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अर्धसत्य का माक्र्सवाद

गोपाल प्रधान
माक्र्सवाद को कफन देकर दफना चुके बौद्धिक अनंत विजय की 2019 में वाणी से बहुमूल्य (795 रुपये) पुस्तक माक्र्सवाद का अर्धसत्य का प्रकाशन उपेक्षा करने लायक घटना नहीं है । थोडी-सी लोकचेतना का सहारा लें तो कह सकते हैं कि इस किताब की सींग-पूंछ का पता नहीं चलता । ढेर सारी कतरनों को जोडकर माहौल का लाभ उठाने के लिए किताब का रूप इसे दिया गया है। अनंत विजय जी बहुत दिनों से हिंदी, साहित्य और भारतीय संस्कृति के क्षेत्र में वामपंथ और माक्र्सवाद के प्रभाव से की जाने वाली व्याख्याओं से उसी तरह निपटने की मुद्रा में खडे दीखते रहे हैं जिस मुद्रा में धारा 144 के बीच दिल्ली के कनाट प्लेस में कुछ प्रदर्शनकारी गोली मारो सालों को चीखते हुए जुलूस निकालते हैं। हाल के दिनों में यह हमला मुद्रा और भाषा से आगे बढकर देश के कुछ हिस्सों में ठोस भौतिक तथ्य में भी बदलता रहा है। हालाँकि इसकी विरासत कुछ लम्बी है जिसके शिकार राष्ट्रपिता भी हुए थे।
वे जिस वैचारिकी से संबद्ध हैं उसके साथ हिंसा तो पहले से ही जुडी हुई थी, फिलहाल झूठ का कारोबार भी बडे पैमाने पर नत्थी हुआ है। इस झूठ की प्रतिष्ठा के लिए पूर्ण असत्य की जगह अर्धसत्य का सहारा लिया जाता है, ताकि श्रोता या पाठक समुदाय के साथ छल किया जा सके और लेखक को उसका अपराध बोध भी न रहे। इस प्रत्रि*या में लेखक ने माक्र्सवाद को भी अपनी इस समझ का शिकार बनाया है। दुनिया में माक्र्सवाद को सिद्धांत और व्यवहार की एकता के बतौर देखा जाता है, लेकिन किताब के लेखक ने -माक्र्सवाद को एक सिद्धांत के तौर पर परखने की बिल्कुल कोशिश नहीं की है, बल्कि इस वाद के बौद्धिक अनुयायियों और भक्तों के त्रि*याकलापों को सामने रखने का प्रयत्न है। भाषा का छल देखिए कि उनके अपने हलके में विवेक का प्रयोग किए बिना अनुसरण करनेवाले को जो कुछ कहा जाता है उसी लकब को माक्र्सवादियों पर सोचे-समझे बिना चिपका दिया गया है। कहते हैं कि आपकी भाषा समूची संस्कृति का लक्षक होती है। आश्चर्य नहीं कि अनंत विजय जी को भक्तों की उपस्थिति सर्वत्र नजर आती है। इस भाषा के सहारे वे विवेकवान अनुसरण को भी संदिग्ध बना देते हैं। असल में वह दुनिया उनकी कल्पना से परे है जिसमें बौद्धिक स्वाधीनता और किसी उच्च आदर्श का अनुपालन एक साथ सम्भव होते हैं। माक्र्स के सिद्धांत पर विचार न करने का संकल्प जाहिर करके जब वे माक्र्सवादियों के आचरण पर ही विचार करने चलते हैं, तो उम्मीद बनती है कि इनके अलग-अलग संगठन उनकी जानकारी में जरूर होंगे । जानकारी तो उनको है, लेकिन आखिर अर्धसत्य के रचयिता को हांकने से कैसे रोका जा सकता है! इस तथ्य को तो वे शायद पूरी तरह खारिज कर देंगे कि माक्र्सवादियों में आपसी मतभेद भी रहे हैं ।
भूमिका में वे माक्र्सवादी व्यवहार के बतौर सोवियत संघ का और अनुयायियों के रूप में फिदेल कास्त्रो और माओ का जिऋ करते हैं। कहने को तो वे सिद्धांत के तौर पर देखने से परहेज का दावा करते हैं, लेकिन भूमिका में स्त्री प्रश्न पर माक्र्सवादी सैद्धांतिकी से जूझने का प्रयास करते हैं। माक्र्सवाद के अन्य बहुतेरे विरोधियों की तरह वे इस सवाल पर पारम्परिक नैतिकता के पक्ष से माक्र्सवाद पर हमला करते हैं और उपरोक्त अनुयायियों के जीवन को अनैतिक साबित करने की कोशिश करते हैं। असल में बुर्जुआ नैतिकता के सभी विश्वासियों की तरह उनकी आपत्ति भी माक्र्सवाद का स्त्री की स्वतंत्रता के पक्ष में खडा होना है। ये सभी लोग परिवार की असलियत को उजागर कर देने वाली माक्र्सवादी दृष्टि से खिन्न रहते हैं । उन्हें साहित्य की जानकारी के नाते पता होगा कि महादेवी वर्मा ने अपनी ऐतिहासिक किताब श्ाृंखला की कडियां में परिवार को भी एक कडी माना था। बहरहाल महादेवी और स्त्री मुक्ति के प्रसंग से उनकी एक और बात याद आई ।
पूरी किताब में जब कभी उन्होंने माक्र्सवाद का नाम लिया है, तो उसके साथ रोमांटिसिज्म जरूर जोडा है । अक्सर वे माक्र्सवाद का रोमांटिसिज्म लिखते हैं । इस धारणा से उनकी चिढ इतनी गहरी है कि नक्सलियों के रोमांटिसिज्म की भी चर्चा करते हैं । छायावाद के इस शताब्दी वर्ष में कोई तथाकथित साहित्य चिंतक रोमांटिसिज्म का इस तरह से उल्लेख करे उचित नहीं लगता लेकिन उनका यह रुख उनकी चिंतन पद्धति के मूल में है । कहने की जरूरत नहीं कि सामाजिक रूढि का नकार रोमांटिसिज्म की जान है और अनंत विजय जी रूढियों की पक्षधरता में यकीन करते हैं । याद दिलाने की जरूरत नहीं कि रोमांटिसिज्म का संबंध युवा प्रेम से होता है जिसे मुक्ति का रूप माना जाता है। इस प्रेम में तमाम किस्म की रूढियों का नकार होता है। दुखद यह है कि अनंत विजय जी के मित्रगण इसे लव जेहाद कहते हैं । इसके चलते समाज के प्रति उनका यह नजरिया तो है ही साहित्य के प्रति भी वे यही रुख अपनाते हैं । पूरी किताब का शायद ही कोई लेख ऐसा होगा जिसमें पुरस्कार वापसी की बात न हुई हो। उन्हें यह तथ्य तो जरूर मालूम होगा कि यह साल जलियांवाला बाग हत्याकांड का भी शताब्दी वर्ष है और इस हत्याकांड के विरोध में नाइटहुड लौटाकर गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने पुरस्कार वापसी को अन्याय के प्रतिकार से जोडा था। हिंदी के प्रसिद्ध लेखक प्रेमचंद ने साहित्य को जीवन की आलोचना कहा था। यह दायित्व आखिर साहित्यकार किस तरह निभाएँ अगर उन्हें इतनी भी आजादी न मिले। इस प्रसंग में अनंत विजय जी ह्वाट्स ऐप यूनिवर्सिटी और गोदी मीडिया के इस झूठ का भी समर्थन कर बैठते हैं कि यह पुरस्कार वापसी सुनियोजित थी । पुरस्कार वापसी से उनको इतना धक्का लगा कि उसका विरोध करने के लिए अशोक वाजपेयी को भी वामपंथी मानकर उन्हें भी गरिया बैठते हैं । संस्थानों या प्रतिष्ठान से उनका अनुराग उनके श्रीमुख से अरुंधति राय, महाश्वेता देवी और नयनतारा सहगल तक के बारे में गलतबयानी करा देता है ।
उनकी भाषा किस हद तक सरकारी है इसका प्रमाण तब मिलता है जब वे नक्सलियों के बौद्धिक समर्थकों को स्लीपर सेल की तरह काम करने वाला बताते हैं । उनकी भाषा में इस कदर जहर भरा है कि विरोध करने को वे लगभग हमेशा ‘छाती कूटना’ या ‘बुक्का फाडना’ कहते हैं । इस तरह की सांकेतिक शब्दावली का इस्तेमाल उन्होंने अपने राजनीतिक करीबियों से सीखा है जो जीवन की प्रत्येक घटना को हिंदू-मुस्लिम के चश्मे से देखते हैं। उनकी तरह ही सभी बातों का सरल समाधान खोजने के चक्कर में अनंत विजय जी वामपंथियों के साथ मानवाधिकार समर्थकों आदि को भी पीट देते हैं । राजनीति में चलने वाली मुहिम के साथ उनकी सहमति को आप उनके अग्रलिखित प्रस्ताव में देख सकते हैं । उनका प्रस्ताव है- राजनीति में जिस तरह से कांग्रेस मुक्त भारत पर लम्बा विवाद हुआ, उसी तरह से हिन्दी में विचारधारा मुक्त साहित्य पर भी बहस होनी चाहिए। उनका कष्ट है कि दबे-कुचले मजलूमों की बातें करते-करते हम अपने गौरवशाली इतिहास को भुलाने लगे। इस तरह के लेखन से उनकी विरक्ति का स्तर बहुत व्यापक है और इसमें समस्त विमर्श परक लेखन आ जाता है। कहते हैं दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, आदिवासी विमर्श और अब तो पिछडों के साहित्य का एक अलग कोष्ठक तैयार करने की तैयारी हो रही है।’ यह बात इनके समर्थन में नहीं, विरोध करने के लिए कही गई है। ध्यान दीजिए कि उनकी चिढ प्रगतिशील से लेकर दलित, स्त्री, पिछडा लेखन तक व्याप्त है । उनका वाम विरोध उन्हें साहित्य से विचारधारा के बहिष्कार के आह्वान तक ले जाता है । शायद विचारधारा विहीन लेखन का नमूना प्रस्तुत करने के लिए ही उन्होंने यह किताब लिखी है!
साहित्यकारों की पुरस्कार वापसी से उनकी चिढ का मूल उनकी इस धारणा में है कि साहित्यकारों को राजनीति में नहीं पडना चाहिए। उन्हें साहित्य लिखने तक ही सीमित रहना चाहिए । उनकी नजर में साहित्यकार को अपनी सीमा में रहना चाहिए । असल में उनकी यह सोच भी रोमांटिसिज्म विरोध से जुडी हुई है। रोमांटिसिज्म व्यक्ति को अपनी तय सीमाओं का अतिऋमण करना सिखाता है। जमीन पर रहकर भी आसमान छूने की कोशिश करने के लिए प्रेरित करता है । इस किस्म के प्रयास ही यथास्थिति के पक्षधरों को अरुचिकर लगते हैं। शासक वर्ग की सोच हमेशा से स्थापित और प्रतिष्ठित के उल्लंघन को हतोत्साहित करती है । अतिऋमण उसके लिए खतरनाक होता है । देवताओं को भी उनसे परेशानी होती है जो मनुष्य को बताई गई सीमा को पार करना चाहते हैं । अनायास नहीं कि रोमांटिसिज्म के अंग्रेजी कवि ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरोध मंइ थे । उनसे प्रभावित हिन्दी साहित्य का छायावाद, मुक्ति को बडे मूल्य के रूप में ग्रहण करता है। मुक्ति के सभी अर्थों का विरोध इस किताब में व्यक्त हुआ है । इसके लिए झूठ का सहारा लेकर किए दुष्प्रचार तक को लेखक ने मान्यता दी है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के विरोध के लिए फांसी की सजा के उनके विरोध के विरोध तक में अनंत विजय जी चले जाते हैं । दुख की बात यह कि इन सबके बावजूद राकेश सिन्हा ट्विटर पर उनका समर्थन नहीं करते !
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पुस्तक का नाम : माक्र्सवाद का अर्द्धसत्य
लेखक : अनन्त विजय
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य : 795/-, पृष्ठ 295
संस्करण : 2019
सम्पर्क : स्कूल ऑफ लैटर्स,
अम्बेडकर यूनिवर्सिटी, कश्मीरी गेट,
दिल्ली-110006 मो. ९५६०३७५९८८