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संस्कृत कविता में गाँधी

राधावल्लभ त्रिपाठी
1.
जय जय

जय जय युगजागरणविधायक!
भारत के सच्चे स्वाभिमान! कोटि कोटि जन नायक!
जय हे मृदुलमधुर मंगलमय मनुजमूर्तिधर निर्जर!
जय निश्छल! जय निर्मल! जय हे निर्मद जय निर्मत्सर!
जय अजातशत्रो! नवीन जय वशीकरण मृदुनिर्झर!
स्मितसंवर्षण भुवनविभूषण जय गीता के गायक!
जय जय युगजागरणविधायक!

जय मनुजों के संजीवन! जय जागृतजनभयभंजन!
ज्योतिर्मय जय जगत्परायण जय जगद्वन्द्य जनरंजन!
इस जग के अवलंबन जय जगती में एक निरंजन!
जनताहित सौ वर्ष जियो तुम आर्यधर्मपरिचायक!
जय जय युगजागरणविधायक !

मूल कवि- ईशदत्त शास्त्री

2.
महात्मा

मन से महत् हो तुम
इसलिये महात्मा हो तुमए
मन, वचन, कर्म से
एक बन कर रहे तुम।

स्थितप्रज्ञ की पहचान शास्त्र में
कौन जान पाता
स्थितप्रज्ञ तुम्हारे जैसा
यदि न सामने आता।

बहुतों ने सुनी है पावन
बोधिसत्त्व की कथा
पर आज के बोधिसत्त्व तो बस
केवल दिखते हो तुम ही।
बहुत से लोग जानते हैं
पुराण की यह कथा
कि तप से थर्राता है इंद्र भी
तपस्या की वह सच्ची शक्ति
जानना चाहे यदि कोई
तो हमारे इस महात्मा को देखे।

कहाँ तो केवल लँगोटी के धन वाले
क्षीणकाय महात्मा हमारे
और कहाँ विविध आयुधों से लैस
अंग्रेज राजा!
पर वह निरन्तर
डरता ही रहा है महात्मा से
अंग्रेज राजा पग-पग पर
काँपता चलता है
रक्षा के सारे साधनों के बीच भी।

जिन के रहने पर संसार मंगलमय बना है
हम सब के कल्याण के लिये
महात्मा वे
सदा जीवित रहें।

मूल कवि- विधुशेखर भट्टाचार्य

3
मोहन

कैलास के जैसी शुभ्र कांति
और ऊँचाई हिमालय की
अपनी आभा से आलोकित करते जग को
और विशेषतः भारत को

देश के दारिद्रय् के संताप से
विदीर्ण हृदय वाले यति हैं गाँधी।
तपस्या से छीज गई उनकी काया
देश के दुःख को उजागर करती उनकी काया।

विश्व के कल्याण की चिंता में मगन
उनका मन निरंतर
दूरदर्शी मुनि वे हैं
या आकाश से उतर आये देव कोई

बुद्ध की तरह महान, बन्धुता के भाव में
हर प्राणी से बँधे हुए वे
जगत् के कल्याण की भावना से
हरदम वे भरे हुए हैं

सेवाधर्म, अनासक्ति योग और कर्म के द्वारा
ईश्वर की पूजा का पथ दिखाने को
एक और भगवान् वासुदेव
भारत में अवतरित हुए -
वही गाँधी हैं

नाम महात्मा मोहनदास गाँधी
कर्म विश्व को विस्मयमोहित करने वाले

दीनों के समुत्थान के लिये
स्वातर्त्र्य की स्थापना के लिये
विश्व में प्रेम के प्रसार के लिये
उन्होंने लिया है जन्म।
(मोहनगीता, 1945, 1.37-43)

मूल कवि- आचार्य इन्द्र
4.
कारागार में गाँधी

भारत देश के निखिल पारतंर्त्र्य को
जड से उखाड फेंकने को
कसी कमर जिसने
कारागृह को जिसने बना दिया एक पावन मंदिर
चिरजीवी हो भारतपारिजात वह

जिनके दर्शन भर कर
उमड उमड पडता है लोगों के मन के अंदर
शांति का अपार पारावार
निरंतर
केवल लँगोटी भर पहन कर
मन में भरता उदात्त भाव
चिरजीवी हो भारतपारिजात वह

जिनकी अनघ आत्मशक्ति और भरपूर धीरज
बुद्धि की पराकाष्ठा, दृढता और परम शांति
भारत को ले आई सच्ची समृद्धि के पथ पर
चिरजीवी हो भारतपारिजात वह

जिनकी बुद्धि का सहारा लेकर
भारतीय जनता कर पायेगी पार
परतंत्रता का महासागर
मान्य जगत् में शाश्वत अजातशत्रु एक
चिरजीवी हो भारतपारिजात वह।
(भारतपारिजातमहाकाव्य)

मूल कवि- स्वामी भगवदाचार्य

5.
कुसुमाञ्जलि

कुटिलता की कलाओं से कीलित यह काल
कालकूट को उगलता निरंतर यह दुष्काल
चंचल मन, निर्बल आकुल व्याकुल जन जन
किसको ताके, खडा अवश राजसत्ता के आगे

खनखन करती हैं बडी क्रूर जंजीरें
सिर से पाँव तक बँधी ये जंजीरें
राजसत्ता बन गई है घोर आततायी
किसकी शरण में जाए दीन हीन जन

महाभारत के महासमर में
रणभूमि में चुक गईं थीं सब सेनाएँ
कृष्ण तो थे अनुपम बुद्धिबल संपन्न
पर वे भी न अपना सके
सफल होने वाली जिस नीति को
हमारे समय के एक मोहन ने
जिसे अपनाया।

अवसन्न है सत्य, धर्म हुआ पराङ्मुख
धरती जल रही युद्ध की ज्वाला में
संशयग्रस्त है जीवन,
कौन है दिव्यशक्तिमय
जो फिर अवतार ले
और सब को बचा ले

सत्याग्रह एक अद्भुत पराऋम से भरा शस्त्र
एक शाश्वत सफलता से संवलित शस्त्र
साम्राज्य के वैभव को झकझोर कर
गिरा देने वाला शस्त्र
इसकी कीर्ति कथा में सज्जनों के वचन
गूँजते रहें निरंतर

जिसकी प्रतिहिंसा संभव नहीं
वह दृढ अहिंसा विजयी है उस महाविभूति की
यह आत्मा का जागरण
विजयी देश की शक्ति का
जमुहाई ले कर उठ जाना
समस्त स्वाभिमान को समेट कर।

चुकाना होगा स्वतन्त्रता का मूल्य
नहीं तो अर्जित न हो सकेगा
मातृभूमि की मुक्ति का लक्ष्य
इसे पाने के लिये मिट जाना होगा
पराशक्ति का फिर से करना होगा आराधन

बली भले है गौरांग भूप
दर्प का उसका है पथ
फिर भी भारत भूमि को छोडना होगा उसे
मोहन ने जो दिया है मंत्र उसे जपने से डरो मत
हित उसी में है वही सत्य है।

सत्याग्रह का व्रत धारण कर
जैसे चऋ सुदर्शन लिये हाथ में
तप अपना पूरा कर
परदुःखों से बने कातर
बली शत्रुओं को सम्मोहित कर
समशक्ति वालों में भक्ति सदा उमडे मोहन के लिये

सत्य में संसक्त सितात्मा
कविकृति में निपुण गोवर्धन की श्री वाले
अंगुलि पर चऋ सँभाले
साथ चलने वालों, भटके जनों का नेतृत्व करने वाले
एक वही कर्मयोगी सारी हित की विधि में कमर कसे
ईश्वर पर आश्रित
वे सदा बचाये देश को
सब नरों में श्रेष्ठ निर्व्याजसुंदर मोहन

मूल कवि- सर्वतन्त्रस्वतन्त्र पं. महादेवशास्त्री

6.
भारतराष्ट्रपिता

जय जय भारतराष्ट्रपिता
सकललोकवन्दित राष्ट्रपिता

विश्वशान्तिदाता
सदा विजयी हों महामानव भारतराष्ट्रपिता।
जय जय भारतराष्ट्रपिता

अजातशत्रु रणबाँकुरे वे पारतन्त्र्यहन्ता।
सोये जन को सन्मति देते सत्याग्रहनेता।
जय जय भारतराष्ट्रपिता

सत्य अहिंसा जिन्हें मान्य है विविधधर्मसमता
अपरिग्रह और विश्वबन्धुता श्रीगीतामाता
जय जय भारतराष्ट्रपिता

पीडित, शोषित और प्रताडित सब के जो हैं बंधु
आश्वासन जन जन को देते जो करुणा के सिंधु
जय जय भारतराष्ट्रपिता

रघुपति राघव ईश्वर अल्लाह के अनुपम गाता
परमवैष्णव व विमलज्ञानी मानवभाग्यविधाता।।
जय जय भारतराष्ट्रपिता

मूल कवि- श्रीधरभास्कर वर्णेकर

7.
गान्धी

एक मोहन ने
अँगुलि पर धारण कर लिया था
गोवर्धन पर्वत
यह सुना है।
पर एक और मोहन ने लाठी पर
धारण किया सारे देश को
वह देखा है।
0
चश्मे से भीतर से
सत्य को देखती आँखें
दुर्बल शरीर
अहिंसा की रक्षा करता हुआ ।
एक वस्त्र
राष्ट्र की लज्जा को बचाता हुआ
काँपते दो हाथ
देश के अवलंबन बनते
कृश वक्षःस्थल
चित्तौड का किला लगता है
झुके कंधे
स्वातन्त्र्य धुरी को ढोते हुए
राम का नाम लेकर
पाई गई मृत्यु
जीवन का महोत्सव।
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भले ही
एक लाठी के सहारे से वंचित देश
गिरेगा नहीं,
पर मार्ग से भटक सकता है
0
राजघाट पर
सुन पडती है नेताओं के चरण की आहट
समाधि धीरे धीरे कहती है ...
हे राम! हे राम!!
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अब सत्य आग्रह नहीं करता,
अहिंसा उपवास नहीं करती
निर्वसन स्नेह मार्गों पर भटकता नहीं है
शांति शांति का जप करते हैं केवल
बुलेट्प्रूफ वाहन
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खादी के शुभ्र पत्र पर
लिखे हुए झूठ से
अच्छा है
टेढे-मेढे दुर्वाच्य अक्षरों में लिखा सच
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यरवडा के चरखे की तरह
घूमता है जब सत्य
तब
क्षणभंगुर कपास के धागे सा कोई मानव
बुन रहा होता है स्वतंत्रता का वस्त्र
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सुदामा हो कर
मोहन ने खोल दिये राजद्वार
चावल जैसी शुभ्र मुक्ति
बाँट दी खाली हथेलियों में
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साबरमती आश्रम में
कहीं पर
दीन निष्कलंक वस्त्र शाखा पर लटका नहीं दिखता
काच के शो केस में चश्मा है
दृष्टि नहीं
चप्पलें हैं,
रास्ता नहीं,
सेवाकुटीर है,
लुप्त हो चुका पर
ऋषि का सत्य।
साबरमती
अब किसके स्पर्श से फिर जी सकेगी?
0
चला गया अधनंगा संत
अपने पूर्ण नग्न सत्य का तेज पहन कर,
अब नहीं है उसकी प्रतिच्छाया भी
अब
छायाएँ घूमती हैं डरावनी
धवल खादी धारे हुए
कच्चा माँस खाने वाले राक्षसों की।

मूल कवि- हर्षदेव माधव
(कण्णक्या क्षिप्तं माणिक्यनूपुरम्, श्रीवाणी अकादेमी, अहमदाबाद, 2000, पृ. 25-26

8.
शहीदपार्क में स्थित गान्धी की मूर्ति

मेरे शहर के बीच में
चौराहे पर
सूरज उगने से लेकर आधी रात तक लगा रहता है
लोगों का ताँता
उसी में हरी घास के बीच
बाउण्ड्री वाल से घिरा
छोटा-सा बगीचा है
जिसे शहीदपार्क कहते हैं।

उसी में एक कोने में
संगमर्मर के पत्थरों से बनी
वेदी है
लगातार आते-जाते
डीजल पेट्रोल की गाडियों से निकलते धुएँ के थक्कों से
कुछ मटमैली होती-होती कुछ चितकबरी हो चुकी है।
वेदी पर विराजमान है
राष्ट्रपिता गाँधी की मूर्ति
न वह हँसती है
न रोती है
भगवद्गीता में निरूपित
स्थितप्रज्ञता पालन करती हुई।

मूल कवि- विन्ध्येश्वरीप्रसाद मिश्र ‘विनय’

9.
सेवाग्राम में

ध्यान से देखें आप लोग, यह बापू की कुटी इधर रही
महात्मा जी इसमें नहाते थे प्रतिदिन, वह टब है यही
भले न हो चिकना चमकीला और शुभ्र, लोहे का ढाँचा है
और मजबूत बहुत है देश में अपने ही बना हुआ है।

एक और टब था जिसको विदेश से मँगवा कर
सेठ बजाज ने बापू को भेंट किया उत्साहित होकर
यह तो अपने देश में नहीं बना इससे करना क्या
चिढ कर बोले थे बापू, और वह टब लौटा दिया।

ढलती उम्र में इस कुटिया में कुछ समय रहे थे बापू
उधर उस कोने में कस्तूर बा सोती थीं, इधर बापू
उधर देखिये वह रही समय की अब मारी जगह वहाँ
सुख से बैठे बापू किया करते थे सूर्यस्नान जहाँ।

इसी आश्रम में माता कस्तूरबा हुईं बीमार एक बार
बापू बोले - केवल मैं ही लूँगा इनकी सेवा का भार
आश्रम के बाकी लोगों को मना करके बरबस
बिस्तर से लगी बा की सेवा मन से वे ही करते बस।

इसी द्वार से गाँधी महात्मा निकला करते थे बाहर
हाथों में अपने बा के मल और मूत्र के पात्र उठा कर
एक अनुपम पूजाभाव रहा करता था उनके मुख पर
फैलती गंध दिव्य, सेवा के फूल यहाँ खिलते फिर।

उधर उस कुटिया में रहते थे परचुरे शास्त्री पंडित
पहले बापू कभी उन्हीं से पढा किये थे संस्कृत
समय की बात कोढ से अंग उनके गलने को आये
तब करुणामय बापू उनको सेवाग्राम ले कर आये।

सेवा का निष्ठा-व्रत धारे वे प्रतिदिन उनकी कुटिया में जाते
पूज्य मान कर परचुरे शास्त्री की सेवा करते, नहलाते
शास्त्री जी के शरीर से पीब बहा करता जो हरदम
बापू करते उसको साफ, लगाते घावों पर, मन पर उनके मरहम।

यहीं खान अब्दुल गफ्फार खाँ का बापू से मिलन हुआ
यहीं संत तुकडो जी का भी बापू के सँग वास रहा
इधर नित्य नियम से प्रार्थना और भजन होते
इधर कताई होती नित्यप्रति चरखे चलते होते।

यह जो पीपल का ऊँचा पेड उस ओर खडा है
मुदित मन से बापू ने इसको अपने हाथों से रोपा है
इधर रही उनके स्नेह में नहा चुकी यह तुलसी
उनके छूने से जो हो जाती थी हुलसी हुलसी।

इधर इसी जगह पर बापू बैठे थे ध्यान लगाकर
सर्प रेंगता हुआ आ गया गोद में उनकी सर्रा कर ।
इसे न कुछ हो, भले यह मुझे काट ले,
मैं मर जाऊँ- काट ले बापू
जब तक वह चला नहीं गया, बैठे रहे यहीं पर बापू।

कोई बूढे सज्जन हैं, जो उत्सुक पर्यटकों को बताते हैं
यह सारी जो करुणामय गाथा वे जो हर रोज सुनाते हैं
वह आकुल घूमती है यहाँ सेवाग्राम के भीतर ऐसे
निर्मल मन से चला दिया हो बापू ने चरखा जैसे।

यहाँ लौट कर मैं फिर आऊँगा केवल तब
मेरे प्रिय देश को स्वराज्य मिल जायेगा जब
साबरमती आश्रम से यह कह कर तब चले गये जो बापू
लौटकर नहीं आये फिर उस आश्रम में बापू

सौंदर्य का समुदाय जो था सजीव उजास से भरा-भरा
जीवन में आचरण की निधि बनकर जो सँवरा निखरा,
जो होता था गतिलयमय स्पंदित एक सजीव संसार
विकल अब वह बन कर रह गया है प्रेतभूमि का आकार।

छीजता हुआ सेवाग्राम प्रयास कर के बचा कर रखा हुआ
आगन्तुक दर्शनेच्छु जनों के कौतुक हित जैसे अँका हुआ।
जो घोर अँधेरे में जला करता था बन कर कोई दीप
बन गया है अब अपने में एकाकी वह एक द्वीप।


जो चरखा उनके लिये धर्मचऋ ही था सहज सरल
जिसमें मनोवृत्तियाँ खप कर गल जाएँ चंचल,
हुई बात विचित्र कि वह है एक चित्र बस अँका हुआ
उसका प्रतीक भर सुंदर-सा देश में है ज्यों टँगा हुआ।

जिस चरखे से प्रतिदिन काता जाता था सूत समुज्ज्वल
जिससे जीवन को जीने के सूत्र मिला करते थे निश्छल
वह बिला गया है खादी नाम की रट में प्रचार में
उसकी दृष्टि और सृष्टि गुम हो गई बाजार के प्रसार में।

कितने कितने सपने लीन हुए कितने कितने जन दीन हुए
इस भारत के जनपद कितने हीन मलीन हुए
नाथूराम नाम के क्रूर असुर ने जिस दिन घात लगाकर
महापुरुष गाँधी की हत्या कर दी सहसा आकर।

गाँधी कर दिये गये विस्थापित स्वदेश में, इस दुनिया में
गाथा उनकी यह बची रह गई देश में, इस दुनिया में
निष्प्राण इंद्रियों के बगैर केवल काया में शेष रहा
सेवाग्राम अभी भी क्या उनका रस्ता है ताक रहा?
***
सम्पर्क : कर्नाटक प्राच्य विद्यापीठ भंडारकर,
ओरियंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट, ८१२
शिवाजी नगर, चिपलूणकर मार्ग, आई.एल.एस लॉ कॉलेज के पास, पुणे - ४११००४