछ नहीं हिली। कुत्ता हैरान परेशान, वह पूँछ हिलाने का देशी अंदाज भूल चुका था। पूँछ के पीछे अनुशासन को लक्ष्य करते हुए अनुरागीजी आगे लिखते हैं कि सभी कुत्ते पूँछ का अनुसरण कर रहे थे। वे पूँछ को ही सर्व शक्तिशाली मान बैठे थे। उन्हें जब भी डर लगता तब वे सरदार की पूँछ को देख लिया करते थे। सरदार की पूँछ हिलती हुई दीखती थी तो वे समझ जाते थे कि सब सुरक्षित हैं।
रोचक अंदाज में इसी व्यंग्य में आगे लिखा गया है कि एक गधे ने कुत्तों की कतार के बीच में छलाँग लगा दी। उस कतार में कुत्ते अपने सरदार की पूँछ को देखकर आगे बढ रहे थे। चूंकि वे कुत्ते पूँछ और सिर्फ पूँछ के प्रति वफादार थे तो वे गधे की पूँछ देखते हुए उसके पीछे-पीछे चलने लगे। रिश्वत का वैज्ञानिक दृष्टिकोण में अघाए हुए रिश्वतखोर की बदहजमी का जिऋ करते हुए व्यंग्यकार लिखता है- मित्र ने बदहजमी की डकार मारी और फिर एक गोला पिछली खिडकी से सरकाया। मीथेन जैसा वातावरण आस-पास फैल गया। मैंने उससे कह ही दिया, तुम्हारी त्रि*या से वायुमंडल की ऑक्सीजन के साथ-साथ कार्बनडाइआक्साइड भी प्रदूषित हो गयी है। इस गैस को ठोस के रूप में ही बाहर निकाला करो।
मोबाइल चार्जर जूते में एक चुहिया ने उन आधुनिक जूतों में अपना मेटरनिटी होम बना लिया। इस पर रोचक लहजे में डॉ. अनुरागी लिखते हैं- जूते रूपी मेटरनिटी होम से डिस्चार्ज हो जाने का इंतजार करने लगे। यद्यपि चुहिया वन्य जीवों की श्रेणी में नहीं आ रही थी, फिर भी वह होम जीव तो थी ही। संतानोत्पति के बहुमूल्य क्षणों में मुसद्दी जच्चा और बच्चा दोनों को मकान यानी जूता खाली करने का नोटिस भी नहीं दे सकते थे।
देश को चूसने के सरसठ साल में व्यंग्यकार की पैनी दृष्टि की झलक इस अंश से नजर आ जाती है- कुछ लकडबग्घों ने देश के माँस को खाने के बाद बची हुई हड्डियों को चबाने का टैण्डर भी निकाल दिया है। वे चाहते हैं जब देश मर ही जाएगा तो क्यों न उसकी हड्यिों को बेचकर आर्थिक लाभ ले लिया जाए। इस व्यंग्य में थोडा विस्तार होता तो अधिक अच्छा होता। प्याज का सरकारीकरण के जरीए गुटबंदी पर तंज किया गया है। प्रायः प्रत्येक मुद्दे पर दो धडे बन जाया करते हैं। प्याज का सरकारीकरण या निजीकरण? प्याज पर राजनीति होने लगी और समाज में भी दो गुट बन गए। अब, मैं असमंजस में हूँ कि कौन-सी पार्टी का प्याज खाऊँ?
चोरी चालू आहे छोटा लेकिन अच्छा व्यंग्य है- थाने का घेराव करने से चोर घबराता है। उसे अंततः यहीं आना है और यहीं से जाना है। चोर सीधा थाने से जुडा होता है। इसलिए थाने का घेराव करते ही वह घेरे में आ जाता है।
हर माल पर छूट है व्यंग्य में लिखा गया है कि छूट का फंडा भी उलझन भरा है। दो किलो टमाटर खरीदने पर एक किलो पालक मुफ्त। सौ रूपये की सब्जी पर एक किलो आलू मुफ्त। दो पैंट खरीदने पर एक पैंट मुफ्त। एक साडी के साथ एक साडी मुफ्त। एक साडी चाहिए होती है, तो दुकानदार से आधी साडी खरीदने की मंशा जाहिर करते हैं। इस अंश को पढकर काका हाथरसी की एक हास्य कविता का स्मरण हो आता है जिसमें एक साडी की सौदेबाजी से झल्लाकर दुकानदार कवि से कहता है कि मुफ्त में ले जाओ, तो कवि कहता है कि हर माल पर छूट है, मुफ्त में भी एक नहीं दो लूँगा।
इसी तरह अनुरागीजी के होलीःपुलिस-वकील ठिठोली को पढते हुए, तीस हजारी कोर्ट में हुए पुलिस-वकील की भिडंत याद आ जाती है। इस व्यंग्य लेख में लेखक दोनों पक्षों पर चोट करता हुआ लिखता है- मूल स्वभाव ही वह भाव होता है जिसमें डंक और फन जैसी चीजें मूल रूप में आ जाती हैं। एक दिन दोनों आपस में गले मिले। गले मिलना रास नहीं आया तो एक दूसरे की गर्दन पर लटक गए। गर्दनें झुकने लगी और टूटने भी लगी तो एक ने अपने हथियार उठाए, दूसरे ने अपने अधिकार अपने हाथ में उठा लिए।
बाबू हडताल पर है कार्यालयी संस्कृति पर व्यंग्य है। बानगी देखिए- यह हडताल ही है जिसमें बाबू लोग पहले से बताकर कहीं गए हैं वरना पता नहीं चलता है कि बाबू लोग सीट छोडकर कहाँ गए हैं? गूगल भी उनको सर्च नहीं कर सकता। ... गरीब की टाँग इस संकलन का उत्कृष्ट व्यंग्य है। एक गरीब गरीबी रेखा से ऊपर चला जाता है तो प्रशासन और सियासत में खलबली मच जाती है। देखिए यह दृश्य- चिंता स्वाभाविक थी। पंचायत से लेकर संसद तक के प्रयासों पर पानी फेरकर यह व्यक्ति गरीबी की रेखा के ऊपर चला गया। केंद्र सरकार ने राज्य सरकार से पूछा। राज्य सरकार ने जिला कलेक्टर को तलब किया। जिला कलेक्टर ने तहसीलदार से जवाब माँगा। तहसीलदार ने पटवारी से पूछा। पटवारी परेशान कि एक आदमी के कारण ऊपर तक हलचल मच गयी। जरूर ऊँची पहुँच है।
आ से आरक्षण को पढे तो इसमें भी व्यंग्यकार का विशेष लहजा नजर आता है- मैंने पूछा, आज लाठी लेकर कहाँ चले? मूँछों पर ताव देकर बोले, आरक्षण लेने जा रहे हैं।
मैंने कहा, जा तो ऐसे रहे हो जैसे भैंस खरीदनी हो। लाठी से मिल जाएगा आरक्षण?
वे बोले, क्यों नहीं मिलेगा ससुरा आरक्षण। लाठी के भय से तो भूत भी मिल जाता है। यहाँ तो लाठी और मूँछों के संयुक्त प्रयास से आरक्षण को झटक लेंगे। इसी प्रकार अजय अनुरागीजी के अन्य व्यंग्य अफसर का भरोसा और भरोसे का अफसर, अथ बकरी कथा, किताब का बदला किताब से, मंत्री का पिल्ला, बे फिक्र रहो, मैं हूँ ना, सिंथेटिक जवानी, स्कूल से बडी फीस, सडक पर सांडों का सावन आदि में गहरा तंज और निहितार्थ छुपे हुए हैं।
अब, कुछ कमजोर रचनाओं की बात कर लें। करेक्टर ढीला है, भ्रष्टाचार का ताबीज, चलती का नाम चप्पल, पावर में आना, मध्यम वर्ग का पानी, पानी की टंकी और आंदोलन, मुर्दों का एक्सचेंज, ट्रांसफर की टीस, काले धन का योगदान, कुत्ता यूनियन, मीठा खाओ- संस्कृति बचाओ, छोटा चुनाव बडा नेता, आदि रचनाएँ पुनर्लेखन की माँग कर रही हैं क्योंकि इनमें से कुछ रचनाएँ आकर में अत्यघिक छोटी हैं और कुछ रचनाओं में संवाद प्रभावशाली नहीं बन पडे हैं। सिलैंडर भरा रहे हमारा में यह संवाद देखिए- मुझे मेरे बच्चे ने लगभग डाँटते हुए कहा, आपको शर्म आनी चाहिए। यहाँ डाँटते हुए के स्थान पर हिकारत से देखते हुए लिखा जाता, तो मेरे दृष्टिकोण से अधिक उचित होता।
सात व्यंग्य संग्रहों के बाद अनुरागी जी का यह आठवाँ व्यंग्य संकलन है। इसमें भरपूर पठनीयता है। पुस्तक का आवरण सुंदर है।
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पुस्तक का नाम - एक गधे की उदासी
लेखक- डॉ. अजय अनुरागी
प्रकाशक- ज्योति प्रकाशन, जयपुर
प्रकाशन वर्ष- 2019
मूल्य- 300 रूपये
सम्पर्क : 193, महाराणा प्रताप कॉलोनी
सवाईमाधोपुर (राज.)- 322001
मो. 9414045857